हुसैन लीला का उत्तर कांड

♦ अशोक वाजपेयी

IND2933A.JPGइसका कोई अंदेशा तो नहीं था। उसके लिए कोई कोशिश भी नहीं की गयी। लेकिन भारतीय मूर्धन्य को कतर सरकार ने सम्मानस्वरूप अपने देश की नागरिकता देने का प्रस्ताव किया है और, खबरों के अनुसार और उनके एक बेटे के हवाले से, लगता है कि हुसेन ने कतर की नागरिकता स्वीकार कर ली है। बरसों से आत्मनिर्वासन पर विवश किया गया एक व्यक्ति अपने जीवन के धुर उत्तर भाग में ऐसा देश पा गया है, जहां वह सुरक्षा से रहकर अपना काम कर सकता है। यह राष्ट्रीय शर्म और खेद दोनों की ही एक साथ घटना है। शर्म इसलिए कि भारत की सरकार और सिविल समाज दोनों ही अपने एक कलामूर्धन्य को अपेक्षित सुरक्षा देने में विफल रहे हैं। पहले उनके खिलाफ एक हजार से अधिक मुकदमे, बाकायदा देश में विभिन्न हिस्सों में सुनियोजित ढंग से दायर किये गये और अब इन मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश ने इन्हें तीन मुकदमों में इकट्ठा कर दिया है। तो सरकार ने, न राजनीतिक दलों ने पहले कभी खुलकर हुसेन को पूरी सुरक्षा दिये जाने या कि स्वदेश लौटने पर उनका स्वागत करने की घोषणा नहीं की थी जो अब, कतर की नागरिकता की खबर आने के बाद, सरकार और अनेक राजनीतिक दल कर रहे हैं। कलाकारों और लेखकों-बुद्धिजीवियों ने तो हुसेन के पक्ष में लगातार अभियान चलाया। लेकिन सिविल समाज इस मामले में सावधानी से चुप ही रहा आया है। हुसेन को जान से मारने की धमकी देने, उनके हाथ कलम करने या आंखें फोड़ देने का मंसूबा जाहिर करने वालों के खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गयी, जबकि पिछले गृहमंत्री ने हुसेन के खिलाफ लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता के एक पत्र के आधार पर महाराष्ट्र सरकार को ‘एडवाइजरी’ जारी की थी। वर्तमान गृहमंत्री ने कुछ महीनों पहले हुसेन की सुरक्षा के मामले में कुछ पहल की जा रही है, ऐसा आभास दिया था। लेकिन लगता नहीं कि वह पहल कोई ठोस रूप ले पायी।

हुसेन आधुनिक भारतीय कला के सबसे खिलंदरे कलाकार और यायावर रहे हैं। उन्हें हमारे समय का लीला-पुरुष भी कहा जा सकता है। जो कुछ अब हो रहा है, उसे हुसेन-लीला का उत्तरकांड कहा जा सकता है। हुसेन एकमात्र ऐसे भारतीय कलाकार हैं, जिन्होंने ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ से लेकर मदर टेरेसा आदि कई धर्मों की देव और संतमालाएं चित्रित की हैं। भारतीय परंपरा का लीलाभाव उन्हें उत्तराधिकार में मिला है। जो भी उनकी कला और जीवनदृष्टि को, स्वयं उनकी कलासंपदा को जानता है वह उन्हें किसी धर्म के अनुयायियों की भावनाओं को आहत करने वाला चितेरा कह या मान ही नहीं सकता। देवी-देवताओं को दिगंबर चित्रित-शिल्पित करने की लंबी परंपरा है जैसे कि उनसे विनोद करने की भी। यह निरी हिंदू परंपरा नहीं है और न ही उससे उत्प्रेरित होने का हक सिर्फ हिंदुओं का है। वह हमारी सामासिक परंपरा है जिस पर हम सभी का, फिर हमारा धर्म कोई भी हो, बराबर का हक है। अगर ऐसा न हो तो वैदिक काव्य, कालिदास और भवभूति पर, तुलसी और सूर पर सिर्फ हिंदू काबिज हो जाएंगे और बेदिल, मीर और गालिब पर सिर्फ मुसलमान। इससे अधिक भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी मानसिकता हो नहीं सकती। हमें उसी ओर ठेला जा रहा है। क्या विडंबना है और लोकतांत्रिक राजनीति का अद्भुत उपहार कि सदियों पहले बनारस में कबीर हिंदू और इस्लाम धर्मों के कर्मकांड और पंडित-मौलवियों की खुलकर निंदा कर सकते हैं और हम आज ऐसा नहीं कर सकते! क्योंकि ऐसा करने से किसी न किसी समुदाय की भावनाओं को चोट पहुंच सकती है।

उन तत्त्वों ने जिन्होंने हुसेन के खिलाफ सारा बवाल खड़ा किया इसे अपनी जीत बताया है और यह दावा भी किया है कि जो कोई भी भावनाओं को चोट पहुंचाने की हरकत करेगा, उसे इसी तरह देशनिकाला और कहीं और की नागरिकता अपनाने पर मजबूर किया जाएगा। यह घोषणा संविधान-विरोधी है कि नहीं इस पर बहस हो सकती है। पर ऐसे संगठन खुल्लमखुल्ला संविधान का मजाक बना रहे हैं और उनका बाल भी बांका नहीं हो पा रहा है। बहुत सारी हिंसा शुद्ध कायरता से उपजती है। देश में इस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हद सिकुड़ रही है, एक मौलिक अधिकार कुछ हुड़दंगियों द्वारा रौंदा जा रहा है और सरकार और समाज लाचार इसे देख रहे हैं।

हुसेन की भारतीय नागरिकता भले समाप्त हो जाए, भारतीय कला और संस्कृति में उनके अवदान को अवमूल्यित नहीं किया जा सकता। वे बीसवीं शताब्दी की व्यापक भारतीय संस्कृति के एक स्थपति हैं और रहेंगे। उनकी बदली नागरिकता उनकी भारतीयता को क्षति नहीं पहुंचा सकती। अनेक राजनीतिक दलों ने हुसेन की वापसी की गुहार अब लगायी है। इसमें वे भी शामिल हैं, जिन्होंने हुसेन के खिलाफ अभियान चलाया और उसे शह दी। क्यों नहीं अब सब दल मिलकर हुसेन के बारे में एक संयुक्त बयान जारी करते? क्यों भारत सरकार दोहरी नागरिकता पर बनने वाले और स्थगित कानून को पास कराके हुसेन की भारतीय नागरिकता बनी रहने का जतन नहीं करती? क्यों नहीं भारत सरकार हुसेन को भारत रत्न से सम्मानित करती? सौ से अधिक कलाकारों-लेखकों-बुद्धिजीवियों ने तीन बरस पहले इसके लिए राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया था। क्यों नहीं राज्य सरकारों को हिदायत दी जाती कि वे हुसेन को मारने या घायल करने की सार्वजनिक धमकियां देने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करें? (साभार : जनसत्ता, 7 मार्च 2010)

Ashok Vajpeyi(अशोक वाजपेयी। साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार से सम्‍मानित वर‍िष्‍ठ हिंदी कवि। कविता की पंद्रह और आलोचना की पांच पुस्‍तकें प्रकाशित। जनसत्ता में कभा कभार नाम से साप्‍ताहिक स्‍तंभ लिखते हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अवकाशप्राप्‍त अधिकारी। भोपाल के मशहूर भारत भवन की स्‍थापना इन्‍होंने ही की थी।)

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