सवर्णों के इस देश में महिला आरक्षण बिल
♦ अजय यादव
बात अगर यूं कहें कि भारत, एक ऐसा देश, जो अपने निर्माण के हजारों साल पहले से ही धर्म, जाति, क्षेत्र, समुदाय और विभिन्न संस्कृतियों के बीच उलझा हुआ देश था (है), आज वही देश कई तरह के संक्रमण को झेलते हुए न सिर्फ दुनिया की महाशक्ति बनने को बेकरार है, बल्कि संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने को प्रतिबद्ध भी। भारत के लिए यह एक ऐतिहासिक समय ही है कि महिला दिवस के मौके पर दक्षिणपंथी-वामपंथी-कांग्रेसी और कुछ क्षेत्रीय दल भी राजनीति में महिलाओं को एक तिहाई हिस्सेदारी देने के लिए एकमत हो गये हैं। ‘आरक्षण विरोधियों’ या यूं कहिए कि पिछड़ों का प्रतिनिधित्व करने वाली नाममात्र की कुछ क्षेत्रीय पार्टियों को छोड़ दें तो आज पूरा देश इस बात पर सहमत है कि महिलाएं, जो किसी भी वर्ग, वर्ण, जाति, क्षेत्र, समुदाय, धर्म या संस्कृति की हों, ‘दलित’ ही हैं, इसलिए उन्हें आरक्षण देना देश और समाज के हित में है – जाहिर है यह सब बढ़कर बहुतों को अच्छा लग रहा होगा, और इनमें भी सबसे ज्यादा वे लोग होंगे जो महिला आरक्षण के मामले में भरत (भारत) के साथ हैं।
अब थोड़ा विषयांतर, दीपक मिश्रा (जिक्र के लिए माफी), मेरा एक ऐसा दोस्त, जो पाकिस्तान और मुसलमानों के मामले में तो दक्षिणपंथी और बाकी मामलों में खुद को प्रगतिशील कहलाना पसंद करता है। दीपक एक न्यूज चैनल में काम करता है। पिछले साल के एक दिन, मैं, दीपक और एक सहकर्मी (नाम याद नहीं) चाय पी रहे थे। वे दोनों इस बात से निराश थे कि किस तरह से सेटिंग-गेटिंग और जातिवाद ने मीडिया में ‘गधों’ का जमावड़ा लगा दिया। वे इस बात से भी दुखी थे कि किस तरह सालों की मेहनत के बाद भी चैनल ने उनकी तनख्वाह एक बार भी नहीं बढ़ायी और ‘गधों-चंपुओं’ की सैलरी कई बार बढ़ा दी गयी। वे मेरी भी सैलरी नहीं बढ़ने पर दुख जता रहे थे। बातों बातों में सहकर्मी ने मेरी तरफ रुख किया, ‘मैंने आजतक जितने भी ‘यादवों’ को देखा, वे या तो बहुत ब्रिलीएंट थे या बहुत ‘गधे’… बीच का एक भी यादव नहीं मिला।’ मैंने उनकी बातों पर सहमति-असहमति जताये बिना ही तुरंत पूछा कि मीडिया में आरक्षण होना चाहिए कि नहीं? पहले तो दोनों अचकचाए, लेकिन बिना समय गंवाये जवाब दिया – ‘नहीं’। मुझे हंसी आ गयी – ‘क्यों, मीडिया में गधे आ जाएंगे?’ ये वही मीडिया है जिसमें ‘तेजस्वी सवर्णों’ का लगभग एकाधिकार है। और इन्हीं तेजस्वी जातियों के कब्जे में पूरा देश भी।
सभी को पता है कि मौजूदा महिला आरक्षण लागू हो जाने पर संसद में किस तबके और कौन से और धर्म की महिलाएं ज्यादा चुन कर आएंगी और वे महिला हितों की लड़ाई को कितना आगे ले जाएंगी। मनुवादियों का वर्गीय चरित्र महिलाओं को अपनी पार्टियों का माउथपीस बना देगा और वे भी सोच के मामले में उतनी ही अभिशप्त होंगी, जितनी कि ये पार्टियां हैं। यहां पर मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि इस आरक्षण व्यवस्था में दलित-पिछड़ी-आदिवासी-अल्पसंख्यक महिलाओं की हिस्सेदारी तय होने पर संसद में कोई सुर्खाब के पर लग जाएंगे। बात बस एक बड़े तबके की महिलाओं के वाजिब अधिकारों का गला घोंटने की है और ऐसा भारतीय ‘लोकतंत्र’ में खुलेआम हो रहा है।
महिला दिवस पर महिलाओं को आरक्षण का तोहफा देने के प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता से पूरा देश खुश है। सवर्ण खुश हैं, कांग्रेस खुश है, वर्गीय चेतना को व्याख्यायित करते वामपंथी खुश हैं, कनविंस कर ली गयी छोटी पार्टियां खुश हैं, मीडिया खुश है, महिला संगठन खुश हैं, दलितों-गरीबों के घर घूम-घूमकर खाना खा रहे युवराज खुश हैं… दुखी है तो बस देश का बहुसंख्यक जन, जिसे एकबार फिर खुलेआम ठगा जा रहा है और वे कुछ नहीं कर पा रहे हैं। पहले शूद्रों के नाम पर भारत की महान संस्कृति ने हजारों साल तक उन्हें समाज से बहिष्कृत किये रखा और अब सत्ता से उनकी मां-बहनों को भी बेदखल करने का पूरा इंतजाम कर लिया गया है। और इन्हीं दबे-कुचले-शोषित लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता और उनकी पार्टियां आज इस मसले पर रिरियाती नजर रही हैं, ये वही पार्टियां हैं, जो महिलाओं के अधिकारों के मामले में मनुवादियों से रत्तीभर भी पीछे नहीं हैं। उनकी इस बात पर कि वे महिला आरक्षण के विरोधी नहीं है, बशर्ते इसमें पिछड़ी-दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक महिलाओं की भी जगह सुनिश्चत की जाए, को अनसुना कर दिया जा रहा है और उल्टे उन्हें ही महिला आरक्षण का विरोधी कहकर मजाक उड़ाया जा रहा है।
कितनी अजीब बात है कि इस अन्याय में वामपंथी भी बराबर के साझीदार है और उन्हें इस बार भी किसी ऐतिहासिक गलती का एहसास तक नहीं है। संसदीय वामपंथ भारतीय लोकतंत्र का एक ऐसा सवर्ण चेहरा है, जो भूख, गरीबी, शिक्षा, भेदभाव, शोषण और वर्गविहीन समाज के नाम पर वंचितो-शोषितों को बरगलाने का काम करता है और इस ‘लोकतंत्र’ को चिरंजीवी बनाने का भी।
यहां पर मुझे भारतीय जनसंचार संस्थान के अध्यापक आनंद प्रधान (यहां उनपर लगे ब्लॉगीय जातिवाद को दूर रखें) की वह बात याद आ रही है, जो कि उन्होंने मंडल विरोधियों को संबोधित करते हुए कही थी – ‘आरक्षण लागू करके वीपी सिंह ने एक तरह से भारतीय लोकतंत्र को बचाने का ही काम किया है।’ जरा सोचिए, अगर मंडल कमीशन नहीं लागू होता तो आज देश के क्या हालात होते (शायद, चिदंबरम का ग्रीन हंट अब कंट्री हंट बन गया होता)? और आज, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यक महिलाओं का हक मारकर किस लोकतंत्र को रचा जा रहा है। मंडल के विरोध में जल मरने वाले सवर्ण (और सवर्ण वामपंथ भी) आज दीवाली मना रहा है, लेकिन दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के घरों में मातम है, दिल उदास है और लाचार भी…
(अजय यादव। गाजीपुर के रहने वाले अजय पिछले कुछ सालों से दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे हैं। खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में। वामपंथी रुझान वाले अजय वाम छात्र संगठन आइसा से जुड़े रहे हैं। उनसे ajayadava@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









tum param .. ho.
इस मामले में मेरिट और क्रीमी लेयर का चर्चा में न आना आश्चर्यजनक है? गरीबों के लिए वामपंथियों, मेरिटवादियों और देशभक्तों के दिल में हूक सिर्फ तभी क्यों उठती है, जब जाति के आधार पर वंचितों को आरक्षण देने की बात होती है। महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए, लेकिन सिर्फ उन्हें जो क्रीमी लेयर में न हों। दलित या ओबीसी आईएएस का बेटा आईएएस क्यों बने के तर्क का विस्तार ये क्यों नहीं है कि अफसर की बहू या नेता की पत्नी और साढ़े चार लाख से ज्यादा सालाना आमदनी वाले परिवारों की महिलाओं को आरक्षण क्यों चाहिए। आर्थिक रूप से कमजोर महिलाएं, कमजोर तबके की महिलाएं संसद और विधानसभाओं में पहुंचे, इसका समर्थन कौन नहीं करेगा। या फिर इसका समर्थन कौन करेगा?
अजय ने एक जरूरी बहस यहाँ रखी है . धन्यवाद.
कॉंग्रेस और भाजपा जहां इस बहस को डाउनप्ले कर रहें हैं और यूथ फॉर इक्वालिटी जैसे ‘अराजनीतिक’ संगठनइस पर चुप्पी साधे हैं, वहीँ वामपंथी सिद्धांतकार सारी महिलाएं दलित हैं जैसे मुहावरे गढ़ने में शायद सबसे आगे हैं.
निवेदिता मेनन ने लगभग एक साल पहले इस पर बहस चलाई थी, जिसके जवाब में कविता कृष्णन ने यह कहा कि संसद में आरक्षण इस अर्थ में भिन्न है कि यहाँ ‘मेरिट’ जैसी कोई नहीं बल्कि अंततः सामाजिक गोलबंदी से अवसरों का फैसला होता है. और चूंकि ओबीसी राजनीतिक तौर पर एक गोलबंद है, जैसा कि संसद में आरक्षण के बगैर भी 27% से ज़्यादा ओबीसी सांसद पहुँचने से ज़ाहिर होता है, अगर बिना अलग कोटे के भी आरक्षण दिया जाय, तो भी ओबीसी महिलाएं अपने अनुपात में स्वाभाविक तौर पर आयेंगी. (देखें – http://kafila.org/2009/06/07/and-arent-obc-women-women-loud-thinking-on-the-womens-reservation-bill/ ).
कुछ ऐसा ही अफलातून जी ने भी लिखा हैं – http://samatavadi.wordpress.com/2010/03/07/nitish_womens_quota/
लेकिन मुझे अभी भी यह तर्क साफ़ समझ में नहीं आया. अगर जनसंख्या की वजह से ओबीसी सीधे ही अच्छी तादाद में संसद में आ गए बिना आरक्षण, तो औरतों को भी उनकी आधी आबादी की ताकत के भरोसे ही क्यों न छोड़ दिया जाए. और अगर हम यह कहते हैं कि औरतों को नहीं छोड़ सकते क्योंकि औरतें राजनीतिक रूप से गोलबंद कौम नहीं हैं, तो फिर ओबीसी औरतों को भी क्यों छोड़ा जाय.
दिलीप जी का क्रीमी लेयर वाला सवाल भी वाजिब और ज़रूरी है.
sahi hai ajay bhai… bilkul theek stand…
अजय आप सरासर सही है। हम इतिहास की एक भयंकर भूल के हिस्सेदार बनने जा रहे हैं। यह बेहद अफसोसनाक है। यह घटना साफ कर देगी कि कम्युनिस्ट पार्टियों का अपना चरित्र भी उनता ही सामंती है जितना कांग्रेस, बीजेपी या दूसरी बुर्जुआ पार्टियों का। यह कोई गूढ़ रहस्य नहीं है कि इस आरक्षण ने किस तबके की औरतों को फायदा होने जा रहा है और इसका इस्तेमाल कौन और कैसे करेगा। मोहिनी गिरी जैसी तथाकथित ‘नारीवादियों’ ने इस तरह के आरक्षण के पक्ष में झंडा उठा रखा है। वृंदा करात इसे पहले दिन पास न किए जाने को शर्मनाक करार दे रही हैं। सुषमा स्वराज कह रही है कि कुछ लोग औरतों को बांटने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करते हुए किया गया था। अगर यह वाकई बंटवारे की साजिश है तो फिर किसी भी तरह का आरक्षण इस साजिश का हिस्सा है। लेकिन यह कहने की हिम्मत किसी में नहीं है। सच तो यह है कि इस विधेयक के मंजूर होते ही संसद का वर्गीय चरित्र और खुलकर सामने आ जाएगा जहां अंबानियों, बिड़लाओं और बच्चनों की बीवियां और बेटियां तय करेंगी कि संसदीय लोकतंत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी की दिशा क्या होगी।
राज कपूर ने एक फिल्म बनायी थी,प्रेमरोग। कुछ लोग को यह नहीं समझ नहीं आता कि महिला उत्पीड़न मामले में क्लास या कास्ट का क्वेश्चन क्यों नहीं आना चाहिए। लेकिन राज कपूर को यह बात पता थी।
पाठकों को जेंडर इक्वलिटी का सवाल उठाने वाली महिलाओं का इतिहास देखना चाहिए। वो कौन थी ? किस क्लास से आती थी ? सर्वप्रथम आखिर किस क्लास की महिलाओं ने औरतों की पहचान लास्ट कालोनी के रूप में की ?
मृणाल वल्लरी ने ध्यान दिलाया कि भारतीय संसद में पहला महिला प्रसाधन गृह एक महिला स्पीकर ने बनवाया ! अभी गीताश्री ने बहस छेड़ रखी है कि जाति और धार्मिक कट्टरवादिता से कई फुट ऊपर उठ चुके कबीर दास के नारी विरोधी (विरोधी हल्का शब्द है दमनकारी कहना ज्यादा सही होता) चेहरे को बार-बार छिपाने की कोशिश की क्यों की जाती है ?
शम्बुक और एकलव्य आज मुख्यधारा में अपने संग हुए ऐतिहासिक अन्याय का जवाब मांगते हैं लेकिन सीता,शूपर्णखा,मंदोदरी,अहिल्या,उर्मिला का क्या ? तुलसी जैसे रामराज्यवादी भी स्त्री के प्रति सर्वथा तटस्थ न रह सके। नारी की पूज्यनीय और प्रताड़नीय की दो अतिवादी छवियों के बीच भी कोई सामान्य नारी भी होती है इसे तुलसी ने भी नहीं स्वीकारा है। जबकि तुलसी जानते थे कि पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं।
सगुण और निर्गुण के दोपाटों पर बसे भक्त कवियों एक विचार सिर्फ एक बिन्दु पर मिलता है, स्त्री दमन के मुद्दे पर। मुझे नहीं लगता कि जब बात स्त्री उत्पीड़न की होगी तो दलित-सवर्ण,अमीरी-गरीब,श्वेत-श्याम पुरूषों के बीच कोई फर्क रह जाएगा !!
निश्चय ही सवर्ण इस देश के सबसे शातिर प्राणी हैं लेकिन सवर्णों से भी शातिर हंै पुरुष। पहली बात केवल भारत के लिए सही है। दूसरी पूरी दुनिया के लिए। जिसे शक हो वो जांच ले।
नाजुकदिलों के लिए – किसी भी हाल में इस मुद्दे पर मेरा पहला और आखिरी कमेंट है।
bahut khoob……..
दरअसल, महिला आरक्षण की सुविधा उन महिलाओं को चाहिए जिनका उद्देश्य संसद और सड़क पर केवल हो-हल्ला काटना है, ताकि वे खबरों में बनी रहे सकें। और ये ही वे महिलाएं जो आम-साधारण स्त्री की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा हैं। ये आरक्षण इनकी अपनी-अपनी राजनीतिक सुविधाओं के लिए है, किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए नहीं।
जो आज महिला आरश्क्षण का समर्थन कर रहीं हैं वही महिलाएं हैं जिन्होंने दलित आरक्षण का विरोध किया था। इसी से समझा जा सकता है कि ये आरक्षण में आरक्षण का विरोध क्यों कर रही हैं।
संजय जी,
कितनी अजीब बात है कि देश की 80 फीसदी आबादी दलितों-पिछड़ो-अल्पसंख्यकों और आदिवासियों की है और देश में बहुमत सवर्ण सत्ता के पास है….दरअसल यह मंडल कमीशन की खीज ही है जो एकमुस्त 33 फीसदी पर नजर गड़ाए हुए है।
अजय आपने ने एक जरूरी बहस यहाँ रखी है . धन्यवाद.
कॉंग्रेस और भाजपा जहां इस बहस को डाउनप्ले कर रहें हैं और यूथ फॉर इक्वालिटी जैसे ‘अराजनीतिक’ संगठन इस पर चुप्पी साधे हैं, वहीँ वामपंथी सिद्धांतकार सारी महिलाएं दलित हैं जैसे मुहावरे गढ़ने में शायद सबसे आगे हैं.
निवेदिता मेनन ने लगभग एक साल पहले इस पर बहस चलाई थी, जिसके जवाब में कविता कृष्णन ने यह कहा कि संसद में आरक्षण इस अर्थ में भिन्न है कि यहाँ ‘मेरिट’ जैसी कोई चीज नहीं चलती बल्कि अंततः सामाजिक गोलबंदी से अवसरों का फैसला होता है. और चूंकि ओबीसी राजनीतिक तौर पर एक गोलबंद है, जैसा कि संसद में आरक्षण के बगैर भी 27% से ज़्यादा ओबीसी सांसद पहुँचने से ज़ाहिर होता है, अगर बिना अलग कोटे के भी आरक्षण दिया जाय, तो भी ओबीसी महिलाएं अपने अनुपात में स्वाभाविक तौर पर आयेंगी. (देखें – http://kafila.org/2009/06/07/and-arent-obc-women-women-loud-thinking-on-the-womens-reservation-bill/ ).
कुछ ऐसा ही अफलातून जी ने भी लिखा हैं – http://samatavadi.wordpress.com/2010/03/07/nitish_womens_quota/
लेकिन मुझे अभी भी यह तर्क साफ़ समझ में नहीं आया. अगर जनसंख्या की वजह से ओबीसी सीधे ही अच्छी तादाद में संसद में आ गए बिना आरक्षण, तो औरतों को भी उनकी आधी आबादी की ताकत के भरोसे ही क्यों न छोड़ दिया जाए. और अगर हम यह कहते हैं कि औरतों को नहीं छोड़ सकते क्योंकि औरतें राजनीतिक रूप से गोलबंद कौम नहीं हैं, तो फिर ओबीसी औरतों को भी क्यों छोड़ा जाय.
दिलीप जी का क्रीमी लेयर वाला सवाल भी वाजिब और ज़रूरी है.
aaj kal kya likh raha hai chirakut
janeman tumari lekhani mein gajab ki dhar hai.etana sab kuch kaise fek lete ho…………kabhi kuchh padane ke bad likha karo……..etani ghatia analysis ke liye ek bar to badhai ke patra ho hi.
bahut paresan na hoi.mahila reservation se pahar nahi tutaga.yeh samvave nahi hai ki backward mahilayon ko roke sakhai.muskil dalit/adiwasi mahilayon ke liye hai.per loktantra unkeh liye bhi rasta bana hi lega.
AJAY YAAR TUMNE TO KAMAL KA LIKHA HAI. PATHAK BHI TUMHARI TARIFF KARNE KO MAJBUR HO GAYA IS ARTICLE KO PARNE KE BAAD
महिला आरक्षण बिल पर सपा-राजद कि समर्थन वापसी ने न्यूक्लियर प्रभाव -
सपा-राजद के सांसदों के बिना संसद जल्दी ही रखा जानेवाला न्यूक्लियर लायबिलिटी एक्ट को पास कराना कॉंग्रेस को मुश्किल पडेगा | इस क़ानून के तहत परमाणु डील के बाद भारत में रिएक्टर लगा रही विदेशी कंपनियों को किसी दुर्घटना की स्थिति में किसी भी जिम्मेवारी से खुली छूट मिलाने वाली है |
या फिर, इस बिल पर हमारे सांसद फिर से सारे मतभेद भूलेंगे और भोपाल से भी भयंकर दुर्घटनाओं के लिए रास्ता खोलेंगे?
मैं दलित न सिर्फ अपने लिंग की वजह से हूं, बल्कि जाति से भी हूं. पुरूष ने स्त्री को अपनी कालोनी ही समझा है और सारी दुनियां में स्त्रियों के दर्द एक ही है, लेकिन मैं देख रही हूं कि भारत में महिला आरक्षण को लोग आधी आबादी की जीत के तौर पर व्याख्यायित कर रहे है. पुरूषों को तो छोड़ दीजिए, अपने देश की महिलाएं ही अपनी दबी-कुचली बहनों के हित का सवाल नहीं उठा पायी. यह देश की 80 फीसदी महिलाओं के साथ ठीक नहीं हुआ. अगर उनके भी दर्द उंचे तबके की महिलाओं के समान है तो उनके साथ यह साजिश क्यों. उन्हें भी लाने की व्यवस्था क्यों नहीं की गयी. क्या देश की 80 फीसदी महिलाओं के हित को इनके ठेके पर चलेगा. क्या उनके आने से देश की संसद और विधानसभाओं में बेठकर गलचौरा करने का स्वाद बिगड़ जाएगा.
मानवता का इतिहास इस देश को और यहां की 33 फीसदी मांग करने वाली महिलाओं को माफ नहीं करेगा
अजय यादव के साथ काम कर चुके लोग उन्हें प्रतिभाशाली मानते हैं । लेकिन भाई साहब आपके विचारों में घुली जातिवाद की कड़वाहट घातक है । जिन सवर्णों और मनुवादियों को पानी पी पीकर कोस रहे हैं , उसकी मौजूदा पीढ़ी ने तो दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों पर कोई अत्याचार नहीं किये हैं । उलटा उसे तो कदम कदम पर आरक्षण के तीरों से घायल होना पड़ा है ।
आप बार बार जिस एलीट क्लास की महिलाओं के राजनीति में घुस आने का हौआ दिखा रहे हैं, उसे तो राजनीति में रुचि ही नहीं । भारत की राजनीति में आज भी जाति का ही कार्ड चलता है बंधुवर , और वहां भगवान की कृपा से मनुवादियों और सवर्णों की नहीं चलती ।
रही बात सवर्णों के अत्याचार की, तो भईया अजय यादव, दिमाग की धूल झाड़ो और याद करो कि मंडल कमीशन लागू करानेवाले वीपी सिंह की जाति क्या थी , ओबीसी लोगों को आरक्षण दिलाने के लिए पूरे देश की लानत झेलनेवाले अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह किस जाति से आते हैं । नहीं जानते तो जान लीजिए कि मंडल कमीशन लागू करनेवाले बीपी मंडल यादव जाति के बहुत बड़े जमींदार थे, जिनके सामने गरीब यादवों की बैठने की औकात नहीं थी ।
रही बात आरक्षण के पैरोकार पिछड़े नेताओं लालू यादव और मुलायम सिंह यादव की की, तो लालू यादव ने हजार करोड़ का घोटाला किया और बिहार नाम के राज्य का नाम ऐसा डुबोया कि साला बिहारी शब्द को गाली में बदल दिया । यूपी के हैं आप…तो मुलायम सिंह के सुशासन से वाकिफ ही होंगे । झारखंड को लूटकर कंगाल बनाने वाले मधु कोड़ा आदिवासी हैं । जिन पिछड़ी जातियों की रट लगाए बैठे हो, कभी इमानदारी से झांक के देखो, क्या बिहार के दबंग यादव वाकई पिछड़े हैं, क्या वो कुर्मी जाति पिछड़ी हुई है, जिसके पास अफरात जमीन है ।
बुद्धिजीवी होकर जाहिलों की तरह बात मत कीजिए । सवर्ण जाति की महिला हो या पिछड़ी जाति की, वो सदा से दबी कुचली रही है । लालू और मुलायम जैसे तुच्छ नेताओं की भाषा मत बोलिये ।
चंदन जी,
आपने दुखी कर दिया। आपकी इस बात पर कि ‘उल्टे उन्हें ही आरक्षण के तीर से घायल होना पड़ रहा है’ के बदले एक उदाहरण आपके सामने पेश करना चाहता हूं…
सेक्शन20(1) के तहत यूजीसी ने 1956 में केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में ST/SC का आरक्षण लागू किया…
31 मार्च 2009 तक केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में इन जातियों के अध्य़ापकों का पद है-12229…
लेकिन 53 सालों में केवल 714 अध्यापक ही मिल पाये हैं इन केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को…
आप इसके निहितार्थ निकाल कर आरक्षण से उंची जातियों के घायल होने के निहितार्थ निकाल कर देखिए…
अब दूसरी बात, क्या आप मुहावरों की भाषा नहीं समझते, इसी पोस्ट में मैंने एक जगह मुलायम-लालू-पासवान के बारे में लिखा है-’दबे-कुचले-शोषित लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता और उनकी पार्टियां आज इस मसले पर रिरियाती नजर रही हैं, ये वही पार्टियां हैं, जो महिलाओं के अधिकारों के मामले में मनुवादियों से रत्तीभर भी पीछे नहीं हैं।’ यह सब आपको क्यों नहीं दिखा, आप अपनी मानसिकता की पड़ताल कीजिए।
यहां पर मनुवाद और सवर्ण एक मानसिकता है, जो किसी भी वर्ण-जाति में हो सकती है…यहां तक कि यह मानसिकता भारतीय मुसलमानों में भी देखी गयी है। आपने वीपी सिंह और मंडल का उदाहरण दिया है, क्या आप भूल गये कि जब इसी वीपी सिंह ने भारतीय लोकतंत्र में व्यापक हिस्सेदारी को ध्यान में रखते हुए आरक्षण लागू किया तो इन्हीं उंची जातियों ने उन्हें ‘गद्दार’ कहा और उनके पुतले जलाए।
यह मेरी मजबूरी ही है कि मुझे खुद के बारे में सफाई पेश करनी पड़ रही है, मैंने कहीं भी न आरक्षण का पक्ष लिया है और न आरक्षण को विकास से कहीं जोड़ा है और न किसी एक जाति के जिम्में सवर्ण मानसिकता का आरोप लगाया है, पता नहीं क्यों अभी भी इस लोकतंत्र से आशा करता हूं, जो इसके हित में व्यापक हिस्सेदारी की बात कर लेता हूं…
सच मानिए, आप मुहावरों की भाषा नहीं समझते और ऩ ही किसी लेख को ढंग से पढ़ते हैं, जानते हैं क्यों? क्योंकि आपके आंखों पर भी उसी मानसिकता का चश्मा चढ़ा है।
मुझसे बस एक गलती हुई है कि मुझे दीपक का नाम नहीं लिखना चाहिए था। मैंने व्यक्तिगत तौर पर इसके लिए दीपक से माफी भी मांग ली है और आज सार्वजनिक तौर पर भी दीपक से मांफी मांग रहा हूं।
लेकिन मांफ करना मेरे दोस्तों, सवर्ण और मनुवाद जैसे शब्द आप ही लोगों को आहत क्यों करते हैं, इसके बारे में सोचिए(सब अच्छा-बुरा आपके मन में होगा और किसी को दिखेगा भी नहीं)।
हां यार..इस बार मेरिट की बात नहीं हो रही है। मंडल जी सही कह रहे हैं। मेरा भी ध्यान नहीं गया था।
aapane thik kaha ajay ki manuvad aur savarn ek mansikata hai lekhin aap yah kyun bhul rahen hain ki dalit aur soshit samaj jaise kuchh gadhe hua shabad bhi kisi mansikata ki upaj hai jiski aar mein aap jaise do kauri ke patrakar kahin aur nahi chhape to mohalla live ko hi ek madhyam bana liya .ajay ji aapse kuchh sawal poochhana chahati hoon ki aapane abhi tak kisi dalit mahila ya bachho ke liye apani kimati samay ka kuchh second bhi diya hain .boging ki gandi patrakarita ko aur bhi narak mat banayen.waise bhi aap patrkarita ke mein stream mein to aap ja nahin sakate kyonki wahan to sawarno ka raj hai……kyon thik khha na.
मीनीक्षी, ये पूरा मुद्दा आप समझ ही नहीं सकतीं,इसलिए नहीं कि आप समझदार नहीं है, इसलिए कि आप समझना ही नहीं चाहती…आप लोगों के लिए अब मैं और मेहनत नहीं कर सकता……
vah bhai vah anand aa gaya.ajayg jatiya chetna k lie mubarakbad kya vampanth aur jatiya chetna sath sath chalege.
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