अश्लीलता हुसैन में नहीं, आपकी आंखों में है
♦ पंकज श्रीवास्तव
बेहतर होता कि एमएफ हुसैन भारत में रहते हुए अपने साथ हो रहे अन्याय का प्रतिकार करते। लेकिन 95 साल की उम्र में जब पेंशन के लिए डाकखाने जाना भी दुश्वार हो जाता है, तब हुसैन अदालतों का चक्कर काटें, ये उम्मीद भी ज्यादती ही है। कोई भी समझ सकता है कि हुसैन के पास वक्त कितना कम है। उन्हें इस उम्र में सुकून से रहने का पूरा हक है ताकि कला के शिखर पर पहुंच चुके अपने घोड़ों का रंग थोड़ा और गाढ़ा कर सकें। इसलिए बिना आवेदन किये कतर की सरकार से मिल रहे नागरिकता के सम्मान स्वीकार कर वे कोई अपराध नहीं कर रहे हैं। रही बात भारत और भारतीयता की, तो इसे हुसैन भी हुसैन से जुदा नहीं कर सकते।
दरअसल, ये पूरा किस्सा सभ्यता की गाड़ी को उलटी दिशा में हांकने की कोशिश से जुड़ा है। हुसैन पर आरोप है कि उन्होंने कथित रूप से सरस्वती का नग्न चित्र बनाया। अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में उन्होंने बहुसंख्यकों की भावनाओं का मजाक उड़ाया। लेकिन सवाल ये है कि सरस्वती का नग्न चित्र बनाने की बात आयी कहां से? क्या ये बात हुसैन ने कही है? क्या उन्होंने अपने चित्र का नाम ‘नग्न सरस्वती’ दिया है? या फिर किसी चित्रकार या कला-आलोचक ने ये बात कही है? या फिर चित्र के सामने आते ही दर्शकों ने ऐसा शोर मचाया? तथ्य ये है कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
हुसैन ने सरस्वती का चित्र 1970 में बनाया गया था, लेकिन इस पर विवाद शुरू हुआ 1996 के आस पास। ऐसा भी नहीं, हुसैन तब कोई गुमनाम कलाकार थे। उन्हें 1955 में ही पद्मश्री से नवाजा जा चुका था। 1967 के बर्लिन फिल्म समारोह में उनकी फिल्म ‘फ्राम द आइज आफ ए पेंटर’ को ‘गोल्डन बियर’ पुरस्कार मिल चुका था। लेकिन 26 साल तक शांति बनी रही। हंगामा तब मचा, जब एक पत्रिका में लेख छाप कर हुसैन को चित्रकार की जगह कसाई बताया गया। आरएसएस और बीजेपी से जुड़े संगठनों ने सरस्वती के ‘नग्न चित्र’ का शोर मचाना शुरू किया। हुसैन की प्रदर्शनियों पर हमले हुए। उनके खिलाफ देश भर में सैकड़ों मुकदमे दायर कर दिये गये। उन्हें मारने की धमकी दी गयी। करीब दस साल की जद्दोजहद के बाद आखिरकार 2006 में हुसैन ने देश छोड़ दिया। तब से वे लगातार स्व-निर्वासित अवस्था में दरबदर घूम रहे थे।
हुसैन के चित्रों की थोड़ी समझ भी रखने वाले जानते हैं कि वे रंगों और रेखाओं के चित्रकार हैं। उनके यहां ‘नख-शिख’ चित्रण नहीं होता है। आमतौर पर वे चेहरा भी नहीं बनाते हैं। जिस चित्र को लेकर विवाद है, वो भी कमोबेश एक रेखाचित्र ही है। जाहिर है, ये नग्नता बनाने वाले की नहीं, हुसैन विरोधियों की आंख में है। ये उनकी तंगनजरी और राजनीतिक इरादों की उपज है, जिसमें एक मुस्लिम कलाकार को निशाना बनाने का खास मकसद होता है।
अजीब बात तो ये है कि ये सब भारतीय संस्कृति के नाम पर हो रहा है। जबकि भारतीय संस्कृति में देवी-देवताओं से ‘खेलने’ की पूरी परंपरा है। यही वजह है कि यहां मंदिरों की दीवारों पर मिथुन मूर्तियां मिलती हैं। कालिदास ‘कुमार संभव’ में शिव और पार्वती के रति-प्रसंगों का विशद वर्णन करते हैं। पुराणों में देवताओं के राजा इंद्र को ऋषि पत्नी के साथ छल से संबंध बनाने वाला बताया जाता है। भागवतकार बताता है कि कृष्ण स्नान करती गोपियों का वस्त्र लेकर भाग जाते हैं। अपनी बहन सुभद्रा का अपहरण करने में अर्जुन का साथ देते हैं।
लेखकों और रचनाकारों की आजादी का ये ‘रंग’ भारतीय संस्कृति में तब से घुला हुआ है, जब ‘संस्कृति रक्षकों’ में चिढ़ पैदा करने वाला ‘प्रगतिवाद’ जैसा शब्द बना भी न था। साफ है कि हुसैन के खिलाफ बवाल मचाने वाले भारतीय संस्कृति को उतना भी आधुनिक नहीं रहने देना चाहते, जितना वो कालिदास के जमाने में थी। समझा जा सकता है कि आज कालिदास होते तो उनकी गर्दन पर किसकी तलवार होती।
हुसैन की गलती यही है कि वे हिंदू या मुसलमान नहीं, भारतीय चित्रकार हैं। वे अकेले चित्रकार हैं, जिन्होंने रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों पर चित्रों की पूरी शृंखला बनायी है। किसी हिंदू चित्रकार ने आज तक ऐसा नहीं किया। ऐसे में ये सवाल बचकाना लगता है कि हुसैन में हिम्मत है तो पैगंबर या उनसे जुड़े लोगों के चित्र बनाएं। न भारतीय समाज किसी कट्टर समाज की प्रतिक्रिया में बना है और न हुसैन की चित्रकला किसी बाहरी परंपरा से प्रभावित है। हुसैन तो भारतीय कलाओं की हजारों साल पुरानी परंपरा से उपजे चित्रकार हैं जो उनके ब्रश के एक-एक स्ट्रोक में नजर आती है।
वैसे भी, चित्रकला और फोटोग्राफी में फर्क है। वहां सीधे-सीधे यथार्थ का चित्रण तब होता था जब कैमरे नहीं बने थे। जाहिर है, आधुनिक कला में प्रतीकों और बिंबों का इस्तेमाल स्वाभाविक और जरूरी है। लेकिन इसे समझने की कोशिश करने के बजाय भावनाओं के चोटिल होने की दुहाई दी जा रही है। ये सवाल बार-बार पूछा जाना चाहिए कि भावनाएं भड़कीं या भड़कायी गयीं। हुसैन अपने चित्र को लेकर गली-गली घूमते तो नहीं हैं। उनके चित्र जिन कलादीर्घाओं में लगे, वहां भी किसी दर्शक की भावना भड़कने का इतिहास नहीं है।
फिर, भावनाओं के भड़कने और न भड़कने की सीमा रेखा कौन तय करेगा। जिन्हें पुराणों की इस बात पर भरोसा है कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर है, उनकी भावना तो कक्षा छह की विज्ञान की किताब से ही भड़क जाएगी, जो सौरमंडल और उसमें पृथ्वी की मौजूदगी के बारे में बिलकुल उलट बात बताती है। बमुश्किल डेढ़ सौ साल पहले स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ लिखकर मूर्तिपूजा के खिलाफ जबरदस्त मुहिम शुरू की थी। लेकिन किसी मूर्तिपूजक ने भावना के आहत होने का सवाल उठा कर उन पर हमला नहीं किया। यही नहीं, 1867 के हरिद्वार कुंभ में उन्होंने ‘पाखंड खंडिनी पताका’ फहरायी थी। लेकिन कोई हंगामा नहीं हुआ।
दरअसल, भावनावादियों को अपनी संस्कृति और इतिहास का उदार पक्ष जहर जैसा लगता है। ये उसी वैश्विक बिरादरी के भारतीय संस्करण हैं, जिनकी वजह से कभी ब्रूनो को जिंदा जलाया गया था। ब्रूनो ने ताल ठोंककर कहा था कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है। तब पृथ्वी को ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता था। भावनाएं भड़क गयीं और ब्रूनो को जिंदा जला कर ही शांत हुईं। गैलीलियो को भी ऐसे ही लोगों ने अपने तमाम खगोलीय सिद्धांत वापस लेने को मजबूर किया था क्योंकि धार्मिक भावनाएं आहत हो रही थीं।
साफ है कि हुसैन के बहाने समाज को कट्टर और मतिमंध बनाने की कोशिश हो रही है। ये एक राजनीतिक अभियान है जो समाज का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके सत्ता तक पहुंचने की कोशिश में अरसे से जुटा है। ये लोकतंत्र में अपना वोटतंत्र विकसित करने के लिए भीड़तंत्र का सहारा लेता है। विडंबना ये है कि भीड़तंत्र की इस राह पर सिर्फ दक्षिणपंथी नहीं हैं। वे वामपंथी भी हैं, जिन्होंने एक बेहतर समाज रचने का वादा किया था। जो अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर सबसे ज्यादा शोर मचाते रहे हैं।
पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार ने तस्लीमा नसरीन के साथ ऐसा ही किया। हालांकि बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा खुद को हुसैन की परंपरा में नहीं रखतीं। वे अपनी नास्तिक आस्थाओं को लेकर किसी भी धर्म से भिडऩे का साहस रखती हैं लेकिन नास्तिकता से जुड़े सबसे आधुनिक दर्शन यानी माक्र्सवाद पर भरोसा रखने वाले वामपंथी उन्हें कोलकाता में रहने देने को तैयार नहीं हुए। ये वही लोग हैं, जो हुसैन पर हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठाते हैं, लेकिन तस्लीमा का नाम आने पर बगले झांकने लगते हैं। क्योंकि उन्हें डर है कि तस्लीमा का साथ देने से मुसलमान नाराज हो जाएंगे जो पश्चिम बंगाल में 26 फीसदी हैं। वैसे भी सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद किसी को ये भ्रम नहीं रह गया है वहां के मुस्लिम समाज में किस कदर पिछड़ापन है। 33 साल के शासन के बावजूद वामपंथी इस समाज के बड़े हिस्से में आधुनिकता का प्रसार करने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं।
हुसैन और तस्लीमा प्रकरण ने भारतीय लोकतंत्र के खोखलेपन को एक बार फिर उजागर कर दिया है। क्योंकि आजादी या तो होती है या नहीं होती। कलाकारों या लेखकों को सीमित आजादी देने का मतलब उन्हें गुलाम बनाना है। इस मोर्चे पर केंद्र की यूपीए सरकार भी बुरी तरह असफल साबित हुई है। वो चाहती तो हुसैन को सुरक्षा दे सकती थी और तस्लीमा को नागरिकता। लेकिन भीड़तंत्र के आगे वो भी नतमस्तक है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी कसौटी अभिव्यक्ति की आजादी है। और अगर इससे किसी की भावनाएं आहत होती हैं, तो उसके प्रतिकार के लिए कानूनी मंच होते हैं। इसलिए ये पूरी लड़ाई सिर्फ हुसैन या तस्लीमा की नहीं है। लोकतंत्र पर आस्था रखने वाले हर शख्स की है। फ्रांसीसी क्रांति की बुनियाद रखने वालों में से एक, महान विचारक वाल्तेयर ने लोकतंत्र के मूल्यों पर बात करते हुए कभी कहा था, ‘मैं जानता हूं कि तुम्हारी बात गलत है, फिर भी उसे कहने के तुम्हारे अधिकार के लिए मैं अपनी जान तक दे सकता हूं।’
(यह लेख पंकज श्रीवास्तव ने हा र मो नि य म पर लिखा है।)
(पंकज श्रीवास्तव। वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार। आजतक, स्टार न्यूज, सहारा समय के बाद फिलहाल आईबीएन 7 से जुड़े हैं। आंदोलनी रुझान वाले पंकज रंगकर्मी भी रहे हैं सार्वजनिक जीवन की शुरुआत में इलाहाबाद की सांस्कृतिक टोली दस्ता में शामिल रहे हैं। उनसे srivastavapankaj@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









…लेखक महोदय आपको शर्म आनी चाहिए… आप अपने आप को पत्रकार कहते हैं और आपको ये मालूम नहीं कि इस देश की अदालत में इस नामाकूल हुसैन पर क्या मामला चल रहा था .. भावनाएं भड़काने का आरोप था जिसमें हाई कोर्ट ने दोषी करार दिया था .. फिर आप जैसे लोगों ने इसे भाग जाने दिया। और जिस पत्रिका की बात कर रहे हैं आप मैं उसका नाम भी आपको बताता हूं – विचार मीमांसा- आजादी के बाद से अब तक उस तेवर की कोई पत्रिका नहीं आई है महज तीन महीने में उसने सवा लाख प्रतियां प्रतिमाह बेचने का रिकॉर्ड बनाया था जिससे इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाओँ के संपादक की कुर्सी हिल गई थी …. कुछ पढ़िये भाई साहब.. टीवी वालों का बुरा हाल है।
विकास सही कह रहे हैं। आजादी के बाद वैसी बाजारू और सनसनी का विस्फोट करने वाली पत्रिका निकली ही नहीं। उसी पत्रिका ने लालू प्रसाद को बंदर की उपाधि दी थी और कवर स्टोरी बनायी थी, बंदर के हाथ में बिहार। मनोहर कहानियां स्टाइल में उस पत्रिका ने लालू प्रसाद के कथित अवैध रिश्तों की कहानी भी छापी थी। विचार मीमांसा पत्रकारिता के नाम पर एक बदनुमा दाग थी महोदय – ऐसा नहीं था कि उसकी पत्रकारिता से सत्ता की चूलें हिल गयी हों। उसके प्रधान संपादक बीएस बाजपेयी एक फ्रॉड आदमी था। फ्रॉडगीरी की वजह से ही वो जेल गया और उसकी पत्रिका भी गतालखाने में चली गयी। आपने सही लिखा है पंकज – keep it up… विकास को मालूम नहीं हमारे देश में न्यायपालिका और न्याय प्रक्रिया का हाल। ये उन्हीं संस्कृति रक्षकों का एक सिपहसालार लगता है, जिसके बारे में आपने इशारा किया है।
विकास जी..कई बार ऐसा हुआ है अदालतों ने खुद अपने फैसले बदले हैं या उन पर पुनर्विचार किया है। जिससे यह तो साफ है कि अदालतों के फैसले अंतिम सच नहीं होते हैं। जहां तक भावनाओं भड़काने का सवाल है,यह उनकी कमजोरी है,जो भावनाओं की राजनीति करते हैं। प्रतियों की विक्री के आधार पर किसी पत्रिका की गम्भीर होने का तर्क सहज स्वीकार्य नहीं है,क्योंकि सरस सलिल भी एक पत्रिका है,जिसने प्रतियों की विक्री के बारे में कीर्तमान स्थापित किया है।
पंकज श्रीवास्तव जी इस मुद्दे पर सबसे संतुलित,सटीक और विचारवान आलेख प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद। दंगा निर्माण एवं उत्पाद उद्योग की अभियांत्रिकी की तरफ आपने ध्यान खींचने की कोशिश की इसके लिए आपका कोटी-कोटी आभार।
भावनाएं भड़कती हैं या भड़कायी जाती हैं इस लाइन पर बहस की यहां कोई गंुजाइश नहीं दिखती। यहां तो खण्डन-मण्डन ही ईश वंदन का स्थान ले चुका है। इस लेख में ऐसा बहुत कुछ है जिसके लिए कह सकता हूं कि आपने मेरे मुंह की बात छीन ली। लेकिन फिर भी कुछ मुंह में रह गयी है। उसे कहे देता हूं। तसलीमा के मामले में आपने सिर्फ पश्चिम बंगाल उर्फ सीपीएम का जिक्र किया है। जबकि हमारे ख्याल से वहां बांग्लादेश और भारत सरकार का भी उल्लेख जरूरी होता। तसलीमा कोलकाता में नहीं रह पाईं तो वो दिल्ली में भी नहीं रह पाईं। जितने दिन रही भीं नजरबंद रहीं।
कुछ लोगों को यह लेख समझ में नहीं आ रहा है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। जिन्हें अंकज्ञान न हो उसे गणित के सामान्यतम सिद्धांत भी नहीं समझाए जा सकते। जिन्हें अक्षरज्ञान न हो उन्हें प्राइमरी की बालपोथी भी नहीं समझाई जा सकती।
उसी तरह सहिष्णुता और संस्कृति के कखगघ से भी वंचित लोगों को समझाना लगभग नामुमकिन है। हुसैन के विरोधी तसलीमा और रश्दी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को समझते हैं। तसलीमा और रश्दी के विरोधी हुसैन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को समझते हैं। इससे स्पष्ट है दोनों धार्मिक असहिष्णुता के अतिरिक्त कुछ नहीं समझते। उनकी सहमति-असहमति का आधार उनका धार्मिक कट्टरपन है। न कि लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान।
एक तीसरी प्रजाती भी है। जो इन दोनों मतांधों को समझाते हैं कि देखो तुम लोग सब कुछ करो लेकिन खुद में इतना भी मत लड़ो कि दोनों का भेद खुल जाए। दुनिया बहुत बड़ी है। मिलकर चरो-खाओ। दोनों के लिए पर्याप्त है। ऐसे लोग ऐसे अवसरों पर शांति और संयम की अपील के साथ नमुदार होते हैं। हालांकि ऐसे लोगों की अपील के निशाने पर दंगाई नहीं होते। वो सृजनकार होते हैं जिनके छवि की लाश पर दंगाई नाच रहे होते हैं।
Pankaj Shreevastav Jee,
Log itne chutiya nahi hai. Paigambar Mohahmmad ko tasweer me nanga dikhaiye, sacchai khud ba khud saamne aa jayegi. Ye chutiyaape kaa charam hai.
अश्लीलता हुसैन में नहीं, आपकी आंखों में है
sachi to kaha hai aap duniya ko jasa dekhna chti hai aap ko vahi dekta hai …
पंकज जी आप शायद ठीक कह रहे हैं, अश्लीलता देखने वालों की आखों में है! आप वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार हैं इस लिहाज से आप का नजरिया भी ‘वरिष्ठ ’ होगा! लेकिन बतौर पत्रकार आप इस बात से इत्तेफाक तो रखते ही होंगे कि दिल्ली हाईकोर्ट ने 2004 में हुसैन को भावनाएं भड़काने के आरोप में दोषी करार दिया था। खैर आप इन धार्मिक भावनाओं को भी ताक पर रख सकते हैं, इस देश में नास्तिक और आस्तिक दोनों हैं। आस्तिक को अपना भगवान नंगा शायद ही भाए। मैं नहीं जानता आप नास्तिक हैं या आस्तिक, इसकी मुझे जरूरत भी नहीं है। लेकिन आप कम से कम भारतीय तो हैं? अगर हैं तो आपको भारतमाता की नंगी तस्वीर तो याद होगी। हालांकि हुसैन ने उसके लिए माफी मांग ली थी लेकिन उनकी बेशर्मी देखिए वो पेंटिंग उनकी वेबसाइट पर आज भी है। या वो भी भूल गए पत्रकार साहब, आप कैसे किसी ऐसे आदमी का महिमामंडन कर सकते हैं जिसे इस देश का कानून और जनमानस नहीं पसंद करता।
भाई रंगनाथ,
तुम्हारे मुह की कोई बात कह दे तो वंदना में लग जाते हो.
कोई बहस तलब बात कहे तो मरकहा बैल बन जाते हो.
ये संस्कृति सहिष्णुता की जुगाली बंद करो यार.तुम्हारा मुह कोटेशन उगलने के लिए ही मुफीद है.
मोहल्ले की चौकीदारी में अजीब रंगदार हो गए यार.
In spite of everything one can not deny that M F Hussain is an excellent artist who can represent Human Emotions, feelings and desires very well in his Modern Art. I have seen one of his paintings wherein he has painted Ayesha (child wife of Paigumbar Muhammad) sitting nude and in very awkward position on Hanuman’s tail. Hanuman is shown as usual well built, Strong, Handsome and full of Vitality. Though some Hindus did not like him for painting Hanuman with a female.
But the just think of the wife of an old fragile man – an husband of 13 wives but without even a single child! Just think about her cravings her innermost desires! This painting reflects her emotions so well. Hats off to MF Hussain.
अश्लीलता हुसैन में नहीं, आपकी आंखों में है……….
यदि उपरोक्त वचन पूर्णतया सही है तो यह सभी पर लागू होना चाहिए…..सभी धर्मों के लोगों पर…..तब प्रश्न यह उठता है कि जब डेनमार्क के एक अखबार में मोहम्मद साहबा का एक कार्टून छपता है तो सम्पूर्ण विश्व के मुसलमानों में हंगामा क्यूँ? तबा क्या यह दलील डी जा सकती थी कि अश्लीलता इस कार्टून में नहीं, आपकी आंखों में है……….
एक और प्रश्न हिंदू और ईसाईं धर्मों के भगवान के तो चित्र होते हैं परन्तु इस्लाम में किसी भी प्रकार के चित्र की ज़गाह नहीं है…वहां निराकार अल्लाह की उपासना की जाती है…जो कि गलत भी नहीं है….तो जब कोई आक्रति ही नहीं है तो कार्टून पर बवाल क्यूँ….एक कार्टून को अपने इष्ट से तुलना क्यूँ कर हुई?…..
श्लीलता हुसैन में नहीं, आपकी आंखों में है……….
यदि उपरोक्त वचन पूर्णतया सही है तो यह सभी पर लागू होना चाहिए…..सभी धर्मों के लोगों पर…..तब प्रश्न यह उठता है कि जब डेनमार्क के एक अखबार में मोहम्मद साहब का एक कार्टून छपता है तो सम्पूर्ण विश्व के मुसलमानों में हंगामा क्यूँ? तब क्या यह दलील दी जा सकती थी कि अश्लीलता इस कार्टून में नहीं, आपकी आंखों में है………????
एक और प्रश्न हिंदू और ईसाईं धर्मों के भगवान के तो चित्र होते हैं परन्तु इस्लाम में किसी भी प्रकार के चित्र की ज़गाह नहीं है…वहां निराकार अल्लाह की उपासना की जाती है…जो कि गलत भी नहीं है….तो जब कोई आकृति ही नहीं है तो कार्टून पर बवाल क्यूँ….एक कार्टून को अपने इष्ट से तुलना क्यूँ कर हुई?…..
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