ममता ने ऐसा क्या किया कि टीवी पर उसे दिखाया जाए
♦ विनीत कुमार


BUZZ पर अभी ये लाइन लिखता ही हूं कि सचिन के महिमा गान के आगे टेलीविजन पर रेल बजट गया तेल लेने कि देखता हूं कि IBN7 का नजारा ही बदला हुआ है। बजट के सेट पर बैठे देश के बौद्धिक और आक्रामक अंदाज के मीडियाकर्मी आशुतोष डंके की चोट पर कहते नजर आते हैं कि आखिर ममता बनर्जी ने रेल बजट में ऐसा क्या कह दिया कि उसे घंटे भर तक दिखाया जाए। ये पुरानी सोच/तरीका है कि बजट पर या ऐसे प्रधानमंत्री को घंटों दिखाते रहो। आशुतोष को लग रहा होगा कि उन्होंने आज टेलीविजन इतिहास में ऐसा कहकर क्रांति मचा दी हो और अब तक ऐसी बात कह दी है कि इसके पहले न तो किसी ने कल्पना की होगी और न किसी ने कहने की हिम्मत की होगी। वैसे भी जिस रेल मंत्रालय के आगे रोजाना सैकड़ों पत्रकार कोटा टिकटों के लिए मारामारी करते फिरते हैं, उसी मंत्रालय की मुखिया ममता बनर्जी के खिलाफ में बोलना, उसे बाइपास कर देना कोई हंसी-ठठा का खेल तो है नहीं। इस हिसाब से तो आशुतोष ने जरूर क्रांति मचा दी है। लेकिन जहां तक मेरी जानकारी है, उन्होंने ये लाइन राजदीप सरदेसाई के वक्तव्य से मार ली है। ये राजदीप का डायलॉग रहा है कि जरूरी नहीं कि हर बुलेटिन प्रधानमंत्री से ही खुले, जिसकी चर्चा नलिन मेहता ने अपनी किताब इंडिया ऑन टेलीविजन में की है। आशुतोष को क्रेडिट बस इतना भर है कि एक स्केल नीचा करके उसमें रेलमंत्री को फिट कर दिया।
बहरहाल आशुतोष की बातों को हम जैसे जो भी लोग गौर से सुनते हैं, हर बात उनके सोचने के तरीके की दाद देते है। ये अलग बात है कि हममें से कुछ छिटक कर तरस भी खाते हैं कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी वाली जगह पर पहुंच कर भी क्या अल्ल-बल्ल सोचते और बोलते हैं। इस कड़ी में कल तो हद ही हो गयी – उनका ये कहना कि रेल बजट में ऐसा क्या कह दिया ममता बनर्जी ने? अब उनको कौन समझाये कि आपकी टीआरपी भले ही तीन घंटे तक सचिन गाथा चलाने से आ जाए लेकिन इससे देश के आम आदमी की प्राथमिकता बदल नहीं जाएगी, प्रभु। संभव है कि आप सचिन के दोहरे शतक से जितने ज्यादा खुश हैं, उससे कई गुना खुश ये गरीब लोग होंगे। आज अगर इस मौज में पाउच और पउआ भी पी लें तो होश आने पर जरूर जानना चाहेंगे कि बलिया, भटिंडा, सहारनपुर, बनारस, दादर के लिए रेलमंत्री ने कौन-कौन सी ट्रेन दी, यात्री-सुविधा के नाम पर कौन-कौन सी घोषणाएं की? माफ कीजिएगा, तमाम तरह के मल्टीनेशनल ब्रांडों और भौतिक सुविधाओं के बीच जीनेवाला ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास अभी भले ही सचिन के गुरुर में चूर हो रहा हो लेकिन उसके ऐसा करने से उसकी जरूरतें बदल नहीं जातीं। आपने जो कहा, आपको अंदाजा नहीं कि उसके कितने बड़े अर्थ हैं? आपने ऐसा कहकर अपने को तो जरूर जस्टीफाय कर लिया, हम दर्शकों को अपनी प्रायॉरिटी भी समझा दी – लेकिन ऐसा कहकर आज अपने को बेपर्द जरूर कर लिया।
ऐसा नहीं है कि ढाई घंटे से अगर हम जैसा टेलीविजन का कट्टर दर्शक भी, जो कि खुलेआम कहता है कि जो भी दिखाओगे देखेंगे, आज पहली बार न्यूज चैनल्स देखते हुए बुरी तरह पक जाता है, अंदर से अघा जाता है कि बहुत हो गया, अब और नहीं तो खुद न्यूज चैनल के लोग पक नहीं गए होंगे। इसकी एक मिसाल खुद आशुतोष के सहयोगी संदीप चौधरी के ही बयान को लीजिए, जो ये कहते है कि पिछले ढाई घंटे से देख रहा हूं कि न्यूजरूम में सिर्फ सचिन को लेकर खबरें हो रही हैं, बातें हो रही है। क्या इस ढाई-तीन घंटे में देश में कोई दूसरी घटनाएं नहीं हुईं। ठीक है इतिहास रचा है तो दस मिनट दिखाओ, बीस मिनट दिखाओ, पचास मिनट दिखाओ… पौने तीन घंटे तक सचिन? आशुतोष ने जिस तरह से रेल बजट के महत्व को नकारा, उसके जबाब में संदीप चौधरी का मानना रहा कि क्या रेल बजट में सचमुच ऐसी कोई बात नहीं है कि उसे दस मिनट भी दिखाया जाए। मेरी पोस्ट को पढ़कर इस चैनल के लोग मेरी मासूमियत का उपहास उड़ाएं, उससे पहले ही ये साफ कर देना होगा कि ये सब उन्होंने पहले से ही तय कर लिया होगा। तभी तो हम ऑडिएंस को अटपटा लगे कि बजट के सेट पर वो सचिन की बात कर रहे हैं – इससे पहले ही एंकर ने घोषणा कर दी कि बजट के सेट पर सचिन और क्रिकेट की बात, क्या ये इतना जरूरी मसला है? ये दरअसल वही मसला है, जैसे हम जैसी ऑडिएंस जो कि पिछले ढाई घंटे से एक ही चीज देखकर पक गये, वैसे ही चैनल के ये लोग एक ही एंगिल पकड़कर दिखाने से ऊब गये तो कुछ अलग करने की सोची। लेकिन नयेपन और बेहूदेपन का फर्क तो एक औसत दर्जे का आदमी भी समझता ही है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि आज का ये दिन क्रिकेट के इतिहास में ऐतिहासिक दिन है। आशुतोष के जुमले का इस्तेमाल करूं, तो पिछले चालीस साल में जो नहीं हुआ आज हो गया, जबकि बजट में वही सारी पुरानी बातें। अब प्रधानमंत्री के गर्व का एहसास और बधाई देने के बाद संभव हो कि इसे आज की तारीख को गजट में शामिल कर नेशनल डे के तौर पर घोषित कर दिया जाए। वैसे भी इस देश को दो ही चीजें सुपर पावर साबित कर सकती हैं – एक जीडीपी और दूसरा क्रिकेट। लेकिन टेलीविजन के इतिहास में आज के दिन को ऐतिहासिक कुछ दूसरे अर्थों में करार दिया जाना चाहिए। एक तो ये कि मुझे नहीं लगता कि अभी से लेकर आनेवाले 12-14 घंटों तक किसी एक खिलाड़ी को लेकर जितने कवरेज होंगे, पैकेज बनेंगे और बुलेटिन पढ़े जाएंगे, अब तक किसी को लेकर किया गया होगा। दूसरा कि हिंदी टेलीविजन के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ होगा कि देश के राष्ट्रीय महत्व की सबसे बड़ी खबर से बुलेटिन खुलने के बजाय एक खेल की खबर से खुली होगी। छिटपुट तौर पर ऐसा अकस्मात जरूर हुआ होगा लेकिन जिस रेल बजट को कवर करने की तैयारी चैनल दस दिन पहले से शुरू कर देते हैं, आपाधापी मची रहती है, स्पेशल टीम गठित किये जाते हैं, उन सबको धता बताकर एक खेल इन सबके ऊपर हावी हो जाता है। आशुतोष ने तो जरूर घोषणा की लेकिन उसके साथ बाकी चैनलों ने भी यही किया। इससे न्यूज चैनलों के रुझान के साथ-साथ लोगों का रुझान भी समझा जा सकता है? क्या वाकई सचिन के आगे रेल तेल लेने चला गया। मीडिया संस्थानों में जो मास्टर साहब लोग खबरों की सीक्वेंस और घूम-फिरकर राष्ट्रीय और राजनीतिक खबरों को प्रायॉरिटी देने की कोशिश करते हैं, मुझे लगता है कि उन्हें अपने पाठ जल्द से जल्द बदलने चाहिए।
टेलीविजन ने आज देश की कई बड़ी और जरुरी खबरों के बीच सचिन को लेकर जो एकतरफा महौल रचने का काम किया है, ऐसे में अगर लिखने और विमर्श करने के स्तर पर हम जैसे सचिन के फैन को जरूर संदेह की नजर से देखा जाएगा। हमें लताड़ा जाएगा। हमें फ्रस्ट्रेट और कुंठित करार दिया जाएगा। तब हम निहत्थे होंगे। हमारे पास तब कोई ऐसा साधन नहीं होगा, जिससे हम साबित कर सकें कि सचिन, आपको पता नहीं कि हमने आपकी खातिर बगीचे के पूरे भिंडी के पौधे को सटासट अपनी देह पर बाबूजी के हाथों टूटने दिया। हमने आपके लिए कई एग्जाम्स खराब किये, हम आपके लिए कई बार लोगों से लड़ भिड़े। किसी के प्रति प्रतिबद्धता न साबित करने की ये असहाय किंतु खतरनाक स्थिति है कि जो कुछ भी है वो मन में है, दिल में है, प्रतिक्रिया के स्तर पर अकेले कमरे में बजायी गयी चंद तालियां हैं या फिर मेसटेबुल पर खुशी में एकाध रोटी ज्यादा भर खा लेना है। लेकिन कहीं ये उससे भी खतरनाक स्थिति तो नहीं जो कि देश की जनता की सचिन के प्रति प्रतिबद्धता के नाम पर लगातार तीन घंटे से टेलीविजन चैनलों पर जो दिखाया गया या दिखाया जा रहा है? यहां बात सचिन की हो रही है तो संभव है कि उनके प्रति अतिशय लगाव की वजह से आप इस बात को बंडलबाजी करार दें लेकिन अतिरेक में जीनेवाले इस भारतीय समाज में खेल के साथ-साथ राजनीति, विकास, धर्म, परंपरा सहित दूसरी बाकी चीजों को भी इसी फार्मूले के तहत देखा-समझा और जिया जाता है और फिर हम धार्मिक और राजनीतिक कट्टरता का समाज रचते चले जाते हैं। ये इसी तरह की मुश्किल का विस्तार है, जहां एक मुस्लिम को इस देश का प्रतिबद्ध नागरिक साबित करने में होती है, उसे धार्मिक तौर पर निरपेक्ष साबित करने में होती है। एक दलित को मुख्यधारा की मान्यताओं के बीच अपने अधिकार रेखांकित करने में होती है। टेलीविजन फैनकल्चर के बीच प्रतिबद्धता का ये उन्माद कैसे पैदा करता है और अतिरेक में जीनेवाले इस समाज को और सुलगाता है, इसकी मिसाल आज से ज्यादा शायद ही किसी दिन मिल पाये। उसके बाद इस उन्माद और अतिरेक के वातावरण में कैसे अपने-अपने मतलब की चीजें स्टैब्लिश की जाती है, इसे समझने के लिहाज से भी आज के टेलीविजन की ये खबर मिसाल के तौर पर काम में आएगी।
सचिन के इस दोहरे शतक को लेकर उसके देवता होने की बात एक खबर की शक्ल में बदलती जाती है। सबसे पहले आजतक ने उसे क्रिकेट का भगवान करार दिया। इसी नाम से स्पेशल स्टोरी चलायी। अब ये भगवान शब्द चल निकला। इस सिंड्रोम से एनडीटीवी भी अपने को बचा न पाया। एंकर ने अपने बुलाये एक्सपर्ट से सचिन के भगवान होनेवाली बात पूछ ली। चैनल के स्तर को ध्यान में रखकर एक्सपर्ट ने जबाब दिया – इसे आप एक बेहतर इंसान के तौर पर कहिए, अलग से भगवान कहने की जरूरत नहीं है, इंसान को इंसान ही रहने दीजिए न। हां ये जरूर है कि उसकी मां को लेकर विचार कीजिए, क्या खिलाकर ऐसा बेटा पैदा किया? अब चूंकि एक्सपर्ट ने चैनल के स्तर को समझा, इसलिए जरूरी था कि वो बाकी चैनलों की तरह फोकना (बलून लगा बाजा) बजाने के बजाय कुछ अलग कहते – इसलिए कहा कि सचिन से सिर्फ खेलने की ही बात नहीं बल्कि उनसे डिसीप्लीन, किसी भी तरह का घमंड नहीं होने जैसी बातें सीखनी चाहिए। बात तो सब करेगा, लेकिन सुबह पांच बजे दौड़ने कहिए तो कोई तैयार नहीं, ये सीखना होगा। यहां भगवान वाला सिंड्रोम थोड़ा पिचकता नजर आया। लेकिन इंडिया टीवी के रहते ये भला कैसे पिचकता? इंडिया टीवी की स्पेशल स्टोरी रही – 200 का देवता। इस चैनल ने सचिन को देवता करार देने के साथ ही 200 संख्या को भी स्टैब्लिश करने की कोशिश की। न्यूज चैनलों में तारीखों और संख्या को स्टैब्लिश करने की बहुत मारामारी मची रहती है। ये भी 9/11 से उधार लिया पैटर्न है। हेडर में बार-बार आता है – 5 मिनट, 5 इंच का देवता। पीछे से जोधा-अखबर का गाना, अजीबो शान शहंशाह… इस चैनल की छवि है कि ये दुनिया की किसी भी खबर में देवी-देवता, रहस्यमयी शक्तियों को तलाश लेती है। इन खबरों को देखनेवाली ऑडिएंस निर्धारित है। ऐसे में अगर सिर्फ सचिन की खबर को दिखाया जाता, तो बात नहीं बनती इसलिए उसे इंडिया टीवी से संस्कारित किया जाना जरूरी हो जाता है।
न्यूज 24 के लिए इस खबर को दिखाने के साथ ही बाकी चैनलों से अपनी औकात अलग भी बतानी होती है। इसलिए वो स्क्रीन को डबल विंडो काटती है। एक तरफ मैच के दौरान सचिन के शॉट्स और दूसरी तरफ चैनल की मालकिन का थकेला सचिन के साथ का इंटरव्यू। अब एकबारगी देखने से ऐसा लगता है कि सचिन मैदान छोड़कर इस चैनल की तरफ भागे हों। चैनल की कोशिश यहां ज्यादा से ज्यादा तड़का मारने की हो जाती है। पहला लक्षण हमें इस चैनल पर दिखा और बाद में फिर बाकी चैनलों पर भी। न्यूज 24 ने पुराने फुटेज बटोरे और रियलिटी शो के उस एपिसोड को स्टोरी के साथ चेंपा, जिसमें कि सचिन के साथ बाकी के क्रिकेट खिलाड़ी मौजूद थे। हेडर लगाते हैं – सचिन को बॉलीवुड का सलाम। यहां भी फुटेज को लेकर धोखा। ये उसी तरह से है कि भइया गंगा का सोता फूटा है, नये-पुराने जो भी बर्तन मिले, डाल दो। अजमेर में सचिन के नाम चादर चढ़ाये जाने की खबर से चैनल ये स्टैब्लिश करता है कि इस खुशी में देश के मुस्लिम भी शामिल हैं। जी न्यूज का आदेश है – काम छोड़ो, मास्टर को देखो।
IBN7 इस खबर से टीआरपी दूहने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। पता कर लिया कि सचिन लता मंगेशकर को मां कहते हैं। तभी जब प्रतिद्वंद्वी चैनल ने सचिन की सास से बाइट लेनी शुरू की, तो इसने लता मंगेशकर को पकड़ा। बार-बार वही सवाल कि आप फोन करके क्या बोलेंगे, आपके बीच किस तरह का लगाव है। अब हालत ये है कि लता मंगेशकर ये कहने के अलावे कि मैं चाहूंगी वो सौ साल तक खेलें, ईश्वर उसे लंबी उम्र दे, कुछ बोलती ही नहीं। यही मौका होता है, जब कोई विवाद पैदा हो सकते हैं। आशुतोष और संदीप चौधरी पूरा दम लगा देते हैं लेकिन उनके सवाल बदलते जाते हैं लेकिन लता के जबाब वही दो-तीन। अब एंकर अपनी तरफ से पास फेंकते हैं – क्या अभी आप ये गाएंगी – सूरज है तू मेरा चंदा है तू। लता का जबाब – अभी तो मैं कुछ भी नहीं गा पाऊंगी।
इस बीच लगभग सारे चैनलों पर सचिन को लेकर किसने क्या कहा फ्लैश होते हैं, पीएम साहब का वक्तव्य स्कॉल में फिक्स हो गया है। तभी दौर शुरू होता है कि सचिन को आज कुछ नया नाम दिया जाय। मास्टर ब्लॉस्टर तो पुराना हो गया आज के दिन। इसकी पहल इंडिया टीवी की तरफ से होती है – सचिन टूहंड्रेडडुलकर। हां, आज से सचिन का यही नाम। पहली बार लगा कि एनडीटीवी इंडिया ने सीधे इंडिया टीवी की नकल मारी है और उसने नाम दिया – सेंचुरकर… न्यूज24 पर खान विवाद सवार है, इसलिए माइ नेम इज खान।
टेलीविजन चैनलों पर सचिन को लेकर खबर अब कुछ भी नहीं है। क्योंकि खबर एक विस्फोट की तरह हुई, जिसकी आवाज देश के बच्चे ने सुनी। लेकिन चैनलों का इसे गींजना-मथना जारी है। अब हर कोई दूर की कौड़ी लाने में जुटा है। टेलीविजन स्क्रीन पर आंख गड़ाये रहने पर मुझे चैनल चाहे जो भी हो लग रहा है – हर कोई टेप सेक्शन की तरफ भाग रहा है, न्यूज रूम की तरफ आपाधापी मचाये हुए है और लग रहा है कि शायद ये टेलीविजन के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा होगा कि राजनीति, खेल, मनोरंजन, सिनेमा और बिजनेस सबके सब बीट के मीडियाकर्मी एक ही मुद्दे पर खबर बना रहे होंगे। चुपचाप बैठे क्राइम बीट के लोग सोच रहे होंगे – क्या आज किसी दलित महिला के साथ शोषण नहीं हुआ होगा, किसी बच्ची की जान नहीं ली गयी होगी, किसी पुलिसवाले ने किसी को नंगा नहीं किया होगा… किया होगा न… तो, तो क्या सचिन के आगे कुछ नहीं चलेगा, चुप्प। टेलीविजन पर देश का लोकतंत्र ऐसे ही सिकुड़ता है। दूरदर्शन के जमाने में इंदिरा के आगे और अब सैकड़ों चैनलों के जमाने में सचिन, शाहरुख और कैटरीना के आगे।
(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्ण मीडिया विश्लेषक। ओजस्वी वक्ता। दिल्ली विश्वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्लॉग राइटर। कई राष्ट्रीय सेमिनारों में हिस्सेदारी, राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। ताना बाना और टीवी प्लस नाम के दो ब्लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









अविनाश जी आप कब से बाजा़रवादी हो गए? या, आपके भीतर जो अवसरवाद छुपा हुआ था वह अब मुखर होकर सामने आने लगा है? सर्वहारा और दबे-कुचले के नाम पर दिखावटी हाय-तौबा करने वाला अविनाश सचिन की बात कैसे करने लगा? सचिन निर्विवाद रूप से क्रिकेट की देन है और निश्चित रूप से आज का क्रिकेट बाजार के पालने में पल रहा है.
चलो देर से ही सही आपको बाजा़र की समझ आने लगी है, कोशिश किजिए की बाजार की पूरी समझ पैदा हो जाए.
विनीत जी,
आपने फिर एक ऐसी टिप्पणी कर दी, जो आपको नहीं करनी चाहिए थी। आशुतोष को लग रहा होगा … और राजदीप ने पहले कहा .. जैसी तुलना आपको नहीं करनी चाहिए थी। कम से कम इसलिए तो कतई नहीं जब कोई भी इसे पुख्ता तौर पर नहीं कर सकता कि यह तर्क सबसे पहले किसने और कब दिया?
क्या आप दावे से कह सकते हैं कि राजदीप से पहले यह बात किसी और ने नहीं कही होगी? क्या आप बता सकते हैं कि नलिन मेहता की जिस किताब का आप जिक्र कर रहे हैं वह कितनी पुरानी है? दो, चार या छह साल पुरानी या फिर दो दशक पुरानी? जहां तक मेरी जानकारी है यह किताब करीब दो साल पुरानी है। इसमें ज़्यादातर अंग्रेजी पत्रकारों से इंटरव्यू लिए गए हैं। खासकर एनडीटीवी और टाइम्स नाउ। किताब भी अंग्रेजी में है। इसलिए अगर उस इंटरव्यू के आधार पर लिखी गई बातों से यह साबित करने की कोशिश होगी कि किसने पहले क्या कहा तो यह ग़लत होगा।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह जुमला “प्रधानमंत्री ने ऐसा क्या कहा कि हेडलाइन बनाई जाए” हिंदी चैनलों में काफी पहले से पॉपुलर है। कम से कम आठ-नौ साल से तो मैं ही सुनते आ रहा हूं। अंग्रेजी वालों ने तो बाद में यह कहना शुरू किया। कुछ अंग्रेजी चैनल तो आज भी अंग्रेजी चैनल उसी ढर्रे पर चलते हैं। प्रधानमंत्री ने कुछ कहा नहीं कि हेडलाइन बदल दी जाती है।
दूसरी बात कि रेल बजट बहुत बड़ा मुद्दा है… उसके बारे में आपको जानकारी होनी चाहिए कि अब तक 350 के करीब घोषणाएं ऐसी हैं जो अधूरी हैं। हर मंत्री, हर साल अमूमन तीस से चालीस अधूरी घोषणाएं करता है। उन घोषणाओं को छोड़ कर आम आदमी से जुड़ी बात सिर्फ़ इतनी ही होती है कि किराया बढ़ा या नहीं और कोई नई ट्रेन उसके इलाके में आई या नहीं। किराया बढ़ा नहीं और ट्रेनों के बारे में सुबह से लेकर शाम तक जानकारी दी ही जा रही थी। अब रात में भी वही चलाया जाए यह किसने कहा था? क्या इस बारे में किसी बाइबल या गीता में लिखा हुआ है?
जो सुबह से शाम तक नहीं देख सका, तो क्या वो अगली सुबह तक इंतज़ार नहीं कर सकता?
तीसरी बात, कि किस मीडिया संस्थान में कौन क्या पढ़ाता है? ज़्यादातर मीडिया संस्थानों में वही पढ़ाते हैं जिन्होंने कभी किसी संस्थान में पांच-दस साल तक काम नहीं किया हो। सिर्फ़ किताबें पढ़ कर लेक्चर देने की आदत हो गई हो। ठीक आपकी तरह किसी नलिन मेहता की किताब को उठा कर कोट कर दिया। यही तरीका है पढ़ाने का। टीवी समझ में आए तब न कुछ नई बात बताएं।
कभी क्रिकेट का बहुत शौक हुआ करता था। अब तो चोरी-चकारी और पी.एच.डी. की तरह आए दिन मैच होते हैं। घिन आने लगी है। जिस दिन टी.वी. पर कोई मैच न आ रहा हो तो डर लगने लगता है कि कहीं कोई 9/11 तो नहीं हो गया। शुक्र है कि स्व. प्रभाष जोशी को घुड़दौड़ वगैरह देखने का शौक नहीं था। नहीं तो आए दिन घुड़दौड़ की उपयोगिता, प्रासंगिकता, आध्यात्मिकता, कलात्मकता पर टी.वी. महात्माओं के आशु-प्रवचनों से माहौल सुगंधित हो रहा होता। सभी क्रिकेटालुओं को मेरा प्रणाम और वृद्धांजलि !
राजेश्वरजी,
पोस्ट पढ़ने के लिए शुक्रिया। आप अपना संपर्क दें,मुझे आपसे बहुत सीखना है। आप जैसे ही गुरु की तलाश में था।..वैसे भी टेलीविजन देखकर और किताबें पढ़कर लिखने की आदत से मुक्त होना चाहता हूं। अगर आप सीरियसली विमर्श करना चाहते हैं तो भी बताएं।..फिलहाल तो आप ललकारकर चले गए।..
विनीत जी,
विमर्श करने के लिए नाम-पते की क्या जरूरत है। आप इसी तरह लिखते रहिए और हम भी इसी तरह अपनी टिप्पणी देते रहेंगे। फिलहाल तो इतना ही कहना चाहता हूं कि सिर्फ़ और सिर्फ़ निंदा करने के लिए निंदा करना सही नहीं है। आप खुद ही सोचिए कि रेल बजट में ऐसा क्या था जिसके लिए सुबह से अगली सुबह तक न्यूज़ चैनल सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी पर टिके रहें? अच्छा चलिए आपसे एक सवाल पूछता हूं। क्या आप बताएंगे कि पिछले साल ऐसी कौन सी घोषणा थी जिससे आपकी ज़िंदगी सीधे तौर पर प्रभावित हुई? वैसे भी न्यूज़ चैनल बजट की जो रिपोर्टिंग करते हैं उससे बेहतर था कि खेल पर कुछ देखने को मिला।
आशुतोष सहित आप जैसे लोग ये तर्क तब दे रहे हैं जबकि सचिन ने कारनामा कर दिया। नहीं तो रेल बजट पेश होते ही एक-एक नेताओं की बाईट के लिए ये चैनल कैसे दौड़ लगाते और एक-एक गेस्ट के लिए कैसे चिरौरी करते ये आपसे और हमसे छुपा नहीं है। मैंने भी ये सब देखा औऱ किया है। आज आपको लग रहा है कि इसमें ऐसा क्या था? सवाल इसमें होने और नहीं होने का नहीं है। सवाल है कि आप हर स्थिति में अपने को जस्टिफाय क्यों करने लग जाते हो? दिखाया तो दिखाया अब ये फालतू के तर्क क्यों दे रहे हैं कि रेल बजट में ऐसा क्या था?
विनीत जी,
इसलिए कह रहा हूं कि टीवी को समझने की कोशिश कीजिए। यहां जो ख़बर बात में आती है, वह बड़ी हो जाती है। कोई ख़बर दोपहर से चल रही हो और कोई ख़बर शाम में आए और दोनों ही ख़बरें करोड़ों लोगों से जुड़ी हों तो शाम वाली ख़बर बड़ी हो जाएगी। सचिन का दोहरा शतक शाम छह बजे के बाद लगा। रेल बजट पर चर्चा सुबह से हो रही थी। सचिन की ख़बर छा गई। इसमें ग़लत क्या है?
टीवी में ऐसा ही होता है। अगर उस समय कोई रेल बजट पर टिका रहता तो उसका बाजा बज जाता। आप जैसे चुनिंदा लोग उसकी तारीफ में एक-दो लेख लिख देते लेकिन उससे क्या फर्क पड़ता है?
इसलिए थोड़ा सोचिए। यह भी सोचिए कि आज सभी अख़बारों ने क्यों सचिन की ख़बर को ममता बनर्जी से ऊपर दिया है। मीडिया पर समीक्षा करनी है तो एक पत्रकार के नज़रिए को समझने की कोशिश कीजिए। इसके बिज़नेस को समझिए। फिर इसकी आलोचना कीजिए। अगर आप मीडिया से बिजनेस को खारिज करके सिर्फ़ नैतिकता का ढोल पीटिएगा तो आपकी बात कोई नहीं सुनेगा। आलोचना करना अच्छी बात है, लेकिन आलोचना भी उसी की सुनी जाती है जो खुले दिल से तारीफ़ करना भी जानता हो। सिर्फ़ और सिर्फ़ आलोचना अच्छी बात नहीं है।
आपको व्यंग्य में गुरु क्या कह दिया कि आप क्लास ही लेने लगे हैं।..आप संवादधर्मिता में नहीं थेथरई की संस्कृति में भरोसा रखनेवाले लोगों में से हैं इसलिए आपसे भिड़कर टाइम खोटा करने से बेहतर है कि आपको अपने हाल पर छोड़ दिया जाए।..समझनेवाले बाकी के लोग मेरी पोस्ट को समझ लेगें।.
सुचिंतित और बेहद जरुरी आलेख। कल जिस तरीके से मीडिया ने सचिन के जरिये रेलबजट को ‘सरपास’ किया वो शोचनीय है। उसमे भी खराब है टी.वी पर बजट को कवर का तरीका। पहले दूरदर्शन पर “पॉईंट वाईज” बात होती थी कि इस बजट में यह है और वह नही है। पर अब तो चैनल लगता है कि कहीं से भी बात शुरु कर देते हैं। खबर और मशाला एक हो गये हैं।
आपको बधाई। जाहिर है इस लेख के लिये।
विनीत जी,
कमाल के आदमी हैं आप! कभी बहस का न्योता देते हैं और कभी थेथर बता देते हैं। आपकी काबिलियत को मानना पड़ेगा। रंग बदलने की आपकी इस काबिलियत को मेरा सलाम।
आपने लिखा है कि “आप (मतलब राजेश्वर) संवादधर्मिता में नहीं थेथरई की संस्कृति में भरोसा रखनेवाले लोगों में से हैं इसलिए आपसे भिड़कर टाइम खोटा करने से बेहतर है कि आपको अपने हाल पर छोड़ दिया जाए।..समझनेवाले बाकी के लोग मेरी पोस्ट को समझ लेगें।.”
विनीत जी, ऐसा कह कर आप साबित क्या करना चाहते हैं? यही न कि आप बहुत बड़े विद्वान हैं। आपको यह पूरा हक़ है कि आप दूसरों की आलोचना करें। उनकी टांग खिंचाई करें। जैसे इस पोस्ट में आपने आशुतोष के बहाने न्यूज़ चैनलों की खिंचाई की है। लेकिन आपके लिखे पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। अगर सवाल उठाएगा और आपकी समझ को चुनौती देगा तो वो थेथर हुआ?
यह तो आपका अहंकार है। इतना अहंकार किस लिए?
अभी अभी फ़ोन पर एक साथी से जानकारी मिली की सचिन ने एकदिवसीय क्रिकेट का पहला दोहरा शतक नहीं लगाया है. ऑस्ट्रेलिया की महिला खिलाड़ी बेलिंडा क्लार्क १९९७ में महिला विश्व कप के दौरान सचिन के गृह नगर मुंबई में १५५ गेंदों पर २२९ रनों की शानदार नाबाद पारी खेल चुकी हैं. जी हाँ १२ साल से भी ज्यादा अरसा गुजर चूका है वन डे क्रिकेट इतिहास में पहला दोहरा शतक लगे. यह जानकारी नई इबारतें ब्लॉग चलने वाले साथी सचिन ने दी. यकीन मानिये अपने अतिरेकी क्रिकेट प्रेमी होने पर उस समय बहुत शर्म आयी. शायद हम अब भी महिला क्रिकेट को कोई खेल मानते ही नहीं हैं. अगर इस जानकारी में कोई विमर्श न भी तलाशा जाये तो भी यह अखबारी भाषा में ब्लंडर तो है ही न. क्या कोई यह जानकारी हमारे टीवी वाले साथियों तक पहुंचाएगा.
रेल बजट माने रेलवे हैरिटेज कमिटी, स्कूल, अस्पताल आदि-आदि। सचिन तेंदुलकर माने रेस्टोरेंट और करोड़ों के खेल आदि-आदि।
दुखी होने वाले बंधुओं से क्षमाप्रार्थना सहित।
एकलव्य जी आपने तो गागर में सागर भर दिया है। बढ़िया है हम क्रिकेट से सौ कोस दूर रहते हैं। टीवी देखना तो हमने छोड़ ही दिया है। खैर,अब यहां प्रस्तुत गौण विषय पर भी दो शब्द कह लूं !
यूं कि हर टेक्सट पर पाठकीय राय बहुत अलग-अलग हो सकती है। कौन क्या देखना-दिखाना चाहता है यह मामला सापेक्षिक है। हर कोई अपने वर्गीय हितों से बंधा हुआ है। मैं भी।
विनीत भाई,
अगर मैं कहूं कि सांस लेने के लिए हवा, पीने के लिए पानी, रौशनी के लिए सूरज, पढ़ने के लिए स्कूल, पेट के लिए भोजन, पहनने के लिए कपड़ा और रहने के लिए एक छज्जा तो सभी के लिए जरूरी है, तो क्या मैं वाकई कोई हास्यास्पद बात कर रहा हूं। अगर मैं कहूं कि किसी महान देश का नागरिक होने के नाते नहीं, बल्कि एक आदमी होने के नाते हर आदमी को उसका हक तो मिलना ही चाहिए, क्या यह भी कोई हास्यास्पद बात है। 24 जनवरी सन् 2010 को भारत की रेलमंत्री ममता बनर्जी ने अपने नागरिकों (भारत में सफर करने वाले विदेशियों के लिए भी) का रेल बजट पेश किया, लेकिन औपनिवेशिक दौर से ही चले आ रहे यात्राओं के अमानवीय सफर की तरफ ध्यान भी नहीं दिया और पिछले रेलमंत्रियों और सरकारों की तरह इस बार भी भेदभाव के सफर को जारी रखा।
मैं बात कर रहा हूं रेलवे का अभिन्न अंग बन चुके उस साधारण डिब्बे की, जो भारत की वर्ण व्यवस्था की तरह देश की बहुसंख्यक जनता के सफर की नियति बन चुकी है। 70 सीटों वाले इस डिब्बे में यात्री तब तक घुसने की जुगत में लगे रहते हैं जबतक कि डिब्बे के दरवाजे पर लटकने की जरा-सी भी गुंजाइश बची हो। कभी ऐसे ही ठसाठस भरे डिब्बे के पास जाइए और केवल समझने के तौर पर अपने बैग बोगी में घुसाने का प्रयास कीजिए। आप पाएंगे कि पहले तो लोग बैग भीतर जाने से ही रोकेंगे और अगर किसी तरह आपका बैग डिब्बे में घुस गया तो वह एक हाथ से दूसरे हाथ, दूसरे हाथ से तीसरे, उपर ही उपर वह पूरी बोगी में सफर कर जाएगा और यह भी तय है कि कुछ मिनटों बाद उसे भी जगह मिल ही जाएगी, लेकिन उस बैग को बोगी से बाहर फेंकने का ख्याल किसी भी यात्री के दिमाग में नहीं आयेगा। लेकिन यही यात्री भारत में सफर की इस वर्ग व्यवस्था का कभी-कभी शिकार भी बन जाते हैं, जिनकी ट्रेन से गिरकर घायल होने या मरने की खबरें हमें अखबारों में अक्सर पढ़ने को मिल जाती हैं।
मैं ये बातें आदमी के हक को खैरात समझने वालों या उन मीडियाकर्मियों के तर्क कि सचिन की सेंचुरी के सामने ममता के बजट की क्या चर्चा, के विरोध में नहीं लिख रहा हूं। बल्कि इसलिए लिख रहा हूं कि आज जब मैं अपने दोस्त जितेन्द्र को छोड़ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचा तो दरभंगा जाने वाली बिहार संपर्क क्रान्ति एक्सप्रेस के एसी टू टीयर के यात्री इस बात से काफी खुश दिखे कि आर्थिक मंदी और कमरतोड़ महंगाई के बावजूद दीदी ने इस बार यात्री किराए में कोई बढ़ोतरी नहीं की। वहीं दूसरी तरफ 17-18 डिब्बों वाली इस ट्रेन के साधारण डिब्बे का नजारा ही दूसरा था। ओवरफ्लो हो चुके डिब्बों में घुसने का प्रयास कर रहे यात्रियों पर पुलिस डंडे बरसा रही थी और ज्यादा पैसा लेकर टीटी जनरल से स्लीपर का वेटिंग का टिकट बना रहे थे। आप विश्वास मानिये कि यह काम कोई एक-दो टीटी नहीं, बल्कि इस काम में करीब 80-90 टीटी लगे हुए थे। स्लीपर और जनरल में फर्क करना मुश्किल था।
इतिहास की पुस्तकों के उन पन्नों को पलटिए या फिर उन फिल्मों को देखिए, जिसमें हिटलर कैसे अपने विरोधियों को गैस चैंबर में झोकने से पहले, मालगाड़ी के डिब्बों में लोगों को भेड़-बकरियों की तरह ढूंस-ढूंस कर भरवाता था। पूरी मानवता को ही स्वाहा करने का दौर था वह, लोग लाचार थे और प्रतिरोधी भी। लेकिन हिटलरकाल से भी बदतर स्थिति में भारत की साधारण डिब्बे में सफर करने वाले ये अभिशप्त, पुलिस के डंडे खाते और टीटी की लूट का शिकार होते लोग किस आजाद देश के नागरिक हैं!
इस बजट को ममता के रेल बजट के रूप में देखने की भूल एकदम मत कीजिए, बल्कि इसके लिए अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी के भारत में गरीबी के आकड़े को देखिए। जिसके मुताबिक, हमारे देश में 78 फीसदी ऐसे लोग हैं, जिनकी एक दिन की कमाई मात्र 20 रूपये है, उनमें भी ये 28 फीसदी शहरी गरीब हैं और 72 फीसदी ग्रामीण। बाकी बचे 22 फीसदी में अंबानी हैं, आप-हम हैं और 21 रूपये में जीवन गुजर-बसर करने वाले घुरहू-कतवारू भी हैं। क्या देश की 80 फीसदी आबादी को सफर करने की कीमत अपने आदमी होने के हक को कुर्बान करके ही तय की जा सकती है। अगर साधारण डिब्बे की संकल्पना, सीट रिजर्व न हो पाने की तत्काल व्यवस्था के रूप में होती तो बात कुछ हद तक समझ में भी आती, हमारे महान देश में तो तत्काल यात्रा को भी दो दिन पहले ही रिजर्व कर लिया जाता है।
और अंत में जवाहर खानदान की बहू मेनका गांधी के उस महामानववाद को याद कीजिए। उनके मुताबिक, हम कितने सभ्य हैं, इस बात से पता चलता है कि हमारा समाज जानवरों के साथ कैसा बर्ताव करता है। मुझे नहीं लगता कि कोई भी आदमी उनकी इस बात का विरोध करेगा, लेकिन जब वह कहती हैं कि एक ट्रक में तीन से ज्यादा पशु नहीं जाने चाहिए, हम भी कहते हैं कि जानवरों के साथ अमानवीय बर्ताव नहीं होना चाहिए, लेकिन ऐसी सोच पशुओं के मामले में ही क्यो? साधारण डिब्बे में आलू-बैगन की तरह ठंसे आदमियों को निरपेक्षभाव से देखने की आदत हमें क्यों पड़ गयी है?
क्या यह इंसानों का बजट था?
24 फरवरी की जगह गलती से 24 जनवरी हो गया है…कृपया सुधार कर पढ़े
शानदार है सचिन का शतक,हमें जरुर ख़ुशी मनानी चाहिए,भांगड़ा करनी चाहिए और लोग नाच भी रहे हैं.पर भईया आप तो जर्नलिस्ट हैं आप भी और लोगों की तरह तमाम मुद्दे दफ़न कर किसी की इतनी ज्यादे बड़ाई करें की उसे इन्सान से भगवान बना डालें..तो क्या फर्क है आपमें और आम इन्सान में…अच्छी चीजों की प्रसंशा जरुर होनी चाहिए लेकिन वों इतनी भी ना हो की आप चापलूस हो जायें.ये क्या किया आपने ३ घंटे में उस शाम क्या कोई भी एसी स्टोरी नहीं नज़र आई की उसे चालअ सकें..हम भी सचिन के कट्टर दर्शक हैं..उस टाइम मैं फैशन शो का मजा ले रहा था.जब सचिन 185 -186 पर पहुचे तो मैं बाहर निकल आया.और लगातार कमेंट्री मो पे सुनता रहा.जसे ही 200 रन पुरे हउवे आसपास जितने भी लोग थे सबको बधाई दे डाली.उसके बाद मच में क्या हो रहा है ये जाने बिना उन दोस्तों की सबकी खबर लेने लगा मो पर जिनसे ३-४ साल पहले सचिन को बाहर करने की बात पे लड़ा था.सबकी खबर ले डाली..आज जी भर के सब को कोशा…सब कुछ किया मगर फिर ३० मिनट बाद फिर stag के करीब आगये.मीडिया का ये रूप बहुत खतरनाक ..कुछ उसी तरह जसे जिस दल पे हम बठे हों उसी को काटने जसा ठहरा.करते रहिये तर्क और कुतर्क इससे आप लोग अपना दामन दागदार होने से नहीं बचा पाएंगे.और खुद को मीडिया के कद को हलके से हल्का बना डालिए ताकि कोई आपे बिस्वास ना करे.एस.पि सिंह भी बहुत खुश होंगे आपसे अपने शिष्यों से जो उनके लगाये पोधों की जड़ में मट्ठा डालने की शिवा कुछ नहीं करते.मुबारक हो .वसे जब trp ही जरुरी है तो ये न्यूज़ चैनल कुन खोले बठे हो.इतनी ही जरुरी है क्रिकेट तो भाई क्रिकेट चैनल खोल लो न्यूज़ चैनल कुन खोले बठे हो…
अजय जी आपका आर्टिकल बहुत कुछ कह गया रेल और उसके सवारियों के बारे में..न्यू डेल्ही से माने भी र ट्रेन में सफ़र थर्ड क्लास में करता रहा हूँ.पहले रेल पुलिस लम्बी लाइन लगवाती है फिर लोगों को अंदर घुसने नही देती जो पासा देता है ४०-५०-१०० उसे पहले चढ़ने देती है.फिर बाकि लोगों को..खोजी पत्रकारिता के लोग कभी पता नहीं न्यू डेल्ही स्टेशन गए हैं की नहीं ये हर दिन का नजर है,जिसपे किसी खोजी पत्रकार की नज़र नहीं पड़ती शायद ये चन्न्लों को TRP नहीं दिला पायेगा.इस वजह से उनकी आँखे अंधी हो गई है.’
अच्छा होता गर ‘खबर हर कीमत पर ‘ का टग भी उतर देते ..बहस करने की कोई जरुरत ही नहीं होती……
अबे साला….. ये क्या बकचोदी है भाई??? सब भी पब्लिसिटी बटोरना चाहते हैं… लेखक भी…. कमेन्ट करने वाला भी… बे सर पैर की बातों में माथा पीट रहे हैं. धत बुद्धिजीवियो!!
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