अपनी बेटियों से डरे हुए लोग!

♦ शीबा असलम फहमी

शीबा का यह लेख हंस के अक्‍टूबर 2008 अंक में छपा था। चूंकि इन दिनों प्रकारांतर से हुसैन-रूश्‍दी-तसलीमा का संदर्भ जीवित हो उठा है, हम इसे प्रकाशित कर रहे हैं : मॉडरेटर

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पिछले कुछ दिनों से तसलीमा नसरीन को लेकर जो विवाद चल रहा है, उसमें सिर्फ एक ही बात उभर कर आ रही है कि विश्व का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा (मुस्लिम) समाज एक ऐसी कठपुतली है, जिसे धर्म के नाम पर कोई भी नचा सकता है। यह एक भयाक्रांत समाज है। इतना बड़ा और फैला हुआ होते हुए भी और इस दावे के बावजूद कि यह सबसे तेजी से फैल रहा है, हीन भावना से ग्रस्त है। मुस्लिम समाज विश्व पटल पर एक चिड़चिड़ा, डरा हुआ और आत्मकेंद्रित समूह जान पड़ता है, जो कि इतने बड़े और लगभग सर्वव्याप्त समूह के लिए खासी अटपटी विशेषता है।

तसलीमा प्रकरण के मद्देनजर कुछ अहम सवाल उभर कर आते हैं, जिन पर मुसलमानों को आत्ममंथन करना ही होगा। तालीमयाफ्ता, तहजीबयाफ्ता, तरक्‍कीपसंद और इंसान-दोस्त समाज आज धर्म को पीछे छोड़ चुका है। उसकी जिंदगी में धर्म ही एक पहचान नहीं है, जिससे वह बंधा है। उसके पास दूसरी कई पहचानें हैं, जो अर्जित हैं, आधुनिक हैं। इसलिए धर्म उसके अस्तित्व का केंद्र बिंदु नहीं रहा। लेकिन इसी विश्व पटल पर कुछ ऐसी प्रक्रियाएं भी चल रही हैं, जो धर्म के आडंबरीय रूप को सामूहिक पहचान से जोड़ने की प्रक्रिया कही जा सकती है। इसी के साथ सामूहिक रूप से धर्म के लिए एक तरह का vigilantism भी उभरा है, जिसके तहत कुछ लोग धर्म की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। परंतु यही लोग अपने-अपने धर्म को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं। जहां तक इस्लाम का सवाल है, एक अजीब विरोधाभास व्याप्त है इसके मानने वालों में।

आप किसी भी इस्लामिक जानकार से बात करें, कुछ खास दावे उभर कर सामने आएंगे कि इस्लाम तर्क, इंसाफ और भाईचारे पर आधारित है। कि इस्लाम और विज्ञान के बीच कोई तनाव नहीं है। इस्लाम का प्रबलतम हामी है। वगैरह वगैरह।

लेकिन मुस्लिम समाज की विश्‍व भर में छवि इसके विपरीत क्यों हैं? आज यह समाज विश्‍व स्तर पर ‘घेटो’ में जी रहा है। एक ऐसे ग्रीनहाउस की तरह, जहां न बाहर से कोई नया विचार अंदर आ सकता है न अंदर से कुछ बाहर दिया जा सकता है। मानो कहने, बताने, जानने लायक सब कुछ सातवीं सदी में कह दिया गया और दुनिया अब उन्हीं जानकारियों के साथ रहे। इससे आगे बढ़ने की कोई जरूरत नहीं।

जहां तक इंसाफ-पसंदी का सवाल है, मुस्लिम समाजों ने अपनी औरतों के साथ क्या-क्या बर्ताव किये हैं और कर रहे हैं, सबके सामने है। सर कलम, संगसार से लेकर सामूहिक बलात्कार तक की सजाएं औरतों को इस्लाम के नाम पर दी जा रही हैं। हालांकि यह सब गैर इस्लामी हैं, लेकिन मुस्लिम समाजों में ही इनका चलन है। यह बिलकुल ‘ऊंची दुकान फीका पकवान’ कहावत को चरितार्थ करने वाली बात है।

मुझे मालूम है कि यह कहते ही मुझ पर इस्लाम को न जानने के आरोपों की बौछार होगी। लोग कहेंगे कि मैं इस्लाम और उसमें निहित औरतों के अधिकारों, उनके मानवाधिकारों, शौहर-बीवी के बीच बराबरी आदि के पहलुओं को न जानते हुए ‘राजेन्द्र यादवीय-डिस्कोर्स’ में पड़ गयी हूं। मुझे मालूम ही नहीं कि जब इस्लाम आया, उस समय अरबों में लड़कियों के साथ क्या-क्या जुल्म होते थे। उन्हें जिंदा गाड़ दिया जाता था। उन्हें गुलाम बनाया जाता था। उनकी कोई इज्जत नहीं थी, वगैरह वगैरह।

इसलिए यहां पर यह साफ कर देना जरूरी है कि ‘इस्लाम धर्म’ और ‘मुस्लिम समाज’ दो अलग-अलग यथार्थ हैं। हालांकि यह अक्सर एक दूसरे में गड्डमड्ड हुए दिखते हैं। इस्लाम ने जरूर उस समय वह रास्ता दिखाया होगा, जिससे यह इतना लोकप्रिय हुआ कि इतने कम समय में दुनिया का दूसरे नंबर का धर्म बन गया। लेकिन एक समाज के तौर पर आज मुसलमान दुनिया से कटे-कटे, शंकालु, भयाक्रांत और बंद समाज ही हैं।

कठमुल्लों की सत्ता में मुस्लिम समाज का वह स्वरूप उभरा है, जो तर्क-वितर्क, विज्ञान, बराबरी, और सहिष्‍णुता को नकारता है। एक ऐसा समाज, जिसमें अपने ऊपर लग रहे आरोपों का जवाब तर्क और इंसाफ के आधार पर नहीं बल्कि ‘हल्ला-बोल’ द्वारा दिया जाता है। शाह बानो, इमराना, और तसलीमा प्रकरण ने इस समाज में व्याप्त डर, घबराहट, और अराजकता को उजागर किया है।

तसलीमा नसरीन ‘अपनी आपबीती’ और ‘लज्जा’ के कारण मशहूर हुईं। ‘लज्जा’ में उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे जुल्मों को उजागर किया। भारतीय मुसलमानों को इसमें क्या आपत्ति है, समझ में नहीं आता। भारत में हिंदुत्व और राष्‍ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने अल्पसंख्यकों के साथ जो कर रहा है उसके बयान पर तो आम हिंदुओं को कोई एतराज नहीं। बल्कि वही भारतीय अल्पसंख्यकों की सबसे मुखर पैरवी करते हैं। लेकिन मुसलमान अपने अल्पसंख्यकों के साथ जो करते हैं, उस पर ‘मुस्लिम इंसाफ-परस्ती’ हर आवाज को खामोश कर देना चाहती है। यही नहीं, जब शिया-सुन्नी फसाद होते हैं, तब भी ‘मुस्लिम इंसाफ-परस्ती’ ‘सुन्नियों’ को कठघरे में नहीं खड़ा करती। हां जब हिंदू-मुस्लिम फसाद होते हैं, तब भारतीय लोकतंत्र, संविधान, न्याय व्यवस्था सब पर सवालिया निशान लग जाता है और सेक्यूलरिज्‍म की दुहाई हर उर्दू अखबार देता है।

रही बात तसलीमा की ‘आपबीती’ की तो यह और भी अजीबो-गरीब मामला है। और यह सिर्फ एक तसलीमा का मामला नहीं बल्कि तकरीबन हर औरत पर, कुछ ज्‍यादा कुछ कम, पर लागू होता है।

घर की चारदीवारी में, सगे रिश्‍तेदारों द्वारा, पितृसत्तात्मक व्यवस्था में, हर समाज में गैरबराबरी और नाइंसाफी व्याप्त है। यह सिर्फ मुसलमानों का मामला नहीं है। लेकिन तसलीमा के आरोप अगर समाज पर न होकर इस्लाम पर हैं, तो भी उसका जवाब तसलीमा के साथ दुर्व्‍यवहार से नहीं दिया जाना चाहिए। अगर धर्म में खुद पर लग रहे आरोपों से खुद को बचाने की तर्क शक्ति नहीं तो वह कठघरे में खड़ा ही होगा। तसलीमा ही नहीं आज विश्वभर में मुसलमान औरतें अपने-अपने समाजों में व्याप्त लिंग भेद पर सवाल खड़े कर रही हैं लेकिन इस्लाम पर हमला बोल कर नहीं। उनके यहां धर्म और समाज का फर्क साफ है। वह इस्लाम में रह कर इस्लामी न्यायप्रियता, बराबरी और आजादी के दर्शन से अपने लिए रास्ता निकाल रही हैं। वह मुसलमान मर्दों से ज्‍यादा स्पष्‍ट हैं इन मुद्दों को लेकर। तो फिर मुसलमान मर्द यह क्यों नहीं कर सकते? दरअसल तसलीमा के साथ जो हो रहा है, वह पितृसत्ता की भयाक्रांता है। धर्म तो सिर्फ उसका मुखौटा है। कहा जा सकता है कि धर्म पितृसत्ता को फलने-फूलने का मौका देता है, लेकिन जिन समाजों ने धर्म को पीछे छोड़ दिया है क्या वे लिंग-भेद और स्‍त्री-दमन से मुक्त हो गये? नहीं! चाहे पूंजीवादी पश्चिम योरोप हो या साम्यवादी व्यवस्था के देश, जो अब पूंजीवादी हो रहे हैं। नारी-दमन किसी न किसी रूप में सभी जगह है। बल्कि किन्हीं मामलों में अपनी पराकाष्‍ठा पर है। कुछ ‘लिबरल्स’ बाजार को एक महान समानतावादी व्यवस्था मानते थे पर जब बाजार आया तो उसने भी उन्हीं सांस्कृतिक बिंबों का ज्‍यादा बेबाकी व बेहयाई से इस्तेमाल किया, जिनके सहारे सदियों से नारी-दमन चल रहा था। बल्कि बाजार ने नारी देह को एक नये स्तर पर ले जाकर बिकाऊ बनाया।

इसलिए सिर पर ‘स्कार्फ’ पहनना दमन है और ‘मिनी स्कर्ट’ और ‘ट्यूब टॉप’ पहनने लायक ‘फि़गर मेंटेन’ करने की मजबूरी दमन नहीं, यह नहीं माना जा सकता है। उपभोक्ता मर्द के आगे परोसने लायक जिस्म का रखरखाव, जिसके तयशुदा पैमाने हैं, जिसके तहत छातियों, होठों में सिलिकॉन भरवाना पड़ता है, नितंबों को उछाल देने के लिए विशेष कसरत व आंतरिक वस्त्र पहनने पड़ते हैं, एशियाई मूल की औरतों को बाल सुनहरे रंगने पड़ते हैं और नीले-हरे ‘कॉन्टेक्ट लैंस’ आखों में लगाने पड़ते हैं कि वह अपने मर्दों की ‘गोरी-फेंटेसी’ को साकार कर सकें, आदि आदि।

फैशनपरस्ती, बाजार, टेक्नॉलाजी, उपभोक्ता संस्कृति और मीडिया ‘पूंजीवादी सेक्यूलर रिलीजन’ द्वारा औरत को दबाव में ले चुके हैं। बार्बी गुड़िया से लेकर 70 साला प्रौढ़ा तक बाजार के नियमों का शिकार हैं। ऐसे समय में, जब फैशन ‘लो-वेस्ट’ जीन्स को चड्ढी दिखाऊ स्तर तक नीचे ले आया है, सर पर बंधा स्कार्फ और पूरे ढंके वस्त्र या हिजाब औरत को बाजार व उपभोक्ता, संस्कृति को नकारने का हौसला भी देता है, साधन भी है। बस बुर्के या बिकनी के बीच का चुनाव औरत स्वयं करे, यह जरूरी है।

(वैसे बाजार में बुर्किनी भी आ चुकी है, जो बुर्के और बिकनी का फ्यूजन है)

बहरहाल नारी मुक्ति आंदोलन में मुस्लिम औरतों के हिजाब पर बहस एक पश्चिमवादी सतही बहस है। ज्‍यादा जरूरी यह है कि घर-परिवार के दायरे में औरतों पर हो रहे जुल्म से निजात के रास्ते ढूंढने के लिए मजहब का भुस भरने के बजाय औरत की शिक्षा, और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव पर ध्यान केंद्रित किया जाए, जिसे सशक्‍तीकरण कहते हैं। मुसलमान मर्द जिन कुतर्कों से ‘हल्लाबोल’ द्वारा धर्म का बचाव करना चाहते हैं, वे चलने वाला नहीं। अलबत्ता बाजार की सत्ता में वे तसलीमा नसरीन जैसी साधारण लेखिका को ‘हॉट-सेलर’ जरूर बना देते हैं।

तसलीमा की यह मांग कि ‘कुरान को पुनर्विश्‍लेषित करने की जरूरत है’, दरअसल जरा ज्‍यादा ‘क्रांतिकारी’ शब्दों में वही मांग है, जिसे मुस्लिम बुद्धिजीवी मर्द और औरतें इज्तेहाद कहते हैं, जो कि इस्लामी धर्म दर्शन के शुरुआती दौर में अहम हिस्सा था और दाशर्निक व सूफी कवि अल-गजाली (1058-1111) के वक्त में निरस्त कर दिया गया था क्योंकि उन्हें लगा था कि इज्तेहाद के नाम पर इस्लाम में प्राचीन यूनानी फलसफे का समावेश हो रहा है, जो कि इस्लाम के बुनियादी मूल्यों को भी प्रभावित कर रहा है। आज विश्‍व भर में मुस्लिम महिलाएं इज्तेहाद की वापसी पर बहस कर रही हैं, जो कि इस्लाम के दायरे में रह कर आज के तकाजों के तहत समाज सुधार की बात है।

धर्म को समूल नकारने के लिए मानवता को जैसी परिपक्वता चाहिए वह अभी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। चंद बुद्धिजीवी जो इस मन:स्थिति को प्राप्त कर चुके हैं, वे व्यक्तिगत जीवन में इस पर निर्णय कर सकते हैं पर आमजन जिनके लिए राज-सत्ता, प्रशासन, न्यायव्‍यवस्था और राष्ट्र-राज सभी केवल दमनकारी ताकतें हैं और उनके पास आधुनिक पहचान भी नहीं, वे धर्म की शरण में जाएंगे ही, किसी को यह मूर्खता लगे तो लगे। वे धार्मिक पहचान से लोकतंत्र में संख्या द्वारा शक्ति अर्जित करते हैं और राष्‍ट्र-राज से अपना हक भी मांगते हैं। दलितों का उदाहरण सामने है। दलितों से उनके हिंदू धर्म की पहचान छीन ली जाए तो आरक्षण का क्या आधार रह जाता है? इसी तरह धार्मिक अल्पसंख्यकों की धार्मिक पहचान ही उन्हें बहुसंख्यकवाद से बचाती है वरना फ्रांस में सेक्यूलर व्यवस्था ने कैसे झूठे बराबरी के आदर्श गढ़े, हम जानते हैं।

अत: धर्म को नकार या नास्तिकता के पैमानों द्वारा समाज का सकारात्मक विश्‍लेषण फि़लहाल हमें बहुत दूर नहीं ले जाता। जिस इस्लाम धर्म ने औरतों को ‘तलाक’ का अधिकार देकर शादी जैसी आदि संस्था को कानूनी-करार की परिधि में ला पटका, जिसे विश्‍व भर की इसाई, हिंदू, मुस्लिम, सिख और यहूदी औरतें अपनी जिंदगी को विवाह रूपी नरक से निकालने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं, जिस इस्लाम धर्म ने बेटियों को पिता की संपति में हिस्सा दिलाया, जिस धर्म ने दहेज के बजाय मेहर की परंपरा दी, जिस धर्म में विधवा विवाह, पुनर्विवाह और शिक्षा में लिंग भेद को खत्म किया, उस धर्म को कठमुल्लों के कब्‍जे से निकालने की जरूरत है, जिसकी कोशिश विभिन्न स्तर पर पढ़े-लिखे मुसलमान स्त्री-पुरुष कर रहे हैं। यह लोग तसलीमाओं की ‘विच-हिन्टंग’ नहीं करते। तसलीमा पर हल्ला-बोल सिर्फ मन्दबुद्धि, अपरिपक्व व डरे हुए बेचारे ‘मर्द’ करते हैं क्योंकि उनके पास इस्लाम पर सीमित जानकारी है या वह इस्लाम को सिर्फ अपनी जागीर समझते हैं।

वे जानते ही नहीं कि मुस्लिम महिलाएं इस्लाम में रह कर जेंडर-जिहाद कर रही हैं और कठमुल्लों की सत्ता को रौंद रही हैं। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान जहां शिक्षा, लोकतांत्रिक मूल्य आदि अपनी शैशवावस्था में हैं, वहां मुशर्रफ के खिलाफ, लोकतंत्र के हक में जो प्रदर्शन हो रहे हैं, उनमें औरतों की भागीदारी विस्मित करती है। भारत में सारी आजादी के बावजूद मिडिल-क्लास में जुझारू महिलाओं का कैसा टोटा है? यही नहीं, इराक-इरान, इंडोनेशिया, तुर्की, बालकन राज्य सभी जगह मुस्लिम औरतें मुखर हैं। अप्रवासी मुस्लिम समाजों में इज्तेहाद और जेंडर-जिहाद एक विचारधारा के तौर पर उभर कर सामने आ रहे हैं। पढ़ी-लिखी, कमाऊ, जागरूक और आत्मविश्‍वासी औरतें चाहें मुसलमान हों या ईसाई या हिंदू, अपने-अपने मर्दों की बखूबी नकेल कस रही हैं।

‘मुसलमान’ महिला होने के नाते मुझसे भी एक दो बार यह आग्रह किया गया कि क्या आपमें तसलीमा जैसी हिम्मत है अपनी ‘आप-बीती’ समाज के सामने रखने की? पहले तो मैं सोच में पड़ गयी कि ‘हां, क्या ऐसा कर सकती हूं!’ लेकिन बहुत खंगालने पर भी कुछ हाथ नहीं लगा। तब समझ में आया कि मुसलमान महिला होने के बावजूद मुझे तसलीमा नसरीन न बनने देने में मेरे रिश्‍तेदारों (चाचा-मामा आदि) का ‘षड्यंत्रकारी’ हाथ है। और यह भी समझ में आया कि तसलीमा की ‘आप-बीती’ का लेना-देना इस्लाम से नहीं, पितृसत्ता के शोषण से है। और यह किसी भी धार्मिक-समूह में हो सकता है, इसके लिए केवल ‘इस्लाम’ की मौजूदगी जरूरी नहीं। इसलिए मजहब को कठघरे में खड़ा करने के बजाय उस आदि व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कीजिए, जो इस्लाम या इसाइयत से बहुत पहले से है, जिसका जिक्र फ्रेडरिक एंजेल्स ने अपने निबन्ध ‘ओरिजिंस ऑफ फेमली, प्रॉइवेट प्रापर्टी एंड स्टेट’ में निजी संपत्ति के उदभव के नाम से किया है।

इसलिए सवाल शिक्षा और आर्थिक स्वावलंब द्वारा आत्मविश्‍वास, आत्मसम्मान अर्जन का है, न कि तसलीमा बनाम कठमुल्ला जैसे डिसकोर्स में इस्लाम को कठघरे में खड़ा करने का, क्योंकि जाग्रत मुस्लिम औरतें इस्लाम को भी बखूबी जेंडर-सेंसिटिविटी के नये अवतार में ला रही हैं। यदि धर्म को नकार नहीं सकते, तो वक्‍त के तकाजों के अनुकूल बना सकते हैं। आखिर शिक्षा और आर्थिक संपन्नता के बल पर खुमैनी के ईरान की अनुशेह अंसारी बिना अपने शौहर, पिता, भाई या पुत्र के, चार ना-महरम मर्दों के साथ, अंतरिक्ष में आठ दिन की सैर कर आयीं। उन्हें क्या फर्क पड़ता है कि ‘हज’ करने अगर ‘महरम’ के साथ जाना पड़े? इसलिए अब ‘दीन और दुनिया’ तो इसी तरह साथ-साथ चलेंगी मियां!

Sheeba(शीबा असलम फहमी। कानपुर की पैदाइश। 94 में पत्रकारिता शुरू की। इन दिनों जेएनयू में रिचर्स फेलो। इस्‍लामिक फेमिनिज्‍म पर शोध। मशहूर साहित्यिक पत्रिका हंस में नियमित स्‍तंभ लिखती हैं। उनसे sheebaasla@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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