अंबेडकर और गांधी : संवाद जारी है
♦ गंगा सहाय मीणा

बाबासाहब अंबेडकर और महात्मा गांधी सिर्फ दो व्यक्ति नहीं, दो ‘स्कूल’ हैं। दो वैचारिक केंद्र हैं। दो संस्थाएं हैं। दोनों आधुनिक भारत के सर्वाधिक विवादास्पद चरित्रों में हैं। चूंकि दोनों लीक से हटकर चले, इसलिए उन पर उनके समय से लेकर आज तक सवाल उठाये जाते रहे हैं। दोनों की मंजिल एक-दूसरे से जितनी मिलती थी, रास्ते उतने ही जुदा थे। दोनों के संदर्भ में सर्वाधिक दुखद यह है कि दोनों के अनुयायियों ने दो ऐसे विशाल खेमे बना लिये हैं, जो आपस में संवाद की कोई जरूरत नहीं समझते। अंबेडकरवादियों के लिए गांधी दलितविरोधी हैं तो गांधीवादियों के लिए अंबेडकर देशद्रोही। गांधीवादियों से अंबेडकर को पढ़ने की क्या अपेक्षा की जाए, वे गांधी को भी नहीं पढ़ना चाहते। कुछ ऐसी ही स्थिति अंबेडकरवादियों की है। इसका परिणाम यह हुआ कि अंबेडकर और गांधी के मूल्य और उनका संघर्ष कहीं पीछे छूट गया है।

ऐसे समय में अंबेडकर और गांधी में संवाद की बेहद जरूरत है। इसी जरूरत को पूरा करने की दिशा में एक सार्थक प्रयास है अस्मिता थियेटर की नाट्य प्रस्तुति ‘अंबेडकर और गांधी’। नाटक का प्रदर्शन ‘अस्मिता थियेटर’ के 18 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में चल रहे समारोहों के क्रम में 20 फरवरी की शाम दिल्ली के यूरेका (सिंधिया हाउस) में किया गया। यह नाटक हमें अंबेडकर और गांधी के वर्ण, जाति और धर्म विषयक विचारों से परिचित कराता है। नाटक की शुरुआत अंबेडकर के एक महत्वपूर्ण कथन से होती है जिसमें वे भारत में शोषण जारी रखने के लिए अंग्रेजी सरकार की आलोचना करते हैं। संभवतः यह नाटक के लेखक की ओर से अंबेडकर को देशद्रोही कहने वालों के लिए जवाब है। नाटक एक तरफ डा अंबेडकर की विचारधारा के निर्माण की प्रक्रिया और उससे उपजी संघर्ष की चेतना से परिचित कराता है, दूसरी तरफ ‘जनता’ द्वारा उनके विचारों को समझ न पाने की वजह से उपजी उनकी चिंता को भी जाहिर करता है।
पूरा नाटक अंबेडकर और गांधी के बीच लगातार संवाद के माध्यम से असहमति के बिंदुओं और उनके बीच सहमति के तत्वों की तलाश करता दिखता है। कांग्रेस और गांधी के लिए ‘अस्पृश्यों की मुक्ति’ एक अंदरूनी समस्या थी जबकि अंबेडकर के लिए सर्वाधिक अहम समस्या। जमींदारी प्रथा की तरह जाति प्रथा और अस्पृश्यता का समाधान गांधी हृदय परिवर्तन में खोजते थे। वे वर्णाश्रम को बनाये रखते हुए अस्पृश्यता खत्म करने के पक्षधर थे जबकि अंबेडकर वर्ण और जाति को ही अस्पृश्यता की जड़ मानते हुए इनका खात्मा जरूरी समझते थे। गांधी के ‘दयाभाव’ के बरक्स अंबेडकर अस्पृश्यों के लिए अधिकारों की मांग करते हैं।
पूना समझौते से पूर्व दोनों के मतभेद चरम पर थे। पूरे घटनाक्रम को नाटक दर्शकों के समक्ष जीवंत कर देता है। गांधी के अनशन ने अंबेडकर लिए द्वंद्व पैदा कर दिया। एक तरफ दलितों के लिए अधिकारों की लड़ाई का प्रश्न था, दूसरी तरफ गांधी का जीवन। यहां नाट्य-लेखक राजेश कुमार ने एक दिलचस्प प्रसंग सृजित किया है। अंबेडकर की गृहिणी पत्नी रमाबाई उन्हें इस द्वंद्व से मुक्ति दिलाने में मदद करती हैं। रमाबाई कहती हैं, ”सिद्धांत जान लेने के लिए नहीं, जान बचाने के लिए होते हैं… आज तक महात्मा लोगों की जान बचाते आए हैं, आप तो महात्मा की जान बचाने जा रहे हैं।” अंबेडकर का द्वंद्व समाप्त हो जाता है और वे गांधी से मिलने का फैसला करते हैं।
नाटक में रमाबाई से जुड़ा एक और प्रसंग है। रमाबाई गणेशोत्सव देखने जाना चाहती हैं, अंबेडकर उन्हें रोक लेते हैं। फिर वे रमा के प्रति अपने व्यवहार की आत्मालोचना करते हैं। शिल्पी मरवाहा ने रमा की भूमिका में अपने बेहतर अभिनय से इस दृश्य को और सजीव बना दिया है।
पूरा नाटक अंबेडकर और गांधी के संवाद पर केंद्रित है। इसी संवाद से दोनों के विचार, सहमतियां-असहमतियां प्रकट होती हैं। अंबेडकर इसी संवाद में भारतीय धर्म, परंपरा और संस्कृति की तथाकथित महानता की कड़ी आलोचना कर उस पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। सवर्णों द्वारा अस्पृश्यों की मुक्ति के बारे में उनका निष्कर्ष है – जिसने भोगा है, उसकी पीड़ा वही समझ सकता है। यह निष्कर्ष अंबेडकर का है या नाटककार का, यह शोध का विषय है। इस पर शोध इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह समकालीन हिंदी दलित विमर्श की सैद्धांतिकी का भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
नाटक का महत्व इस दृष्टि से भी है कि यह एक बहुत बड़े ऐतिहासिक सत्य का उदघाटन करता है, वह है – तमाम मतभेदों के बावजूद अंबेडकर और गांधी एक-दूसरे से घृणा नहीं करते थे। गांधी की हत्या से अंबेडकर आहत होते हैं, वहीं दूसरी तरफ गांधी की इच्छा है कि अगर मेरा दुबारा जन्म हो तो महाशूद्र के रूप में हो। दोनों के मन में एक-दूसरे को अपनी बात न समझा पाने की कसक है। नाटक के अंत में अंबेडकर अपने इस कथन से दर्शकों को एक जिम्मेदारी सौंप जाते हैं, ‘अस्पृश्यता के सवाल पर हम अपने-अपने ढंग से लड़ रहे थे। गांधीजी संवाद अधूरा छोड़ कर चले गये’। अंबेडकरवादियों और गांधीवादियों को अपने-अपने खेमों से निकल कर इस संवाद को जारी रखने की जरूरत है। इस संवाद के अभाव का ही परिणाम है कि आरक्षण आदि मसलों पर अंबेडकरवादी और गांधीवादी कोई सहमति बनाने के बजाय उग्र हो जाते हैं। आज भी दलितों की मुक्ति से हम कोसों दूर हैं।
इस नाटक का एक और महत्व है – अंबेडकर और गांधी के क्रमशः विकसित होते चरित्र को रेखांकित करना। 1947 के गांधी वे नहीं हैं, जो पूना पैक्ट के पहले थे। नाटक अंबेडकर की विचारधारा के निर्माण की प्रक्रिया को जितने बेहतर ढंग से प्रस्तुत करता है, उतना गांधी की विचारधारा के निर्माण को नहीं समझा पाता – यह नाटककार की एक सीमा कही जा सकती है। खास बात यह है कि नाटक अंबेडकर और गांधी को ‘मसीहा’ छवि से निकालकर मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करता है – ऐसे मनुष्य जिनके कुछ अंतर्विरोध भी हैं।

संवाद केंद्रित व विचारप्रधान होते हुए नाटक कहीं ऊब पैदा नहीं करता। इसकी वजह राजेश कुमार के सफल लेखन, अरविंद गौड़ के सफल निर्देशन और कलाकारों के सफल अभिनय के अलावा दृश्यों के बीच में डाले गये समूह गीत भी हैं। जैसे ‘हम लडेंगे साथी…’, ‘रुके न जो, झुके न जो…’, ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए…’, ‘सबसे खतरनाक होता है…’, ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भई…’, ‘तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर…’, ‘सूनी राहों पर कोई कब तक चले…’। संगीता गौड़ ने नाटक का संगीत-निर्देशन किया है। गीतों का चयन सराहनीय है लेकिन कुछ गीतों की गायन शैली असहजता भी पैदा करती है।
अंबेडकर और गांधी का सफल किरदार क्रमशः बजरंग बली सिंह और वीरेन बसोया ने निभाया है। वीरेन बसोया की आवाज की तेजी गांधी के किरदार से कभी-कभी उन्हें दूर भी कर देती है। राज शर्मा, सौरभ पाल, मलय गर्ग, पंकज राज यादव, शिव चौहान, पूजा प्रधान, पंकज दत्ता, तोषम आचार्य, दिशा अरोड़ा, सवेरी गौड़, काकोली गौड़, राहुल खन्ना आदि का अभिनय भी सराहनीय था। नाटक के प्रदर्शन के बाद उस पर संवाद का आयोजन भी किया गया, जिसमें दर्शकों ने अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करते हुए अपनी जिज्ञासाएं नाटक के निर्देशक अरविंद गौड़ के समक्ष रखीं।
(गंगा सहाय मीणा से भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू, नई दिल्ली 67 के पते पर संपर्क करें।)









अंबेडकर और गांधी के अनुयायियों को सचमुच आपस में बात करने की आवश्यकता है, ताकि उनके वहम दूर हो सकें. संवाद न होने से वहम पैदा होता है.
Ambedkar was the real father of nation.
there is no significant dialogue between the parties and men, who believe in gandhi and ambedkar.and this is not an exception, because now a days in indian politics nobody believes in the culture of debate and discussion.
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