दारोगा वीसी का दमनचक्र : छात्र को छह महीने की सज़ा
वर्धा प्रकरण अब हम लगभग खत्म ही करना चाहते थे। कुछ टिप्पणियों के जरिये लोगों ने आग्रह किया था कि बहुत हो गया, अब दूसरे मामलों को उठाना चाहिए। कल मानवाधिकार कार्यकर्ता सलीम अख्तर सिद्दीक़ी ने फोन पर समझाया भी कि मामला बोरिंग हो चला है, अब रुख बदलिए। दरअसल मेनस्ट्रीम मीडिया यही करता है। मसले उठाता है और मसला अपनी जगह हल हुआ हो या न हुआ हो – यह सोचकर कि अब लोग पक गये होंगे, खबरों की दूसरी चटपटी गली खोज लेता है। हम यह तो नहीं कह रहे कि हमारे इस अभियान से वर्धा में लोकतंत्र बहाल हो जाएगा, दलितों को उनके अधिकार और उनका वाजिब सम्मान मिलने लगेगा, दोयम दर्जे के शिक्षकों को जातीय या किन्हीं और वजहों से प्रश्रय मिलना बंद हो जाएगा और अनिल चमड़िया की वापसी हो जाएगी… लेकिन इतने आश्वस्त जरूर थे कि अपनी बेहतरीन लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष छवियों के साथ प्रचारित विभूति नारायण राय का चेहरा सबके सामने बेपर्दा हो जाएगा। शायद ऐसा हुआ भी है। बहरहाल, हम इस मसले को विराम दे देते, लेकिन वर्धा में बेज़ा हादसे बंद ही नहीं हो रहे हैं। बेशर्मी की नयी हद ये है कि एक असहमत छात्र को वीसी ने दूसरे बहानों से छह महीने के लिए कैंपस से बाहर निकाल दिया। अनिल ने प्रोफेसर चमड़िया प्रकरण और कई दूसरी वजहों से क्षुब्ध होकर अपनी पीएचडी की डिग्री छोड़ने का फ़ैसला लिया था और इस आशय का एक निजी पत्र वीसी को मेल किया था। जब हफ्ते भर बाद भी उनका कोई जवाब नहीं आया, तो अनिल ने उस मेल को सार्वजनिक कर दिया। तमतमाये वीसी ने कुछ पुराने मामूली मामले निकलवाये और कुलानुशासक के जरिये कार्रवाई कर दी। एक छात्र के हवाले से हम ये पूरा प्रकरण आपके सामने रख रहे हैं : मॉडरेटर
यह नवंबर माह की घटना है। (सत्ता तंत्र और पुलिस यह जानती है कि घटनाओं कब कैसे उठाया जाए और तिस पर विभूति नारायण राय जैसा तानाशाह यह बेहतर तरीके से जानता है।) मीडिया विभाग के तृतीय छमाही का सेमिनार आयोजित किया गया था। यह एक विभागीय सेमिनार था, जिसमें छात्र-छात्रों द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले सेमिनार के निरीक्षण के लिए कोई भी बैठ सकता था। यह विश्वविद्यालय में एक स्वस्थ परंपरा के तौर पर था, जिसे भाजपाई कहे जाने वाले कुलपति जी गोपीनाथन ने भी बरकरार रखा। यह सेमिनार मीडिया विभाग के एक अध्यापक अख्तर आलम द्वारा आयोजित किया गया था। इसमें अनिल, जो कि विभाग के शोध छात्र हैं, जब सम्मलित होने के लिए गये, तो उन्हें घुसने से मना किया गया और कहा गया कि पहले विभागाध्यक्ष (चोर गुरु अनिल अंकित) से पूछ कर आओ। ऐसे में अनिल द्वारा यह कहा गया कि यह विभाग में एक स्वस्थ परंपरा है, इसलिए इसमें विभागाध्यक्ष से पूछने की कोई जरूरत नहीं है, जिसका समर्थन वहां पर उपस्थित सेमिनार दे रहे छात्रों ने भी किया और अनिल को बैठने दिया गया। सेमिनार प्रस्तुत कर रहे दिलीप नाम के एक छात्र की किसी तथ्यात्मक गलती को अनिल ने ठीक करने को कहा, जिस पर अख्तर आलम ने कहा, आप बैठ सकते हैं, कुछ बोल नहीं सकते। जबकि पहले ऐसा होता था कि उपस्थित छात्र सवाल करते थे और बहसें होती थीं। अनिल उसके बाद वहां से निकल आये। बाद में अनिल अख्तर आलम से मिले और घंटों बातचीत की, जिसमें वे इन सारी बातों को लेकर सहमत भी थे। पर चोर गुरु अंकित के उकसाने पर अख्तर आलम ने एक पत्र लिखा, जिसमें कहा कि अनिल ने हमसे वाद-विवाद किया। इस पर कुलानुशासक ने अनिल को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया। विश्वविद्यालय में चल रही प्राक्टर की सामंती व कुलपति की तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्रों में से अक्सर अनिल को नोटिस मिलती रहती थी और परेशान किया जाता था। यहां तक कि यह सब प्रायोजित रूप से छात्रों के द्वारा चिट्ठियां लिखवा कर किया जाता था। नमूने के लिए इस लिंक पर जाएं… नमूना है… mgahv.blogspot.com
अनिल ने कारण बताओ नोटिस का जो जवाब भेजा, वो ये रहा…
प्रो मनोज कुमार
कुलानुशासक
म गां अं हिं वि वि, वर्धा (महाराष्ट्र)
महोदय,
आपका पत्र (पत्रांक:/जा क्र 87/09, दिनांक 25.11.2009) मिला। पत्र में हालांकि यह स्पष्ट तौर पर उल्लिखित नहीं है कि यह पत्र वास्तव में है क्या? क्या यह ‘कारण बताओ अधिसूचना’ है या सामान्य पत्र? बहरहाल, सामान्य तौर पर विश्वविद्यालय में तथा खासतौर से विभाग में हमेशा से अकादमिक गुणवत्ता आधारित माहौल निर्मित करने के लिए संपूर्णता में अपने आप को हर तरह से जिम्मेदार मानते हुए मैं इस पत्र का जवाब लिख रहा हूं, अन्यथा जिस मामले के बारे में आपने मुझे “स्पष्टीकरण” देने को कहा है, मैं उसे ‘वास्तविक मुद्दा’ नहीं मानता हूं। इसके पहले एक बात यह कि मेरा नाम ‘अनिल मिश्रा’ नहीं है। औपचारिक तौर पर ’अनिल कुमार मिश्र’ लिखा जाता है, लेकिन भविष्य के पत्रों में अगर आप मुझे सिर्फ अनिल संबोधित करेंगे, तो मेहरबानी होगी। मैं सिलसिलेवार तरीके से अपनी बातों को निम्न बिंदुओं से स्पष्ट करने की कोशिश करूंगा।
आपने अपने पत्र में लिखा है, “माननीय कुलपति महोदय के द्वारा मेरे संज्ञान में लाया गया है कि 16 नवंबर 2009 को एमए तृतीय छमाही के वर्ग सेमिनार में आपके प्रवेश को लेकर जनसंचार विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ अख्तर आलम के द्वारा आपत्ति करने और विभागाध्यक्ष से अनुमति प्राप्त कर बैठने को लेकर वर्ग में वाद-विवाद किया। बैठने की अनुमति देने के बावजूद आपने व्यवधान उत्पन्न किया। जबकि वर्ग सेमिनार परीक्षा का एक हिस्सा है।” (शब्दों पर जोर मेरा।)
1) सबसे पहली बात, आपने बिल्कुल गलत लिखा है कि माननीय कुलपति महोदय द्वारा आपके संज्ञान में यह बात लायी गयी। आपको याद होगा (और मुझे यकीन है कि आपको जरूर याद होगा) कि उसी दिन इस पूरे प्रकरण के बाद मैंने खुद आपके कार्यालय में आकर इस प्रकरण की तफसील से जानकारी दी थी। मैंने आपसे स्पष्ट कहा था कि अगर आप चाहें तो मैं लिखित दे सकता हूं लेकिन आपके इस आश्वासन पर मैंने लिखित नहीं दिया कि आप सारे मामले को मौखिक तौर पर संज्ञान में ले रहे हैं। साथ ही इस प्रकरण को विभाग में स्थापित और अब रोज-ब-रोज प्रचलित (और असहनीय भी) होती जा रही फर्जी और निरंकुश कार्यप्रणाली से जोड़ते हुए मैंने विभाग के और भी कुछ बेहद बुनियादी और गंभीर अकादमिक मुद्दों की ओर आपका ध्यान दिलाया था।
2) आपके पत्र की भाषा से झलक रहा है (और जहां तक मैं समझ पा रहा हूं) कि आपने डॉ अख्तर आलम से उस क्षण हुई मेरी बातचीत के बारे में मुझ पर दो आरोप लगाते हुए स्पष्टीकरण की उम्मीद की है। पहला, मैंने “वाद-विवाद” किया और दूसरा, बैठने के पश्चात “व्यवधान” उत्पन्न किया। श्रीमान, मैं इन दोनों शब्दों के ठीक-ठीक मायने नहीं समझ पा रहा हूं कि आपका इनसे आशय क्या है? बेहतर होगा कि आप मुझे डॉ अख्तर आलम द्वारा मेरे खिलाफ दिये गये शिकायत पत्र की प्रति उपलब्ध कराएं ताकि मैं उनके आरोपों के स्पष्ट अर्थ समझ सकूं।
3) उस दिन की बातचीत को, जिसके पहले अंश को आपने “वाद-विवाद” कहा है, मैं एक ‘बहस’ कह सकता हूं जैसा कि कोई भी गंभीर और अकादमिक रुझान का विद्यार्थी किसी भी शिक्षक से करेगा। इतना ही नहीं, उस दिन चूंकि डॉ अख्तर आलम का पूरा व्यवहार मेरे लिए खुद भी बेहद अपमानजनक था, इसलिए उसी दिन अर्थात दिनांक 16 नवंबर को इस “बहस” के बाद, मैंने विभागाध्यक्ष प्रो अनिल कुमार राय ‘अंकित’ से इस बारे में अपनी आपत्तियां दर्ज करायी थीं। उनसे भी मैंने कहा कि अगर आप कहें तो मैं लिखित दे सकता हूं लेकिन उन्होंने मुझे आश्वस्त किया था कि ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं है, वे डॉ अख्तर आलम से बातचीत करेंगे।
4) इस पूरे मामले पर मेरा सिर्फ यह कहना है कि तृतीय छमाही के विद्यार्थियों के सेमिनार में मैंने जब बैठना चाहा, तो डॉ अख्तर आलम ने मुझे यह कहते हुए कक्षा से बाहर जाने के लिए कहा कि, “आप बैठ नहीं सकते!” मेरे ‘क्यों?’ पूछने पर उनका जवाब था कि ‘आप विभागाध्यक्ष से पूछ कर आइए।’ इस पर मैंने कहा, “किस कक्षा में कौन बैठेगा, यह विभागाध्यक्ष कैसे तय करेंगे? जबकि हमारे विश्वविद्यालय में अंतरानुशासनिक ढंग की शिक्षा की अवधारणा है। इसीलिए तो विश्वविद्यालय के अब तक के अकादमिक इतिहास में इच्छुक विद्यार्थी किसी भी सेमिनार में बैठते रहे हैं और जरूरत पड़ने पर सवाल पूछते रहे हैं।” वहां उपस्थित विद्यार्थियों से इस बात की प्रतिपुष्टि करने पर डॉ अख्तर आलम ने इस बेतुकी हिदायत के साथ बैठने को कहा कि “आप डिस्टर्ब नहीं करेंगे।” मैंने तत्काल कोई प्रतिवाद नहीं किया। एक विद्यार्थी ने अपने सेमिनार में जब कुछ तथ्यात्मक भूल की, तो मैं उसे ठीक करने के लिए उठा। डॉ अख्तर आलम ईर्ष्या से भर कर बोले, “आप डिस्टर्ब मत करिए!” मैंने तब प्रतिवाद करते हुए कहा कि “आप अजीब तरह से शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। महोदय, मैं डिस्टर्ब नहीं कर रहा हूं बल्कि एक तथ्यात्मक भूल को महज ठीक कर रहा हूं।” इसके बाद मैंने खुद ही कक्षा में और आगे बैठना उचित नहीं समझा और उठ कर कक्षा से बाहर आ गया।
5) महोदय, मेरा सवाल आपसे हमारे विद्यापीठ के अधिष्ठाता होने के नाते यह है कि अगर विभाग से संबंधित यह कोई बहुत जरूरी (Urgent) मुद्दा था, तो इसे डॉ अख्तर आलम द्वारा प्राथमिक तौर पर विभागाध्यक्ष और अधिष्ठाता के यहां पेश क्यों नहीं किया? इस पूरे प्रकरण में सीधे कुलपति महोदय को शामिल क्यों किया गया? क्या विश्वविद्यालय में कुलपति के अलावा अन्य कोई अकादमिक बॉडी इस मामले को सुनने तक में सक्षम नहीं थी? फिर जबकि मैंने आपको स्वयं सारे मामले की विस्तृत जानकारी दी थी, खुद विभागाध्यक्ष प्रो अनिल कुमार राय ‘अंकित’ को जब मामले की सारी जानकारी थी तो बावजूद इसके कुलपति महोदय को इस बारे में ठीक ठीक जानकारी क्यों नहीं दी गयी? क्या ऐसा हुआ कि जानकारी दिये जाने के बाद भी उस पर गंभीरतापूर्वक कोई पक्ष क्यों नहीं लिया गया?
6) भविष्य के पत्राचार तथा किसी किस्म की प्रस्तावित कार्रवाई को सरल बनाने के लिए एक बात का उल्लेख करना जरूरी लग रहा है। इस बातचीत के दो दिन बाद डॉ अख्तर आलम से उनकी कक्ष में मेरी तक़रीबन एक घंटे चर्चा हुई, जिसमें हमने व्यक्तिगत तौर पर विभाग से संबंधित कई मुद्दों पर खुली चर्चा की। इस पूरी बातचीत के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें पिछली किन्हीं बातों से किसी तरह की परेशानी नहीं है। बल्कि विभाग की स्थितियों पर उनकी कुछ तकलीफें बेहद जैनुइन थीं, जिनके बारे में चर्चा शायद कभी न हो। इससे स्पष्ट होता है कि अगर यह कोई वास्तविक मुद्दा होता, तो डॉ अख्तर आलम कहीं न कहीं जरूर इस बारे में कोई इशारा करते। जबकि सारी बातचीत बिल्कुल मैत्रीपूर्ण तरीके से हुई थी। इसी विश्वास के कारण मैंने शुरू में कहा है कि विभाग का यह कोई “वास्तविक मुद्दा” नहीं है।
7) मैं साफ तौर पर कहना चाहता हूं कि विश्वविद्यालय के प्रमुख पदाधिकारी अकादमिक प्रारूपों पर अगर इस तरह का नजरिया रखते हैं, तो यह विश्वविद्यालय के विजन और अकादमिक भविष्य के निर्माण की बची-खुची उम्मीद के साथ एक क्रूर खिलवाड़ है। आपने अपने पत्र में कहा है कि “वर्ग सेमिनार परीक्षा का एक हिस्सा है।” मैं समझ सकता हूं कि यहां आपका आशय शायद कक्षा से ही है। यह कोई नयी बात नहीं है। हम सभी यह जानते हैं। यहां आप पिछले ढाई तीन सालों से हैं, आप इस तथ्य से भलीभांति परिचित हैं कि यहां विद्यार्थी किसी भी सेमिनार में जाते हैं, सवाल पूछते हैं। सब कुछ से अवगत होते हुए भी निराधार तरीकों और वजहों से आपने मुझसे जिस तरह से स्पष्टीकरण मांगा है, यह सत्ता का मनमाना (दुर) उपयोग है, जो सख्त आपत्तिजनक है।
पत्र के अंत में, मैं अपने आपको हिंदी के चर्चित कवि देवी प्रसाद मिश्र की एक कविता उद्धृत करने से नहीं रोक पा रहा हूं:
हमारे समाज में आदमी को अपमानित करने की
कई हजार तकनीकें विकसित कर ली गयी हैं
समाज में इतने सारे लोग इतने सारे तरीकों से
अपमानित किये जा रहे हैं कि लगता है
जो बहुत सम्मानित है, वह संदिग्ध है।
विभाग से संबंधित कुछ गंभीर तथा बेहद जरूरी अकादमिक मुद्दों के बारे में आपसे सार्वजनिक बातचीत करने और इस पत्र के जवाब में,
अनिल
पीएचडी, जनसंचार विभाग
अनिल के इस जवाब के बाद एक कमेटी गठित कर दी गयी। कमेटी में दलित उत्पीड़न के लिए कुख्यात आत्मप्रकाश श्रीवास्तव, निपेंद्र मोदी, अशोकनाथ त्रिपाठी जैसे लोगों को रखा गया। ये सब संघ के सदस्य हैं और चुटिया धारण कर कक्षा में पढ़ाने आते हैं। इस पूरे मसले पर अनिल या वहां पर उपस्थित किसी छात्र से कुछ नहीं पूछा गया और छह माह के रस्टीकेशन का आर्डर टाइप कर दिया गया है। चूंकि अनिल वर्धा में उपस्थित नहीं हैं, इसलिए यह उन तक नहीं पहुंचाया जा सका। यह एक कर्मी ने फोन से बताया। पत्र में लिखा है कि अख्तर आलम के मसले पर कमेटी का निर्णय आ चुका है, जिसमें आप दोषी पाये गये हैं। इस आधार पर आपको छह माह के लिए रस्टीकेट किया जाता है। इस फैसले में अहम भूमिका मनोज प्राक्टर ने भी निभायी, जो सामंती मूल्यों के कारण छात्राओं का छात्रावासों में प्रवेश निषेध मानते हैं और इसे नैतिकता के खांचे में देखते हैं।









ab kulapati proctar aur is tarah ke tanashaho ko muntajar al-jaidi ki bhasha me samjhana chahiye.
yet apratyashit nahi hai, wardha ke is VC ke bare me kuchh bhi apratyashit nahi hai, yah VC camous band (sane dai) bhi kar sakta hai, kuchh bhi apratyashit nahi. lekin itna tay ki jhuthi hi sahi, jo image VN Rao ki thi, uska janaza nikal chuka hai.
दरअसल, अब वी सी महोदय सामंतशाही से राजशाही की ओर बढ रहे हैं. अनिल का निलंबन इसी का एक उदाहरण है. छात्रों ने वर्धा में जो एकजुटता दिखाई है उससे जाहिर है की ऐसे मामले और बढ़ेंगे. हमें इस ‘मोनार्किज्म’ का एकजुट हो विरोध करना चाहिए. अनिल का निलंबन निंदनीय है. वी सी महोदय को लगता है की वो सही हैं तो छात्रों से विश्वविद्यालय में ही बात करे. वो ऐसे ही निकलते रहे तो यह भी ध्यान रखना चाहिए की वहां गिनती के ही छात्र हैं, और इनमे से बहुमत उनके खिलाफ है. कहीं ऐसा न हो की वहां केवल राजा और उनेक चोर-चापलूस मंत्री ही बचे.
हम मोहल्ला के मोडरेटर अविनाश को भी बधाई देते हैं की वो तमाम दबावों के बावजूद विश्वविद्यालय के छात्र न होकर भी उनके साथ खड़े हैं. अविनाश जी, सलीम अख्तर सिद्दीक़ी की बात अपनी जगह सही हो सकती है लेकिन अभी जो कुछ मोहल्ला लाइव पर चल रहा है वो कहीं से गैर जरुरी नहीं.
मै कल प्रति कुलपति के पास पढाई लिखाई के मामले मे मिलने गया था. मुझे लग रहा था इस दौर मे भी पढाई ठीक से करनी ही चाहिए लेकिन प्रशासन को ऐसा नही लग रहा है. वे बिल्कुल परेशान करने के मूड मे है. तो फिर ठीक है चलने दीजिए.
आलोकधन्वा, कृष्ण कुमार, मृणाल पांडे और गंगा प्रसाद विमल इस बारे में क्या कहते हैं । इस बार तो मामला जातिवादी भी नहीं है । विभूति का मामला दरअसल एकांगी रूप से कभी जातिवादी नहीं रहा है । वो लोकतंत्र को अपने बूट के तले रखता है , इसके लिए वह जातिवादी भी हो जाता है । तथाकथित वामपंथियों, अतिवामपंथियों, समाजवादियों से उसकी यारी चौंकाती है और कई सवाल खड़े करती है ।
वैसे आलोकधन्वा की पगार कितनी है ? आखिर कितने में बिका गोली दागो पोस्टर का चरम क्रांतिकारी कवि । नामवर किस भाव मिलते हैं । चिटफंड कंपनी में उनका भाव कितना लगा और रि
टायर्ड पुलिस अफसर के हरम ( राजकिशोर के शब्द ) की देखभाल की पगार कितनी है । हम उन्हें किराए पर लेना चाहें तो क्या रेट होगा । अफसोस कि ये सब हमें जीते जी ही देखना पड़ा । अफसोस कि हम इन्हें महान मानते हुए बड़े हुए ।
लेकिन मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि जिस छात्र ने पहले ही विवि छोड़ने की घोषणा कर दी है और वह अब वहां लौटने को कतई इच्छुक नहीं है, उसे कैसे विवि से निष्कासित कर सकते हैं. क्या यह हास्यास्पद बात नहीं है…चूंकि अनिल अभी वर्धा में नहीं था, इसलिए वह औपचारिक तौर पर विवि छोड़ नहीं पाया था. वे एक एसे छात्र को निकाल रहे हैं, जो नैतिक तौर पर अब वहां का छात्र ही नहीं है.
हम एक एसे देश में रह रहे हैं, जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते थकतना नहीं लेकिन जिसे सबसे अधिक डर लोकतंत्र से ही है.
मेरा अविनाश जी से अनुरोध है कि इस मुद्दे को बंद करने के बारे में बिल्कुल मत सोचें। यह विवाद महज विवाद ना हो कर एक आंदोलन का रूप ले चुका है। इस आंदोलन में केवल वे लोग शराीक नहीं हैं जो अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं या जिन पर आरोप लग रहे हैं। हर वह व्यक्ति खुद को इस मुद्दे से जोड़ना पसंद करेगा जो झूठ और लालफीताशाही के खिलाफ समझौता नहीं करना चहता बल्कि लड़ना चाहता है। इसलिए अपनी सूचनाओं और बहस का उचित मंच उपसब्ध कराने का अपना सार्थक प्रयास बंद ना करें। विभूति नारायण जैसे लोगों को बेपर्दा होने का डर सबसे ज्यादा है। साथ ही अन्याय के खिलाफ लड़ने वालों का साथ देना हमारा-आपका फर्ज भी है।
avinash agar aap ye sab jald band nahi kiye to vibhooti aapke katl ki supari lekar khoj rahe hai. batawo jan pyari hai ya patrakarita.
Bura mat man Anil,
Apradhi kabhi khud ko Apradhi nahin manta, “TUMHARE SATH BHI AISA HI HAI”.
TERE KO KAUN NAHIN JANTA KI TU M.A. SE HI US UNIVERSITY MEIN BATTAMIZI BHARE KAM KAR RAHA HAI. AB JARA MAHAUL SAHI HO RAHA HAI TO TERE KO PARESANI HO RAHI HAI. TU KITNO KO ISTEMAL KARTA RAHA HAI, AB LAGTA HAI TERI ASALIYAT LOG BEHTAR SAMAJH GAYE HONGE.
भाई नाथ
पता नहीं आप कौन है. लेकिन अगर आपको लग रहा है कि विश्वविद्यालय में सब ठीक चल रहा है तो या तो आप के साथ प्रशासन विशेष तरीके से पेश आ रहा है या फिर आप इस छोटे से विश्वविद्यालय में अपनी आंखों से कुछ नहीं देख पा रहे हैं.
आप जैसे लोगों के साथ दिक्कत यही है कि जब तक अपने पर न पड़े तब तक आप मुँह नहीं खोलते.
ठीक है यार मत खोलो लेकिन जो कुछ बोलने लिखने वाले लोग हैं उसे क्यों परेशान कर रहे हो? क्यों उसको अपनी घटिया तर्क के उत्तर देने को मज़बूर कर रहे हो.
जाओ भविष्य में तुम्हारे लिए एक नौकरी सुरक्षित रहेगी यहाँ. सो जाओ और साल दो साल बाद अपनी इस वफादारी का ईनाम पाने का इंतज़ार करो.
Maoist killed 30 policemen in Bengal and killed 9 villagers in Bihar. Avinash will not discuss that issue because none of the killed belong to his family. Maoist are more dangerous then Pakistan . Soon our Govt realises this thing is better. They should arrest the sympathizers of Maoist who are providing base and collecting money for them
जहां छात्रों से संवाद की जगह साजिश को तवज्जो दी जाती हो,वहां चेतना को विकसित करने का काम यानी शिक्षा तो हो ही नहीं हो सकती है। अब नाम में चाहे महात्मा गांधी को जोड़ लिया जाये या गोरख पांडे के नाम पर इमारत खड़ी कर दी जाये। वर्धा विश्वविद्यालय के कुलपति अपने चर्चित कारनामों से अपनी मदांधता और स्वार्थी होने का प्रदर्शन कर रहे हैं। इसीलिए उनके निशाने पर वे सभी लोग हैं जो उनकी राय से इत्तेफाक नहीं रखते हैं,अब वे चाहे अनिल चामड़िया हों या अनिल। साथ ही यह कहना जरूरी लगता है कि न्यायप्रिय संघर्ष कभी बोर नहीं कर सकता है क्योंकि उसमें परिवर्तन का सुख है। इसलिए आप चोरों को बेनाब करने की मुहीम जारी रखें। हम आपके साथ हैं।
jab se vibhuti narayan roy ke tenati jab se m.g.a.h.v.wardha camp me hue he tab se vibhuti jee anushan heen (jo unke banaye kanuno ko sar jhuka kar nahi mante) chatro aur pro. ka kaurt marshal karte aaye hai aur aage bhi karte rahaige. esai aashcharya ki koun see bat hai. ek ig say aap aur kaisi umid kar sakate hai.
I`m also agree with Mr. rajesh. It`s a absolutely one sided propaganda campaign by Avinash. Mr. Avinash u should feel guilty about it, if ur parents & ur family teach u about national and social responsibility.If not u r not eligibile to live in India
aur agar hindi me samjhauin to ….
har maa-bap yahi dua mangenge ki agar unhe tumhare jaisa bachha milna ho to behatr hai ki vah beaulad rahein..
अनिल एक बात बताओ कि क्लास में बैठने और नहीं बैठने देने का हक तो शिक्षक का है कि नहीं?कोई जबरदस्ती तो नहीं है कि वह आपको बिठाये?
आप जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहे थे इसका कोई प्रमाण नहीं है.आपके साथ ऐसा होने में काफी देर हो गयी है.ऐसा काफी पहले हो जाना चाहिए था.आपकी बातों से यही लग रहा है कि पड़ने पड़ाने में आपकी कोई दिलचस्पी नहीं है .आप केवल चापलूसी और चमचागिरी करने ही आये थे.
पुरे विश्वविद्यालय में तो येही चर्चा है कि आपको नौकरी नहीं मिली तो आप ऐसा करके दबाव बनाना चाहते हैं.
और रही बात शिक्षकों के अपमान की तो आप स्वयं ही एक दलित शिक्षक को पहले भी अपमानित कर चुके हैं,एक निवेदन है कि आप जरा एक अंगुली अपनी तरफ भी उठाकर देखो निष्पक्ष रूप से, सायद आपको समझा आ जायेगा
और हाँ ये बताओ की आप कठपुतली की तरह और कब तक नाचोगे?
बेटा ये कृपाशंकर चौबे एक अनिल को तो खा गया तुम्हे भी खाने कि जुगाड़ में है
meri शुभकामनाये तुम्हारे साथ हैं
IG VIBHUTI NARAYAN ROY vishav vidiyaley ke morche par tenat hai. aur unke camp me mashinikaran kee prakriya ko torane ka matalab hai KOART MARSHAL.
ex professor ab aur kitni kurbani lega. anil ko pehle usene bigara.apne fayede ke liye istemal kiya. aur ab hamesha ke liya bampanth ke naam per use gulam banakar apne pass rakhega
अनिल के निलम्बन की खबर जान कर दुःख हुआ ! पर आश्चर्य नही . दरसल दिल्ली में अनिल ने बात करते समय मुझसे कहा था की अब इस संस्थान में पढाई नही हो सकती . दरअसल यहाँ पढाई के नाम पर जिस तरह की ओछी राजनीति हो रही है उससे संस्थान का और उसमे पढने वाले छात्रों का चारित्रिक पतन होगा . उस समय मैंने कहा था की आप को अपने भविष्य के विषय में सोच समझ कर कदम उठाना चाहिए .पर आज जब महान कुलपति और उनके महान अध्यपको की करनी देख रहा ह तो मुझे शर्म आ रही है हमारी व्यवस्था पर ! बधाई अनिल भाई ऐसे घटिया संस्थान से मुक्त हो ने के लिए . पर घोर आश्चर्य की एक विधालय में एक छात्र को इसलिए निकाल दिया जाता है की उसने अपने गुरु से कुछ सवाल किया !!?, या गुरु की किसी गलती को सुधरने का प्रयास किया ! चलो एक पल मान लेते है की अनिल ने महागुरु से कुछ ऐसे सवाल किये जो उनकी सान के खिलाफ थे ! तो भाई गुरुवर आप का क्या कर्तव्य बनता था? अनिल को समझाना या उसकी सिकायत करना ? क्या आपने अनिल को एक बार भी सही बात बताने का प्यास किया ? नही तो क्यों ? क्या हमारी गाढ़ी कमाई से आपको पगार के रूप ने अपने घमंड के ऊँचा रखने के लिए दी जाती ? ईमानदारी से देखा जाये तो करवाई आप पर होनी चाहिए की आप अपना कर्तव्य सही तरीके से नही निभाते ! अब आप यह दावा नही कर सकते की आप गरु हैं दरसल आपने जिस बेशर्मी से एक छात्र को छ माह के लिए संस्थान से निकलवाया है सभी गुरुवो की गरिमा कम कर दी !! आप को और आप के साथ आपकी महान टीम को एक छात्र को छ माह संथान से बाहर निकलवाने के लिए बधाई — जीत का जस्न मनाईये पर याद रखिये वर्धा विश्वविधालय के पतन की जब भी बात होगी आप को याद किया जायेगा– इतिहास के पन्नोमें आपलोगों का नाम काले अच्छरों से अंकित होगा . शर्म करो — शर्म करो — शर्म करो शर्म करो मझे शर्म आरही है आप लोगो के कार्य पर छि छि छि
badhai anil bahi. shahadat ka sehara to bandha. vana chamaria ke prati guru bhakti par saval uth jata.
arun bahi ye rajnitigya khud anil bhi tha. vase apki jankaree ke liye bata doon vahan rajneeti nahin chhichhorapan aur tuchchiai hoti hai aur khud anil bhi uaska hissa hai. ap jyada chinta na karen bahut kharkhwah hain usake. bahuton ki tel bajee ki hai usane bhi koi na koi to bachayega hee.
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