तसलीमा की राजनीति, हुसैन का मर्म समझिए
♦ अरविंद शेष
‘अब ब्लाउज खोल कर फेंक दो, छाती पर हाथ फेरो, फटाफट साड़ी उतारो और टांगें फैला कर सो जाओ। धत्तेरे की, मेरे सामने शर्म कैसी!’
“पोर्नोग्राफी पर रोक कैसे लगे? समाज का सही चित्र न दिखाने की मंशा से ही तो वह सब दिखाया जाता है। अगर लोगों के मन-मस्तिष्क के भीतर किसी कोने में विकृति भरी हुई है तो आज नहीं तो कल भद्र कहे जाने वाले चेहरों पर से मुखौटा हटेगा ही। मेरा मानना है कि विकृति चिरस्थायी चीज नहीं है। स्वस्थ, सुंदर, समान अधिकार वाला समाज बनाने के लिए चल रही कोशिशों में स्त्री और पुरुष दोनों को मिल कर यह विकृति समाप्त करने की चेष्टा करनी ही होगी। इसे बुरी बात मान कर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से कुछ नहीं होगा। यह गंदगी पूरी दुनिया को अपने आगोश में लेती चली जाएगी। कानून बना कर और मानवाधिकारों के मामले में लोगों को शिक्षित करके ही इस विषमता और विकृति को रोकने में मदद मिल सकती है।”
ये दोनों अंश तसलीमा नसरीन के एक लेख के अंश हैं। सुविधा के लिए इस लिंक पर जाया जा सकता है – http://mohallalive.com
- शब्दों के जरिए रचा गया चित्र,
- और विश्लेषण के बाद समाधान के लिए बताया गया रास्ता…।
एक लेख के चंद अंशों से किसी को आंकना ठीक नहीं। लेकिन यह उनके एक ताजा लेख के अंश हैं और उम्मीद यही होती है कि कोई व्यक्ति अपने काम के क्षेत्र और विषय के प्रति समय के साथ और ज्यादा परिपक्व होता है।
अब हुसैन की रेंज और तसलीमा के विस्तार की तुलना कीजिए। दो व्यक्ति को एक कसौटी पर कसने के लिए दो मापदंड नहीं हो सकते। तसलीमा और हुसैन, दोनों अपने-अपने देश के बहुसंख्यक कठमुल्लावाद के शिकार हैं। दोनों को ही अपने-अपने देशों से इसलिए भागना पड़ा है क्योंकि उन्होंने एक जड़ व्यवस्था के सामने साहस के साथ अपना प्रतिरोध दर्ज किया। लेकिन तसलीमा अपने इसी प्रतिरोध के कारण मुसलमान से ऊपर उठ कर इंसानियत की पक्षधर हो जाती हैं और हुसैन की पहचान एक मुसलमान के दायरे में सिमट जाती है। क्यों…?
अपने देश लौटने की अपेक्षा हम जितनी “उदारता” के साथ हुसैन से करते हैं, क्या ऐसी ही सदिच्छा हम तसलीमा से कर सकते हैं। उनके बांग्लादेश लौटने का रास्ता क्या इतना आसान रह गया है? बांग्लादेश की सरकार ने तसलीमा को बाहर किया, इसलिए कि वहां के कठमुल्लों की यह इच्छा थी। हुसैन को इस देश से इसलिए बाहर जाना पड़ा, क्योंकि यही यहां के कठमुल्लों की इच्छा है।
दोनों के अपने वतन लौटने पर कौन-सी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है? तसलीमा बांग्लादेश सरकार और वहां के कठमुल्लों – दोनों के निशाने पर हैं। और हुसैन! देश लौटने के साथ ही यहां के कठमुल्लों की तलवारें और सरकार की हथकड़ियां – दोनों ही हुसैन के स्वागत के लिए तैयार खड़ी हैं। क्या अंतर है?
(यों, यहां भी एक अजीब समानता है कि तसलीमा अब शायद बांग्लादेश नहीं जाना चाहतीं और हुसैन अब भारत नहीं आना चाहते। एक अंतर यह है कि तसलीमा आज बांग्लादेश के बजाय भारत-प्रेम को जाहिर करने से कभी नहीं चूकतीं और कथित रूप से कतर की नागरिकता ग्रहण कर लेने के बावजूद हुसैन यही कहते हैं कि मैं आज भी भारत से प्रेम करता हूं, लेकिन भारत के लोगों ने मुझे खारिज़ कर दिया…)
फिर यह भी क्या सच नहीं है कि जिन कारणों से हुसैन की “सरस्वती” या “भारतमाता” जैसी कृतियां एक हिंदू मन को तकलीफ पहुंचाती हैं, लगभग उन्हीं कारणों से तसलीमा की रचनाएं एक मुसलिम मन को तकलीफ पहुंचाती हैं? एक कलाकार या रचनाकार को जैसे ही हम (या वह खुद भी) एक दायरे या एक मुसलमान-हिंदू के रूप में देखते हैं, यह समस्या आ खड़ी होती है।

तसलीमा ने जिस साहस के साथ इस्लामी कठमुल्लावाद का प्रतिरोध किया, उसे स्वीकार करने में कोई परेशानी नहीं। लेकिन उसी कसौटी पर हमें “सरस्वती”, “भारतमाता” या दूसरी कृतियों को देखना पड़ेगा कि वे एक व्यवस्था को आईना दिखाती हैं। न कि किसी मुसलमान मन को तुष्ट करती हैं या हिंदू मन को आहत करती हैं। अगर ऐसा नहीं है तो हैदराबाद के पंडित बद्री विशाल पित्ती की प्रेरणा से “रामायण” और “महाभारत” बनाने वाले हुसैन को हम किस रूप में देखेंगे? वहां तो हम हुसैन की व्याख्या एक कलाकार और इंसान के रूप में करने लगते हैं!
और यह भी एक अजीब तर्क है कि हुसैन ने अल्लाह या पैगंबर के चित्रों की रचना क्यों नहीं की? जिस तरह हम यह तय नहीं कर सकते कि तसलीमा क्या लिखें, उसी तरह हम हुसैन से यह उम्मीद क्यों करें वे अपनी कूचियां हमारी कामनाओं को तुष्ट करने के लिए चलाएं। और वह भी तब, जबकि हुसैन के उलट तसलीमा ने अपनी नास्तिकता को घोषित तौर पर स्वीकार करते हुए अपने काम सामने रखे। इसके बरक्स दुनिया में जितने लोग आस्तिक हैं, क्या उन सभी का संहार कर देना चाहिए? (पढ़ने वालों को यह ध्यान रखने के लिए कहना चाहूंगा कि मैं खुद घोषित तौर पर नास्तिक हूं और कई लोगों की भयप्रद आशंकाओं के बावजूद इस रास्ते से अपनी वापसी संभव नहीं मानता।)
अगर दलित वर्गों को अपनी सामाजिक स्थितियों के वास्तविक शास्त्र का पता लग जाए, तो वे मंदिर प्रवेश के लिए संघर्ष करने के बजाय धर्म और ईश्वर द्रोह की घोषणा करके गर्व करेंगे। हां, उन तथाकथित प्रगतिशील और क्रांतिकारी लेखकों के बारे में बात करने की जरूरत भी नहीं महसूस करता जिनके लिए “भगवान की मर्जी ही सब कुछ है।” (भगवान की मर्जी केवल सामाजिक सत्ता को बनाये रखने में सार्थक होती है।)
जहां तक हुसैन की कलाकृतियों के बाजार-शास्त्र का सवाल है, तो इस कसौटी पर भी दोनों में बहुत ज्यादा फासला नहीं है। दोनों ही अपनी-अपनी रचनाओं के लिए बाजार का निर्माण करते वक्त मूल रूप से एक ही फार्मूले का इस्तेमाल करते हैं। हां, तसलीमा के मुकाबले वहां हुसैन ज्यादा क्लासिक हो जाते हैं। (यहां हम हुसैन और तसलीमा के “उपभोक्ताओं” के बीच वर्ग विभाजन कर सकते हैं)। और अपने तमाम साहस और व्यवस्था के प्रतिरोध के बावजूद चूंकि तसलीमा भारत के बहुसंख्यक कठमुल्लावाद के लिए एक हथियार के तौर पर भी काम करती हैं, इसलिए उनकी “औसत” और एक स्तर पर असरहीन रचना भी महत्त्वपूर्ण के रूप में पोषित होती है। वरना क्या कारण है कि एक स्त्री का दुख सामने रखते हुए वे जितना बहादुर होती हैं, उन दुखों से लड़ने का रास्ता बताते हुए वे उतनी ही कमजोर और कहीं-कहीं उसी पुरुष-सत्ता का औजार हो जाती हैं, जिसके बरअक्स एक विकल्प के रूप में खड़ा होना पहली जरूरत है। यह तो नहीं हो सकता कि अपनी चुनौतियों से मुकाबले के लिए एक सामाजिक-लैंगिक सत्ता के रूप में पुरुषवाद जिन धतकर्मों को अपना हथियार बनाता है, वही फार्मूला स्त्री समाज के दुखों से निपटने के लिए अपनाया जाए। यह एक पुरुषवाद के बरअक्स उसी पैमाने पर खड़ा होने वाला दूसरा पुरुषवाद होगा और अपनी प्रकृति में आखिरी तौर पर उसी तरह नतीजे देने वाला साबित होगा।
मुश्किल यह है कि तसलीमा हमें अपनी बाकी कृतियों के मुकाबले सिर्फ “लज्जा” के लिए बहादुर लगती हैं। और “लज्जा” को सामने रख कर हुसैन से उनकी तुलना करेंगे तो एक तरह से कठमुल्लावाद के खिलाफ उनके साहस को बहुत छोटा करने की यह एक भद्दी कोशिश होगी। “लज्जा” बहुत सारे उन लोगों के लिए एक हथियार है, जो खुद स्त्रियों और समाज के वंचित तबकों के लिए आज तक अपराधी वर्ग के रूप में काम कर रहे हैं। बलात्कार, दहेज-हत्या से लेकर सती तक की परंपराएं या हर स्तर पर अपनी अस्मिता की हत्या के दौर से गुजरती स्त्री का दुख जिनके लिए “महान” परंपराएं हैं और कुछ “निर्वस्त्र” चित्र उनके लिए दुख के अंतिम विषय हैं। हर रोज दुनिया की सबसे वीभत्सतम जलालतें झेलते समाज के वंचित तबके जिनके लिए धर्म के गौरव हैं और “भारतमाता” का चित्र उनके लिए शर्म पैदा करता है।
हुसैन के देश छोड़ देने से पैदा हुई परेशानी से पहले हम शायद कभी परेशान नहीं होते जब सरकार के चालीस से साठ लाख रुपये डकार कर तैयार होने वाले हमारे डॉक्टर तुरंत आका अमेरिका का रुख कर लेते हैं। इस संदर्भ में दिलीप मंडल की इस टिप्पणी को सामने रखना जरूरी है –
भारत सरकार के पैसे से एम्स में पढ़कर डॉक्टर बने लगभग आधे प्रतिभाशाली, मेरिट से लबालब भरे छात्र विदेश चले गये। एम्स के पूर्व छात्रों की डायरेक्टरी आप भी देख सकते हैं कि वे किस देश की सेवा का मेवा खा रहे हैं। किसी को एतराज हुआ क्या? उनकी देशभक्ति क्यों असंदिग्ध है। वे तो आदरणीय पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन है। अब तो उन्हें वोट देने के अधिकार की भी बात हो रही है। जबकि उन्होंने देश का पैसा और देश के संसाधन का दोहन किया और जो हुनर सीखा, उसका फायदा देश को रत्ती भर भी नहीं मिला। हुसैन ने कम से कम भारत का पैसा तो नहीं लूटा।
हुसैन निशाने पर इसलिए तो नहीं हैं कि उनका नाम हुसैन है और जिस देश ने उन्हें नागरिकता दी है, उसका नाम कतर है। अपने निजी स्वार्थ और फायदे के लिए विदेश भागो और यहां सीखा हुआ वहां लुटा दो, तो सम्माननीय पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन और जान पर खतरे की वजह से या मुकदमे झेलने में नाकामी की वजह से विदेश भागो तो देश का द्रोही। आपको ऐसा नहीं लगता कि देशभक्ति और नैतिकता की परिभाषाएं सुविधा के हिसाब से बदली दी जाती हैं।
तो हुसैन या तसलीमा को उनकी मुस्लिम पहचान के रूप में नहीं, एक व्यवस्था-द्रोही प्रतीकों के रूप में देखा जाना चाहिए। दोनों ही बर्बर व्यवस्थाओं के प्रतिरोध के प्रतीक हैं। हुसैन से तसलीमा की तुलना इसीलिए होगी, तसलीमा चाहें या नहीं चाहें। वे अच्छी तरह से जानती हैं कि अगर उन्होंने स्वेच्छा से बांग्लादेश नहीं छोड़ा है, तो हुसैन ने भी कोई शौक से भारत से बाहर जाने का फैसला नहीं किया था। तसलीमा कठमुल्लापन के खिलाफ एक बहादुर प्रतिरोध और स्त्री अधिकारों की आवाज हैं, और इस रूप में उनका महत्त्व बना हुआ है।
और…
बिहार से होली की छुट्टी में चार दिनों के लिए दिल्ली आये एक दोस्त ने एक घटना का ब्योरा दिया, जो इस प्रकार है – बिहार के सिवान जिले में एक जगह एक दबंग सवर्ण जाति के बारात में नाच-गाने का कार्यक्रम चल रहा था। वहां पड़ी खाली कुर्सियों पर सबसे पीछे की कुर्सी पर एक छोटा बच्चा बैठ कर नाच-गाना देखने लगा। घर वाले एक व्यक्ति ने बच्चे से नाम पूछा। उसके नाम से पता चला कि वह एक दलित जाति का बच्चा था। पूछने वाले व्यक्ति ने सीधे रिवॉल्वर निकाला और उसके सीने में दाग दिया। कुर्सी पर बैठने के एवज उस दलित जाति के बच्चे अपनी जान गंवानी पड़ी।
इस तरह की स्थितियों पर शर्मिंदा होने के बजाय अगर हम हुसैन के कुछ चित्रों से दुखी और प्रताड़ित महसूस करते हैं, तो शायद हम इसी लायक हैं।
(अरविंद शेष। युवा पीढ़ी के बेबाक विचारक। दलितों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों के पक्षधर पत्रकार। पिछले तीन सालों से जनसत्ता में। जनसत्ता से पहले प्रभात ख़बर के संपादकीय पन्ने का संयोजन-संपादन। कई कहानियां भी लिखीं।)









मुकर्रम! मुकर्रम! वाह अरविंद शेष तुमने तो तस्लीमा नसरीन को सरे बाजार …. कर डाला! वाह गुरु तुम तो उसके चाचा से भी दो कदम आगे निकले. तुम्हें तो कोई एवार्ड शेवार्ड मिलना चाहिये मेरे प्यारे. बलकि इतने अच्छे तुलनात्मक अध्ययन के लिये तुम्हें तो सीधे भारत का सबसे महान लेखक घोषित कर देना चाहिये. कोई तुमसे सीखे पालिटिक्स गुरु!
आखिरी टिप्पणी तो और भी चोट पे चोट रही… क्या बात कही तुमने गुरुवर!
“कुर्सी पर बैठने के एवज उस दलित जाति के बच्चे अपनी जान गंवानी पड़ी।
इस तरह की स्थितियों पर शर्मिंदा होने के बजाय अगर हम हुसैन के कुछ चित्रों से दुखी और प्रताड़ित महसूस करते हैं, तो शायद हम इसी लायक हैं। ”
हैं, इसी लायक हैं हम. बच्चा मर गया, हम देखते रहे. तुमने सुन लिया और सुना कर किया क्या बल्कि लिख डाला, ब्लाग पर छाप डाला. हिम्मत की इंतहा देखते रहे हम तुम्हारी. बेशक तुमने जाकर उस गांव में कोई मुहिम वुहिम नहीं चलाई, और हुसैन पर कुर्बान अपने पूरे लेख के सबसे अंत में पटाक्षेप के तौर पर उल्लेख कर दिया, लेकिन उस लड़के कि उससे भी ज्यादा औकात क्या है?
हुसैन की वाहिद किस्म कि पेंटिगों पर ऐसे सौ लड़के कुर्बान और ये साले अगर हुसैन पर लिखे लेख में कहीं एक लाइन पा जायें तो सीटियां तो बजनी ही चाहिये.
क्या उदाहरण दिया है तुमने मेरे मास्टर (लार्ड अलमाइटी)! अब कहीं कुछ भी अत्याचार होते देखूंगा तो पहले उस लड़के को याद करके सोचूंगा कि साले हम तो हैं इसी लायक.
सड़क पर गुंडे किसी को पीट रहे हैं तो बचाऊंगा नहीं, उस लड़के के बारे में सोचूंगा (साले हम तो हैं इसी लायक).
किसी लड़की को छेड़ा जा रहा तो प्रतिवाद नहीं करूंगा, छोटा अपराध है. उस लड़के के बारे में सोचूंगा. (साले हम तो हैं इसी लायक).
और तस्लीमा नसरीन की बात को पालिटिक्स का तमगा दिया जा रहा हो तो उस लेखक के मुंह पर सचमुच थूंकूंगा भी नहीं (साले हम तो हैं इसी लायक)
मैं सोच लूंगा हुसैन की कसीदेकारी में तुम्हारे लिखे इस लेख के अंतिम पैरा में उल्लेखित उस गरीब दलित लड़के के बारे में (जो इस लायक नहीं था कि उसे खुद का एक लेख मिले) और सोच लूंगा की साले हम तो हैं इसी लायक
कदम कहां है शेष तुम्हारे? चूमने है मुझे. लाओ तो सही.
कभी यह भी सोचना मेरे बेबाक चिंतक, विचारक, उद्धारक, और मेरे लिये हृदय विदारक
उस लड़के जैसे समस्यायों के बजाय देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाने वाला हुसैन किस लायक है.
और तुम… तुम जो चिंतक, विचारक होकर भी उस लड़के के बारे में बात हुसैन के बारे में लिखे लेख में हुसैन की वकालत के लिये उल्लेख देकर करते हो… तुम किस लायक हो?
अभी सर में दर्द कर दिया तुमने. लगता है कि दो तीन डायरियां फाड़ कर चैन मिलेगा
अरविन्द बाबू ने कई मुद्दों को आपस में घालमेल कर दिया (शायद बड़े लेखक ऐसा ही करते होंगे) (If you can not convince them, confuse them) की तर्ज़ पर…
यदि तसलीमा गलत है तो हुसैन सही कैसे हो सकता है, और यदि हुसैन सही है तब तो तसलीमा और भी सही साबित हो जाती है… लेकिन यही सेकुलरवादियों की चाल है, ये लोग तसलीमा को मोहरा बनाकर हुसैन के काले कारनामों को सही ठहराना चाहते हैं। यह लोग सिद्ध करना चाहते हैं कि तसलीमा तो गलत है (क्योंकि मुसलमानों के खिलाफ़ लिखती है) लेकिन हुसैन सही हैं (क्योंकि हिन्दुओं के भगवानों को नंगा करते हैं)…। ऐसी सेकुलर मार्केटिंग की वजह से ही हुसैन एक “सेलेबल सेलिब्रिटी” बने हैं, वरना उनसे कई गुना बेहतर कलाकार अंधेरे में गुम हो चुके हैं…। “सेकुलर मार्केटिंग” करके “धंधा” बढ़ाना सीखना हो तो हुसैन से सीखो, शबाना से सीखो, सीतलवाड से सीखो, महेश भट्ट से सीखो…। हिन्दुओं को नपुंसक बनाने वाला इंजेक्शन है सेकुलरिज़्म… जय हो भैया, जय हो…।
हुसैन के मामले में जो मेरी राय है वह मैं पहले ही सामने रख चुका हूं। अतः उसे दोबारा लिखना जरूरी नहीं है। लेकिन मुझे यह समझ नहीं आता कि तसलीमा को हुसैन के सामने बार-बार क्यों खड़ा किया जा रहा है ?
अरविन्द जी आपने तसलीमा की जिस पहली एक लाइन को कोट किया है उसके आगे-पीछे की बातें जानने वाला कोई भी पाठक इन लाइनों को अश्लील नहीं मानेगा। बलात्कार में भी काम रस लेने वालों की बात अलग है ! आपने दूसरे जिस पैरा को कोट किया है उसे आप खुद दोबारा पढ़ें। आपने सरासर उलटा भाष्य किया है।
कई सामंती पुरुष मानसिकता से ग्रस्त लोगों को तसलीमा चुनौती देती है। चाहे वो हिन्दू हों या मुस्लिम हो या नास्तिक ही हो। तसलीमा ईश्वर के आस्तित्व में आस्था नहीं रखती उसी तरह जैसे अरविन्द शेष ,संजय ग्रोवर,रंगनाथ सिंह या बहुत से अन्य लोग नहीं रखते हैं। लेकिन तसलीमा ने आस्तिकों को मारने की बात कब और कहां की ? तसलीमा ने इस्लाम के विरोध में क्या लिखा है ? जरा इसे भी कोट करके दिखाए। तसलीमा ने गुजरात और राजस्थान की भाजपा सरकारों से कब लाभ लिया ? जबकि उन्हें बुलावा भी मिला था।
अरविन्द जी, आपने सबसे बड़ी तथ्यात्मक भूल यह की है कि तसलीमा और हुसैन को एक ही पलड़े में तौल दिया है। आपको यह भी पता नहीं कि तसलीमा को दो देशों और एक प्रदेश की सरकार ने देशनिकाला दिया। आपके हिसाब से हुसैन और तसलीमा और हुसैन दोनों को कठमुल्लों ने बाहर जाने को मजबूर किया। बन्धु अब उम्मीद है आप यह समझ लेंगे कि हुसैन को सिर्फ शिव सैनिकों/सघियों से खतरा था। लेकिन तस्लीमा को तीन सरकारों,कट्टरपंथियों और वामपंथियों सभी ने मिलकर निकाला।
तस्लीमा सरकार से सुरक्षा मांगती रही लेकिन नहीं मिली। मिला देश निकाला। हुसैन को सुरक्षा देने का सरकार ने बार-बार वायदा किया है। आप जिस अखबार में काम करते हैं उसमें छपी खबर के अनुसार सरकार ने बताया है कि हुसैन के खिलाफ सभी मुकदमे उच्चतम न्यायालय ने निरस्त कर दिए हैं। हुसैन अपनी स्वेच्छा से मुकदमों के डर से और िहंसात्मक हमलों के डर से देश से बाहर गए हैं। तसलीमा को तीर सरकारों ने कठमुल्लों के आगे झुक कर सरकारी तौर पर बाहर किया है।
यह स्पष्ट कर दूं कि मेरी समझ से तसलीमा नसरीन साहित्य इतिहास में लज्जा के लिए नहीं अपनी आत्मकथा के लिए याद की जाएंगी। चित्रकारों का समाज पर प्रभाव और लेखक का समाज पर प्रभाव में बुनियादी अंतर होता है। जो इतना भी नहीं समझता उसे समझा पाना किसी के लिए असंभव है।
अरविन्द शेष जी यह भी स्पष्ट करें कि हुसैन ने किस व्यवस्था के खिलाफ द्रोह किया है ? हुसैन के पुराने चित्रों को चरमपंथियों ने गोदाम से निकालकर विवादास्पद बनाकर हुसैन को इतना प्रचार दिलवा दिया। वरना रजा,सुजा,रवि वर्मा वगैरह को संस्कृतिकर्म से अंसंबद्ध कितने लोग जानते हैं ?
तसलीमा नसरीन की रचना को औसत या और एक स्तर पर असरहीन कहने से पहले अरविन्द जी को यह पता करना चाहिए कि जिस अखबार में वो नौकरी करते हैं उनमें से कितने कालमिस्टों की तसलीमा सा पाठकीय स्वीकार मिला है ? तसलीमा के लेखन में मीनमेख निकालने वालांे को अपने प्रतिमानों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।
अरविन्द जी हमारा तो पता नहीं पर आप इसी लायक हैं। मैंने हमेशा ही वामपंथी लेखकों की प्रवृत्ति देखी है वह है मूल समस्या से भटकाने के लिये एसी एसी बाते उठाना जिसका विषय से ताल्लुक ही न हो। आप ग्लेशियर के पिघलने की चर्चा कीजिये तो वो विदर्भ के किसान पर बात करेंगे..विदर्भ के किसान पर बात कीजिये तो गुजरात पहुँच जायेंगे। यह आप लोगों की बेसिक ट्रेनिंग का ही हिस्सा है मैं जानता हूँ।
जिस तरह आप वामपंथी उम्मीद करते हैं कि साहित्य में क्या लिखा जाये और “हसिया” “हथौडा” “खून” “पसीना” “मजदूर” के अलावा कुछ भी साहित्य नहीं है उसी तरह कलाकार से उम्मीद की जाती है कि वह अपने समाज के प्रति उत्तरदायी हो। माँ सरस्वती की हजारो प्रतिमायें कलात्मक तथा अल्प-वस्त्रों में हैं। हमारे अतीत से ले कर वर्तमान तक इस तरह की मूर्तिया व चित्र विद्यमान रहे हैं विरोध नग्न अभिव्यक्ति का नहीं है और इसका भी नहीं कि माँ सरस्वती ही क्यों। कुछ बातें उसकी अभिव्यक्ति पर। चलिये माँ दुर्गा को नग्न बनाना हुसैन की अभिव्यक्ति है लेकिन शेर के साथ लैंगिक जुडाव के साथ दर्शाना क्या उसकी धृष्टता नहीं है? माँ सीता अशोक वाट्का में नहा रही होती तो समझता कि वह उन्हे नग्न बना कर अभिव्यक्ति की चरमावस्था पर पहुचना चाहता है लेकिन रावण की जंघा पर नग्न? ऐसी तो राम कथा भी नहीं है? ऐसा तो वैदिक काल से आज तक किसी मूर्ति में नहीं किसी चित्र में नहीं किसी के दिल दिमाग में भी नहीं।
आईये अभिव्यक्ति की आजादी की बात करें। मरियम के कुआरेपन को ले कर हाल में अभिव्यक्ति की होली जलाई गयी है। यही वह भारत देश है जहाँ सभी नें कान में उंगली डाल ली क्योंकि….आप जानते हैं। एक बेचारे समाचार पत्र नें मोहम्मद साहब का कार्टून छापा था। उसकी अभिव्यक्ति की पुंगी जब बजायी जा रही थी तब कहाँ भांग खा कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सो रही थी? भारत में बुद्धिजीवि विलुप्त हो चुकी प्रजाति है और हुसैन के समर्थन से पहले तसलीमा के वीजा पर जिगर चौडा कर के बात कीजिये तो आपके कलेजे को मान लिया जाये। सलमान रश्दी मत बनाईये इस मनोरोगी हुसैन को।
बात कला और काला के बीच के फर्क की है। आप यह न कहें कि हुसैन हिन्दु नहीं थे इस लिये आलोचना हो रही है, भारत भवन में हाल में कुछ इस तरह की प्रदर्शनियों पर विरोध हुआ है जिसके चित्रकार हिन्दु ही थे। असल में आप जान बूझ कर इस मुद्दे का मुसलमानीकरण कर रहे है जब कि यह मानसिकता का मुद्दा है।
हुसैन को किसी नें निकाला नहीं है, उसका कतर की नागरिकता ग्रहण करना उसका निजी फैसला है। उसमें भारत में न्याय का सामना करने की हिम्मत नहीं थी इस लिये भाग गया या उसे कतर के महल में कोई माधुरी दीक्षित नजर आ गयी होगी।
रही शर्मिन्दगी की बात तो हुसैन के स्वेच्छा से भारत छोडने से किस बात की शर्मिन्दगी? हाँ आप लोग लगे रहिये।
रंगनाथ जी,
आपने मेरे नौकरी करने की जगह, यानी अखबार ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गई लगती है। खैर, मैंने भी आपके देश की ही बात की है, जहां से तसलीमा और हुसेन को (कारण चाहे जो भी हैं) निकलने को मजबूर होना पड़ा है।
तसलीमा के महत्त्व को मैंने कहीं भी आपसे कम करके नहीं आंका है। लेकिन मूर्तिपूजा मेरे बस में नहीं है। तुलना को एक ही पलड़े में तौलने की तथ्यात्मक भूल मैंने की है या यह आपकी समझ की समस्या है, इस पर विचार कर लेंगे, अगर उत्साह बहुत जोर नहीं मार रहा हो। खासतौर पर व्यवस्था और द्रोह का अर्थ आप सचमुच मुझे न समझाएं, क्यों आपकी बातों इतना समझा जा सकता है कि आप क्या कहना चाहते हैं।
आश्चर्य है कि अगर किसी चीज का भाष्य मैं आपके हिसाब से करूं तो वह सीधा भाष्य होगा। और आप उम्मीद नहीं करें, बल्कि इस बात का इत्मीनान रखें कि मैं पहले से भी आपके द्वारा प्रेरित कई बातें समझता रहा हूं कि हुसेन को खतरा जरूर शिवसैनिकों और बजरंगियों से था, लेकिन उनके चित्रों की व्याख्या करने वाले बहुत सारे लोग प्रगतिशीलता का चोला ओढ़े बैठे हैं।
आश्चर्य इस बात पर भी है कि इस बहाने मैंने कुछ और जो बातें कहने की कोशिश की है, उस पर गौर करना आपको जरूरी नहीं लगा।
खैर, मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूं कि तसलीमा और हुसेन में से किसी को कम करके नहीं आंकता हूं।
अपने प्रतिमानों पर पुनर्विचार करने की आपकी चुनौती को मैं स्वीकार नहीं करके आपकी ओर ही वापस करता हूं।
रंगनाथ जी, जानकारी अगर दंभ में बदलती है, तो इसी तरह विकृत हो जाती है।
बाकी मैं अपनी बातों पर कायम हूं।
अरविन्द शेष जी आप रहिये कायम, निर्लज्जता जब पराकाष्ठा के पार हो जाती है तो अपनी नग्नता के भौंड़े प्रदर्शन पर कायम ही रहती है. सचमुच तस्लीमा की हुसैन से तुलना निर्ल्लजता ही है.
आप एक ही वाक्य में दोगली बात कर जाते हैं, तस्लीमा को समझने का दम भी भरते हैं और उसे हुसैन से कमतर भी आंकते हैं. मुझे ऐसा नहीं लगता की फेर आपकी समझ में है, फेर है आपकी बुद्धी में. आप जानते हैं कि आपका लेख झूठ है और घटियापन से भरा है, लेकिन फिर भी आप लिख रहे हैं क्योंकि आप जिन्हें खुश करना चाहते हैं उन्हें खुश करने के लिये आप किसी भी हद तक गिर सकते हैं, बल्कि गिर चुके हैं.
लेकिन आप यह सोचने की गलती कभी न करिये कि लोग आपकी चोरी पकड़ेंगे नहीं. आपके पाठक आपके झूठ को समझ रहे हैं, और यह भी समझ रहे हैं कि आपका यह लेख किस स्तर का है.
इसलिये अपना भजन आप ही गुनिये और आप ही सुनिये.
बेहद निर्ल्लज और घटिया लेख.
अरविन्द जी आपके अखबार का हवाला सिर्फ एक बार दिया गया है उसके नाम की माला नहीं जपी गई ! लेकिन लगता है कि आपको बुरा कई बार लगा !
वह हवाला भी इसलिए दिया गया है कि आपको अपने अखबार के स्तम्भकारों के लेखों के बारे मंे फर्स्ट हैण्ड प्रमाणिक जानकारी होना स्वाभाविक है। आपने तसलीमा को औसत और असरहीन कहा तो आपको याद दिलाया कि ज्यादा दूर न जाएं घर में झांक लें तसलीमा के असर का प्रमाण मिल जाएगा।
खैर,यदि आपको अखबार की बात बुरी लगी तो मैं इसे बदल कर यूं कर देता हूं कि हिन्दी के सभी अखबारों मंे स्तम्भ-लेखकों से तसलीमा के स्तम्भ की तुलना कर लीजिए।
आपने मेरे उठाए प्रश्नों का जवाब देने के बजाय मेरा जवाब देने की कोशिश की है। लगता है कि उन प्रश्नों का आपके पास जवाब नहीं है ?
आपकी इस अदा का मेरे पास कोई जवाब नहीं है। आप जवाबदेही से साफ मुकर गए हैं तो मेरे पास कोई वजह नहीं है कि आपको कुछ और कहुं।
पुनश्च – आपके अखबार का हवाला एक नहीं दो बार दिया गया है। एक बार एक खबर के संदर्भ में आपके अखबार का हवाला दिया है। जिससे इस बात पर जोर दिया जा सके आपको वह खबर पता होगी। दूसरी बार आपके अखबार का हवाले देकर इस बात पर जोर देने की कोशिश की गयी है कि तसलीमा का असर हवाई नहीं है। इसका प्रमाण आपका ही अखबार है। अतः आपको पता ही होगा। आपके आपको।
ऊपर लिखे कमेंट के अंत में “आपके आपको” तकनीकी गलती से चला गया है।
अरविंद जी, आपसे ऐसे अटपटे लेख की उम्मीद नहीं थी। आपने कहीं का कहीं जोड़ा है, कहीं की कहीं निकाली है। पहली बात तो यह कि तसलीमा ‘लज्जा’ के लिए सिर्फ भारत में जानी जाती हैं वो भी एक ख़ास वर्ग में।सारी दुनिया में वे व्यवहारिक स्त्रीवादी-मानवतावादी और घोषित नास्तिक के तौर पर जानी जाती है। अब अगर कोई सांप्रदायिक मंत्री उन्हें अपने प्रदेश में रहने को आमंत्रित करता है तो इसमें तसलीमा का क्या कसूर है मेरे भाई ? वे वहां चली गयीं क्या ? अभी अगर मैं आपसे कहूं कि मेरे साथ डाका डालने चलो तो क्या मेरे आमंत्रण भर से आप डकैत हो जाएंगे ? आप तो दूसरों की संकीर्ण समझ का दायरा खामख्वाह तसलीमा के सिर फोड़ रहे हैं। गोडसे ने गांधी को मुसलमानों के चक्कर में मारा। दलित उनकी आलोचना उनके वर्णप्रेम की वजह से करते हैं। ओशो ने गांधी की अवैज्ञानिक सोच की आलोचना की । तो क्या आप गांधी के सारे विरोधियों को एक ही तराजू में तोल देंगे ?
तसलीमा चाहे पुरुषों का शिकार होती हों चाहे करती हों, वे इस बाबत अपने विचारों और अनुभवों को ईमानदारी से लिखती तो हैं। आप क्या चाहते हैं कि वे भी उन पाखण्डी विचारकों की तरह हो जाएं जो खुद तो योजनाबद्ध ढंग से सेक्स के लिए स्त्री-पुरुषों का शिकार करते हैं मगर तसलीमा या मटुक-जूली की आत्म-स्वीकृतियों को प्रसिद्धि और पैसे की चाह से जोड़ देते हैं !? इस पाखण्डी, बड़बोले और आर्टीफिशियल क्रांतिकारियों से लबालब समाज में, विद्रोही और नास्तिक विचारों के साथ दुनिया भर में अकेली लड़ती-फिरती औरत से क्या-क्या उम्मीदें रखते हैं आप ? दुनिया भर में उनकी किताबों के अनुवाद छपते हैं। क्या ज़रिया है उनके पास पता लगाने का कि जैसा वे बांगला में लिखती हैं ठीक वैसा ही अनुवादों में भी छपता है ! अकेली औरत कहां-कहां बचाएगी ख़ुदको शिकार होने से !
हुसैन ने बेटी के शादी कार्ड में दैव-चित्र बनाए हों या बाद में आपत्तिजनक चित्र, एक ही बात को बताते हैं कि अभी तो वे रीति-रिवाज़ों और परंपराओं से ही नहीं मुक्त हो पाए। जबकि तसलीमा के यहां न बेटी-बेटे हैं न उनकी शादी है न आमंत्रण पत्र हैं न ऐसी कोई चिंताएं हैं। उनकी सोच. सरोकार और व्यवहार सब कुछ अलग है। तसलीमा का मामला ही अलग है, हुसैन कहीं ठहरते ही नहीं, टुल्ले-मुच्चे बिजूकों की तो बात ही छोड़िए।
हो सकता है मेरी जानकारी ग़लत हो, तसलीमा ने ऐसा कब कहा कि वे बहुत बड़ी साहित्यकार या कलाकार हैं। (इसका मतलब यह नहीं कि जो उनका विरोध कर रहे हैं, सब ऊंचे दर्जे के साहित्यकार हैं) वे दुनिया बदलने निकलीं हैं और जो भी साधन उपलब्ध हो रहा है उसके ज़रिए ईमानदार कोशिश कर रहीं हैं।
मैं तो हुसैन के साथ-साथ दिलीप मंडल और अविनाश का भी फैन हूं और इसीलिए उनसे उम्मीद करता था कि जिस तरह उन्होंने भारतीय कम्युनिज़्म में घुसे हिंदू सवर्णवाद को खोला उसी तरह मुस्लिम कठमुल्लेपन को भी सामने लाएंगे। मगर आज मेरी इस धारणा को फिर बल मिल रहा है कि पार्टी और विचारधारा की भक्ति स्वतंत्र सोच को किस कदर बुरी तरह प्रभावित करती है।
आपने जो दलित-प्रसंग रखा उससे पूरी तरह सहमति है। दिलीप ने जो विदेश भागने वाले डाक्टरों पर तंज़ किया, पूरी तरह सहमति है। पर इन सबका तसलीमा से क्या लेना-देना है मेरे भाई !?
एक और ग़लतफ़हमी से जितनी जल्दी संभव हो बाहर निकल आएं। दलितों को लेकर नाक-भौं चढ़ाने के मामले में कई ‘धर्मों’ के आभिजात्य एक ही ‘धर्म’ के हैं।
Hello arvind ji,
aapko padh kar bahut achha laga, aapne jo kuch likha main usse pooro tarah sehmat hoon
arvindji….jab koi dharm ke parkhachhe udaata hai to uske saath wahi hota hai jo aapke saath ho raha hai….bas yaad rakhiye…kuch to log kahenge logon ka kaam hai kehna
hussain kya kahte hai yah bhi jaaniye—–
As a child, in Pandharpur, and later, Indore, I was enchanted by the Ram Lila. My friend, Mankeshwar, and I were always acting it out. The Ramayana is such a rich, powerful story, as Dr Rajagopalachari says, its myth has become a reality. But I really began to study spiritual texts when I was 19. Because of what I had been through, because I lost my mother, because I was sent away, I used to have terrible nightmares when I was about 14 or 15. All of this stopped when I was 19. I had a guru called Mohammad Ishaq— I studied the holy texts with him for two years. I also read and discussed the Gita and Upanishads and Puranas with Mankeshwar, who had become an ascetic by then. After he left for the Himalayas, I carried on studying for years afterwards. All this made me completely calm. I have never had dreams or nightmares ever again. Later, in Hyderabad, in 1968, Dr Ram Manohar Lohia suggested I paint the Ramayana. I was completely broke, but I painted 150 canvases over eight years. I read both the Valmiki and Tulsidas Ramayana (the first is much more sensual) and invited priests from Benaras to clarify and discuss the nuances with me. When I was doing this, some conservative Muslims told me, why don’t you paint on Islamic themes? I said, does Islam have the same tolerance? If you get even the calligraphy wrong, they can tear down a screen. I’ve painted hundreds of Ganeshas in my lifetime — it is such a delightful form. I always paint a Ganesha before I begin on any large work. I also love the iconography of Shiva. The Nataraj — one of the most complex forms in the world — has evolved over thousands of years and, almost like an Einstein equation, it is the result of deep philosophical and mathematical calculations about the nature of the cosmos and physical reality. When my daughter, Raeesa wanted to get married, she did not want any ceremonies, so I drew a card announcing her marriage and sent it to relatives across the world. On the card, I had painted Parvati sitting on Shiva’s thigh, with his hand on her breast — the first marriage in the cosmos. Nudity, in Hindu culture, is a metaphor for purity. Would I insult that which I feel so close to? I come from the Suleimani community, a sub-sect of the Shias, and we have many affinities with Hindus, including the idea of reincarnation. As cultures, it is Judaism and Christianity that are emotionally more distant. But it is impossible to discuss all this with those who oppose me. Talk to them about Khajuraho, they will tell you its sculpture was built to encourage population growth and has outgrown its utility! (laughs) It is people in the villages who understand the sensual, living, evolving nature of Hindu gods. They just put orange paint on a rock, and it comes to stand for Hanuman.
-From Tehelka Magazine, Vol 5, Issue 4, Dated Feb 02, 2008
रंगनाथ सिंह जी
पहले अखबार, फिर घर की चहारदिवारी…। खैर…।
और आप आरोप जैसा लगाते हैं कि मेरे उद्धरण का सिरा बलात्कार में काम रस लेने वालों से जुड़ता है। यहां भी क्या कहूं…।
संजय ग्रोवर जी को यहां सब कुछ अटपटा लग रहा है। संजय जी, मैं सचमुच कहीं से कहीं को जोड़ता हूं, और कहीं से कहीं का निकाल लेता हूं। अब यह आपकी समस्या है कि इस कहीं के कहीं में से आप वह निकाल नहीं पा रहे हैं जो मैंने आखिरी में कहने की कोशिश की है। हम जिस समाज में जी रहे हैं, उसके लगभग सारे तार कहीं न कहीं से जुड़ते हैं और इसीलिए कहीं से कहीं का निकल आता है।
बहरहाल, कर्नाटक की ताजा घटना की जानकारी सबको होगी। किसी अखबार ने तसलीमा नसरीन के हवाले से छाप दिया कि मुहम्मद साहब ने बुर्के का विरोध किया था। हंगामा बेलगाम हुआ। दो लोग मारे गए। अखबार के दफ्तर पर हमला हुआ। और तसलीमा ने कहा कि वह मेरा लेख था ही नहीं। और कि मैंने कहीं यह नहीं लिखा कि मुहम्मद साहब ने बुर्के का विरोध किया था।
कोई बात नहीं। यहां भी मेरा मकसद तसलीमा के साहस को कसौटी पर रखना नहीं है।
मैं यहां यह कहना चाह रहा हूं कि जिस तरह डेनमार्क के एक कार्टूनिस्ट के कार्टून पर जिस तरह का विरोध हुआ, कर्नाटक में जिस तरह लोग फट पड़े, क्या उसी मनःस्थिति में आप लोग नहीं चले गए हैं?
भाई मेरे, तसलीमा को आप जितना पसंद करते हैं, मेरा दावा है कि मैं उस मामले में आपसे कम नहीं हूं। लेकिन यह क्या कि सीधे मूर्ति बना लिया जाए और उस पर उठने वाली उंगली ही तोड़ डालने की वही मुद्रा अख्तियार कर ली जाए, जो आज तक किसी भी धर्म-समुदाय के कट्टरपंथी करते रहे हैं। कट्टरपंथ क्या हिंदुत्व या इस्लाम का बाना ओढ़ कर निबाहा जा सकता है? तसलीमा के प्रति निरादर भाव तो मैंने कहीं नहीं जाहिर किया है, तो फिर आप लोग इस हद तक परेशान क्यों हो गए कि कुछ भी सहना मुश्किल हो गया। क्या जरूरी है कि तसलीमा का लिखा मुझे मुग्ध करता है, तो आपको भी करे। यही बात उलटी भी लागू होती है। आप किसकी अभिव्यक्ति का आजादी की मांग कर रहे हैं?
तसलीमा अच्छी, हुसेन खराब- यह तो मुझसे नहीं होगा। मैं अब भी दोनों को व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीकों को तौर पर देखता हूं। रंगनाथ सिंह हुसेन को व्यवस्था के गुलाम के रूप में देखना चाहते हैं। क्यों? सिर्फ सरस्वती, भारतमाता जैसे कुछ चित्रों के कारण? रामायण, महाभारत को कहां रखेंगे? मैं नास्तिक हूं। आप भी शायद। आप बताइए कि आपका कौन-सा धर्म रह गया है, या कौन सी जाति रह गई है?
तसलीमा घोषणा करती हैं कि वे नास्तिक हैं। हुसेन नहीं करते। लेकिन एक कलाकार क्या किसी धर्म के दायरे में रह कर कलाकार बना रह सकता है? हुसेन से आप इस्लाम से द्रोह की अपेक्षा करते हैं। उनका काम आपको विद्रोह नहीं दिखाई देता। आपकी मर्जी। देश के अक्तूबर 1996 के अंक में कवर पृष्ठ पर दुर्गा की एक कृति छपी थी। उसे बनाने वाले का नाम अरुण बसु था। वहां वे विद्रोही हो गए। क्यों आप कलाकारों को दायरे में कैद करके देखना चाहते हैं। लेकिन आपकी समस्या समझी जा सकती है। आप फिर कह सकते हैं कि पहले अपने घर के भीतर झांक कर देखो। पहले अपनी मां की नंगी तस्वीर बना कर देखो। क्या-क्या करके देखूं मैं आपके हिसाब से।
मैं समूची व्यवस्था के सामाजिक सूत्रों की ओर चला जाता हूं यह सब देखते हुए। और अगर इसे समझने में आप विफल हैं, तो इसका मुझे कोई गम नहीं। मैं तसलीमा हों या हुसेन, उनकी अच्छाइयों और कमियों के साथ देखूंगा। मैं सलाह तो नहीं दूंगा लेकिन यह जरूर कहूंगा कि किसी को भी मूर्ति बनाएंगे तो बहुत दुख होगा। वह चाहे तसलीमा हों या हुसेन। इस मूर्ति प्रवृत्ति ने इस समाज से क्या-क्या छीना है, यह आप विद्वानों से छिपा नहीं होगा।
1.
हुसैन के पक्ष में अपनी छह दिन पहले मोहल्लालाइव पर लिखी टिप्पणियों को यहाँ दुबारा लगाना असंगत है। क्योंकि वो इस वेबसाइट पर ही उपलब्ध हंै।
2.
हुसैन के मामले की ओट में तसलीमा के अवमूल्यन को लेकर मोहल्लालाइव पर जो लिखा जा रहा है उससे हमने विरोध जताया है। अब यहाँ यह बहस चल रही है कि हुसैन बड़े या तस्लीमा नसरीन ?
यहाँ यह भी साफ है कि मोहल्लालाइव की नजर में तस्लीमा की इज्जत वही नहीं है जो हुसैन की है। प्रमाणस्वरूप प्रस्तुत लेख की लोडेड हेडिंग “तसलीमा की राजनीति समझिए, हुसैन का मर्म समझिए” देखी जा सकती है।
3.
तस्लीमा नसरीन,उदय प्रकाश,अरूंधती राय जैसे लेखकों के परिवर्तनकारी सामाजिक प्रभाव के मुकाबले रजा,सुजा, अमृता शेरगिल,हुसैन या राजा रवि वर्मा का परिवर्तनकारी सामाजिक प्रभाव क्या है ?
4.
इस अदा का क्या जवाब की कोई किसी लेखिका से कहे कि तुम औसत हो और एक स्तर पर असरहीन हो, फलां साहब महान हैं लेकिन मैं तुम दोनों को बराबर मानता हूं !! मैं तुम्हारी “राजनीति” को भी समझता हूं और चित्रकार साहब के “मर्म” को भी समझता हूं लेकिन तुम दोनों को बराबर कहे दे रहा हूं !! वाह रे करूणानिधान, वाह रे गरीब परवर !
5.
एक सवाल यह है कि , जब मैं अपने से चालिस/पचास साल वरिष्ठ जातिवादी लेखकों के खिलाफ लिखता हूं तो कई लोग मुझे साहसी कहते हैं। लेकिन जब मैं उन्हीं लोगों में से किसी के खिलाफ लिखता हंू तो मैं उन्हें दंभी लगने लगता हूं। यह दोहरापना नहीं है तो क्या है ?
6.
जो लोग सीधे आपके देश-मेरे देश जैसी भाषा का प्रयोग करने लगते हैं। न जाने वो किस देश के हैं ?
7.
देश के एक कोने में जब एक दलित का बच्चे को कुर्सी पर बैठने के लिए गोली मारा जा रहा था तो उसी वक्त उस बच्चे की चिंता में गले जा रहे जुझारू युवा पत्रकार अपनी कलम से किसी लेखिका को गिराने और एक अरबपति चित्रकार को उठाने का काम कर रहे थे। हालांकि उनका दावा था कि वो उस बच्चे की चिंता में दूसरे सभी लेखकों से ज्यादा दुबले हुए हैं।
अरविंद जी, तसलीमा की मूर्ति बना कर पूजा न करने की बात मोहल्ला पर आपसे भी पहले मैं उठा चुका हूं। तब एक सज्जन ने इसे बाल की खाल निकालने की संज्ञा दी थी। लेकिन भक्ति न करने का मतलब यह भी तो नहीं है कि मैं खामख़्वाह तसलीमा की टांग खींचनी शुरु कर दूं। और आप मेरे सारे कमेंटस् पढ़ जाईए, मेरा हुसैन से ऐसा एक भी विरोध नहीं है जो दूसरों के हैं। मैंने गांधी का उदाहरण देकर समझाया भी फिर भी आप सबको एक ही पलड़े में तौले जा रहे हैं। आप अगर बात को सही संदर्भ में समझना ही नहीं चाहते तो हो क्या ! मैं कहता हूं कि इसकी पूरी संभावना है कि तसलीमा ने वह लेख न लिखा हो। क्यों कि जितना मैंने तसलीमा को पढ़ा है, तसलीमा को अगर बुरके का विरोध करना होगा तो वे सीधे-सीधे करेंगी, किसी मीडियोकर सुधारक की तरह वे इसके लिए किसी इतिहास या धर्म-पुरुष के नाम का सहारा नहीं लेंगीं। वे एक साहसी महिला हैं।
तसलीमा और हुसैन की तुलना, तसलीमा की आपत्ति के चलते शुरु हुई, मैंने या आपने इसे शुरु नहीं किया।
और जो लोग कहते हैं पहले आप अपनी मां-बहिन की नंगी तस्वीर बनवा कर देखो, उनके खिलाफ़ भी तर्क पहली बार मैंने ही दिया था। और आपने उसे पढ़ा न हो, असंभव ही लगता है। अगर इतने सबसे भी आपको न समझ आए कि कौन किस मानसिकता में है तो आगे क्या कहा जाए !?
अरविन्द जी आपने जिस तरह अखबार और घर वाली बात को पकड़ा है उससे लगता है कि आपने व्यंजना और अभिधा के बीच भेद करना छोड़ दिया है। इससे ज्यादा अफसोस मुझे इस बात का है कि आपने बस इसी एक बात को पकड़ कर बैठे हैं। क्यों पता नहीं ?
आपके यह भी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि आप हुसैन का पक्ष ले रहे हैं इसलिए आप का यहां विरोध हो रहा है। यह बात सरासर गलत है। हुसैन के लोकतांत्र नागरिक अधिकारों के आप हमसे बड़े झण्डाबरदार होंगे लेकिन इससे यह नहीं साबित होता कि दूसरा उसका विरोधी है।
जब आप किसी लेखिका को असरहीन कहेंगे तो आप को आपकी बात के गलत होने का प्रमाण दिया जाएगा। और वह जो प्रमाण आप के जितना निकट होगा उसे सबसे पहले याद दिलाया जाएगा। यह तो स्वाभाविक है।
आप नहीं समझते हैं तो मैं आगे से किसी टिप्पणी में ऐसी किसी व्यंजना का प्रयोग नहीं करुंगा जिसमें अखबार या घर की ध्वनी भी निकलती हो। लेकिन। लेकिन आप उन प्रश्नों का जवाब दें जो आपके लेख से उठें हैं ? मैंने क्या ओढ़-बिछा रखा है इसका उदघाटन फिर कभी कर लीजिएगा।
लिंक पर जाने की जहमत न उठाने वाले पाठकों की सुविधा के लिए मैं वह पैरा नीचे लगा रहा हूं जिसकी एक पंक्ति को कोट करके अरविन्द जी ने अपने इस लेख का प्रारंभ किया है।
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इंटरनेट पर अच्छी-बुरी अनेक चीजें उपलब्ध हैं। सच-झूठ, धर्म-अधर्म सब। बिस्तर सेक्स भी। तथ्य आहार हो सकते हैं, संगीत आहार हो सकता है तो सेक्स क्यों नहीं। सेक्स से ज्यादा स्वादिष्ट चीज है भी क्या? इंटरनेट पर सेक्स का आहार करने और कराने वालों की कमी नहीं है। लेकिन उस दिन मैं अवाक रह गयी। भारत में गैर-बंगाली लड़के तो ऐसा करते ही हैं, बंगाली लड़कों ने भी अपनी बीवियों के साथ हार्डकोर सेक्स की वीडियो तस्वीरें इंटरनेट पर डाल रखी हैं। यानी उन तस्वीरों की बिक्री की है। उन वीडियो को देख कर कोई अंधा भी समझ सकता है कि उनकी बीवियों को पता ही नहीं है कि वे तस्वीरें क्यों ली जा रही हैं। अगर बीवी जानना चाहती है तो शांत-सुबोध, चश्माधारी भद्र कहा जाने वाला छात्र या चाकरीशुदा पति कहता है, व्यक्तिगत संग्रह के लिए। वह व्यक्तिगत संग्रह दो दिन बाद दुनिया के संग्रह की वस्तु बन जाता है। यह उसका पति तो जानता है, पर पत्नी नहीं जान पाती। लक्ष्मी कही जाने वाली पत्नी अपने पति का निर्देश मानती जाती है। ‘अब ब्लाउज खोल कर फेंक दो, छाती पर हाथ फेरो, फटाफट साड़ी उतारो और टांगें फैला कर सो जाओ। धत्तेरे की, मेरे सामने शर्म कैसी!’
तस्लीमा ने क्या लिखा है अरविन्द जी ने उसका क्या भाष्य किया है इस पर पाठकों की राय आए तो कुछ बात बने। अरविन्द जी तो कह चुके हैं कि वो अपनी बात पे कायम रहेंगे। अतः अब प्रबुद्ध पाठक ही तस्लीमा का लेख पढंे और देखें क्या अरविन्द शेष जो अर्थ निकाल रहे हैं तस्लीमा ने वही कहा है ?
खासतौर पर महिला नामवाले टिप्पणीकारों की इस मुद्दे पर राय जरूर आए। तस्लीमा ने जिस चीज के खिलाफ लेख लिखा है ठीक उसी चीज के लिए तस्लीमा को कटघरे में खड़े कर देने के बाद अरविंद शेष को मेरा उनके भाष्य को रेप….से जोड़ देने का दुख है। यानि को वो एक महिला के लिखे का दुष्प्रयोग कर सकते हैं लेकिन मैंने उसपे तीखा तंज कस दिया तो बिफर पडे़ !!
पाठक फैसला करें कि अरविन्द जी ने तस्लीमा के इस पैरे से उस पंक्ति को अपनी टिप्पणी “शब्दों के जरिए रचा गया चित्र” के साथ प्रस्तुत किया है क्या वो मिस-कोटिंग का बेहद आपत्तिजनक मामला नहीं है ?
अरविन्द जी यह भी जरूर बताएं कि एक लेख के विरोध में तसलीमा के पक्ष में जाती कुछेक टिप्पणियां कर देने को कैसे और क्यांे कर मूर्तिपूजा कह रहे हैं ?
मैं रंगनाथ से पूरी तरह सहमत हूं । इससे मेरी इस आशंका को बल मिला है कि किसी दलविशेष द्वारा किसी धर्म विशेष के कट्टरपंथियों से मिलकर तसलीमा को बदनाम कर देने का सोचा-समझा अभियान चलाया जा रहा है।
शीर्षक पर ध्यान दीजिए
“तसलीमा की राजनीति समझिए, हुसैन का मर्म समझिए”
बहस के पहले ही फैसला दिया जा चुका है ।
मुझे लगता है, बात तसलीमा ने ही शुरू की है। जनसत्ता में उन्होंने खुद को बड़ा, अलग और ज्यादा न्यायप्रिय बताने का एलान करते हुए पाठकों से अनुरोध किया था कि उन्हें हुसैन और रूश्दी के बरक्स न खड़ा किया जाए।
ये किधर जा रहें हैं हम?
अरविंद जी, पहले साफ़ कर दूँ कि हुसैन को “बड़ा” कलाकार मानाने पर और उनपर या किसी भी कलाकार पर वह क्या रचे, क्या न लिखे इसकी पाबंदी का विरोध में मैं आपके साथ हूँ.
लेकिन मुझे लगता है कि यह काम आलोचनाओं से ऊपर उठा कर किया जाय यह बिलकुल ज़रूरी नहीं है. अगर मुझे हुसैन की तसवीरें घटिया लगतीं तब भी उनकी आज़ादी का समर्थन करता.
सवाल वैसे यहाँ हुसैन की तस्वीरों के घटिया लगाने का नहीं है. हम जानते हैं कि बड़ा बनाने और होने की भी कई परतें होती हैं. जैसे कई बार हम धर्म पर, वर्ग पर प्रगतिशील हो जाते हैं और जाती पर नहीं होते. हुसैन ने खुद को उस ग्लोबल कल्चरल इंडस्ट्री का हिस्सा बनाने दिया हैं जिसने पिछले दशकों में हमारे देश के कई एनी पेंटरों को भी अच्छी शोहरत और करोड़ों डॉलर दिलवाए हैं. जाहिर है यह इंडस्ट्री धर्म, पहचान इत्यादि के मायने में तो लिबरल तो होगी ही. लेकिन इसके आगे न सिर्फ इसकी उदारता हवा हो जाती है बल्कि स्वान्तः सुखाय कला का एक बाजार रचना और कला का fetish बनाना इसकी प्राथमिकता होती है.
मैं अधिकार के साथ नहीं कह सकता कि हुसैन अपनी पेंटिंग में किस किस परत तक प्रगतिशील हैं, कहाँ क्या गोल कर जाते हैं और कब बाजार में बने रहने के लिए माधुरी की पीठ रंगने लगते हैं क्योंकि मुझे सच में पेंटिंग एक्जीबिशन समझ में नहीं आते. मोटा मोटी इतना समझ पाया हूँ कि हुसैन साहब से कम से कम यह सवाल पूछना बेतुका है कि आपने मोहम्मद साहब की नंगी तस्वीर क्यूँ नहीं बनाई
तसलीमा ने न सिर्फ धर्म से टक्कर ली है बल्कि समाज को कई स्तरों पर आईना दिखाया है और उनकी इस बात में दम है कि जहां हुसैन और रश्दी कम-से-कम कानूनी तौर पर नहीं निकाले गए हैं, उनको दो देशों के कठमुल्लों और बंगाल की प्रगतिशील कही जाने वाली सरकार ने भी खदेड़ा है. तसलीमा और स्त्री-दलित जैसे मुद्दों पर लिखने वाले अन्य लोगों को साहित्य के सौन्दर्यशास्त्रीय पैमाने पर औसत बताकर खारिज करने की राजनीति भी हम समझते हैं. बंगाल की सरकार को अपनी कमजोर नस न बनाने दें, बाकी आपके लिए सम्मान हमेशारहेगा
रंगनाथ सिंह के लिए-
शर्मिन्दा said:
अरविन्द शेष जी आप रहिये कायम, निर्लज्जता जब पराकाष्ठा के पार हो जाती है तो अपनी नग्नता के भौंड़े प्रदर्शन पर कायम ही रहती है. सचमुच तस्लीमा की हुसैन से तुलना निर्ल्लजता ही है.
आप एक ही वाक्य में दोगली बात कर जाते हैं, तस्लीमा को समझने का दम भी भरते हैं और उसे हुसैन से कमतर भी आंकते हैं. मुझे ऐसा नहीं लगता की फेर आपकी समझ में है, फेर है आपकी बुद्धी में. आप जानते हैं कि आपका लेख झूठ है और घटियापन से भरा है, लेकिन फिर भी आप लिख रहे हैं क्योंकि आप जिन्हें खुश करना चाहते हैं उन्हें खुश करने के लिये आप किसी भी हद तक गिर सकते हैं, बल्कि गिर चुके हैं.
लेकिन आप यह सोचने की गलती कभी न करिये कि लोग आपकी चोरी पकड़ेंगे नहीं. आपके पाठक आपके झूठ को समझ रहे हैं, और यह भी समझ रहे हैं कि आपका यह लेख किस स्तर का है.
इसलिये अपना भजन आप ही गुनिये और आप ही सुनिये.
बेहद निर्ल्लज और घटिया लेख
सुंदरम जी,
आपकी सारी बातों से सहमति, इस आग्रह के साथ कि कोई भी मेरी कमजोर नस नहीं बन सकता। शायद यही कारण है कि मैंने आज तक अपने लिए कोई मूर्ति नहीं बनने दी है, जिससे किसी की सहमति नहीं होने पर मेरा सिर दुखने लगे। हां, आज भी मैं तसलीमा के उस पक्ष पर मैं मुग्ध होता हूं जहां तसलीमा ने न सिर्फ धर्म से टक्कर ली है बल्कि समाज को कई स्तरों पर आईना दिखाया है।
अब मुझे तसलीमा के लिखे में कुछ चीजें बहुत प्रभावित नहीं करतीं, तो इसमें कृपया कोई राजनीति नहीं तलाशिए, इसे मेरी कमी समझिए। जरूरी नहीं कि मेरा लिखा सबको हर बार बहुत पसंद आए ही।
रही बात तसलीमा के इस देश से बाहर रहने का, तो असली बात वोट पर टिक जाती है। वोट का मसला जितना पश्चिम बंगाल सरकार के लिए महत्त्वपूर्ण है, उतना ही इस देश की कांग्रेसी सरकार के लिए भी। इसी आईने में आप हुसेन के वापस नहीं हो पाने को भी देख सकते हैं।
और मैंने जो कहना चाहा है, उस पर किसी को एतराज हो सकता है। लेकिन शशिभूषण के लेख को वे पढ़ें और परेशान होएं। ऐसे अराजक किस्म के लोगों के लिए कोई जवाब नहीं होता, जिनके लिए मूर्तियां महत्त्वपूर्ण होती हैं।
अरे भाई लोगो, अपने चालीस-पचास साल वरिष्ठ जातीवादी लेखक के विरोध में लिख देने के बदले में रंगानाथ सिंह जी को किसी ने अभी तका ढलाका साम्मान क्यों नहीं दिया है। किसी जाती वादी लेखाक का नाम तो नहीं पाढ़ा था, लेकिन समूचे लेख में बा-बा-बा-बा (ब्लैक शिप) जैसा कुछ जरूर था। हिम्मत हो तो इस तरह की कि छिप-छिप के वार करूंगा जानिये…
अरविंद जी आपने जिस अजीबोगरीब ढंग से जवाब दिया है उसको मैं समझ नहीं पाया। किसी ने आपके लिए स्तरहीन और अश्लील टिप्पणी की है तो मैं क्या कर सकता हूं ?
आपने अपने कमेंट में मेरे लिए जो कुछ कहा है मुझे सिर्फ उससे ही वास्ता है। आप भी सिर्फ मेरे लिखे से वास्ता रखें। आपको कोई संदेह हो तो अविनाश जी से कहिए कि वो सभी कमेंटकारों का आईपी पता सार्वजनिक कर दें। चरित्रहनन करने के लिए छद्म रूप धरने वाले कुंठासुरों की पहचान से परदा उठ जाएगा।
रंगनाथ सिंह जी,
आपको मेरी टिप्पणी में क्या स्तरहीन और अश्लील दिखा. खासकर अश्लील वाले हिस्से पर प्रकाश जरूर डालिए. अगर मैं अपने नाम से टिप्पणी नहीं कर रहा इसका मतलब यह नहीं है कि मैं किसी प्रकार की कुंठा से ग्रसित हूं.
विरोध के कई तरीके होते हैं यह तो आप जानते ही होंगे, यह भी जानते होंगे की विरोध के लिये अपना नाम जाहिर करना कोई जरूरी नहीं है. बहुत सारे क्रांतिकारी भी मूक नाम से या छद्म नाम से विरोध करते रहते हैं.
सिर्फ अरविंद शेष के सामने अपना हिसाब साफ रखने के लिये मुझे अश्लील या कुंठा ग्रसित कहना कोई जायज बात नहीं है, क्या आप ऐसा इसलिये कह पाये कि मैंने अपना नाम नहीं बताया? अगर अपना नाम बता देता तो क्या हो जाता?
मुझे अरविंद शेष से डायलाग कि कोई मंशा नहीं, न मैं तस्लीमा का दोस्त हूं, न हुसैन से मैंने पैसे खायें है. अरविंद शेष ने जो लिखा मुझे बकवास लिखा, इसलिये मैंने अपनी सोच साफ साफ उनके सामने रखी. अपने नाम से रखता तो शायद इतने बेबाक शब्दों में अपनी बात नहीं कह पाता (चाहे मैं उन्हें जानता भी नहीं).
जहां मेरा नाम या आइपी जाहिर करने की बात है, तो शौक से जो कोई चाहे करे. मैं इससे कोई डरता नहीं, न ही मैं इतना बेबस हूं कि अरविंद शेष या कोई और मुझे नौकरी से हटवा देंगे.
इस context में नाम न जाहिर करना मेरी शालीनता थी, न कि कुंठा.
अगर आपको अरविंद शेष के सामने खुद को पाक साफ जाहिर करना है तो कम से कम मेरा नाम लेकर तो न करें.
Badhaye ho. Sanghe hamla to nischit tha. So hua.
sharminda ji mai apki peeth ki wot nhi le rha ahi. meri ye fitrat hi nhi hai. arvind shes ka apke comment koperi pith par chipkane ki niyat kya ho sakti hai ?
mai kisi ki identity jahir karwane ke paksh me bhi nhi hu. i p address ka hawala dene ke uddesya tha ki us comment se mera koi sambandh nhi ahi. maine to jinhone mujhe gali di maine unki i p address jahir karne ki prtyaksh ya aprtyaksh kosis nhi ki. agyat nam se comment karne walo ka mai samrthak hu. is samrthan ki kuchh kimat chukani pade to bhi.
apne jis tarah se mere khilf apna mat rakha hai kya thik usi tarah apne arvind shes ke khilaf kiya hai ? apne unke lekh ko dogala.ghatiya vagairah kaha hai. bahas kum ki.
arvind ji khud mere khilaf apsabdo kaprayog kar rhe hai. lekin ye anuchit hai. chahe koi bhi kare.
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