गौरीनाथ को खगेंद्र ठाकुर ने भेजा कानूनी नोटिस

मोहल्ला लाइव पर छपी कथाकार गौरीनाथ की एक प्रतिक्रिया के लिए उन्हें कानूनी नोटिस भेजा गया है। यह प्रतिक्रिया गौरीनाथ ने खगेंद्र ठाकुर के उस आलेख पर दी थी, जिसमें उन्होंने गौरीनाथ को इशारों इशारों में अवसरवादी कहा था और इस अवसरवादिता के एक उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया था कि पटना पुस्तक मेले में मंच पर आकर गौरीनाथ ने आलोचक नामवर सिंह के पांव छूए। यह आलेख खगेंद्र ठाकुर ने रविवार डॉट कॉम के लिए लिखा था। इसकी प्रतिक्रिया गौरीनाथ ने मोहल्ला लाइव डॉट कॉम को दी, जिसे आप इस लिंक (खगेंद्र ठाकुर का फसाना : झूठ पर झूठ) के जरिये पढ़ सकते हैं। इस प्रतिक्रिया से तिलमिला कर खगेंद्र ठाकुर ने अपने वकील के जरिये गौरीनाथ को कानूनी नोटिस भेजा है और चरित्र हनन का आरोप लगाया है। खगेंद्र ठाकुर को अपने लिए प्रयुक्त जिन शब्दों पर आपत्ति है, वे हैं – चापलूस, झोलटंग, राजनीति के गलियारे में भटकना, किसी भी दर्ज के सत्ता से सटे लेखकों की चाटुनुमा प्रशंसा आदि। इस नोटिस पर गौरीनाथ की पहली प्रतिक्रिया एक सवाल के रूप में है कि क्या ऐसे नोटिस से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीनी जा सकती है?









चलिए, नए माध्यमों का अनुभवी साहित्यकारों पर कुछ तो असर हो रहा है। नहीं तो कई नामचीन साहित्यकार मंडी हाउस की संगोष्ठियों मोबाईल का हरा बटन और लाल बटन के अलावा कुछ और नहीं जानने के दंभ किया करते रहे हैं।..इधर बी ताक-झांक कर लेते हैं,अच्छा लगा जानकर। भाई गौरीनाथ को तो खुश होना चाहिए।
हमें खुशी हो रही है कि जिस हिन्दी समाज को खाने तक का पैसा नहीं जुट पाता था अब कोर्ट-कचहरी में केस-मुकदमा ठोकने का भी पैसा हो गया है। अपग्रेडिंग हुई है साहित्यकारों की।..
मैंने गौरीनाथ और खगेन्द्र ठाकुर के उक्त दोनों लेख पढ़े हैं.जिन्हें अपने सम्मान का खयाल हो उन्हें खुद किसी का चरित्रहनन नहीं करना चाहिए.खगेन्द्र जी ने तो पूरे प्रसंग में गौरीनाथ को नाम लेने लायक भी नहीं समझा है.चूँकि खगेन्द्र जी की प्रसिद्धि गौरीनाथ से ज्यादा है इसलिए जाहिर है गौरीनाथ की ज्यादा मानहानि और नुकसान हुआ होगा.फिर जब खगेन्द्र जी के पास बड़ी पाठकीय अदालत है तब उन्हें ऐसे लेखकीय मसलों पर उसी पर भरोसा करना चाहिए.परेशान करने का यह रास्ता अभिव्यक्ति की आज़ादी के खिलाफ़ है और जबरा मारे रोने न दे को चरितार्थ करता है.मुझे इस घटना से यह जानने की इच्छा हुई कि क्या खगेन्द्र ठाकुर जी ने कभी कोई जनहित याचिका भी दायर की कभी?
गोैरीनाथ नें स्थिति को जिस बेबाक तरीके से रखा है, उसमें ऐसा तो कुछ नहीं कि खगेन्द्र जी मुकदमेबाजी तक जा पहुंचे। साहित्यकारों के बीच आरोप-प्रत्यारोप की परम्परा बहुत पुरानी है। खगेन्द्र जी में यदि सहिष्णुता नहीं है तो चिंताजनक है।वैसे भी, जब वे गोैरीनाथ की टिप्पणी पर तुरंत ही अपना आक्रोश जाहिर कर चुके थे तो बाद में ऐसेी कार्यवाही करने का कोई तुक नहीं रह जाता। वे यदि झोला नहीं उठाते हैं, तो उन्हें निश्चिंत रहना चाहिए। गोैरीनाथ के इस असत्य-भाषण का जवाब खगेन्द्र जी को पढ़ने और जानने वाले ख्ुा दे देगें। साहित्यकार की सुप्रीम अदालत तो साहित्य पढ़ने लिखने वाले समाज के अलावा और कोैन हो सकता हैं।
असहिष्णुता का इससे अच्छा उदाहरण दूसरा न मिलेगा। लेखकों के बीच ऐसा होने लगा तो फिर सारे लेखक जेल मंे नजर आएंगे। अशोक वाजपेयी ने तो नामवर सिंह को समर्पित एक नया जुमला ही गढ़ दिया है: ‘अचूक अवसरवादी’। भला हो नामवर जी का कि अशोक जी पर ‘अचूक मानहानी’ का मामला नहीं दायर किया !! तब अशोक जी ‘अचूक सजा’ के तौर पर ‘कभी-कभार’ हवालात से लिख रहे होते।
@vinit
badhaee. ab tchnocrate sahityakar aa rahe hai!! creativity nahi hogi to bhi chalega, intellectuality nahi hogi to bhi chalega, ideology nahi ho chalega, chalega kya dodega; zaruri hai techno-friendly hona, nahi to mazak ke patra banenge. sochiye kesa ho yadi, aane wale kuch dino me ek naya lekhak sangthan bane ya prales apna nam badal TWA (Techno-freindly Writters Association)??? vaise mafi chahate chhote muh badi baat, aapne likha to sahi hi likha hoga……..
@B.P. Dev
मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि आपने ये बात किस अंदाज में कही है। लेकिन मेरी अपनी समझ आपके संदर्भ को लेकर बस इतनी है कि ऐसा नहीं है कि जो टेक्नो-सेवी है वो क्रिएटिव नहीं है,इन्टलेक्चुअल नहीं है,उनके पास ऑयडियोलॉजी नहीं है औऱ ऐसा भी नहीं है कि जो लाल-हरे मटन के अलावे कुछ नहीं जानते वो दिनभर चिंतन किया करते हैं,खूब सर्जनात्मक हैं,ऑडियोलॉजी में यकीन रखते हैं।..आप लगता है वेवजह टेक्नोसेवी होनेवालों का उपहास उड़ा रहे हैं और जो नहीं जानते उन्हें अप्रत्यक्ष तौर पर समर्थन कर रहे हैं। हिन्दी समाज के साथ दिक्कत है कि तकनीक अज्ञानता को भी महिमामंडित किया जाता है जैसे कॉन्वेट से पढ़े बच्चे के लिए हिन्दी नहीं जानने को ग्लैमराइज किया जाता है और मां-बाप गर्व से बताते हैं कि अंग्रेजी और फ्रैंच तो ठीक है,हिन्दी में पुअर है।..
It was indeed very shocking for me to pass through the unfortunate nuances of this episode…hardly I could foresee any reason for a true literaraturer to fall in such debate.Hope respected Khagendra jee would rethink about his allegation on Gaurinath jee-I know him very personally, and have no doubt about his democratic public behaviour…apart from that,I think public act and reaction, both should be on par with the constitutional elements otherwise things have every reason to be distorted and subversive.
Atul Thakur,New Delhi
@vinit
“ऐसा नहीं है कि जो टेक्नो-सेवी है वो क्रिएटिव नहीं है,इन्टलेक्चुअल नहीं है,उनके पास ऑयडियोलॉजी नहीं है औऱ ऐसा भी नहीं है कि जो लाल-हरे मटन के अलावे कुछ नहीं जानते वो दिनभर चिंतन किया करते हैं,खूब सर्जनात्मक हैं,ऑडियोलॉजी में यकीन रखते हैं।.”
aapke is statement ko dhyan se padne se pata chalata hai ki creativity, intellectuality me techno-friendly hone-nahi hone se koee fark nahi padta. ho sakta hai yeh aapne bekhayali me likh diya vo, lekin main to pakka yahi manta hoon. kharab yah laga tha jis tarah ka saralikaran karte hue aapne nahi janane walo par tippani ki, kyoki me techno-user nahi hoon. abhi ek dost hai to uske yahan yah kar sakta hoon, varna, yah sab meri jeb ke dayare ke bahar ka mamla hai.
bhaiya kuchh baate batayenge? technology bhi gyan-agyan se juda mamla hai kya? matlab kya technology bhi knowledge hoti hai kya? aapne “takniki agyanata” ka prayog kiya, to me confuse ho gaya. bura mat maniyega sikhane ke liye puchha hai…
me hindi ka student nahi hoon, isliye puchh raha hoon, hindi samajh kise kahate hai?
technology bhi gyan-agyan se juda mamla hai kya? – हां है। अब लेखक होने का मतलब कागजों पर सिर्फ शाब्दिक अभिव्यक्ति भर नहीं है। अगर आप सहित बाकी लोग भी ऐसा मानते हैं तो लेखन बहुत ही सीमित संदर्भ में देख रहे हैं,इस बात में हिन्दी साहित्य भी शामिल है।.
राग दरबारी का एक हिस्सा याद आता है। जब कल्ले में बूता नहीं होता तो आदमी इंसानियत का राग अलापने लगता है। जब तक दांव लग रहा था सब ठीक था अब फंसी पड़ी है तो इंसानियत इंसानियत चिचिया रहे हैं खगेंद्र जी। वैसे अगर वे खुद को चापलूस, झोलटंग, राजनीति के गलियारे में भटकने वाला, किसी भी दर्ज के सत्ता से सटे लेखकों की चाटुनुमा प्रशंसा करने वाला नहीं मानते हैं तो फिर इतना लोड क्यों ले रहे हैं। विनीत की बात से सहमति चलिए कम से कम हिंदी का लेखक मर मोकदमा करने लायक तो हुआ ।
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