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हुसैन और तसलीमा एक दूसरे के साथ क्‍यों नहीं हैं?

4 March 2010 45 Comments

♦ शशि भूषण

MF Husain, Taslima Nasreenलोगों के तस्लीमा प्रेम को भी समझा जाना चाहिए। यह बहुत जरूरी है। तस्लीमा लज्जा की लेखिका हैं। इस उपन्यास को भारत में फैलाने का श्रेय पांचजन्य को है। इसका मतलब यह नहीं कि पांचजन्य कोई सेक्युलर अप्रोच का पत्र था या है। इसके बारे में सब जानते ही हैं। इसने लज्जा को अगर धारावाहिक रूप में छापा तो मकसद यह था कि भारत के लोगो, देखो हिंदू कैसे त्रस्त हैं। जबसे तस्लीमा ने लज्जा लिखा है वे भारतीय दक्षिणपंथियों की विशेष प्रिय रही हैं। क्योंकि इसका वे इस्तेमाल कर सकते हैं। चूंकि तस्लीमा के समूचे काम में चरमपंथ, सांप्रदायिकता का घोर विरोध है, इसलिए वह वामपंथियों को भी प्रिय हैं। पर दिलचस्प यह है कि जब दक्षिणपंथी, वामपंथियों की कोई मुखर बौद्धिक आलोचना करना चाहते हैं तो तस्लीमा उन्हें बहुत सहायक होती हैं। इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि फिदा हुसैन के विरोधी तस्लीमा के प्रबल समर्थक हैं, छद्म प्रगतिशीलता से बड़े चिंतित हैं। अंशुमाली रस्तोगी की पूरी चिंता में यह देखा जाना चाहिए कि वे प्रगतिशीलों को बड़ा भोला समझते हैं। जैसे जो प्रगतिशील हैं, उन्हें पता ही नहीं कि कला का क्या मूल्य है? जैसे प्रगतिशीलता भी डिग्रियों की भांति कोदौ देकर मिलती है। जैसे प्रगतिशील यह भांप ही नहीं सकते कि उनकी पालिटिक्स क्या है?

प्रसिद्ध चित्रकार प्रभु जोशी से हुई बातचीत में उनकी एक बात यहां उद्धृत करना बेहद जरूरी लग रहा है। उन्होंने कहा कि हुसैन बड़े चित्रकार हैं। वे रजा से इस मायने में बड़े हैं कि रजा ने बड़ा काम किया है, पर हुसैन ने बड़ी कृतियां दी हैं। काम और कृति का फर्क जोशी जी से बात करके ही बेहतर समझा जा सकता है। उन्होंने आगे कहा कि हुसैन का प्रगतिशीलता या कम्युनिज्म से कोई संबंध नहीं रहा है। वे सफल चित्रकार हैं। अन्य जगहों पर भी तस्लीमा और हुसैन को साथ होना था पर ऐसा इसलिए नहीं हो सका क्‍योंकि तस्लीमा हुसैन का पक्ष लेकर हिंदुओं को नाराज नहीं करना चाहेंगी और हुसैन तस्लीमा का पक्ष लेकर मुसलमानों को नाराज नहीं करना चाहेंगे। इसी बिंदु पर ये परस्पर दूर हैं।

अब यहीं से यह सवाल उठता है कि वाकई ये दोनों एक दूसरे के साथ क्यों नही हैं? इस पर भी बहस होनी चाहिए।

shashibhushan image(शशिभूषण। कवि-कथाकार। आकाशवाणी रीवा में क़रीब चार साल तक आकस्मिक उदघोषक रहे। बाद में यूजीसी की रिसर्च फेलोशिप भी मिली। फ़िलहाल चेन्नई रीजन के एक केंद्रीय विद्यालय में हिंदी की अध्यापकी। gshashibhooshan@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

45 Comments »

  • शुक्रिया said:

    शुक्रिया यह दिखलाने के लिये कि किसी भी लेखक की समग्र मेहनत की ऐसी-तेसी एक झटके में कैसे फेरी जा सकती है. तो तस्लीमा का गुनाह यह है कि उन्हें पांचजन्य ने छाप डाला? अब आप यह भी कह डालिये कि लिखा भी उन्होंने पांचजन्य की शह पाकर ही था. जरूर से उस समय रहे संघ प्रमुख की तस्लीमा के साथ गुप्त मंत्रणा हुई होगी जिस पर तस्लीमा ने लिख डाला.

    अगर लज्जा और तस्लीमा की बाकी कृतियां आपने पढ़ीं हो तो बेशक आपको वहां के अल्पसंख्यकों से इतर भी कुछ ऐसे समूह मिल जायेंगे (या औरतें भी अल्पसंख्यक होती हैं?) जिनके बारे में बात तस्लीमा ने की, और अल्पसंख्यकों से ज्यादा ही की है.

    लेकिन आप तो तस्लीमा को दक्षिण मार्गी कहकर खारिज करने को इतने आतुर दिख रहे हैं कि इस पूरे लेख में उस मुद्दे को इग्नोर कर दिया. आप बार-बार भूल जाते हैं कि तस्लीमा न हिन्दू हैं, और न हिन्दूवादियों के लिये सहानुभूति रखती हैं. अगर हिन्दुओं कि कुछ संस्थाओं ने उनके लिखे को छापा तो मौकापरस्ती उनकी है न कि तस्लीमा की.

    हुसैन और तस्लीमा में समानताओं से ज्यादा विषमतायें है़. हुसैन एक कामर्शियल आर्ट प्रोड्युसर है और तस्लीमा एक रिव्योल्युशनरी. क्रांतिकारियों को धंधेबाजों के साथ तोलना ही हिमाकत है. यह आप क्यों नहीं समझते?

    आपने यह भी लिखा है कि तस्लीमा हिन्दुओं को नाराज़ नहीं करना चाहतीं? ऐसा आपने सोचा है या तस्लीमा ने आपको बताया था? कयास भी लगाते हैं तो ढंग से लगाइये. अगर तस्लीमा हिन्दुओं को खुश करने को इतनी ही आतुर होतीं तो बंगाल की जगह मध्यप्रदेश या गुजरात तो अपना घर बनाने की कोशिश करतीं. और गुजरात सरकार तो ने उन्हें निमंत्रण भी दिया था.

    आपके इस लेख में फिर मुझे नासमझी के बजाय एक खास एजेंडा दिख रहा है. क्यों न कभी आप दिल से भी लिखें, क्योंकि इसमें यह भी दिख रहा है कि जो आप समझा रहे हैं उससे आप् खुद भी convinced नहीं हैं.

  • R.K.Dhakad said:

    Aapke ghar par sirf पांचजन्य aata hoga isliye aapko aisa laga hoga, Shashi ji.

  • एकलव्य said:

    शशि जी, अगर आपका यही लेख उठा कर प्लेबाय वाले छाप दे तो फिर आपके ही हिसाब से आपका साहित्यिक कैरियर तो ख़त्म ही समझिए। उसके थोड़े दिन बाद कोई अगर यह मानना शुरु कर दे कि आप तो पोर्न-प्रेमियों के लिए ही बने थे और यह आपकी कोई मजबूरी या अन्जानता नहीं बल्कि राजनीति थी तो आप किस तर्क से उसका विरोध करेंगे ?
    और प्रभुसाहब की कला की समझ और संघर्ष का तो आपको ही पता होगा, संस्कृतनुमा हिंदी में घिनौने और कुत्सित भाव से राजेंद्र यादव पर लिखे एक-दो प्रवचन बांचने का सौभाग्य हमको भी प्राप्त हुआ है। उपसंहार यही निकल रहा है कि वहां शेर पर सवार होकर स्त्री-जागरन चल रहा है तो दूसरी जगहों पर मुंह पर स्याह परदा डालकर आज़ादी-ए-औरत लाने की कवायद शुरु हो गयी है। जो कि एक ही सिक्के, कट्टरपंथ के दो पहलू हैं। जिसमें ज़ाहिर है कि तसलीमा की जगह कहीं भी नहीं है। तसलीमा और हुसैन हो न हो, उक्त दोनों नेचुरल एलाय तो साथ हो ही गए।
    धन्य है मोहल्ला का यह हृदय परिवर्तन और अ-अराजकता।

  • शशिभूषण said:

    मैं यह नहीं कह रहा कि तस्लीमा नसरीन दक्षिणपंथी हैं.मैं उनका साहसी सांप्रदायिकता विरोधी तथा स्त्री अधिकारों की मुखर लेखिका के रूप में सम्मान करता हूँ.
    मैंने उनको काफ़ी पढ़ा है.कोई चाहे तो तस्लीमा की लेखकीय सीमाओं पर भी बात करने मे मुझे परहेज नहीं.
    मेरे कहने का मतलब यह भी न निकाला जाए कि पांचजन्य में छपने से लज्जा कलुषित हो गया.पर यदि भारत में हिंदू चरमपंथी उन्हें थोड़ा बहुत बर्दाश्त कर लेते हैं तो इसके मूल में यह किताब है इसमें संदेह नहीं.इससे मुह चुराने की ज़रूरत नहीं.
    मैं सिर्फ़ यह समझना चाहता हूँ कि कैसे एक कलाकार(हुसैन)को हिंदू चरमपंथ बर्दाश्त नहीं कर सकता और दूसरे लेखक(तस्लीमा)को मुस्लिम चरमपंथ बर्दाश्त नहीं कर पा रहा.दोनों ही चरमपंथ के निशाने पर हैं.निर्वासन झेल रहे हैं पर एक दूसरे के सहयोगी नहीं हैं बल्कि परस्पर दूरी रखते हैं.
    आप कल्पना कीजिए इस पूरे प्रसंग में अगर चरमपंथ जीत जाए तो हम तो हुसैन और तस्लीमा दोनो को ही नहीं बचा पाएँगे.
    मेरी चिंता यह है कि कैसे चरमपंथ आश्रयखोजी कलाकारों को एक दूसरे से दूर करके सज़ा देता है.
    हो सके तो चरमपंथ के खिलाफ़ नारेबाज़ी से हटकर दूरगामी सोच बनाने में मेरी मदद कीजिए.क्योंकि मुझे लगता है इसी से कला और लेखन बचाए जा सकेंगे.
    प्रभु जोषी बड़े लेखक और चित्रकार हैं.अपनी जगह बनाने के लिए उन्हें राजेन्द्र यादव जी का विरोध करने की ज़रूरत कभी नहीं रही.बहुत पहले कला संपादक के रूप में वे हंस को अपना योगदान दे चुके हैं.
    जिस भी विधा में काम किया है उसे ऊँचाई तक ले गए हैं.रेडियो प्रोग्राम प्रोडक्शन हो या फिल्म निर्माण
    उनकी कृतियाँ दस्तावेज़ हैं.राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की सूची रखने की यह जगह नहीं.कहानी पढ़ने मे रुचि हो तो कभी पितृऋण खोजकर पढ़ें.मैं इस बात को साधिकार कह सकता हूँ कि हिंदी कहानी कितना ही आगे निकल आई हो पर भाषा के मामले में उनकी कहानियों के सामने विनत होगी.
    एक निवेदन और मेरी बातों को घोषणा या फतवा न समझा जाए.

  • अरविंद शेष said:

    शशिभूषण जी की बातों से पूरी सहमति। कुछ लोगों को अपना सिर नोचने के बजाय शशिभूषण जी की बातों पर गौर करना चाहिए।

  • एकलव्य said:

    हम आपकी परेशानी समझ गए, रविंद जी। अपना दुख शेयर करने के लिए धन्यवाद। निश्चिंत रहें, आगे से ऐसी परेशानी नहीं आएगी।

  • अरविंद शेष said:

    एकलव्य जी,आप अपनी एकलव्यता से परेशान न हों। द्रोणाचार्यों का दिन जा चुका है। कम से कम यहां इस खोल को ओढ़े रखने का कोई मतलब नहीं बन रहा। वैसे भी, खोल का लंबे समय तक बने रहना कई तरह के प्रदूषण पैदा करता है।

    और हां, परेशानी तो एक चुनौती के रूप में मेरे जीवन का शौक है। आएगी तो वाह-वाह, नहीं आएगी तो वाह-वाह…।

    नहीं आएगी तो एक काम और करूंगा…। आपको मिठाई खिलाऊंगा…। खाने आएंगे न…। अपनी एकलव्यता से बिना घबराए आइएगा। यहां की दुनिया का आंगन बहुत बड़ा है। पूरे भरोसे के साथ कह रहा हूं। बहुत कुछ शेयर करूंगा। बस शेयर करना सिखा दीजिएगा…।

    वैसे तो अरविंद, लेकिन आपका
    रविंद…

  • एन. नंदा said:

    शशि भूषण भाई कठमुल्लों की एक और कौम है और वह हिन्दु या मुस्लिम नहीं वामपंथियों की है। आप जैसे वामपंथी कठमुल्ले पहले ही अपने निष्कर्ष पर पहुच जाते हैं फिर लेख लिखते हैं। दुनिया में किसी भी तरह के कठमुल्लों को शांति नहीं मिली और आप लोग भी इसी घिसी घिसाई लीक से अलग हट कर लिख ही नहीं सकते।

  • एकलव्य said:

    भई मिठाई हमें पसंद तो नहीं पर मिलने ज़रुर आएंगे। आप चाहेंगे तो खोल के पास खोल आएगा नहीं तो असल के पास असल आएगा।

  • रंगनाथ सिंह said:

    शशि जी आपने उन लोगों के बारे में कुछ नहीं कहा जो हुसैन के भी समर्थक हैं और तसलीमा के भी समर्थक हैं ? आपने न जाने कैसे तय कर लिया कि तसलीम के समर्थक वही लोग हैं जो हुसैन के विरोधी हैं !! इसे जरूर स्पष्ट करें।

    तसलीमा ने बार-बार स्पष्ट किया है कि वो सभी धर्मों में समानरूप से अनास्था रखती हैं वो सभी तरह की कट्टरताओं के खिलाफ हैं। उनका स्टैण्ड सदैव एक प्रगतिशील नारीवादी-मानवतावादी का रहा है।
    मेरे घर या उसके आस-पास भी पांचजन्य नहीं आता था। न ही उस वक्त मेरी वय ऐसी थी कि ऐसी चीजें पढ़-समझ सकूं। मैंने कथादेश के एक विशेषांक के संपादक से बातचीत की। यह पूछने के लिए कि पांचजन्य में क्या छपता था ? उन्होंने बताया कि पांचजन्य ने लज्जा तो बहुत शौक से छापा लेकिन तसलीमा का इस आशय का बयान आया कि यदि वह भारत में होती और हिन्दु होती तो निश्चय उसके निशाने पर विहिप और संघ जैसे चरमपंथी संगठन होते तो पांचजन्य ने उसे छापने से मना कर दिया था !!

    जब तसलीमा को दोबारा देश निकाला दिया जा रहा था तो उस गाढ़े वक्त में भी हिन्दु चरमपंथयों के निमंत्रण को ठुकरा दिया था। मैंने पहले भी पूछा था कि तसलीमा ने हिन्दु चरमपंथियों के पक्ष में कभी कोई बयान दिया है तो उसे सामने लाया जाय। यदि तसलीमा ने इस्लाम की विशेषकर कोई बुराई की हो तो उसे भी सामने लाया जाय।

    तसलीमा के लेखन को लज्जा तक सीमित कर देना भी एक बौद्धिक अपराध है। तसलीमा की श्रेष्ठ रचना उनकी आत्मकथा मानी जाती है। आपने तसलीमा को काफी पढ़ा है तो उसकी लेखकीय सीमाओं पर जरूर बात करें। हो सके तो लेखकीय सीमाओं से उठ चुके साहित्यकारों की एक सूची भी दें। जिससे पाठकों को आपकी बात समझने में सुविधा हो।

    आपने अपने लेख में काम और कृति के बीच किसी गूढ़ अंतर की बात की है जिसे समझने के लिए प्रभु जोशी से बात करनी होगी !! लेख आपका बात हमें प्रभु जोशी से करनी होगी ?

  • रंगनाथ सिंह said:

    शशि जी आपने कहा है कि तसलीमा को मुस्लिम कट्टरपंथ बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है और हुसैन को हिन्दु कट्टरपंथ !!

    इस आधे झूठ और आधे सच का मोहल्लालाइव पर कब तक प्रचार होता रहेगा ? क्या गोएबल्स थ्योरी को सही साबित करने के लिए कमर कस ली गई है क्या ?

    मुझे तो लगता है कि हुसैन को हिन्दु चरमपंथी नहीं बर्दाश्त कर पा रहे हैं यह बात आपने सही कही है। लेकिन तसलीमा को ?? मुस्लिम चरमपंथी,पश्चिम बंगाल सरकार, बांग्लादेश सरकार,भारत सरकार ये सभी नहीं बर्दाश्त कर पा रही हैं !! चरमपंथयों और सरकार में कोई फर्क है कि नहीं ? इस पैरे में यह जोड़ना भी जरूरी है कि तसलीमा की रक्षा मार्क्सवादी भी नहीं कर पाए !! तसलीमा ने भाजपाईटों के निमंत्रण को भी ठुकरा दिया था !!

    गुण्डा-समूहों द्वारा किए गए विरोधों का इतिहास काफी रहा है। इसी देश में प्रेमचंद की रचनाएं जलाए जा चुकी हैं। लेकिन सत्ताधारी सरकारों द्वारा बेदखल किए गए लेखकों का इतिहास अलग रहा है। इन दोनों बातों में फर्क है। बड़ा फर्क है। ऐसा नहीं है कि मुक्तिबोध को अपने विचारो के लिए कोई विरोध नहीं सहना पड़ता था लेकिन जब उनकी किताब का मध्य प्रदेश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया तो उन्हें प्राणहंता सदमा लगा था।

    सरकार का कदम उस देश के बहुसंख्यक का मत माना जाता है। किसी कट्टरपंथी विचारधारा के पक्ष में जब सरकारें खड़ी हो जाएं तो यह कहना ही सही होगा समझो वो सरकारंे कट्टरपंथी हो गयी है !!!

  • रंगनाथ सिंह said:

    तसलीमा ने हर तरह की कट्टरता,दोगलेपन और पाखण्ड की खुल मुखालफत की है। क्या कोई मुझे बताएगा कि हुसैन ने ऐसा किस बयान या चित्र श्रृंखला में ऐसी कोई कोशिश की है ?

    हुसैन हिन्दु वैष्णव दर्शन में डूबे हुए व्यक्ति हैं। इस्लामी प्रैक्टिस पर अमल करते हैं। हुसैन का दर्शन बीसवीं सदी का सबसे पाप्युलर धर्म-दर्शनों में प्रमुख है। बीसवी सदी में व्यापक रूप दार्शनिक स्तर पर यह मत प्रबल हुआ कि व्यक्ति को अमल अपने जन्मना रिचुअल पर करना चाहिए और दार्शनिक प्रेरणा और समर्थन सभी धर्मों से लेनी चाहिए। क्योंकि सभी धर्म अपने मूलाअर्थ में समान होते हैं। हिन्दुओं मंे गांधीजी ,विवेकानन्द इसके उदाहरण है। दार्शनिकों में विलियम जेम्स,रूडोल्फ ओट्टो और मर्सिया इलियाडे इस दर्शन के सबसे बड़े प्रवक्ता थे।

    हुसैन ने आज तक कभी भी हिन्दु धर्म के खिलाफ कुछ नहीं कहा। हुसैन के बयानों से जाहिर होता है कि उन्हें जितनी समझ और कदर हिन्दु वैष्णव दर्शन की है उतनी शिवसेना हेड और संघ के टेल को भी नहीं होगी। हुसैन के चित्रों की मूर्ख व्याख्या करने वालों से ज्यादा हिन्दु हुसैन हैं। हुसैन ने लोहिया के कहने पर चित्र-श्रृंखला बनायी थी। लोहिया का दर्शन क्या था ? मुझे उम्मीद है खुद का मार्क्सवादी,वामपंथी या प्रबुद्ध समझने वालों को समझाने की कोई जरूरत नहीं है।

    हुसैन के उलट तसलीमा बीसवीं सदी के उस सबसे प्रभावशाली दर्शन के निकट हैं जो धर्म को कंधो पर पड़ा जुआ समझता है। तसलीमा महिलाओं के लिए उन अधिकारों के लिए लड़ रही हैं जिसको देने के लिए कोई यथास्थितिवादी-पश्चगामी व्यवस्था/दर्शन तैयार नहीं हैं।

    खुद को किसी विशिष्ट प्रजाती का प्रगतिशील समझने वाले लोगों को चरित्र प्रमाणपत्र बांटना बंद करके हुसैन और तसलीमा का वैचारिक मूल्यांकन करें। प्रमाणपत्र वो बाद में भी बांट सकते हैं। मेरी प्रगतिशीलता सबसे सफेद जैसे विज्ञापानी नारे लगाने से कुछ स्थापित नही होता है। अपने पक्ष में तथ्य और तर्क रखें।

    मुझे हुसैन के उन बयानों-चित्रों की प्रस्तुती का इंतजार रहेगा जो किसी भी प्रकार के सामाजिक अन्याय,भ्रष्टाचार,फासीवाद,गैर-बराबरी,दमनकारी पूंजीवाद या पैशाचिक कारपोरेट के खिलाफ है।

  • रंगनाथ सिंह said:

    बीस लाख डालर की एक पंेटिंग बेचने वाले हजारों चित्र बना चुके, अपने देश-काल से गाफिल विशुद्ध कला में डूबे और रंगो-रेखाओं में की पूँछ पकड़कर सार्वकालिक अमरत कृतियों के माध्यम से अमरता का अमृत चखने मंे लगे बुर्जूग चित्रकार के पक्ष में मैं सिर्फ इसलिए हूं कि उन्हें अपने मनमर्जी चित्र बनाने का पूरा अधिकार है। जिस देश में जन्मे उसी में रहकर बनाने का अधिकार है। अपनी कला को उसके चरम तक पुष्पित-पल्लवित करने का प्रयास करने का उन्हें पूरा अधिकार है। ये सारे अधिकार उन्हंे कोई खैरात में नहीं दे रहा है। इन अधिकारों को उन्हें देने का वादा उस देश के संविधान में किया गया है जिसमें उनका जन्म हुआ है। ये सारे अधिकार एक नागरिक के तौर पर उसके जन्मसिद्ध अधिकार है। उन्हें कोई भी गुण्डा-समूह इन अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता। यदि करता है तो यह उस देश की सत्ता संभालने वाली सरकार के लिए शर्म की बात है।

    लेकिन यत्र-तत्र-सर्वत्र जिस तरह से हुसैन के पक्ष में सैद्धांतिकियां गढ़ी-मढ़ी जा रही हैं। उनका अंध-समर्थन संभव नहीं है। हुसैन एवं उन जैसों को सबसे लम्बे बांस पर टांग उठाने के लिए अशोक वाजपेयी जी जैसे लोग पहले ही बहुत हैं। हुसैन के ऊपर कई हजारों की किताब अंग्रेजी में लिखकर हर हिन्दी अखबार में उसकी समीक्षा या अंश छपवाने वाले पहले ही मौजूद हैं। अजीब बात है कि पहले से इतनी भीड़ होने के बावजूद कई लोग उस कलापारखी-यों की पुरानी महालम्बी सूची को और महालम्बा करने हेतु अपना नाम आगे करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।

    यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि बुद्धिजीवी/लेखक कोई राजनेता या संगठन प्रमुख नहीं होता जिसे अपने तात्कालिक लाभ-अलाभ या सत्ता में बने रहने के अनुसार अपना स्टैण्ड बनाना होता है !!

  • रंगनाथ सिंह said:

    http://mohallalive.com/2010/02/27/shashi-bhushan-writeup-on-mf-husain-citizenship/

    हुसैन मामले पर मोहल्ला के इस लिंक पर उपलब्ध शशि जी के लेख को इस लेख के साथ ही पोस्ट किया जाता तो पाठकों को उनका स्टैण्ड समझने मंे ज्यादा सुविधा होती। मुझे उम्मीद है कम से कम अरविंद जी ने तो उस लेख के प्रकाश में ही इस लेख से अपनी सहमति जताई होगी…

  • शशिभूषण said:

    रंगनाथ जी,
    आप अच्छी तरह जानते हैं कि मेरी उपरोक्त बातें अपने मूल रूप में एक टिप्पणी की शक्ल में थी.अब इतने कम शब्दों में जो-जो कहा जा सकता था वही मैं कह पाया हूँ.अभी भाषा तकनीकि रूप से इतनी समर्थ नहीं हुई है कि वह कम्प्यूटर के साफ्टवेयर की तरह फाइलों को अपने भीतर समेट पाए.किसी ज़माने में भक्त पाठक एक एक लाईन की महीनों व्याख्या करते थे वैसा ज़माना अब रहा नहीं.यहाँ तो यही डर बराबर बना रहता है कि शालीनता से बात करने के दौरान ही किसी ने अब धोती खींची कि तब.आप अच्छी तरह जानते हैं कि यहाँ कुछ लोग मजे के लिए पत्थर मार-मारकर दुर..दुर..हो..हो..करते हैं.बीच बीच में हाँक लगाते रहते हैं कौन है हो?…कहाँ से आया है….फिर सवाल-जवाब का शिल्प गंभीर बात रखने के लिए उपयुक्त भी नहीं माना गया है.इसलिए मुझे घेर घेरकर भाग खड़े होने को मजबूर न करें.और ये उद्धरण बहुत खतरनाक होते हैं.ज्यादातर मूर्ख अध्यापकों से परीक्षा में नं.लेने के लिए घोटे जाते हैं और उम्रभर छाती पर सवार रहते हैं.अच्छी खासी समझ को भी बोझिल बना देते हैं.हो सके तो इनसे बचाइए खुद को.जाने कौन कौन से नामों से मेमोरी फुल कर रखी है.
    आपने कहा है-तसलीमा के लेखन को लज्जा तक सीमित कर देना भी एक बौद्धिक अपराध है। तसलीमा की श्रेष्ठ रचना उनकी आत्मकथा मानी जाती है। आपने तसलीमा को काफी पढ़ा है तो उसकी लेखकीय सीमाओं पर जरूर बात करें। हो सके तो लेखकीय सीमाओं से उठ चुके साहित्यकारों की एक सूची भी दें। जिससे पाठकों को आपकी बात समझने में सुविधा हो।
    मैं अगर तस्लीमा के लेखन को सचमुच लज्जा तक सीमित कर रहा हूँ तो मुझे सज़ा दीजिए.मैं भी इसे अपराध मानता हूँ.रही बात आत्मकथा की तो एक मज़ेदार घटना सुनिए.मैं नागपुर रेलवे स्टेशन पर एक बुक स्टाल के सामने खड़ा था.किसी लड़की ने आकर पूछा क्या कोई आत्मकथा भी मिलेगी?दुकान की मालकिन स्त्री ही थी उसने हँसकर कहा आत्मकथाओं की क्या कमी है अभी देती हूँ.और कई आत्मकथाएँ सामने रख दीं.मुझे उसकी यह टिप्पणी बड़ी मार्के की लगी.बाद में मैंने उससे पूछा क्या आजकल आत्मकथाएँ ज्यादा रखती हैं.उसने कहा रखनी पड़ती है.आजकल तो लेखक भी पहले आत्मकथा लिखकर लेखक बन जाते हैं फिर और कुछ लिखते है.
    रंगनाथ जी अगर आपने भी आत्मकथा को किसी के लेखकीय मूल्यांकन का आधार बना लिया हो तो ज़रा इस दुकानदार स्त्री की बातों पर गौर कीजिएगा.हाँ सचमुच ऐसे लेखकों की सूची सभी लेखकों के नामवाली सूची होगी जिसमें सीमाओ की बात की गई हो.
    बाकी कभी विस्तार से बाते होंगी.
    और हाँ अरविंद शेष जी पर भी संदेह की गुंजाइश कहाँ रह गई?वे तो भरोसेमंद लेखक हैं.क्या उन्हें मुझसे सहमति के लिए भी कोई आमराय बनानी चाहिए थी?

  • रंगनाथ सिंह said:

    शशि जी, अरविंद शेष से जो कहा है उसका जवाब उन्हें देने दीजिए। अरविंद जवाब देने या चुप रह जाने के लिए पर्याप्त बौद्धिक हैं। आप को मेरे लिखे को कुपाठ करने से बचना चाहिए। क्योंकि हम दोनों के लिखे यहीं उपलब्ध हैं। किसने क्या लिखा हैै यह देखा जा सकता है। मैंने कब कहा कि अरविंद जी को आपसे सहमति जताने के लिए आमराय बनानी होगी ???? फिर से पढ़िए। आपसे सहमति जताने वाले लोगों से यह उम्मीद करना उचित ही है की एक ही मुद्दे पर आपकी दोनों लेखों को एक साथ पढ़ना आपके स्टैण्ड को समझने के लिए ज्यादा मददगार होगा।

  • रंगनाथ सिंह said:

    शशि जी, आपने कहा है कि

    “रंगनाथ जी अगर आपने भी आत्मकथा को किसी के लेखकीय मूल्यांकन का आधार बना लिया हो तो ज़रा इस दुकानदार स्त्री की बातों पर गौर कीजिएगा”

    मुझे डर है कि आप हिन्दी के उन टिपीकल लोगों में से न हों जिनके पास हर बात का जवाब कोई निजी किस्सा होता है। मैं उस महिला दुकानदार की बातों पर क्या गौर करूँ ? आप जितनी साहित्यिक समझ की उससे मुझे उम्मीद भी नहीं है। मैं तो आपको बातों पर गौर करके सोच रहा हूँ आपने उससे रूसो,गांधी या मार्खेज वगैरह की आत्मकथा नहीं मांगी !!

    शशि जी, आपने न जाने क्यों बलिदानी मुद्रा अपना ली है। आपको कौन घेर रहा है भाई ?
    अविनाश जी की और अरविंद जी की सहमति आपके साथ है। चरमपंथी लोगों ने मुझसे कभी कोई विशेष सहमति नहीं जताई है। चाहें तो मोहल्लालाइव का गोदाम देख लें। वो जानते हैं कि मुझसे तात्कालिक लाभ के लिए सहमति जताना उन्हें भारी पड़ सकता है।

    यहां एक स्टैण्ड चरमपंथियों का है,दूसरा मोहल्लालाइव का। मैं सिर्फ यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि यहां एक तीसरा पक्ष भी है। जिसे नकारने की पूरी कोशिश शेष दोनों पक्ष कर रहे हैं।

    आपने घेरने-घारने की बात अज्ञात लोगों के लिए की है तो मैं आपको एक तथ्यात्मक बातें कह दूं। किसी भी बहस में हर लेखक जाहिर तौर पर किसी एक पक्ष में होता है। यानि वह बहुत से लोगों के विपक्ष में होता है। मेरे लिए भी यही सही है। मैं तंज के बनारसी अंदाज में लिखता हूं यह भी जगजाहिर है। जिनके खिलाफ लिखता हूं उनको चुभता ही होगा। लेकिन, आज तक अपवाद छोड़ दिए जाएं तो मुझे कभी भी किसी अज्ञात की अश्लीलता-स्तरहीनता-चरित्रहनन का सामना नहीं करना पड़ा है। यदि किसी ने तात्कालिक तौर पर अज्ञात बनकर अपवाद स्परूप कुछ कह भी दिया हो तो भी ऐसा एक बार के बाद उसी व्यक्ति ने दुबारा ऐसा नहीं किया।

    इसके पहले भी अविनाश ने जब कुंठासुर नामक शब्द प्रस्तुत किया और उनके पक्ष-विपक्ष में बहस रखी थी तो मैं अज्ञात लोगों के पक्ष में खड़ा था। मेरा भरोसा उन पर आज भी है। हमारे देश में लोकतंत्र की जो स्थिति है उसे देखते हुए मुझे नहीं लगता कि आने वाले कुछ व-र-शों में उच्च-आदर्शों के कठदलील देकर मैं ऐसे लोगो का विरोध कर पाऊँगा।

  • अरविंद शेष said:

    मैंने अपने एक मित्र के हवाले से इस घटना का ज़िक्र किया था-

    “बिहार से होली की छुट्टी में चार दिनों के लिए दिल्ली आये एक दोस्त ने एक घटना का ब्योरा दिया, जो इस प्रकार है – बिहार के सिवान जिले में एक जगह एक दबंग सवर्ण जाति के बारात में नाच-गाने का कार्यक्रम चल रहा था। वहां पड़ी खाली कुर्सियों पर सबसे पीछे की कुर्सी पर एक छोटा बच्चा बैठ कर नाच-गाना देखने लगा। घर वाले एक व्यक्ति ने बच्चे से नाम पूछा। उसके नाम से पता चला कि वह एक दलित जाति का बच्चा था। पूछने वाले व्यक्ति ने सीधे रिवॉल्वर निकाला और उसके सीने में दाग दिया। कुर्सी पर बैठने के एवज उस दलित जाति के बच्चे अपनी जान गंवानी पड़ी।

    इस तरह की स्थितियों पर शर्मिंदा होने के बजाय अगर हम हुसैन के कुछ चित्रों से दुखी और प्रताड़ित महसूस करते हैं, तो शायद हम इसी लायक हैं।”

    इसके बाद रंगनाथ सिंह ने यह कहा-

    “देश के एक कोने में जब एक दलित का बच्चे को कुर्सी पर बैठने के लिए गोली मारा जा रहा था तो उसी वक्त उस बच्चे की चिंता में गले जा रहे जुझारू युवा पत्रकार अपनी कलम से किसी लेखिका को गिराने और एक अरबपति चित्रकार को उठाने का काम कर रहे थे। हालांकि उनका दावा था कि वो उस बच्चे की चिंता में दूसरे सभी लेखकों से ज्यादा दुबले हुए हैं।”

    रंगनाथ सिंह की इस टिप्पणी के बाद क्या मुझे उनकी किसी भी बात का जवाब देना चाहिए?
    इस कसौटी पर क्या-क्या औऱ किसको-किसको रखेंगे? किनका दैनिक इतिहास और वर्तमान हमारे सामने सचित्र और सचल सबूत के रूप में हमारी थाली में मौजूद है? और इसके बाद हम जिनकी भक्ति में दुबले हुए जा रहे हैं, वे कहां होंगे? खैर, मैं फिर कहना चाहता हूं कि मुझे भक्ति में लीन और बौद्धिक दंभ के भार से दबे जा रहे रंगनाथ सिंह के किसी सवाल का जवाब देना जरूरी नहीं लगता।

    बाकी किसी चीज का पाठ, सुपाठ और कुपाठ क्या और कैसे होगा, अगर यह तय करने का हक सिर्फ कुछ “महंथों” के हाथ में अधिकृत तौर पर सुरक्षित है, तो और क्या कहना। शशिभूषण, अरविंद शेष या कोई भी व्यक्ति अगर इन “महंथों” से इत्तेफाक (उनके बनाए गए फार्मूलों पर आधारित आम राय) नहीं रखेगा, तो “महंथ” जी का नाराज होना, स्वाभाविक है।

  • रंगनाथ सिंह said:

    शशि जी, पहले आपके भरोसेमंद लेखक अरविंद शेष ने और अब आप ने मेरे व्यक्तिगत चरित्र और क्षमता को लेकर टिका-टिप्पणी की है। अरविंद जी मेरे चारित्रिक दोषों को तवज्जो दी तो आपने एक कदम आगे बढ़ते हुए किसी स्कूल-मास्टर की तरह व्यक्तित्व और ज्ञान के विकास के तरीके बताएं हैं। न जाने आपसे किसने कह दिया कि गंभीर बातों के लिए सवाल-जवाब का शिल्प उपयुक्त नहीं माना गया है !!

    मुझे लगा कि आप एक कक्षा में बुद्ध,सुकरात,आइंसटीन वगैहर को बैठा कर सवाल-जवाब के तथाकथत शिल्प की तथाकथित अगंभीरता के बारों में छात्रों को लेक्चर दे रहें है।

    हर क्षेत्र के कुछ प्रचलित नामों के आगे नतमस्तक लोगों की यह मृदु-आम्लिक अहंकार भी क्या खूब है ?? जिन लोगों का आपने नाम नहीं सुना हो उनको मैंने पढ़ रखा है तो यह भी मेरी खराबी !! जिस क्षेत्र में ज्ञान नहीं उसे खारिज कर दो, वाह उस्ताद, वाह !! यह तो ऐसा कुछ हो गया कि गास,काची,एबेल का नाम लेने पर कोई भड़क उठे कि किनका नाम ले लिया ? आपने कहीं लिखा है कि आपने गणित से स्नातक पास किया है। घबड़ाइए नहीं, मैंने भी बीएचयू में वही किया है, पास किया है। इन लोगों का नाम मोहल्लालाइव पर वही जान सकता है जिसने गणित पास या फेल किया हो। ऐसा ही मैं दूसरों क्षेत्रो ंके बारे में भी कहुंगा। जिनमें आपने न तो पास किया है न फेल किया है। जो लोग फेल हो जाते हैं उनके पास ज्ञान नहीं होता लेकिन उनकी जबान पर नाम तो होता ही है।
    आपने सूक्तियों के शिल्प में दूसरी कई हल्की बातें की हैं। जिनका जवाब दूं तो आपको…. इसलिए इतना ही।

    हां,इस बार किसी स्टेशनी-स्टाल से खरीद कर आत्मकथा पढ़ने का मन करे तो दुकानदार से जूठन मांगिएगा। पढ़ रखी हो तो उसकी राय जानने के लिए मांगिएगा।

  • अरविंद शेष said:

    राजकिशोर जी का लेख है जनतंत्र पर, उसका आखिरी हिस्सा पढ़िए…

    वैसे इसे पूरा http://janatantra.com/2010/03/05/rakishore-article-on-taslima-nasreen/ यहां पढ़ा जा सकता है…

    “जो लेखक और बुद्धिजीवी इस्लाम की कुछ चीजों से सहमत नहीं हैं, उन्हें भी धार्मिक प्रश्नों पर तीव्र संवेदनशीलता को आंख-ओट नहीं करना चाहिए। धर्म का मामला बहुत ही नाजुक होता है और छोटी-सी बात पर भी बड़ा-सा उपद्रव खड़ा किया जा सकता है। यह सच है कि साधारण जनता सहनशील होती है और दंगा भड़काने का काम कठमुल्ले, वे चाहे जिस धर्म के हों, और राजनीतिक दल ही करते हैं। लेकिन इनकी शक्ति को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। दूसरी बात यह है कि लेखक और बुद्धिजीवी को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह अपने ही समान लेखकों और बुद्धिजीवियों की सभा में बैठा हुआ है और उनसे शास्त्रार्थ कर रहा है, जिसके दौरान कोई भी बात बेधड़क हो कर कही जा सकती है। शुद्ध तर्क तो ऐसी ही सभाओं में चल सकता है। जब आप जनसाधारण के बीच धर्म से संबंधित कुछ रेडिकल बातें कहते हैं, तो कहने की शैली ऐसी होनी चाहिए जो सोच-विचार करने के लिए लोगों को प्रेरित करे, न कि उनमें उत्तेजना पैदा करे और वे सोच-विचार का रास्ता छोड़ कर हल्ला-गुल्ला या दंगा-उपद्रव करने लगें।

    तसलीमा नसरीन अकसर पते की बात करती हैं, लेकिन बाज दफा उनकी शैली मजाक उड़ानेवाली और चिढ़ानेवाली होती है। इसका भी उन्हें अधिकार है। लेकिन अगर वे यह भुला देती हैं कि वे किस समाज को संबोधित कर रही हैं, तो उनके लेखन का असर जो भी हो, परिणाम वह नहीं हो सकता जो वे चाहती हैं। बेशक यह एक विडंबना है, लेकिन जब कोई विडंबना है, तो इसका ध्यान न रखना बुद्धिमानी की बात नहीं है। जवानी के जोश में तसलीमा ने पहले जैसा भी लिखा हो, अब वे प्रौढ़ हैं और उनका अनुभव संसार बहुत बड़ा है। अब उन्हें संयम तथा शांति से काम लेना चाहिए।”

    (राजकिशोर हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं और आप उनसे raajkishore@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

  • संजय ग्रोवर said:

    कितना हास्यास्पद है सब कुछ। जो लोग शशिभूषण और प्रभु जोशी की भक्ति कर रहे हैं वे दूसरों को भक्ति से बचने का उपदेश दे रहे हैं। जो लोग उपलब्धि के रुप में प्रभु जोशी की रेडियो अफसरी और पुरस्कार गिनाना चाहते हैं, वे रंगनाथ को उद्धरणों से बचने की सलाह दे रहे हैं। जब मन आया उसी तर्क को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लिया और जब जी चाहा उसे कुतर्क घोषित कर दिया। उन्हें सवाल-जवाब की शैली रास आएगी भी कैसे जिन्हें मनमाने ढंग से पत्र-पत्रिकाओं और रेडियो-टीवी पर प्रवचन करने की सुविधा मिलती आयी है। उन्हें नहीं दिखता कि रंगनाथ को इतनी मेहनत से किए कमेंट से कुछ नहीं मिलता सिवाय आत्म-संतुष्टि के। जबकि टीपचंद जी दस-बीस किताबों से झोल मार-मारकर अपने नामों से ‘शोध’ छपाते हैं और अफसरी और प्रतिष्ठा पाते हैं।
    बड़प्पन तो यह होता कि अरविंद तसलीमा को मिसकोट करने की अपनी ग़लती पर खेद व्यक्त करते। बच्चा भी समझ सकता है कि उन्होंने ग़लत किया है और रंगनाथ ने सही बात उठाई है। अपनी शेष प्रतिष्ठा को ख़ुद ख़राब कर रहे हैं अरविंद। इसलिए वे असली बातों का जवाब न देकर ‘सिर नोचने’ जैसे तर्क (?) दे रहे हैं। मुश्किल यह है कि अपनी आंखों पर तरह-तरह के चश्मे लगाए लोग, नंगी आंखों से दुनिया देखने वालों को समझ ही नहीं सकते। उन्हें न रंगनाथ समझ आएंगे न तसलीमा। उन्हें नहीं समझ आएगा कि कैसे हिंदुत्व के मुद्दे पर आलोक तोमर से असहमति रखने के बावजूद संजय ग्रोवर, कार्टून के मुद्दे पर उनका समर्थन कर सकते हैं। जिस दुनिया में चश्मे को ही दृष्टि मान लिया गया हो वहां बहस में ऐसे नज़ारे कोई आश्चर्य की बात नहीं। खोलों की दुकान में बैठे लोग दूसरों से खोल न खरीदने का मसखरा इसरार करते दिखेंगे ही। न समझ आने वाली भाषा से दुनिया को घुमाते आए लोग समझ में आने वाली भाषा में बात करने वालों को ‘शालीनता’ बरतने का उपदेश देंगे ही देंगे।
    मैं, संजय ग्रोवर कबीर, चार्वाक, शंबूक, करन, एकलव्य, पंचरवाला, आम आदमी इत्यादि जैसा ही एक आम आदमी, इसरार करता हूं कि पिछले सालों में मोहल्ला और दूसरी जगहों यहां तक कि पत्र-पत्रिकाओं में आने वाले सभी छद्मनामों के एड्रसों और आई पी एड्रेसों को सार्वजनिक कर दिया जाए ताकि शालीनता को नीचे से ऊपर तक हाथ डालकर ईमानदारी से जांचा जा सके। कोई शक।
    अब ज़रा इस बात पर बहस हो जाए कि हुसैन इस दुनिया में न आए होते तो दुनिया को क्या फ़र्क़ पड़ता और तसलीमा न होतीं तो क्या फ़र्क़ पड़ता ?

  • संजय ग्रोवर said:

    बुद्ध किसका मज़ाक उड़ते थे ? जीसस किसका मज़ाक उड़ाते थे ? क्या गैलीलियो विनम्र नहीं थे ? मेधा पाटकर ने किसका मज़ाक उड़ाया था जब उन्हें पीटा गया ? एक ही बात हर संदर्भ में सही नहीं होती ?
    एक हद तक राजकिशोर की बात सही है, मैं सहमत हूं। लेकिन यह यहां एक अदा के तौर ‘परफार्म’ की जा रही है। तसलीमा को ग़लत कोट करना क्या लोगों को भड़काना नहीं है ? पहले आप ख़ुद तो समझ लें फिर दूसरों को समझाएं।
    क्या मोहल्ला पर जिस तरह तसलीमा की छवि-भंग की प्रक्रिया चल रही है उसे राजकिशोर के वक्तव्य से जस्टीफाई किया जा सकता है ? आप इतने ही संवेदनशील होते तो तसलीमा का मुद्दा ही न उठाते। तब तो माना भी जा सकता था कि हां आप राजकिशोर से वाकई प्रभावित हैं। अब तो साफ दिख रहा है कि आप मतलब के लिए उनका इस्तेमाल कर रहे हैं।

  • संजय ग्रोवर said:

    आप शुरुआत तो कीजिए संतई की, हम आपके पीछे हैं। मोहल्ला पर चल रही ये सारी बहसें बंद कीजिए अगर आपको लोगों के भड़कने की इतनी चिंता है तो ! क्या राजकिशोर ने हुसैन की पेंटिंग्स से लोगों के भड़कने के बारे में भी कुछ लिखा है ? अगर नहीं लिखा तो पता नहीं क्यों नहीं लिखा !? अगर लिखा है तो पता नहीं उसका ज़िक्र आपने यहां क्यों नहीं किया !?

  • अविनाश (author) said:

    तसलीमा बीच में क्‍यों आयीं? क्‍योंकि उन्‍होंने हुसैन से दूरी का सार्वजनिक एलान किया। इसकी कोई जरूरत नहीं थी। जिस तरह तसलीमा की हुसैन के बारे में समझ है, उसी तरह तसलीमा के बारे में और लोगों की समझ हो सकती है। यह तय है कि तसलीमा को हुसैन की पेंटिंग समझ में नहीं आती है। वे हवा का रुख देख कर बात करती हैं। जनसत्ता में जो लेख छपा है, उसमें उन्‍होंने पैगंबर मोहम्‍मद के बारे में वही सब बातें कहीं हैं जिसकी वजह से कर्नाटक में हिंसा भड़की। जब भड़क गयी, तो उन्‍होंने कहा कि मैंने तो वैसा लिखा ही नहीं है। इस किस्‍म की गलतबयानी और तसलीमा का सृजन पक्ष – दोनों दो ध्रुव है। इसको समझना चाहिए। लोग समझ नहीं रहे और कहे जा रहे हैं कि मोहल्‍ला तसलीमा का अवमूल्‍यन कर रहा है। तसलीमा एक बड़ी और साहसिक लेखिका हैं, इसमें कोई शक नहीं है लेकिन वे हिंदू मन को पोषित करने वाले वक्तव्‍य देती आयी हैं, इसमें भी कोई शक नहीं है। हुसैन पर जो भी असहमत प्रतिक्रियाएं आ रही हैं – वे दरअसल भारतीय कला परंपरा को नहीं जानते। इसलिए उनकी जानकारी के लिए एक लेख हम थोड़ी देर में अपलोड करने जा रहे हैं।

  • शशिभूषण said:

    रंगनाथ जी,

    मैं आपके अध्ययन,तर्कशीलता लेखन का कायल हूँ.

    इसे अनुचित सलाह न माने तो महसूस करता हूँ कि संजय ग्रोवर जैसे कवि यश:प्रार्थी,विह्वल समर्थकों की परवाह न करते हुए आपको बाक़ायदा लेख की शक्ल में बातें लिखनी चाहिए.क्योंकि मुझे अंदाज़ा है कि आप इन टिप्पणियों को सहेज नहीं पाते होंगे.ज्यादा आत्मसंतुष्टि वक्त की बर्बादी में बदल जाती है.

    मैं आपको उपदेश क्यों देने लगा?

    पर हर बात का एक संदर्भ होता है.यह मैं सवाल जवाब शैली के बारे में कह रहा हूँ.मुझे पता है इस पूरी परंपरा का अवदान जिसका अधिकांश वाचिक है.लेकिन मैं इस ठोस स्थिति के बारे में कह रहा हूँ जिन परिस्थितियों में मैं और आप हैं.

    आपने सबका नाम लिया ओशो और जे.कृष्ण मूर्ति को क्यों छोड़ दिया.पर तब शायद धन संबंधी अपनी धारणा में हुसैन के साथ न्याय नहीं कर पाते आप.पेंटिंग बेचने संबंधी आपकी भर्त्सना कमजोर पड़ जाती.इन दोनों ने गरीबों के लिए भी अपना कोई सुख नहीं छोड़ा.

    पर उस तर्क के बारे में आप क्या कहेंगे जिसमें ज्यादा मुह पकड़ना ही होता है.जैसे कोई कहे कि सूरज पूरब में उगता है तो कोई झट टोक दे महाशय जी सूरज उगता ही नहीं है.अब यहाँ दोनों सही ही हैं पर धरातल अलग हैं.इस संबंध में आप चाहें तो कृष्णमोहन झा की कहानी शात्रार्थ भी याद कर सकते हैं.

    आप खूब पढ़िए.पढ़ने ही तो गए हैं दिल्ली.ऐसी जगह रहते हैं जहाँ का मैं टेस्ट पास करने के बाद भी अपनी किसी कमजोरी की वजह से रीवा में ही रहा आया.जिसका मुझे अब ज्यादा पछतावा होता है.पर जब साफ दो टूक बात कर सकते हों मुझे याद है आप करते भी हैं तो थ्योरी बघारने से बचिए.

    जब कोई बहुत बड़े विद्वान का नाम लेकर डराता है तो मेरी यही इच्छा होती है किसी मामूली आदमी की बात करूँ.यह मेरा तरीक़ा है.

    मैंने जूठन के अलावा अक्करमाशी और अछूत भी पढ़ी हैं.आलो आँधारि तो हमारे यहाँ ग्यारहवीं के बच्चे पढ़ रहे हैं.पर इस सबकी धौंस जमाने का क्या फायदा?

  • संजय ग्रोवर said:

    तसलीमा ने कहा कि लोग मेरी उनसे तुलना करते हैं, न किया करें। उन्होंने विस्तार से बताया कि किस तरह वे तीनों अलग-अलग डगर के राही हैं और किसने किस मकसद से क्या परेशानी उठाई और क्या समझौते किए। हुसैन के कामों का सामाजिक बदलाव से कोई लेना-देना सीधे तौर पर नहीं है। इसको जानने के लिए भारतीय कला प्रक्रिया या किसी और कला प्रक्रिया को समझने का क्या अर्थ बनता है ? क्या हमारे पास इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी है कि पेण्टिग बनाने, खरीदने. बेचने, दिखाने से कोई सामाजिक बदलाव आता है ?
    तसलीमा हिंदू मन को पोषित नहीं करती, उनकी बातों से हिंदू मन पोषित होता है। दोनों बातों में ज़मीन-आसमान का अंतर है।

  • रंगनाथ सिंह said:

    अरविंद जी, आपने उस लेख में जिस तरह से दो घटनाओं का जिक्र किया है उससे जाहिर है कि आप इन घटनाओं के माध्यम से इमोशनल एण्ड मोरल एज लेने के नाकामयाब कोशिश कर रहे थे। मैंने वह पैरा आपका सच उजागर करने के लिए ही लिखा है कि जब आप एक मित्र के हवाले उस घटना का जिक्र कर रहे थे तो ठीक उसी वक्त आप उस मुद्दे के बजाय कतर में पूरी तरह सुरक्षित और प्रसन्न-संपन्न एक अरबपति चित्रकार के लिए कागजी लडाई लड़ रहे थे। फिर आप उन लोगों से अलग कैसे हो गए ??

    पहले आप अखबार और घर शब्दों की ओट में छिप रहे थे और अब यह इमोशनल ड्रामा !!
    यदि मेरा वही पैरा आपके गले में अटका हुआ है ता मैं अविनाश जी से अनुरोध करता हूं कि वो अरविंद जी के हलक में फंसे उस पैरे को निकाल दें। जिससे पाठकों को उन प्रश्नों का जवाब मिल सके जिसे अरविंद जी अन्यान्य कारणों से स्थगित कर रखा है।

    अरविंद जी जिस तरह आप मेरा पूरा नाम बार-बार ले रहा हैं उससे जाहिर है कि आपकी मानसिक स्थिति क्या है ? आप मेरे लिए नए-नए विशेषण खोज कर ला रहे हैं। मैं सिर्फ यही कहंगा कि आप की विकृत होती जा रही भाषा मुझसे ज्यादा आपके चरित्र का उद्घाटन कर रही है।

    मेरी किसी बात का जवाब देना नहीं बन रहा है तो कम से कम शशि जी के पिछले लेख पर अपनी राय तो जाहिर कर दीजिए। जिससे मैं भी जान लूं कि हर साल विदेश जाकर बसते लाखों भारतीयों और हुसैन में बहादुर शाह जफर के ज्यादा करीब कौन है ????
    अरविंद जी अन्ततोगत्वा आपको राजकिशोर जी का ही सहारा मिलना था ! इस बहस में आपके वैचारिक संगतियों की खूब पहचान हुई। खैर,तसलीमा का सबसे बड़ा दोष यही है कि वह महिला होकर मुखर है।

  • संजय ग्रोवर said:

    रंगनाथ जी, आप हलवा खाया करें, रात को बादाम भिगोकर रख दिया करें, सुबह दूध पिया करें, घूमने जाया करें और मेरी सलाहें लिया करें। उनके जैसे –पता नहीं क्या-क्या–प्रार्थी की भी सलाहें लिया करें क्यों कि साहित्यिक-दिल्ली में रहना है और सर्व-स्वीकृत बनना है तो उनकी सलाहें ही ज़्यादा काम आएंगी। मौसम बदल रहा है, थोड़ा ध्यान रखें।
    बाक़ी बातें अलग चिट्ठी में लिखूंगा।

    :-)

  • Rangnath said:

    mera net kharab ho gya hai. MTnl ki kripa !! thik hote ho mai apna paksh rakhunga.

  • अरविंद शेष said:

    मैं तो अनायास ही आपका पूरा नाम ले रहा था रंगनाथ। (कैसा लगा केवल- रंगनाथ)।
    लेकिन आपने अपने सिंह को चरितार्थ किया है। (अपने सिंह पर बहुत ज्यादा शर्म आ रही हो तो महज पच्चीस रुपए लगेंगे इस सिंह से मुक्ति पाने में)

    आप इतने अलोकतांत्रिक और असहिष्णु हो सकते हैं, इसका अंदाजा नहीं था। और आप बात करेंगे तसलीमा और हुसेन पर, जो मूलतः इसी अलोकतंत्र और असहिष्णुता के मारे हैं।

    जब आप निजी हो रहे हैं तो मैं आपको चुनौती और न्योता देता हूं कि मेरे अपने स्तर पर किए गए काम को देखें। फिर देखता हूं कि आपकी यह रुदाली कहां ठहरती है कि मैं करोड़ों में खेलने वाले हुसेन की वकालत करते हुए किसी के लिए कागजी लड़ाई कर रहा हूं या क्या कर रहा हूं। फर्क सिर्फ यह है कि मैं अपनी प्रदर्शनी नहीं लगाता। आपकी तरह फूं-फां-फूं जैसे विद्वानों की लिस्ट नहीं गिनाता, बल्कि इसे घृणास्पद मानता हूं।

    आपकी बातों को सही कहूं तो बहुत अच्छा, लेकिन अगर राजकिशोर जी की बात सही लगी, तो वहां आप वैचारिक संगति-कुसंगति खोजेंगे। अरे रंगनाथ महोदय (सिंह कहने से सचेत स्तर पर बचूंगा), इतनी भी क्या हताशा कि अगर कोई बलात्कार के विरोध में खड़ा हो तो उसके साथ खड़ा होने पर आप मेरी वैचारिक जमीन खोजने लगें?

    और हां, अगर मैं कोई इमोशनल ड्रामा कर रहा हूं, तो आप उस पर ज़ार-ज़ार क्यों रो रहे हैं? आपके पास तो पूरी दुनिया पड़ी है, पूरी दुनिया के फूं-फां-फूं-फीं जैसे विद्वानों की फेहरिस्त पड़ी है। आप खुद को और बड़ा बनाइए न…।

    एक बात और…। तसलीमा का यह दोष नहीं, उनकी ताकत है कि वे महिला होकर भी मुखर हैं। यह आप जैसे हर बात में इमोशनल ड्रामा ढूंढ़ने वाले लथपथ लोगों की ही महानता है कि वे उनके मुखर होने को दोष के रूप में रुदाली राग दें। आप फिर कहेंगे कि आप अभिधा, लक्षणा और व्यंग्य में बोल रहे हैं। आप यही कर ही सकते हैं रंगनाथ महोदय (सिंह बोलने से सचेत स्तर पर बचना चाहता हूं)।

    आपको एक सूचना और दे दूं। मेरे हलक में कुछ नहीं फंसा है और अगर होता तो उसे निकालने के लिए किसी दूसरे की जरूरत नहीं पड़ती मुझे। अगर आपके हिसाब से कुछ फंसा है और आप उससे परेशान हैं तो संजय ग्रोवर की सलाह मानिए और वह सब करिए जो उन्होंने कहा है। वे शायद यही करते रहे हैं।

    अगर मैं कागजी लड़ाई लड़ रहा हूं तो आप यहां इंटरनेट पर बैठ कर अपना सिर क्यों नोच रहे हैं? मैं तो पाखंड रच रहा हूं, कम से कम आप तो कर्नाटक की हिंसा की रोक-थाम करने में कुछ तो भूमिका निभाते।

    (नोट- जब कोई निजी होने लगे, तो उसका मान जरूर रखना चाहिए…)

  • शर्मिन्दा said:

    अरविन्द शेष जी (देखिये, पूरा नाम ससम्मान लिया है)

    आप तो लड़ाई को व्यक्तिगत स्तर पर ले आये. वैसे आपसे अपेक्षा भी यही थी क्योंकि कोशिश आपकी शुरुआत से यही रही है कि इधर उधर के उद्धरण देकर मुद्दे से भटकाया जाये. एक तरफ तो अपने परिचय में आप लिखा है कि आप स्त्री समर्थक हैं, लेकिन तुरंत ही आप अपनी कलई खुद ही खोल देते हैं जब आप कहते हैं कि तस्लीमा स्त्री ‘होकर भी’ मुखर हैं. मतलब उनकी मुखरता आपको चाहे थोड़ी बाद में साले, लेकिन स्त्रीत्व पहले साल रहा है.

    अरविंद शेष जी (देखिये फिर से पूरा नाम ससम्मान लिया है), हुसैन प्रकरण में लिखे पिछले ही लेख से आपकी संवेदनायें किस तरफ हैं यह साफ हो चुका है. इसलिये फिर कहता हूं कि बेहतर है कि तस्लीमा को समझने की बजाय आप हुसैन की कला को समझने का दम भरें, यह ज्यादा विश्वसनीय होगा.

    इमोशनल ड्रामा कि तलाश किसे है यह तो इस बात से ही जाहिर होता है कि आपने हुसैन के बारे में लिखे लेख में बिना किसी कनेक्शन के जबरदस्ती दलित बच्चे की मौत को डाला. क्या जबर्दस्त इमोशनल सीन बनाया था आपने! एकबारगी मेरी आंखों में आंसू आ गये, और यकीनन आपके लेख से आइडेन्टिफाई करने वाले बहुत रो पड़े होंगे.

    और आखिर घूम फिर कर आप कर्नाटक में हुई मौतों पर भी आये. यह तो एक जायज सवाल है. इन मौतों की जिम्मेदारी भी तय करनी है. बाकी लोग को भूमिका निभायेंगे उसका सवाल तो बाद में उठेगा, लेकिन आप जो हुसैन और तस्लीमा दोनों के ही बारे में टोटल आथिरिटी है कम से कम इतना तो बता ही सकता है कि दंगे की दोषी तस्लीमा के साथ (जैसे की आपके लेख से जाहिर है कि तस्लीमा की पालिटिक्स के कारण ही हुआ था) क्या सलूक किया जाये.

    अरविंद शेष जी (फिर पूरा नाम, पूरे सम्मान को जोड़ के लिखा है), पहले मुझे लगता था कि आप समझदार हैं और नासमझ होने का नाटक कर रहे हैं, लेकिन अब आपकी खुद को सही साबित करने की इस बचपने भरी जिद को देखकर लगने लगा है कि बौद्धिक स्तर पर अभी आपको परिपक्व होना है और जो आपने लिखा था, शायद सच भी उसी को आप समझते होंगे.

    अरविंद शेष जी (पूर्ण सम्मान के साथ पूर्ण नाम), आप तो आपके साथ सहानुभूती ही शेष रख कर अपनी तरफ से इस बहस का पटाक्षेप कर रहा हूं.

  • अरविंद शेष said:

    शर्मिंदा (आपका तो इतना ही पूरा है, इसके बाद क्या सिंह या पूंछ लगाऊं। और इतनी बुद्धि है तो पता कीजिएगा कि या होगा कि सिंह जी का मतलब किसी जात का होना होता है, शेष को किसी हिंदू जाति-व्यवस्था में “ढूंढ़ते रह जाओगे…”) जी,

    आप तो पहले ही शर्मिंदा है। आपको क्या कहूं। शर्म और बाकी बची हो तो और हो लीजिएगा।
    तसलीमा स्त्री “होकर भी” अगर मुखर है तो आप जैसे लोगों के लिए दोषपूर्ण होगा। मेरे लिए वह एक बहादुर प्रतीक है। तसलीमा के स्त्रीत्व ने मुझे साला हो या नहीं, आपको इतना साला है कि शर्मिंदगी से मरे जा रहे हैं। पर्दे के भीतर भी शर्मिंदा…। वाह क्या बात है…

    कर्नाटक के जिक्र से छाती फटने लगी न…। इसी लेख की टिप्पणियों में से अविनाश (ऑथर) की टिप्पणी पढ़िए और एक बार फिर थोड़ा सा और शर्मिंदा हो लीजिए।

    आपने कहा-
    “इमोशनल ड्रामा कि तलाश किसे है यह तो इस बात से ही जाहिर होता है कि आपने हुसैन के बारे में लिखे लेख में बिना किसी कनेक्शन के जबरदस्ती दलित बच्चे की मौत को डाला. क्या जबर्दस्त इमोशनल सीन बनाया था आपने! एकबारगी मेरी आंखों में आंसू आ गये, और यकीनन आपके लेख से आइडेन्टिफाई करने वाले बहुत रो पड़े होंगे.”

    अब आए अपनी असली समस्या पर…। मेरे उस पूरे लेख का भी मकसद यही था शर्मिंदा जी। तसलीमा और हुसेन हमारे लिए इतने प्यारे (प्रिय) हो जाते हैं कि अपने आसपास के शर्मों से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। दुनिया भर की तमाम बहसें तभी तक जायज़ हैं जब तक समाज के कमजोर तबकों का सवाल बीच में न आए। अब आए असली चेहरे के साथ आप सब लोग।

    यही कारण है कि कोई उस बच्चे के लिए कागजी लड़ाई लड़ने की दुहाई दे रहा है तो किसी की छाती इसलिए फट रही है कि इस बहस में उस दलित बच्चे की एक सवर्ण (जाति भी बताता हूं हत्यारे की। उसकी जाति राजपूत है…।) के हाथों हत्या का प्रसंग कैसे आ गया।

    मेरे समझ को तो सचमुच मरते दम तक परिपक्व होने के दौर में चलना है। लेकिन अब जाकर गांठ खुली आप लोगों की असली बात क्या है। सारी प्रगतिशीलता की औकात यही है, शर्मिंदा साहब-साहिबा…।

    सहानुभूति शर्म से मरने वाले शर्मिंदाओं के लिए व्यक्त की जाती है शर्मिंदा साहब-साहिबा…। शेष तो हमेशा शेष रहता है, जब सब कुछ खत्म हो जाता है, तब भी कुछ न कुछ शेष बचा रह जाता है।

  • रंगनाथ सिंह said:

    अरविंद जी, राजकिशोर से आपकी आपद सहमति मुझे समझ आती है। आखिरकार उन्होने भी घुमा-फिरा कर सारा दोष तसलीमा के मत्थे मढ़ दिया है।

    मैं फिर से कहता हूं मेरे व्यक्तिगत गुण-अवगुण बाद में गिना लीजिएगा। मैं क्या हूं’ क्या नहीं हूं इसका उदघाटन इस बहस के बाद कर लीजिएगा। पहले मेरे प्रश्नों के जवाब दीजिए। जवाब नहीं दे सकते तो देते रहिए गाली। सभी जानते हैं खिसयानी बिल्ली खंभा नोचे !!

    शेष मैं पहले ही कह चुका हूं कि “आप की विकृत होती जा रही भाषा मुझसे ज्यादा आपके चरित्र का उद्घाटन कर रही है।”

    और हाँ शशि जी के पिछले लेख पर आपका कमेंट कब आएगा ??

  • रंगनाथ सिंह said:

    शशि जी फिलवक्त आप मेरा कायल होना मुल्तवी कर दीजिए। मेरे हित-अहित की चिंता को स्थगित करके आपके बयानों से जो प्रश्न उठ रहे हैं उनके जवाब दीजिए। आप एक सुर में परस्पर विरोधी बातों का जखीरा खड़ा किए जा रहे हैं। हुसैन को बहादुर शाहर जफर का दर्द समझाने के बाद आप हमें के समर्थकों का मर्म समझाने लगे।

    पहले मेरी बात काटने के लिए आपने एक किस्सा सुनाया और अब मुझे सूची दे रह हैं कि आपने कौन सी आत्मकथाएं पढ़ रखी हैं। वो भी ऐसी किताबों की सूची जो हिन्दी साहित्य जगत में अत्यधिक पाप्युलर हैं। अब मैं नीचे आपका पहले कहा दिया बयान लगा रहा हूं। पढ़ लीजिए।

    “”दुकान की मालकिन स्त्री ही थी उसने हँसकर कहा आत्मकथाओं की क्या कमी है अभी देती हूँ.और कई आत्मकथाएँ सामने रख दीं.मुझे उसकी यह टिप्पणी बड़ी मार्के की लगी.बाद में मैंने उससे पूछा क्या आजकल आत्मकथाएँ ज्यादा रखती हैं.उसने कहा रखनी पड़ती है.आजकल तो लेखक भी पहले आत्मकथा लिखकर लेखक बन जाते हैं फिर और कुछ लिखते है.”"

    “” रंगनाथ जी अगर आपने भी आत्मकथा को किसी के लेखकीय मूल्यांकन का आधार बना लिया हो तो ज़रा इस दुकानदार स्त्री की बातों पर गौर कीजिएगा “”

    पहले तो आपने आत्मकथा के आधार पर तसलीमा के सहित्यिक मूल्य को खारिज करते हुए एक रेलवे स्टाल वाली महिला दुकानदार की शहादत दिलवायी। । जब मैंने आपके आत्मकथाओं का साहित्यिक मूल्य बताने के लिए कुछ उदाहरण दिए तो आप पलटी मार गए। मुझे पता है कि जूठन आपने पढ़ा होगा। ध्यान से पढ़िए। मैंने खुद लिख दिया था। आप दुकान वाली महिला के जिस कहन को तसलीमा के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे थे उसकी असलियत खोलने के लिए ही मैंने आपको उससे जूठन मांगने की सलाह दी। पढ़ा हो तो भी।

    आपने कहा है कि मैंने ओशो और जीदू दोनों के नामों को छोड़ दिया है। ऐसी कोई सूची नहीं बनाई जा सकती जिसमें सभी नाम गिनाए जा सकें। अब यह मत कहिएगा कि आपको पता है। यह कहने से पहले सोचिएगा कि फिर आपने ओशो या जीदु के नाम छुटने का बेमतलब उल्लेख क्यों किया ?

    शशि जी, सनद रहे इसलिए कहना जरूरी है कि आज तक मेरी संजय ग्रोवर से किसी भी माध्यम से किसी भी तरह की कोई बात-चित नहीं हुई है। उनके बारे में मुझे उतनी ही जानकारी है जितनी एकलव्य,शंबुक के बारे में है। इसके उलट मैं अरविंद जी और अविनाश जी से काफी परिचित हूं। आपकी सोच जिस वेव-लेंथ पर है उससे आपको गलत संदेश ही मिलेगे। किसी के बारे में कुछ कहने से पहले अपनी मालूमात पुख्ता रखा करें।

  • रंगनाथ सिंह said:

    शशि जी,आपने जिस तरह ओशो की तुलना जे. कृष्णमूर्ति से की है उससे जाहिर है कि आपको दोनों के बीच का भेद बिल्कुल नहीं पता है। या फिर कम से कम जीदु के बारे में कुछ नहीं पता है। आशो ने निसंदेह अपनी मेधा और समझ का उपयोग अपने भोग-विलास मात्र के लिए किया। ओशो ने दावा किया था कि वो अमीरों के लिए ही हैं। वे थे भी उन्हें के लिए। लेकिन जीदू ने ऐसा कभी नहीं कहा। आप पहले व्यक्ति हैं जिसने ऐसी बात कही।

    जीदू का चरित्र ओशो के ठीक उलट था। वह एक मौलिक दार्शनिक थे। वो शिक्षा,समाज,इतिहास,मानवियता जैसे प्रश्नों पर बहस करते थे। उनके समाधान के लिए अपना मौलिक समाधान सामने रखते थे। वो ओशो जैसे निर्लज्ज हेडोनिस्टिक नहीं थे।

    आप को ओशो कम्यून और कृष्णमूर्ति फाउण्डेशन या श्रृषि वैली के मुख्य कामधाम और उद्देश्य के बारे में कोई मालूमात न हो पहले पता करिए उसके बाद ऐसे चालु फिकरे कसिए।

    आपको शायद पता हो कि जीदू को थियोसोफिकल स्कूल ने मैत्रेय बुद्धा के अवतार के रूप में खोजा और पाला-पोसा था। लेकिन यह कृष्णमूर्ति की ईमानदारी थी कि उन्होेने इस नाटक का भाण्डा खुद फोड़ दिया। दूसरे तरफ आत्मरति के शिकार ओशो थे कि खुद को खुद ही भगवान घोषित कर रखा था।

    जीदू के पास राल्स रायस कारों का जखीरा भी न था। न ही वो कामपिपासु एवं अय्याशी भरा जीवन जीते थे। एक सामान्य दार्शनिक जैसा जीवन था उनका। ओशो और जीदू को लेकर इतना ही। शेष फिर कभी।

  • रंगनाथ सिंह said:

    अविनाश जी, तसलीमा बीच में क्यों आईं ? बहुत ही भोला जवाब है आपका !!

    तसलीमा को क्या लिखने की जरूरत है यह आप तय करेंगे ? तसलीमा ने अपने और हुसैन के बीच में भेद स्पष्ट किया। उन्होंने सलमान रश्दी और अपने बीच के भेद को भी स्पष्ट किया। उनके तर्क था कि पुरूषवर्चस्व श्रेष्ठता गं्रथी से ग्रस्त समाज में स्त्री को भोग्या बना दिया जाता है। बहुत से ऐसे कर्म हैं जिन्हें करने के बाद भी पुरूष कलाकार महान माने जाते हैं। वो सुख और समृद्धि पाते हैं। लेकिन महिला कलाकारों द्वारा उनका नाम लेने पर भी लोग उनके जान के दुश्मन बन जाते हैं। यदि आप ने जनसत्ता में छपा तसलीमा का लेख ध्यान से पढ़ा होता तो जरूर देखा होता कि तसलीमा ने एक नहीं कई बार हुसैन को अपने से बड़ा कलाकार कहा है। हालांकि यह उनकी विनम्रता ही है। तसलीमा ने हुसैन की कला को बहुत ऊँचे स्तर का बताया है। तसलीमा ने अपने लेखन को हुसैन के कला के सामने कमतर कहा है। लेकिन तसलीमा अपने जीवनार्दशों को हुसैन की कला से भी श्रेष्ठ मानती है।

    सामंती,पितृसत्तात्मक,चरमपंथी,असहिष्णु समाज में स्त्रियों के लिए सम्मानजनक स्थान दिलवाना ही तसलीमा का प्रमुख उद्देश्य है। दूसरी तरफ तसलीमा विरोधियों का उद्देश्य है उस शोषणकारी दमनकारी व्यवस्था को बनाए रखना।

    आपने अपने लेख में कहा था कि आपका लेख तसलीमा के लेख की प्रतिक्रिया में नहीं लिखा जा रहा है। यदि आपने तसलीमा के जवाब में लेख नहीं लिखा ता फिर आपने पूरा लेख यह बताने में क्यों खर्च कर दिया कि तसलीमा की रचना कैसे हुसैन के चित्र से फीकी है!!

    फिर भी मान लिया जाए कि तसलीमा का लेख इस तुलना का कारण बना तो भी आपने सिर्फ हुसैन को लेकर क्यांे उछाला ?? सलमान रश्दी को दो लाईनों में झटक क्यों दिया ?? रश्दी को लड़कीबाजी और मांगे हुए पैसे से शराब पीने के आधार पर खारिज करके आपने क्या कहना चाहा है ? इन बातों से रश्दी के साहित्यिक मूल्य का क्या सीधा संबंध है ? आपने तो तसलीमा और हुसैन की तुलना करते वक्त हुसैन की हिरोईन प्रेम पर कुछ नहीं कहा। आपने दोनों के कलात्मक अवादानों को ही अपनी तुलना का आधार बनाया है। फिर आप रश्दी के बारे में अपनी राय जाहिर करने से क्यांे पीछे हट गए ? आखिरकार तसलीमा ने अपना आधा लेख रश्दी को लेकर ही लिखा है।

    आपने लिखा है कि यह तय है तसलीमा को हुसैन की पेंटिंग समझ में नहीं आती ! तसलीमा ने कब और कहां कहा कि हुसैन की पेंटिंग बेकार हैं ? या फिर वो हुसैन की पेंटिंग की सबसे बड़ी पारखी हैं ?
    आपने कहा है कि तसलीमा ने अपने लेख में मोहम्मद साहब के बारे में वही सब बातें कही हैं जिससे दंगा भड़का !

    मोहम्मद साहब के जिस कार्टून से पूरी दुनिया में दंगा भड़का उसे तो आपने खुद अपने वेबसाइट पर लगा रखा है। उस कार्टून का प्रभाव तो जाहिर है। फिर क्या समझा जाए कि आप भी दंगा भड़काना चाहते हैं ??

    खैर,यदि आपको मोहल्लालाइव पर दंगा भड़कने का भय न हो तो जरा उस लेख से उन पंक्तियों को कोट कर दें जिनसे दंगा भड़क गया ? जनसत्ता का वह लेख अभी हम सबके पास सुरक्षित है। हम भी देख लें उन पंक्तियों को। यह भी देख लें कि क्या वो पंक्तियां उस कार्टून से भी ज्यादा भावना भड़काऊ हैं जो आपने लगाया है।

    आपने उदारता दिखाते हुए बड़ी और साहसिक लेखिका माना है लेकिन साथ ही यह भी जोड़ दिया है कि वो हिन्दु मन को पोषित करने वाले वक्तव्य देते आयी हैं। तसलीमा के बारे में आपकी यह राय क्या तसलीमा विरोधी चरमपंथियों को मन को पोषित करने वाली नहीं है ??

  • अविनाश (author) said:

    रंगनाथ जी, तसलीमा के मुताबिक उनके जीवन के अपने आदर्श हुसैन की कला से श्रेष्‍ठ हैं, तो जरूरी नहीं कि तसलीमा की इस बात से आपकी तरह मैं भी सहमत रहूं। एक कला माध्‍यम और जीवन के व्‍यक्तिगत आदर्शों को एक दूसरे के बरक्‍स खड़ा कर देने की उनकी सीमा पर आप मुग्‍ध होते रहें, मैं नहीं हो सकता। तसलीमा जिन वजहों से जरूरी और महत्‍वपूर्ण हैं, वो रहेंगी। दिक्‍कत ये है कि आप जिस हद तक तस्‍लीमा समर्थक हैं, हम भी उसी हद तक हुसैन समर्थक हैं। इसलिए सवाल-जवाबों का यह सिलसिला शायद ही कभी खत्‍म हो। यह तो तय है कि न आप मुझे सहमत कर सकते हैं, न मैं आपको। रचना और उसको समझने की ज़मीन कमोबेश एक होने के बावजूद।

    तसलीमा की जिन पंक्तियों से दंगा भड़का, वो 2007 में छपी थी, बुर्क़ा शीर्षक से, जिसे उक्‍त कन्‍नड़ अखबार ने री-प्रोड्यूस किया था। मूल लेख का लिंक ये रहा, http://answers.yahoo.com/ जनसत्ता में छपे लेख की जिन पंक्तियों के संदर्भ में मैंने हड़बड़ी में बात की थी, वे ये हैं : हिंदुत्व के प्रति अविश्वास के चलते ही उन्होंने लक्ष्मी और सरस्वती को नंगा चित्रित किया है! क्या वे मोहम्मद को नंगा चित्रित कर सकते हैं? मुझे यकीन है, नहीं कर सकते। मुझे किसी भी धर्म के देवी-देवता या पैगंबर वगैरह को नंगा चित्रित करने में कोई हिचक नहीं है।

    बहरहाल जब दंगा भड़क गया, लोग मारे गये – तो तसलीमा को ये सफाई देने की जरूरत नहीं थी कि उन्‍होंने कन्‍नड़ भाषा के किसी अखबार के लिए कोई लेख नहीं लिखा है और उनकी अनुमति के बगैर कोई कैसे उनके लेख को री-प्रोड्यूस कर सकता है? उनका लेख पब्लिक डोमेन में है और बहुत सारे मीडिया माध्‍यमों ने उनसे पूछे बग़ैर उनके लेख को छापा होगा। लेकिन जब वो लिखती हैं, तो उसकी प्रतिक्रियाओं को लेकर भी उन्‍हें सहज रहना चाहिए। क्‍योंकि हम सब जानते हैं कि हमारा समाज धर्म-संस्‍कृतियों की नुक्‍ताचीनी के मामले में कितना कंजर्वेटिव है।

    इससे पहले की टिप्‍पणी में अपनी हड़बड़ाहट के लिए मैं आपसे और पाठकों से माफी मांगता हूं।

  • शशिभूषण said:

    असहिष्णु जी,
    हम तो अकिंचन ठहरे लीजिए जे.कृष्णमूर्ति की ही कुछ सुन लीजिए-

    प्रज्ञा बोद्धिकता से कहीं अधिक विराट होती है क्योंकि इसमें विवेक और प्रेम का समन्वय रहता है.परंतु प्रज्ञा तभी आती है जब हममें स्वबोध हो,अपने भीतर की तमाम गतिविधियों की गहरी समझ हो…यह निहायत ज़रूरी है कि हम अपने व्यक्तिगत और समूहगत पूर्वप्रभावों और उनकी प्रतिक्रियाओं से पूर्ण परिचित हों.कोई स्व से केवल तभी पार जा सकता है जब वह इसकी गतिविधियों के प्रति,इसकी विरोधाभाषी इच्छाओं और भागदौड़,इसकी अपेक्षाओं और भय के प्रति पूरी तरह सजग हो.केवल प्रेम और सम्यक विचारणा ही हममें वास्तविक क्रांति,आंतरिक क्रांति ला सकते है.

    एक दूसरी जगह वे कहते हैं-

    सही प्रकार की शिक्षा का सरोकार व्यक्ति की स्वतंत्रता से होता है क्योंकि यही संपूर्ण जगत के साथ एवं अनेकानेकों के साथ भी वास्तविक सहयोग ला सकता है.परंतु यह स्वतंत्रता अपनी ही बढ़ा चढ़ाकर हाँकने और सफलता का पिछलग्गू बनने से प्राप्त नहीं की जा सकती.स्वतंत्रता तो आत्मपरिचय से आती है
    ,जब मन अपनी सुरक्षा के लिए अपने ही द्वारा निर्मित अवरोधों से ऊपर और परे चला जाता है.शिक्षा का कार्य है प्रत्येक व्यक्ति की इन तमाम मनोवैज्ञानिक अवरोधों के अनावरण में सहायता करना,न कि उनके ऊपर विचार के नये ढंग थोपना.यह थोपना उनमें कभी प्रज्ञा और रचनात्मक समझ नहीं जगा सकता,बल्कि उसे और अधिक प्रभावग्रस्त बना देता है.

    आगे आप जे.कृण्णमूर्ति को पढ़ लेंगे या मैं ही समय निकालकर कुछ यहीं टीपता रहूँ?

    और हाँ मैंने वह आत्मकथा भी पढ़ी है जिसके बारे में गौतम सान्याल ने लिखा था और उसी पर बनी फ़िल्म में मनीषा कोईराला ने अभिनय किया है.नाम लिखकर आपका समय नष्ट नहीं करूँगा.आप बूझ लेंगे.

    आप बड़े तर्क व्यसनी हैं.
    वो विद्वान क्या कहते हैं इसे,विखंडनवादी है.पर हम अकिंचन लोग इसे प्याज छीलना कहते हैं.

    मुझे अपना खाना भी बनाना पड़ता है और आठ घंटे की चाकरी मे भी हूँ.
    आप यहीं जे.कृष्ण मूर्ति की धरती में ही आ जाइए.अपन जो समय मिलेगा उसमें केवल यही कर लेंगे.
    वो क्या कि आपको अरविंद शेष को भी सुधारना है न तो यहाँ से कर्नाटक भी नज़दीक है.

    यहां से कोई नयी धौंस उत्तर आधुनिकता से भी ऊँची चीज़ ले जा सकें तो बड़ा अच्छा होगा.वहाँ सुधीश पचौरी आदि आपको इतने में ही पैर नहीं टिकाने देंगे.माफ़ कीजिएगा मुझे सूझ नहीं रहा कि और किसी को आपको पछाड़ने की ज़रूरत है.

    हम तो अकिंचन हैं पहले ही निवेदन कर लेते तो कुछ समय ही बचा लेते.
    उम्मीद है अब तो छोड़ देंगे.

  • रंगनाथ सिंह said:

    शशि जी, अहिष्णुता और अभद्रता कौन कर रहा है इसका फैसला आप ही सुनाए देंगे या किसी तीसरे को भी इसका मौका देगे।

    अब आप सीधे-सीधे आरोप मढ़ने लगाने लगे। मैं जो पूछता हूं उसका जवाब देने के बजाय मेरे ऊपर तरह-तरह के चारित्रिक आरोप मढ़ जा रहे हैं।

    आप झल्लाहट में जीदू की किताबें टीपने लगे ! मुझे उन्हें पढ़ने का प्रवचन देने लगे ! जबकि आपको उनके बारे में बुनियादी बात भी गलत पता थी। आपके प्रवचन के प्रतिउत्तर में मैं कहुं कि मेरी पास उनकी या उनसे संबधित ज्यादातर किताबें हैं या मैंने पढ़ रखी हैं तो आपके कहेंगे कि यह धौंस है।

    आप का झूठ/दुष्प्रचार आपकी विनम्रता है। मैं सच को सामने ला रहा हूं तो मेरी कमी है।
    आपने कृष्णमूर्मि की जमीन पर खड़े होकर बोलने का कुतर्क दिया है। क्या इससे आप उन्हें ज्यादा समझने लगेंगे। शशि जी गांधी की धरती पर क्या हो रहा है ? सब जानते हैं। आप भी क्या कम हैं कृष्णमूर्ति की जमीन पर खड़े होकर,उनकी कुछ किफायती दामों में उपलब्ध किताबों को पलट, कृष्णमूर्ति को ओशो जैसे व्यसनी-अय्याश हेडोनिस्ट के समान बता रहे हैं।

    आप ने बेहद कुतार्किक तरीके से कृष्णमूर्ति और ओशो को एक ही पलड़े में तौल दिया। जब मैंने आपको आपकी गलत-बयानी का तथ्यात्मक रूप से जाहिर कर दिया तो आप भड़क गए। आप पहले भी यही करते रहे। आपने एक बार भी अपने किसी गलत बयान के लिए खेद नहीं जताया,न ही माफी मांगी।
    आप लोग सरेआम सफेद झूठ बोलते रहे। दुष्प्रचार करते रहे। लेकिन कोई उसका प्रतिरोध न करे। यही चाहते हैं न आप लोग। नहीं तो आप लोग उसे मोहनदास बना देंगे।

    आप बार-बार साहित्यिक गालियां दे रहे हैं। विभिन्न तरह के रूपक गढ़ रहे हैं। बंधु, आपने काशी का अस्सी पढ़ा होगा। हमने जिया है। फिर भी मैं आप लोगों जैसी अभद्रता में यकीन नहीं रखता। आप जैसों के लिए ही महबूब शायर ने कहा है

    अपनी खामोशियां में पिन्हा थे
    लोग बातों के दरमियान खुले

  • रंगनाथ सिंह said:

    आपने उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली बात सच साबित कर दी। आप को मैने कब पकड़ा है जो छोड़ूंगा। आपको आपके झूठ और गलतबयानियों ने पकड़ रखा है। जो आपका उदघाटन करे उसे तरह-तरह से गाली देने की बिमारी ने पकड़ रखा है। मैं मुंह देखी नहीं लिखता। आपको याद ही होगा आपके समानधर्मा एवं संभवतः आपके परिचित महोदय ने डायरी-अडायरी के प्रसंग में आप से उसी शैली में बात की थी जिस शैली में आजकल आप मुझसे बात कर रहे हैं। उस वक्त भी मैं तथ्य और तर्क के साथ था। जाहिर है उस वक्त आपको मेरा ऐसा करना बुरा नहीं लगा था। उस वक्त दूसरे कुछ लोगों को बुरा लगा होगा।

    आपने मुझे बहुत प्रवचन और उपदेश दे लिया। अब मैं आपको एक बात बताता हूं। आप सब विद्वान बनने का अभिनय बंद कर दीजिए। सिनेमा में आइंसटीन का चरित्र निभाने वाला कुशल अभिनेता कहा जा सकता है, आइंसटीन नहीं। आपको किताबों से एलर्जी है। अतः एक लोक कहावत याद दिलाता हूं। सियार ने जब शेर की खाल ओढ़ ली वो खुद को शेर ही समझने लगा। लेकिन जब उसने मुंह खोला……तो ….।

    आपको याद दिला दूं कि आपकी कठदलीली से बात खिंचती गई। आपने अपनी गलतबयानियों को कभी स्वीकार नही किया। जबकि आप जानते होंगे कि एक झूठ को छिपान के लिए सौ झूठ बोलेन पड़ते हैं। फिर भी मेरा आपके संदर्भ में यह आखिरी कमेंट है। मेरे चारि़ित्रक दोषों के लिए मनचाहे अभियोग-पत्र पेश करने के लिए आप सब स्वतंत्र हैं।

  • रंगनाथ सिंह said:

    अविनाश जी, हमारी रचना को और उसको समझने की जमीन एक होने के तथ्य का संज्ञान लेने के लिए धन्यवाद। यह धन्यवाद इसलिए कि कई लोग यह बुनियादी बात भी भूल गए या भूलाना चाहते हैं। आपने ईमानदारी पूर्वक यह भी स्वीकार किया है कि आप मुझसे सहमत नहीं होंगे।

    आपने एक गलतबयानी भी स्वीकारी। अब आपके उस टिप्पणी की नजीर देने वालों का मुंह अब देखने लायक होगा ! खैर, वो गत्ते की तलवार भांजने में व्यस्त होंगे।

    आपने जनसत्ता की जो लाईनें कोट की हैं उनमें तसलीमा ने सीधे तौर पर यह बात सभी धर्मों के लिए कही है। किसी एक धर्म विशेष के लिए नहीं। यह बात पूरी तरह साफ है।

    तथ्यात्मक और तार्किक गलतबयानियों का प्रतिवाद वहीं और उसी स्थान पर करना श्रेयस्कर करना श्रेय है जहां जो जड़ जमा रही होती हैं। इतनी सी बात बहुतेरे लोग नहीं समझते। यहां अब तक मैं यही कर रहा था। तथ्य और तर्क से आगे बढ़ते हुए आपने कुछ सैद्धातिंक विचलनों या विभेदों की बात की है। जिनका जवाब स्वतंत्र लेख लिख कर ही दिया जा सकता है। संभव हुआ तो मैं अपने ब्लाग पर अपना पक्ष अवश्य रखुँगा। तब शायद मेरे लेखों के तलबगारों को थोड़ा चैन मिले।

    आश्चर्य है कि हुसैन मामले पर इतनी तीखी बहस चल रही है और आपने मोहल्ला ब्लाग पर चली बहस में प्रस्तुत राजकिशोर और विक्रम सिंह के लेखों को यहां नहीं लगाया। जबकि मोहल्ला के लाइव होने के बाद बहुत से नए पाठक बढ़े हैं।

  • शशिभूषण said:

    रंगनाथ जी,
    मैंने क़िफ़ायती दामों पर उपलब्ध किताबें पढ़ने का गुनाह किया है.आपको एक और आलोचना योग्य अपने खिलाफ़ तथ्य बता दूँ कि मैंने अधिकांश किताबें मांगकर पढ़ीं.जिन्होंने मुझे पढ़ने को उकसाया और अपनी गाढ़ी कमाई के रुपयों से खरीदी किताबें खुद से पहले मुझे पढ़ने को दे दीं.यहाँ तक कि अपने इनाम के रुपये भी मुझे किताब खरीदने को दिए.मैं उनका ऋणी हूँ.और भाग्यशाली हूँ कि उन्होंने मुझे कभी नहीं जताया कि मैं क़िफायती दामों वाली किताबें पढ़नेवाला दरिद्र हूँ.यह भी आपको बड़ा बल देगा कि मेरे खानदान में कोई लेखक,पत्रकार समीक्षक या साहित्यकार नहीं रहा है.इससे भी आप छाती फुला लीजिए कि मैंने बनारस या दिल्ली में पढ़ाई नहीं की.आप चाहें तो इस बात पर भी मुझे हीन समझ लें कि मैं छुपकर ओशो पढ़नेवालों भीतर ही भीतर उसकी तर्क पद्धति का अनुकरण करनेवालों तथा प्रकट उनका विरोध करनेवाले चरित्रवानों पर हँसता हूँ.
    पर बंधु हो सके तो मेरी यह बात याद रखें कि मैं किताब और रोटी को मँहगा रखनेवालों को समाज का दुश्मन समझता हूँ.
    आपने ऐसी कोई ग़लती नहीं रखी मेरी जिस पर विनम्र होकर माफ़ी माँगी जाए.आप शुरू से घेरने की मुद्रा में हैं.

    आप मुझे बेवजह किताबें सुझा रहे हैं.विदेशी नामों की धौंस जमा रहे हैं.आपने बनारस ऐसे ही जिया है तो एक बार लौट जाइए वहीं क्योंकि मैं बनारस जीनेवालों को जानता हूँ.और बनारस के दंभियों से तो सभी परिचित हैं.

    ढोंग आप कर रहे हैं.बहस का नाटक मेरी समझ में आ गया.आप गुटबाज़ी के मारे हुए हैं.कहते क्यों नहीं कि मेरे समानधर्मा से तक़लीफ़ है आपको.वरना उसे यहाँ नहीं घसीट लाते.कैसे बनारसी हैं भई,अपने बीच का एक सशक्त कहानीकार नहीं पचा पा रहे हैं.पर मैं अब समझ रहा हूँ आपको.लेकिन यह समय की बर्बादी ही होगी.किसी का क़द आपके फैसलों से आगे निकल गया है.
    बड़े समीक्षक बनते हैं.आप अपनी हालत की समीक्षा क्यों नहीं करते?एक कमेंट के जवाब में यहाँ वहाँ कई-कई कमेंट पेलते हैं.समय भी लिखने का जो होता है आपका सभ्य समाज में उस वक्त में लोग मजबूरी में भी नहीं परेशान करते.
    इस मुद्दे पर यह मेरी अंतिम बात है आपसे.ऐसी चालू बहसों के अलावा याद आए तो फ़ोन कीजिए.और अगर मुझे अपढ़ और झूठा ही समझ लिया हो तो अपनी ही पूजा कीजिए.किसी तरह का संवाद रखने की कोई ज़रूरत नहीं.

  • रंगनाथ सिंह said:

    शशि जी आप मुझे गाली दे रहे हैं तो वही देते रहिए। लेकिन मेरे लिखे का उलट-पाठ तो मत कीजिए। अपने किए का दोष मुझ पर तो मत मढ़िए। आप अपने हर नए कमेंट में अपने पिछले कमेंट से पलट जाते हैं। मैं जो कहने के लिए आपका विरोध करता हूं आप उस बात को मेरे पीठ पर चिपकाने लगते हैं। मजबूरन मुझे न चाहते हुए भी आपको जवाब लिखना पड़ रहा है।

    आप किफायती किताबों के समर्थक हैं। मैं भी हूं। लेकिन उनके किफायती होने का जो अशोभनीय दुरुपयोग आपने किया है उस पर कुछ क्यों नहीं बोलते ?? जीदू की सस्ते में उपलब्ध किताबें पढ़कर ही तो आपने उनकी ओशो से तुलना की थी। तब ये बताइए उन किताबों का किफायती होना जीदू के लिए कितना घातक साबित हुआ !! आप अपनी मूल बात का जवाब क्यों नहीं देते कि आपने जीदू को ऐसा क्यों कहा ? किस आधार पर कहा ? यह कब स्पष्ट करेंगे ? मेरा जोर जिस बात पर होता है उस पर आप चुप क्यों लगा जाते हैं ?

    आपने ओशो को पढ़ने को लेकर निंदाप्रस्ताव प्रस्तुत किया है। मैं ओशो को पढ़ना आप जितना बुरा नहीं समझता। लेकिन आपने यह कैसे घोषित कर दिया कि मैं ओशो को छिप-छिप कर पढ़ता हूं। वाह रहे अंतर्यामी !! ओशो का नाम आप घसीट लाए। उसे कृष्णमूर्ती के बराबर आप घसीट लाए। पहले तो आपने ओशो के लिए बड़े बोल बोले अब ओशो का ठीकरा मेरे सिर फोड़ रहे हैं !! हद है गलतबयानी की।

    मेरे सभी कमेंट पढें और देखें कि मैंने आपकी इसी बात पर आपत्ति की थी कि आपने ओशो को जीदू के बराबर खड़ा कर दिया। ओशो की अनुशंसा में आप मेरा एक कमेंट दिखा दे ंतो मैं आप की सभी बातें मान लूंगा। अब आप पूरा पाला ही बदल रहे हैं। आपके किए को ऐसे प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे वो तुच्छता आपने नहीं मैंने की थी।

    ओशो का पढ़े आप, उसे महान बताएं आप, उसका नाम लेने पर मुझे चेताएं आप, ओशो को पढ़ने को निकृष्ट कर्म भी आप ही बताएं !! ऐसा आप ही कर सकते हैं।

  • रंगनाथ सिंह said:

    शशि जी पहले आप मुझे गरिया रहे थे। अब बनारसियों को भी गरियाने लगे। मुझे पता था कि आप सुदूर दक्षिण में है। साहित्यजीवी हैं। आपने ब्लाग पर जो थोड़ा बहुत लिखा उसे पढ़कर मुझे लगा कि आप अच्छा लिखते हैं। मेरे विश्वसनीय एवं गैर-साहित्यिक/पारिवारिक कारणों से परिचित एक कथाकार से मैंने आपकी तारीफ की तो उन्होंने बताया कि आप कहानी लिखते हैं और अच्छी कहानी लिखते हैं। लेकिन अब लगता है कि यह सब आपका छलावा था। आप दक्षिण में रहकर भी उत्तर की बीमारियों से पीछा नहीं छुड़ा सके हैं। वरना आप मुझ पर गुटबंदी का आरोप न लगाते। मैं सिर्फ इतना कहुंगा कि आप इस बात के समर्थन में सिर्फ एक उदाहरण दें। एक काफी होगा। हां, इस संदर्भ में अपनी स्थिति पर मुझे कुछ नहीं कहना है।

    आपको उस घटना का याद इस लिए दिलाया कि आपको याद आए कि मैं व्यक्तियों का मंुह नहीं देखता। उसका उल्लेख करने का उद्देश्य था कि शायद तब आप मेरा चरित्रहनन करने से बाज आएं। बात क्या है ? मुद्दा क्या है ? यह देखता हूं। विश्लेषण में तथ्य और तर्क के अलावा किसी दूसरी चीज पर भरोसा नहीं करता। लेकिन आप है कि उसे पलटे ही जा रहे हैं। एक और उदाहरण देता हूं। समझना हो तो समझिएगा। आपने जिस पोस्ट पर अपनी कहानी टिप्पणी के रूप में दी थी वहां मैंने जिनसे बहस की उनसे मेरे संबंध अच्छे थे। वो मेरे सम्माननीय भी थे,प्रिय भी थे। यहां भी अरविंद शेष या अविनाश मेरे परिचित है। लेकिन किसी की गलतबयानी के लिए मेरे पास कोई विशेष छूट नहीं है।

    जिनको लिए आपकी छाती फाट रही है उनको मैं दूर या नजदीक से बिल्कुल भी नहीं जानता। उन्होंने मुझे मेल किया तब जाकर उनसे मेरा पहला परिचय हुआ। जब वो ब्लाग में आए तभी मैंने उनके बारे में जाना। उन्होंने ने एक अपनी एक कहानी भी भेजी लेकिन पढ़कर उन्हें अपनी राय नहीं दे पाया।
    मैं न कहानी लिखता हूं। न ही हिन्दी अकादमिक जगत में मेरा अन्य कोई लाभ है। मैंने उस आदमी की कोई कहानी भी नहीं पढ़ी। न ही हमारा कोई साझा दोस्त-दुश्मन है। ऐसे व्यक्ति को मैं पचा नहीं पा रहा हूं। मुझे उससे तकलीफ है !! क्या आपको यह भी बताना पड़ेगा कि तुलना/प्रतिस्पर्धा समान क्षेत्र में होती है। पहले तो मेरा मुख्य कर्मक्षेत्र हिन्दी साहित्यालोचना नहीं है। दूसरे हिन्दी भाषा में जो मैं लिखता हूं उसके आधार पर भी मेरी तुलना किसी कवि या कहानीकार से नहीं की जा सकती।

    किसी एक साहित्यकार,बुद्धिजीवी या अन्य संस्कृतकर्मी का नाम आप जरूर बताएं जिससे मेरा नाम जोड़ा जा सके। जिसकी मैंने प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रशस्ति गायी हो।

    मुझे यह नहीं समझ आता कि मेरे पास आपका नम्बर भी नहीं है तो मैं आपको फोन कैसे करूंगा ? नम्बर हो तो भी क्यों करूंगा ? लिखित बहस की परिणति फोन पर क्यों ? हालांकि आपने इस प्रस्ताव को जिस उदारता से रखा है, मैं अनुग्रहित हूं !

    आपने मुझे बहुत से सुझाव दिए। मैं आपके सामने एक विनम्र प्रस्ताव रख रहा हूं। आप इस समूचे लेख,टिप्पणीसहित का प्रिंटआउट लें लें। इत्मिनान से पढ़ लें। पढ़ा लें। राय बना लें। हम दोनों की बहस में किसी तीसरे की जिसे आपको भरोसा हो उसकी राय ले लें।

    यह भी कह दूं कि झूठी गवाही में माहिर लोगो जब खुद अंधे-कानून की चपेट में आते हैं तब वो सबसे पहले उस ईमानदार तटस्थ गवाह को खोजते हैं जिनका उन झूठों न सदा असम्मान किया होता है।

  • तरंगनाथ said:

    रंगनाथ सिंह का बुद्धि-दानी में एक्जीमा और खाना-पीना नहीं पचता है, उसके क्या कहते हैं- हं, अनपच,,, वही हो गया हुआ लगता है। शिशि जी, झोड़िए रंगीले रंग-नाथ पूंछ जी को। इन्हें अपना एक्जीमा खुजलाने दिजीएष फरांस, इंकलैड अमारिका और दुकनिया भर के बिदवानों को अपना पेट में रख कर उलटिया रहे हैं। अब इनको चंद्रमा के बिदवान ने नेओता भेजा है। आप बेकारे में इनको फंसाए हुए हैं। ठकुरानों का बारे में न जानतेहै। बिट्टा सूत जाओ,,, गबबार सिंह आ जावेगा, सो जाओ… हाला करोगा त सुन लेगा आएगा और काट के रख देगा।

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