“मुझे निष्कासित नहीं करने का कारण बताये प्रशासन”
छात्रों के पास मीडिया है, विश्वविद्यालय के पास कानून है
♦ दिलीप
यह हिंदी विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं का दुर्भाग्य है कि उनके पास अपनी बात रखने का ज्यादा विस्तृत आयाम विश्वविद्यालीय मंच के बजाय मीडिया मुहैया कराता है। मैं इसे दुर्भाग्य इसलिए मान रहा हूं क्योंकि मीडिया के जरिये यहां की सहमति-असहमति देश-दुनिया के लोग सुन तो लेते हैं लेकिन इसका समाधान कानूनी तौर पर अंततः विश्वविद्यालय प्रशासन के पास ही होता है। छात्रों के पास मीडिया है, विश्वविद्यालय के पास कानून है। विद्यार्थी मीडिया का इस्तेमाल जानता है, प्रशासन कानून का इस्तेमाल जानता है। प्रशासन राजनीतिक मामले में यहां के छात्रों से कहीं अधिक परिपक्व है। उनकी परिपक्वता का आधार तर्क नहीं है बल्कि वे कुछ काम शुरू से ही शानदार फिनिसिंग के साथ करते रहे हैं। इनमें छात्र-छात्राओं को मुद्दे से भटकाना और उनके बीच अविश्वास की एक मोटी काली चादर खड़ी करना। एक क्षेत्र ऐसा है, जिसमें उन्होंने लगातार बड़ी सफलता हासिल किया है। यहां मुद्दों की बाढ़ आती है। अब छात्रों को यह तय करना होता है कि वे किस मुद्दे को अपनी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखते हैं। बाहरी लोगों (मेरा मतलब यहां की स्थितियों को सिर्फ मीडिया से जानने वाले लोगों से है) को शायद यह पता न हो कि यहां विद्यार्थियों की कुल संख्या महज 300 के आंकड़े को छूते हैं। और यह भी कि इनमें से लगभग 100 विद्यार्थी शोध के सिलसिले में शहर से बाहर ही रहते हैं। अब यह आसानी से महसूसा जा सकता है कि वर्तमान समय में छात्र राजनीति के अर्थ में जिस तरह नकारात्मकता भरा गया है, उससे कई छात्र इस पचड़े से दूर रहना ही पसंद करेंगे। कुछ छात्रों के भीतर स्वाभाविक तौर पर प्रतिकार करने के गुण होते हैं लेकिन यह भी बहुत सच है कि यही वह समय होता है, जब घर-परिवार और समाज की बड़ी अपेक्षाओं से वे दबे होते हैं। उनका अंतर्द्वंद्व इन दो मुद्दों को लेकर तीक्ष्ण स्तर तक गुंथता है, जिनमें उसे कैरियर और विरोध को चुनना होता है। जाहिर है विरोध कैरियर का विकल्प नहीं हो सकता। इन दो स्तरों के विद्यार्थियों को प्रशासन लगातार बहला-फुसला कर और भविष्य के हसीन सपने (एम फिल और पीएचडी मे नामांकन सहित कई तरह के विश्वविद्यालयीय नौकरियों के सपने) दिखाकर – जिसमें डर के तत्त्व को चाशनी के तौर पर लपेट दिया जाता है – अपने पक्ष में करने का हरसंभव यत्न करता है। हालांकि कई विद्यार्थियों में प्रशासनिक जी हुजूरी के भी स्वाभाविक गुण पाये जाते हैं, जिसके कारण इनके मद में प्रशासन को अधिक ऊर्जा खर्च नहीं करनी पड़ती। अब बच गये बेचारे विरोध को अपना वर्तमान और भविष्य समझने वाले स्टूडेंट (जिनके बारे में देश भर में यह भ्रामक प्रचार है कि ये पढ़ने में निहायत ही बेवकूफ टाइप के होते हैं)। इन्हें देश भर में अपने बारे में मौजूद भ्रांतियां भी तोड़नी है और विरोध को भी लगातार जारी रखना है। हिंदी विश्वविद्यालय के प्रशासनिक हित के आड़े इस हिसाब से कुल कितने कमिटेड विद्यार्थी आते हैं, जबकि उनकी कुल संख्या उतनी ही है जितनी ऊपर बतायी जा चुकी है, यह एक सवाल है? प्रशासन का यह गणित बहुत ठोस है।
बावजूद इन तमाम तथ्यों के, जिनमें से ज्यादातर प्रशासनिक पक्ष में ही झुके हुए है, प्रशासन कुछ और स्तर पर सक्रिय है। मसलन यहां शिक्षकों के यूनियन हैं। गैर शैक्षणिक कर्मचारियों के यूनियन हैं लेकिन छात्र यूनियन और चुनाव को लेकर यहां अब तक कुलपति अपनी असहमति जाहिर करते रहे हैं। आखिर वे कौन से कारण हैं, जो छात्र संघ का गठन न करने को लेकर उनकी इस राय को पुख्ता करते हैं? शायद छात्रों की एकजुटता के संभावित खतरे।
अभी अनिल चमड़िया के मामले को लेकर लगातार बहस चल ही रही है कि इसी बीच बड़ी सतर्कता के साथ एक और बड़ा मुद्दा छात्रों को थमा दिया गया। मोहल्ला पर अभी-अभी पीएचडी के छात्र अनिल के डिग्री त्यागने संबंधी एक चिट्ठी को सार्वजनिक किया गया। डिग्री त्यागने संबंधी मुद्दे पर 22 छात्र-छात्राओं के बीच सहमति थी। यह विश्वविद्यालय पर एक बड़े दबाव का कारण बन सकती थी। इसको दुरुस्त करने और अनिल चमड़िया के जाने के बाद छात्रों में जन्मे असंतोष को एक अलग दिशा में मोड़ देने के लिए गुरुवार (दिनांक 18.02.2010) को अनिल को छह महीने के लिए रेस्टीकेट करने का पत्र भेज दिया गया। इस दौरान अनिल दिल्ली से वर्धा आ रही रेलगाड़ी में थे। अनिल शुरू से बोलने वाले छात्र के तौर पर जाने जाते हैं। वह खतरनाक साबित हो रहे थे। विश्वविद्यालय में, और खास तौर पर जनसंचार विभाग में उसने कई सवाल उठाये, जिसके जवाब देने में प्रशासन असहज महसूस करता रहा। यह बारीक राजनीति है, जिसमें एक छात्र द्वारा डिग्री त्यागने का आधिकारिक इस्तेमाल किये जाने से पहले ही उसे निष्कासित कर दिया गया। काम भी हो गया और इज्जत भी सुरक्षित रह गयी। अब कुछ छात्रों का ध्यान भी मूल मुद्दा अनिल चमड़िया से भटक कर शोध छात्र अनिल के निष्कासन पर टंग जाएगी। बहुत खूब विभूति जी।
अब जरा अनिल पर लगे आरोप के बारे में जान लिया जाए। पिछली छमाही में हमारा बैच ‘जनसंपर्क’ पर सेमिनार प्रस्तुत कर रहा था। अनिल सेमिनार में बैठना चाह रहे थे। सहायक प्रोफेसर अख्तर आलम ने उनको कक्षा में आने से रोक दिया। उनका कहना था कि जब तक विभागाध्यक्ष से वह अंदर आने की अनुमति नहीं ले लेते, उनको अंदर नहीं आने दिया जाएगा। अनिल ने प्रतिवाद किया। अंत में अख्तर आलम ने मुझसे पूछा कि क्या कोई सीनियर विद्यार्थी दूसरे बैच के सेमिनार में बैठ सकते हैं? मैंने जवाब दिया कि हां बैठ सकते हैं और अब तक बैठते आये हैं। यह विश्वविद्यालय में पहला मौका था, जब किसी विद्यार्थी को सेमिनार में आने से यह कह कर रोका गया कि इसके लिए विभागाध्यक्ष की अनुमति जरूरी है। अख्तर आलम के पास फैसला लेने का क्या इतना साहस नहीं था कि वे या तो सीधे रोक सकें या फिर अंदर आने दें? दरअसल कमजोर व्यक्ति की कमजोरी वक्त-बे-वक्त साफ नमूदार हो जाती है। अख्तर आलम विभागाध्यक्ष ‘चोर गुरु’ अनिल राय अंकित के बहुत ही खास हैं। विभाग की अनियमितताओं पर सवाल उठाने वाले छात्रों को परेशान करने के लिए यह एक स्पष्ट योजना का हिस्सा थी, जिसके तहत अनिल को न सिर्फ रोका गया बल्कि इस घटना के बाद उल्टे अख्तर आलम ने यह शिकायत की कि अनिल ने उन्हें बेइज्जत किया है। अनिल पर तीन सदस्यीय जांच कमेटी बैठा दी गयी, जिसका निर्णय अभी अभी आया है। जांच कमेटी में शामिल आत्मप्रकाश श्रीवास्तव, जिनके जातिवादी रंग के बारे में पाठक राहुल कांबले के मामले में परिचित हो चुके हैं और जो अनिल राय अंकित के बेहद घनिष्ट मित्रों में से हैं और जो उनके दफ्तर में प्रतिदिन कम से कम दो-तीन घंटे समय निकाल कर जरूर बैठते हैं। विभूति नारायण राय के कुलपति नियुक्त होने से पहले आत्मप्रकाश श्रीवास्तव यहां के कार्यकारी कुलपति हुआ करते थे और यही वह दौर है, जबसे अनिल उनकी नजर में चढ़े हुए थे। उनका कार्यकाल भीषण अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के लिए भारतीय विश्वविद्यालय के इतिहास में एक मजबूत उदाहरण हो सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में गठित तीन सदस्यीय समिति ने वहां मौजूद छात्रों से घटना के बारे में पू्छने तक की जहमत नहीं उठायी। मेरे बैच के किसी भी छात्र-छात्राओं से इस संबंध में कभी भी संपर्क नहीं किया गया। तो इसका मतलब यह हुआ कि कमेटी ने एकतरफा अख्तर आलम की शिकायत पर फैसला लिया है। फिर कमेटी का नाटक क्यों? अनिल को निकाले जाने को मैं सिर्फ इसी मामले तक सीमित करके नहीं देख रहा हूं बल्कि यह ‘चुनो और वार करो’ की नीति पर आधारित है, जिसमें एक-एक विद्यार्थियों से निपटने की योजना अंतर्निहित है। विश्वविद्यालय प्रशासन से मैं यह जवाब चाहता हूं कि क्या मेरे (और मेरे जैसे अन्य सभी जो इस संघर्ष में शामिल हैं) संघर्ष में कहीं कमी है कि मुझे अब तक निष्कासित नहीं किया गया? मैं चाहता हूं कि मुझे भी वह चिट्ठी मिले।









ghabrao nahin dilip tumhe bhi jald hi chhitthi milne wali hai.
aur zyada udo mat..
Dilip Ji
Aapke sangharsh mein sach mein kami hai, ye kami tab puri hogi jab aap bhi Anil misra jaise GHATIA aur BATTAMIZI bahri harkatein kareinge.
Are is Anil misra ko to usi samay restricate hona chahiye tha jab vah HINDI SAMAY mein University ke Atithi “Bhagwan Das” ke sath sareaam Manch pe BADSULUKI kiya tha, ya fir kisi professor ko DHAMKATE hue kahna ki “Main to abhi aur karunga, TUMHE JO UKHADNA HO MERA UKHAD LENA”, Aur n jane kitne Karmchariyon se battamizi se bat karne ke mamle usse hamesha jude rahe hain.
apne changu-mangu k alawa tum kahin aur jagah apni rajniti kyon nahin karte? Virod Nishpach ho to jayaj hai Par sirf Pachpat bara aur apne hit mein na ho…. Santosh Baghel ke AANDOLAN k samay kahta tha ki “ye SC hai aur faltu drama kar raha hai, iska kuch nahin hone wala” Fir uske Admission ke bad khud Santosh ke sath ho liya.
Jahan bhi gya jugad se gya… ase aadmi ki wahiyat harkaton pe Aap kyo apna restrication demand kar rahe ho.
kulpati mahodey, chatra ki eacha(dilip ki eacha) ko pura karke aap apne man me chipi eacha(progresive chatro ko bahar nikalne ki eacha) ko pura kar lijiye. nahi to kahi chatro ka erada badal gaya to aapke green student hunt program ka javab ve student peace hunt say dene laganga.
भाई नाथ
पता नहीं आप कौन है. लेकिन अगर आपको लग रहा है कि विश्वविद्यालय में सब ठीक चल रहा है तो या तो आप के साथ प्रशासन विशेष तरीके से पेश आ रहा है या फिर आप इस छोटे से विश्वविद्यालय में अपनी आंखों से कुछ नहीं देख पा रहे हैं.
आप जैसे लोगों के साथ दिक्कत यही है कि जब तक अपने पर न पड़े तब तक आप मुँह नहीं खोलते.
ठीक है यार मत खोलो लेकिन जो कुछ बोलने लिखने वाले लोग हैं उसे क्यों परेशान कर रहे हो? क्यों उसको अपनी घटिया तर्क के उत्तर देने को मज़बूर कर रहे हो.
जाओ भविष्य में तुम्हारे लिए एक नौकरी सुरक्षित रहेगी यहाँ. सो जाओ और साल दो साल बाद अपनी इस वफादारी का ईनाम पाने का इंतज़ार करो.
Maoist killed 30 policemen in Bengal and killed 9 villagers in Bihar. Avinash will not discuss that issue because none of the killed belong to his family. Maoist are more dangerous then Pakistan . Soon our Govt realises this thing is better. They should arrest the sympathizers of Maoist who are providing base and collecting money for them
Desh mein aur bhi mudde hain jis par aapko saval uthane ki jaroorat hai Dilip ji. Anil ko target lagatar kiya jata rahega.Bhavishya mein aap jab sabke genuine muddo par sath denge tab student ka viswas bhi aap par badhega.
अविनाश जी, ये क्या हो रहा है? ब्लॉग लेखन क्या इस तरह किया जाता है? जिसे जो मन में आता है लिखे जा रहा है! माओवाद पर एक बहस करवाइये.
prof. pyarelal ji, kya gajab farmaish hai aapki? maovad par par bahas chahiye, taki vibhuti ka mamala pichhe chala jay, aapko bhi VN Rai se khairat milane wali hai kya? salami thokane ka itna hi shok hai to, thokte rahiyega. jaha tak maovad ki bat hai, to is blog par uski charch hoti hi hai. blog lekhan kis tarah kiya jata hai, yah agar aapko achhi tarah se pata hai to, aap bhi blog likhiye.
lekin ek bat dhyan rakhiye aapka pyara, dulara VN Rai ab gaya kam se, samjhiye unki ulti ginati shuru ho gai
भूत की प्रेम कथा
स्थान— हिन्दी का एक अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यलय
लेफ्ट राइट, लेफ्ट राइट
गोपाल जी की जै,
भूत की प्रेम कथा
स्थान— हिन्दी का एक अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यलय
लेफ्ट राइट, लेफ्ट राइट
कुछ गणवेशधारी भगवा, कुछ बाघाम्बरी शिवसैनिक, कुछ लाल पगरी बन्धे कामरेड, कुछ नीले वस्त्रधरी बहुजनो आदि- आदि का एक साथ मन्च पर प्रवेश.
सभी समवेत स्वर में———
मंगलाचरण…….
गोपाल जी की जै अपूर्वा की जै, कश्यप बाबा की जै, हनूमान जी की जै, अचार्य रजनीश की जै, राहुल की जै, राजीव की जै, अनिल बन्धुओं की जै
मार्क्स की जै , गाँधी की जै, अम्बेडकर – लोहिया की जै, लेनिन बबा की जै,
डीह बाबा , सती माई ……………………… की जै
मंगलाचरन के अन्त तक गांधि पार्क की बकरी और प़रेमचंद की गाय भी सुर मिला देते हैं साथ ही पंचतीला के कुछ सियार कुक्कुरा और गदहे भी अपना सु(अ)र मिला देते हैं.
बीर बहादुर लेफ्तराइटियों का काँपते हुए अचानक पलायन.
(सियारों कुक्कुरों के डर से या गाय और बकरी के ये वो जनें)
हवल्दार का डंडा भांजते प्रवेश, द………. दलाल साथ में
तेजी से क्रांतिकारियों के पीछे मंच से उतर जाते हैं.
अतबत्ता एक दलाल रुक कर देखता है वफादारी जताते किसि ने देखा नहिं ना फिर वो भी वकियों कि दिशामें गायब.
सूत्रधार का प्रवेश
सूत्रधार—-
किस-किस को देखूँ,
किस-किस को सोचूँ,
किस-किस को प्यार करूँ
किस-किस को नोचूँ
सब तो हैं अपने ही
बस छुप रह मन घोंचूँ.
सूत्रधार का प्रस्थान और दूसरी ओर नटी का नट के साथ प्रवेष
नटी — प्रिय हवा कुछ गर्म है. चलो दिल्ली चलें.
नट—– प्रिये वहाँ तो पहले ही गरमी ज्यादा है.अपने थोरात भाई तो वहीं हैं.और अपने भभूती काका भी वहीं पगुरा रहे हैं. यहाँ की गर्मि से पच नहीं रहा था यहाँ.
पगुराने से भि तो गरमी बढती है.
वैसे भी दो अनिलों की तो छुट्टि हो गयी ,
तीसरा अनिल कौन ?
क्या पता अपना भी नं. आ ही जाय.
नटी- फिर !
नट —- बैताल बाबा के पास चलो वही कुछ उपय बतयेंगें. वसे भी हम सेक्यूलर तो हैं नहीं,
नटी ———कौन बैताल बाबा?
नट———– वही जो भभूती काका को सपने में भूत कथा कह गये थे.
नटी——— चलो अच्छा है हम भी उनसे कथा सुनते है.
दोनों का प्रस्थान.
पंचटीला के प्रेत भवन में प्रवेश
पेड की ठूँठ के सामने बैठ कर प्रेतराज का अह्वान धूप दीप के साथ अनुष्ठान
प्रेत राज का अचानक आगमन.
बैताल—- बोलो बच्चा क्या बात है?
(स्वगत)
मुझे किसी ने तीसरी दफे जगया है.
पहले अभिव्यक्ति के डान ने फिर भभूती ने अब तुमने.
दोनों की कमना पूरी हुई. अब तुम बताओ.
नट– बाबा मन बडा ऊब रहा है. डर लग रहा है. कथा सुनाओ.
ना-नुकुर के बाद दारू अनुष्ठान. बैतल की कथा आरम्भ.
बैताल—( खाँस-खँखार कर )
बात उस जमाने कि है जब कुछ लोग जोकहरा जने कि तैयरी में थे और कुछ जोंक हरे हो रहे थे.
बहुतों के एक हाथ में तेल था और दूसरे में हुनर.
तब सारी अबो हवा( अनिल ) और चन्द्रिकाएँ सुखकर और अनुकूल थीं.
हुनर और तेल दोनो में बढ – चढ कर.
फिर…………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………….
तब तुम्हारे काका परेम कि भूत कथा सुनने आये थे. और उसे सुन कर मेरे ये चेले हुनर भूल गये. इनका पुराना भूत जाग गया.
फिर………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..मुहल्ले मे पढ लो. इन भूतों ने खुद अपनी कथा कही है.मेरा टाइम क्यों जाया कराते हो.
अल्ला हाफिज . फिर मिलेंगे.
बैताल अन्तरधान हो गया.
kya baital katha sahi hai deelip jee?
aisi vahiyaat bhutkathayen ghatiya dimaagon ki upaj hain…..beta kuchh aur bhi kar jeevan me..ab is sasti aur nakli kranti ke bal par jyada din roti nahi tod sakte.
hari bahi sahi bol rahe ho .
apane yahan to 99 men nabbe krantiyan ghatiya hoti hain.
karan pata hai age ki kaman tum jaise nadan aur behude logon ke hath ati hai. akhir vo ghatiya nahin hoti to uski ijad tu m jaisee ghatiya santane ho rahi hain.
vase bhoot katha hindi vishvavidyalaya ki ghatiya kranti ka hi nazara pesh karati hai.
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