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“नागरिकता है क्‍या? सिर्फ काग़ज़ का एक टुकड़ा है”

4 March 2010 17 Comments
MF Husain Interview

हुसैन के बहाने राष्‍ट्रीयता और नागरिकता और अभिव्‍यक्ति की आजादी की हद और अनहद पर हो रही तमाम बहसों के बीच आइए हम हुसैन का इंटरव्‍यू पढ़ते हैं। ये इंटरव्‍यू एनडीटीवी के लिए जुझारू युवा पत्रकार बरखा दत्त ने लिया है। इस इंटरव्‍यू में हुसैन ने बताया कि चाक्षुष कला की दुनिया के रंग कितने बहुआयामी होते हैं। उन्‍हें कोई एक राजनीतिक लाइन या सामाजिक संवेदना मिटा नहीं सकती। उससे असहमत जरूर हो सकती है। इसी इंटरव्‍यू में हुसैन ने बताया है कि टैक्‍स की मुश्किलों के चलते सृजन की अपार संभावनाओं को किस कदर मौतें नसीब होती हैं और यह भी इसी वजह से दुनिया के कई कलाकारों को कई कई बार अपनी जमीन छोड़नी पड़ी। हुसैन के इस बयान को कुछ लोग उनकी धनलोलुपता से जोड़ रहे हैं – जो यकीनन बहुत हास्‍यास्‍पद है। इस इंटरव्‍यू का अनुवाद स्‍वर्णकांता (मुक्‍ता) और प्रकाश प्रियदर्शी ने किया है। हम इन दोनों के हृदय से आभारी हैं : मॉडरेटर

बरखा दत्त : आपने अपना भारतीय पासपोर्ट क्‍यों त्‍याग दिया और कतर की नागरिकता क्‍यों स्‍वीकार ली? इतने साल से तो आप बाहर रह ही रहे थे, आखिर अब ऐसा क्‍या हुआ कि आपको भारतीय नागरिकता छोड़नी पड़ी?

एमएफ हुसैन : इसके पीछे एक कारण है। 2006 में मैंने तीन बड़े प्रोजेक्‍ट पर काम करने का फैसला लिया था -

1. मोहनजोदड़ो से मनमोहन तक की भारतीय सभ्‍यता का इतिहास
2. बेबीलोन के समय से अब तक की अन्‍य सभ्‍यताओं का इतिहास
3. और सिनेमा, जो मेरे दिल के बहुत करीब है – मेरा प्‍यार – भारतीय सिनेमा के सौ साल। अगले साल भारतीय सिनेमा सौ साल का हो जाएगा।

मैं इन सारे प्रोजेक्‍ट्स को इंडिया में करना चाहता था। मगर आप जानती हैं कि इसके रास्‍ते में कई सारी बाधाएं हैं। सबसे पहला सवाल तो स्‍पॉन्‍सर खोजने का है। तो मैं इंतजार में था, इसलिए मैंने 2004 में दुबई आकर स्‍पॉन्‍सर खोजने का फैसला लिया। लंदन में मुझे भारतीय सभ्‍यता पर काम करने के लिए स्‍पॉन्‍सर मिला और क़तर में शेख मोज़ाह ने अन्‍य सभ्‍यताओं पर काम करने के लिए मुझे आमंत्रित किया। और अबू धाबी भारतीय सिनेमा पर काम करने के लिए मुझे स्‍पॉन्‍सर करेगा। अगले साल मैं कुछ बड़ा कर पाऊंगा। इन सारे कामों को करने में आने वाली टैक्‍स की मुश्किलों से बचने के लिए मुझे एनआरआई बनना पड़ा (कोई भी कॉरपोरेट आपको इस बारे में तफसील से बता सकता है।)। यहीं नहीं, पूरी दुनिया में ये समस्‍या है। स्‍वीडन में बर्गमैन और पोलैंस्‍की के साथ क्‍या हुआ – उन्‍हें भी टैक्‍स की वजह से मेरी तरह अपनी जमीन छोड़नी पड़ी।

अगर मैं चालीस साल का होता, तो मैं इन मुश्किलों से लड़ने के लिए रात-दिन एक कर देता। लेकिन मैं खुद को पूरी तरह अपने काम पर केंद्रित करना चाहता हूं। मैं अब कोई गतिरोध नहीं चाहता। मैं ज्‍यादा से ज्‍यादा सुविधाएं और सहूलियत चाहता हूं।

फिर भी, हिंदी हैं हम वतन हैं, सारा जहां हमारा।

ये सरहदें केवल राजनीति की सरहदें हैं। खासकर कर चाक्षुष कला (विजुअल आर्ट) यूनिवर्सल लैंग्‍वेज है। आप दुनिया में कहीं भी रह कर काम करो, आप जो काम कर रहे हैं, उसकी जड़ें पांच हजार सालों के महान भारतीय इतिहास से खुद ब खुद जुड़ जाती हैं।

बरखा दत्त : मगर हुसैन साहब, आपकी बातों से ऐसा लगता है कि जो कुछ भारत में आपको नहीं मिल सका, वह क़तर आपको मुहैया करा रहा है। मगर आपका बयान है कि भारत ने आपको खारिज़ कर दिया। क्‍या इस वजह से आपने क़तर की नागरिकता लेने का फ़ैसला किया?

एमएफ हुसैन : मैंने कभी नहीं कहा कि भारत ने मुझे खारिज कर दिया। उन्‍होंने जो भी किया हो, मेरा मानना यही है कि अवसरों की आसान उपलब्‍धता के चलते मैं यहां आया। और नागरिकता है क्‍या? यह सिर्फ काग़ज़ का एक टुकड़ा है – क्‍योंकि जब कोई इतने प्‍यार और स्‍नेह से मुझे बुलाये, तो क्‍या मैं उसके पास नहीं जाता और यह कह कर उनके आमंत्रण को ठुकरा देता कि मैं मांसाहारी नहीं, शाकाहारी हूं? ऐसे मामलों में मैं लकीर का फकीर नहीं हूं।

वो कहते हैं न, जहां भी प्‍यार मिला, मैं उसके साथ हो हो गया। मैं मोहब्‍बत वाला आदमी हूं। जहां भी मुझे गर्मजोशी दिखाई पड़ती हैं, मैं उनका हो जाता हूं। हालांकि भारत में 99 फीसदी लोग मुझे प्‍यार करते हैं और अब भी करते हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि रचना के लिए राजनीति हमेशा नुक़सानदेह रही है। गैलीलियो से लेकर कालिदास तक, सभी महान कलाकार इससे प्रताड़‍ित रहे हैं। नेरुदा, चैप्लिन जैसे कई लोग भी इसके उदाहरण हैं।

बरखा दत्त : क्‍या आपको घर लौटने की बेचैनी नहीं होती?

एमएफ हुसैन : मेरी आत्‍मा हमेशा से वहीं है। सदेह उपस्थिति में क्‍या रखा है? तकनीक और संचार की वजह से दुनिया ऐसे भी आस-पड़ोस हो गयी है और एक रचनात्‍मक शख्‍स किसी भूगोल से बंधा हुआ नहीं है। आप कहां रहते हैं, ये कोई मायने नहीं रखता। मैं मूल रूप से एक भारतीय चित्रकार हूं और अंतिम सांस तक रहूंगा।

बरखा दत्त : मगर सच्‍चाई ये है कि बहुत सारे भारतीयों का मानना है कि आपके भारत आने के लिए सरकार और राजनीतिक सत्ता बहुत कुछ कर सकती थी…

एमएफ हुसैन : मैं ऐसी बातों पर कोई तवज्‍जो नहीं देता। वो क्‍या सोचते हैं, ये उनका काम है। इससे न तो मैं परेशान हूं और न ही इससे मेरा काम रुकने वाला है।

बरखा दत्त : ल‍ेकिन क्‍या आपको लगता है कि सरकार आपके लिए कुछ और कर सकती थी? गृहमंत्री ने आपकी पूरी सुरक्षा का वादा किया है। वे कहते हैं कि आपको लौट जाना चाहिए।

एमएफ हुसैन : मैं इन सब पचड़ों में नहीं पड़ना चाहता। उन्‍हें उनका काम करने दीजिए और मुझे मेरा। मैं उनकी मंशा पर सवाल नहीं खड़ा कर रहा। लेकिन मेरे पास तीन जरूरी काम हैं और मुझे इसे खत्‍म करना है, जो मैं भारत में नहीं कर सकता। इसकी कई वजहें और सबको पता है। अगर वे अपने अंदर झाकेंगे, तो उनकी अंतरआत्‍मा उन्‍हें सब कुछ बता देगी।

बरखा दत्त : आपके आलोचक आपके अगले पड़ाव के आपके चुनाव पर सवाल खड़ा कर रहे हैं – आपने ऐसा देश चुना है, जहां लोकतंत्र नहीं है। क़तर क्‍यों?

एमएफ हुसैन : जैसा कि मैंने बताया कि स्‍पॉन्‍सर और सारी सुविधाएं मिलने के कारण मैंने यहां काम करने का फ़ैसला लिया। पिछले साठ सालों से मैं इसी तरह अपना काम करता रहा हूं। पूरी दुनिया में मेरे पास अभी तक एक भी स्‍टूडियो नहीं है। मैं होटल के कमरों और दोस्‍तों के घरों में जाकर अपने कैनवास फैलाता हूं। मैं एक लोक कलाकार की तरह हूं, जो ऑन द स्‍पॉट काम करता है। अपने काम करने का अंदाज़ मैंने इसी तरह विकसित किया है। कई महान चित्रकार और विचारक हैं, जिनका मैं सम्‍मान करता हूं – लेकिन मेरे काम करने का ढंग ऐसा ही है।

बरखा दत्त : क्‍या आपके लिए भारतीय नागरिकता छोड़ना कष्‍टप्रद रहा?

एमएफ हुसैन : मेरे फैसले को लेकर मीडिया ज्‍यादा दुखी है, मैं नहीं। पिछले चालीस बरस से फिल्‍म बनाते हुए, शब्‍द रचते हुए, चित्रकारी करते हुए मैं परम आनंद में हूं। मेरे भीतर का महज दस फीसदी ही अभी अभिव्‍यक्‍त हुआ है, नब्‍बे फीसदी अभी भी बचा हुआ है। पर लगता है कि सब मेरे साथ कब्र तक जाएगा।

बरखा दत्त : आपने अपने परिवार, बच्‍चों और दोस्‍तों को कैसे समझाया और उनकी क्‍या प्रतिक्रिया रही?

एमएफ हुसैन : वो सब इसी पेड़ की छाया में पले-बढ़े हैं, इसलिए वे मुझे बेहतर समझते हैं। एक समय उन्‍हें लगता था कि मैं पागल हो गया हूं – क्‍योंकि एक खास अभिनेत्री ने मेरे साथ काम किया :)

बरखा दत्त : आपको लगता है कि क़तर में आपकी अभिव्‍यक्ति और रचना को पूरी आज़ादी मिलेगी? यहां तो लोकतंत्र भी नहीं है?

एमएफ हुसैन : मैं यहां पिछले दो साल से काम कर रहा हूं और मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। लेकिन आगे क्‍या होगा, इसके बारे में पूरी तरह अभी से आप कुछ नहीं कह सकते। ये एक जुआ है, लेकिन रचनात्‍मक।

बरखा दत्त : आपकी विवादास्‍पद पेंटिंग्‍स को लेकर शिवसेना जैसे समूहों का मानना रहा है कि पहले आप माफी मांगे, फिर वतन लौटें। क्‍या आप इस पर अफंसोस जाहिर करेंगे?

एमएफ हुसैन : अफसोस किस बात पर? अगर कोई आहत हुआ है, तो मुझे दुख है – लेकिन मेरी अंतरात्‍मा सीसे की तरह साफ है।

बरखा दत्त : आप 95 बरस के हो गये। यह आपके जीवन की गोधूलि बेला है। इस उम्र में लोग अपने घर लौटना चाहते हैं।

एमएफ हुसैन : मैं सचमुच इस मसले को अभी तक समझ नहीं पाया हूं। मैं कोई बीस बरस का छोरा नहीं, जिसको एक घर की जरूरत हो। मैं उस लड़कपन को कब का पीछे छोड़ चुका। जब आप जवान होते हैं, तो आप शिकार को झपटने के लिए हमेशा तैयार होते हैं।
यह समय है सब कुछ छोड़ देने और त्‍याग देने का। शून्‍य पर आ जाने का। मैं कोशिश कर रहा हूं लेकिन अभी ऐसा कर नहीं पाया हूं। केवल संन्‍यासी ही ऐसा कर पाते हैं।

बरखा दत्त : आपने कहा कि आप चालीस के होते तो आप संघर्ष करते। आप आज क्‍यों नहीं लड़ रहे हैं? आपने लड़ना क्‍यों बंद कर दिया है?

एमएफ हुसैन : हां, ये सच है। चालीस की उम्र में अगर आप राजा की बेटी से शादी करना चाहते, तो आपके लिए वो असंभव होता। हम उसे यूं नहीं जाने देते, उसे अगवा कर लेते। मगर वह उम्र बीत चुकी है।

बरखा दत्त : लोग अभी भी यही जानना चाह रहे हैं कि आप वापस लौट कर कोर्ट का सामना क्यों नहीं करते? जबकि अब सिर्फ तीन ही मुकदमे बचे हैं? आप लौट कर सामना क्यों नहीं करते?

एमएफ हुसैन : मै तो वही हूं, मेरी आत्मा अभी वहीं है। मैं नहीं सोचता कि लोग मुझे करीब से देखना चाहते हैं या मेरे पास आना चाहते हैं। आशा है, कला के क्षेत्र में जो काम मैंने कर दिया है, वह कभी मिट नहीं सकता। वह हमेशा मौजूद रहेगा। वैसे भी अब जिंदगी के सात-आठ साल ही बचे हैं।

बरखा दत्त : क्या आपको ऐसा लगता है कि आपको लोगों ने धोखा दिया है? सरकार ने धोखा दिया है? क्या आप नहीं सोचते कि उम्र के इस पड़ाव पर आपके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था?

एमएफ हुसैन : नहीं, मैं ऐसा नहीं सोचता। मैंने कभी ऐसा नहीं कहा है और न कभी कहूंगा कि किसी ने मुझे धोखा नहीं दिया है। यह कुछ ऐसे लोगों के कारण हुआ, जो आधुनिक पेंटिग्स को नहीं समझते। कला हमेशा वक्त से आगे चलता है। एक दिन वे लोग भी समझ जाएंगे।

बरखा दत्त : आपको नहीं लगता कि आपकी सुरक्षा के लिए ज्यादा ठोस कदम उठाये जा सकते थे?

एमएफ हुसैन : मैंने हमेशा कहा है कि सरकार अपना काम कर रही है और मुझे अपना काम करने से कोई रोक नहीं रहा। मैं लौट भी सकता हूं। लेकिन एक बात समझ लीजिए, मै कहीं भी पेंटिग्स करूं – चाहे पेरस हो, लंदन हो, न्यूयॉर्क हो या क़तर हो, मैं अभी भी एक भारतीय चित्रकार हूं। मैंने कोई जुर्म नहीं किया है, कोई हत्या नहीं की है, मैंने किसी से भी एक पैसा नहीं लिया है।

बरखा दत्त : आपका दिल क्या कहता है? क्या भारत अब भी आपका घर है?

एमएफ हुसैन : फिर आप शरीर की उपस्थिति की बात कर रही हैं। मैं इससे ऊपर उठ चुका हूं। जो लोग मुझे समझते हैं, वे मेरी कमी कभी महसूस नहीं करेंगे।

बरखा दत्त : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस हद तक होनी चाहिए? क्या आप सोचते हैं कि असहिष्‍णुता की राजनीति भारतीय विविधता के लिए खतरा है?

एमएफ हुसैन : सौभाग्य से भारत मे रचनात्मक पेंटिग्स में ज्यादा रूकावटें नहीं हैं और मैं नहीं सोचता कि इस तरह की समस्या वहां हमेशा थी। एक घटना बड़ौदा मे हुई लेकिन मेरे साथ जो हुआ, वो एक छोटी घटना थी। बावजूद इसके भारत स्वतंत्र है।

बरखा दत्त : आपके लिए पिछला कुछ साल कितना कठिन रहा है हुसैन साहब?

एमएफ हुसैन : आप फिर से कठिन शब्द का इस्तेमाल कर रही हैं। मेरे लिए कठिनाई कोई समस्या नहीं रही है। हां कुछ मुकदमे हैं, जिसे मेरा वकील देख रहा है। मैं भागा नहीं हूं। पूरे भारत में तीस-चालीस हजार से ज्यादा पेंटिंग्‍स मैंने किये हैं, उसके बारे मे आप क्या कहेंगी? यही सबसे महत्वपूर्ण चीज है, जो मैंने अपने प्यारे देश को दिया है। इतना काम मैंने किसी और देश के लिए नहीं किया है।

बरखा दत्त : 95 की उम्र मे कोई अधूरा सपना?

एमएफ हुसैन : यही सपना है कि जब तक जीवित हूं, अपना योगदान देता रहूं। अपने देश और बाहर के लोगों का जो प्यार और सहयोग मिला है, उसके बदले में जो खुशी उन्‍हें दे सकता हूं, दूं। एक पल के लिए भी मैं यह नहीं सोचता कि मुझे धोखा दिया गया है। जो मुझे नहीं समझ सके, उम्मीद है वक्त आने पर वे भी समझेंगे। मेरे दिल में उनके लिए भी प्यार है। हर किसी को अपने विचार व्यक्त करने का हक है। हमें याद रखना है कि हमारा देश एक महान लोकतांत्रिक देश है।

बरखा दत्त : आप उन भारतवासियों को क्या संदेश दना चाहेंगे, जो आपके दीवाने हैं?

एमएफ हुसैन : तू कहे तो मैं उन्‍वान बदल दूं, लेकिन एक उम्र दरकार है अफसाना बदलने के लिए। क़तर, न्यूयॉर्क या कहीं भी मैंने जो पेंटिंग्स बनायी, सिर्फ उनके शीर्षक बदल गये। इसके अलावा कुछ नहीं बदला। अपने साधारण तरीके से मैंने अपनी कहानी कही है। उम्मीद है, मेरे करोड़ों देशवासियों के दिलों में वो हमेशा मेरी याद दिलाती रहेगी।

17 Comments »

  • एन. नंदा said:

    बरखादत्त इस इंटरव्यू में उन सभी सवालों से बची हैं जो हुसैन से पूछे जाने चाहिये थे। जो सवाल पूछे गये हैं वे सामान्य हैं और उसकी छवि के विपरीत एक एसकेप रूट जैसे हैं। हुसैन की आतरी भी उतार ली जानी चाहिये थी। वैसे मुझे उम्मीद है जल्दी ही अविनाश हुसैन चालीसा भी छापेंगे :)

  • अनुनाद सिंह said:

    ये तो साक्षात्कार नहीं, फिक्सिंग है दद्दू।

  • haedeep rana said:

    nanda ji ye to islaam ka ullanghhan ho jaayega…

  • शशि सिंह said:

    आजकल इंटरव्यू नहीं पीआर होता है। गुड पीआर स्टोरी! वेलडन बरखा एंड मोहल्ला टू। अगले साल एनडीटीवी के इंडियन ऑफ द ईयर के प्रशस्ति पत्र पर दद्दू का नाम तो जरूर चमकेगा। उस चमक में बाकी सब फीका। आई लव माई इंडिया ओह सॉरी आई मीन कतर…

  • विनीत कुमार said:

    उपर के जिन लोगों के और इस मिजाज के कमेंट पहले भी जो हमने मोहल्लालाइव पर पढ़ा है उससे यही निष्कर्ष निकाल पाया हूं कि इनलोगों के मिजाज का इंटरव्यू एक ही चैनल ले सकता है- सुदर्शन टीवी। अब पता नहीं वो ऑनएयर है भी या नहीं।..

  • Rajesh said:

    Hi Vinit,

    I am sure if you keep on writing like this you will get place in polit bureau

    Great Job done !!!!!

  • शशि सिंह said:

    विनीत, सबकुछ इतना ब्लैक एंड व्हाइट नहीं होता जितना आपने ऊपर बताने की कोशिश की है। दुनियावी बातें ग्रे एरिया में ज्यादा संचालित होती हैं। ऐसा मेरा मानना है। भारत के संदर्भ में यह कहीं ज्यादा ही प्रसांगिक है बशर्ते हम सच को स्वीकार करना चाहते हों, अन्यथा तर्क (अधिकतर मामलों में कुतर्क) तो एक खूबसूरत नशा है ही।

  • sachin B said:

    Guru ji ,
    Barkha Dutt Ek Badi Patrakar(Big Journalist) Hai Iss Terak Ke Interview Kar Ke Hi Log Bade Patrakar bante Hai. Bhai Iss Me Naya Kya Hai… Ye To Bade Journalist Ki Nishani Hai Ki PM Se Bat Karo To Mahangai Ke Bare Me Na Pucho Baki Sab Bakwas Karo . Sharad Pawar Se Baat Karo To Sugar Mills Me Kalabazari Kar Ka Rakhi Gayi Sugar Ka Bare Me Na Pucho Cricket Me Tendulkar Ki 200 Run Per Bat Karo.
    Tabhi Padma Awards Me Naam Jayega Aur award Bhi Aayega…

    MEDIA SAMAZ KA AIENA HAI… AINA KE SAMENE NIKHRNA BHI PADTA HAI

  • विनीत कुमार said:

    दुनियावी बातें ग्रे एरिया में ज्यादा संचालित होती हैं।
    शशिजी,इस लाइन को स्वीकार करने और मानने में रत्तीभर भी दिक्कत नहीं है। लेकिन लोगों ने जो कमेंट किए हैं जिसकी तरफ मैं इशारा कर रहा हूं क्या वहां भी यही फार्मूला लागू है?

  • ajay brahmatmaj said:

    हम रचनाशील व्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता और नागरिकता के घालमेल में सही और गलत का फर्क नहीं कर पा रहे हैं। उलझन में हुसैन भी होंगे। हम ने एक रचनाकार के प्रति संयम और सम्‍मान नहीं दिखाया है। हुसैन महत्‍वपूर्ण काम में लगे हैं। उनकी कूंची चलती रहे। अभी फिल्‍म बिरादरी के उनके प्रशंसक बिल्‍कुल खामोश हैं,जबकि हर स्‍टार के घर में उनकी पेंटिंग टंगी है। इस सुनिश्चित खामोशी को ही हम समाज में भी देख सकते हैं।

  • शशि सिंह said:

    विनीत भाई, सहमति के लिए धन्यवाद।

    नतीजा पहले तय करके उसे साबित करने के लिए तर्क गढ़े जायें तो तो फिर सारे फार्मूले फेल हैं। उसके उलट यदि हम खुले दिल से तर्कों के सहारे नतीजे तक पहुंचते हैं तब शायद हम कहीं ज्यादा सही होते हैं। इसी कसौटी पर हर नतीजों को कसा जाना चाहिये। बस इतना ही कहना है मुझे…

  • ऋषि कुमार सिंह said:

    हुसैन का किसी देश की नागरिकता स्वीकार कर लेना भारतीय गणराज्य की व्यवस्था और न्यायपालिका के सामने सवाल है। पूरे वाकये को इस लिहाज से देखा जाये तो सवाल तमाम विरोधों के बावजूद एक सार्थक बहस की तरफ ले जाते हैं। हुसैन कलाकार होने से पहले नागरिक हैं। उन्हें इस देश की व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर विश्वास क्यों नहीं हुआ और हो भी क्यों ? देश की कानून-व्यवस्था की हालत का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि अगर आप ईमानदार हैं और भ्रष्टाचार का विरोध करते हैं,तो आपकी जान का खतरा हरवक्त है। जबकि हुसैन पर तो साम्प्रदायिक भावना को ठेस पहुंचाने का आरोप लगा हुआ है। साम्प्रदायिकता के नाम कितना खून बहा है,सभी जानते हैं। दूसरी बात न्यायपालिका,जहां मुकदमा एक पीढ़ी दायर करती है और फैसला अगली पीढ़ी सुनती है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर जा पहुंचा इंसान कितना सामर्थ्य पैदा करे? हुसैन ने सही कहा है कि संघर्ष करने की उम्र नहीं रही।
    सेनाओं के बलात्कार से पीड़ित परिवारों,पुलिस की आयाशी का शिकार बन रहे परिवारों,भूख से विलविलाते बच्चों के लिए सूखी रोटी पानी उबालकर भूख शांत करते परिवारों,आत्महत्या को मजबूर हो रहे किसानों से पूछिये कि उनकी नागरिकता की गुणवत्ता क्या है। अगर नहीं समझ में आ रहा है,तो कभी उस दुकान के पास खड़े होकर देख लीजिये जहां पर दैनिक मजदूरी करने वाला व्यक्ति अपने घऱ का राशन खरीदता है,देशभक्ति,आजादी,नागरिकता,चौथी अर्थव्यवस्था और विकास दर की आर्थिकी का सारा भेद खुल जायेगा।
    मैं नहीं मानता कि हुसैन का जाना उतना दुखद है,जितना कि दिखाया जा रहा है। जिसके पास विकल्प है,वह चला गया। देशभक्ति के मुगालते में व्यवस्था या उसकी पैदाइश द्वारा कुचले जाने की तुलना में बेहतर फैसला है। केवल फरवरी महीने में 13 पत्रकारों को पुलिस प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा है,ये वही पत्रकार हैं,जो व्यवस्था को आईना दिखा रहे थे। यह भी इसी व्यवस्था और देश का सच है। जिन लोगों को हुसैन का जाना ज्यादा बुरा लग रहा है,वे पहले यह तय करें कि देश के हालात क्या किसी संवेदनशील प्रकृति के इंसान के लिए मुफीद हैं। वैसे भी हुसैन न तो देश की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने वाले राज लेकर गये हैं और न ही इस देश के नागरिकों को लेकर कोई अफसोसजनक टिप्पणी की है। इसलिए हुसैन का जाना व्यवस्था की विश्वनीयता पर सवाल से ज्यादा कुछ भी नहीं है और जहां तक कला का प्रश्न है,तो वह राष्ट्र-राज्य की सीमाओं से परे है। ग्लोबलाइजेशन की आंधी में इसकी आशंका दूर-दूर तक नहीं है कि उनकी रचनाएं कतर तक ही सिमट जायेगी।

  • MAYANK said:

    GHAR SE MASJID HAI BAHUT DOOR….CHALO AB KUCH YUN KAR LE…? KISI ROTE HUE BACHCHE KO HANSAYA JAYE…..

    PATRAKARON KO ISH DESH ME AAM GARIB AUR BPL.KI AABADI KI ROJ-B-ROJ MARTI ZINDGI PAR BHI KUCHH SARTHAK KAM KARNA CHAHIYE..

    KUCHI CHALA KAR APANI BHAWNAYEN UKERANE PAR BAHAS KARNE SE IS GARIB DESH KI AABADI KO KOI MATLAB NAHIN….
    SAMVIDHAN ME BHI RIGHT OF EXPRESSION KI BYAKHYA KI GAI HAI…

    DHANYAWAD….

  • रश्मि said:

    जब तक दुनिया में चूची है, तब तक हुसेन की कूची है।

  • कृष्ण कुमार मिश्र said:

    निरर्थक बहस और प्रयास जो इस आदमी को लेकर किए जा रहें है, जो यकीनी तौर पर कलाकार तो है, पर आखिर चर्चा-ए-आम करने का मकसद मैं नही समझा, इन्हे दर-बदर करना भी मैं मुनासिब नही समझता, भारत सभी का है, कमीनों, हरामियों और मक्कारों का भी, तो फ़िर इन लोगों को रहने दीजिए किसी बूचड़खाने में महिमामण्डित क्यों कर रहे है! यहाँ मीडिया अपने निज़ी स्वार्थों के लिए समाज़ में गलत सन्देश देकर दूषित मानसिकता को भी उरूज पर पहुंचा देता है।

  • कृष्ण कुमार मिश्र said:

    किसी की आस्था को चोट पहुंचाना कलाकारी नही है, ये महज़ एक तरीका है, चर्चा में रहने का और चरचा घरों(मीडिया) के लिए मसाला!

  • MAYANK said:

    HUSSAIN KO LEKAR ITANA SHOR KYUN…..? KYA MEDIA KI KOI AATMA HAI…? CAINVAS PAR KUCHI CHALA APNI BHAWNAYEN JAHIR KARNEWALE HUSSAIN SAHAB KO,HAMESHA VIVADON ME RAHNA KYUN PASAND HAI…? JAHIR HAI KI AISE MUDDO KO UTHA KAR HAM SABHI HUSSAIN KO MAHIMAMANDIT HI KAR RAHE HAIN…?

    KOI IS KALAKAR SE YAH KYUN NAHI PUCHHATA KI…KISIO KI BHAWNAON KO THES PAHUNCHANA SAHI HAI…? YE SAB PUBLICITY PANE KA HATHKANDA HAI…. BHARAT KE KHET-KHALIHAN AUR GARIB KISANON KI FATEHALI KO YE KALAKAR APNE CANVAS PAR KYUN NAHI UKERTA….? KYA SIRF MAHILAON KI TASWIR BANANA HI INKA NAYA PESHA HAI…?

    AUR BHI BAHUT SE MUDDE HAI JO DESHHIT ME JANTA TAK MEDIA KO PAHUCHANA CHAHIYE…

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