संसद ने पहली बार महिलाओं का दर्द समझा
♦ मृणाल वल्लरी

एक महिला होने के नाते यह खबर मेरे लिए बेहद अहम थी कि लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर पहुंचने वाली पहली स्त्री, यानी मीरा कुमार ने संसद भवन परिसर में महिलाओं के लिए अलग से प्रसाधन कक्ष का इंतजाम कराया है। संसद भवन में पुलिसकर्मी, पत्रकार या किसी भी रूप में काम कर रही महिलाओं को दिये गये इस तोहफे का जो प्रकार है, उसके बारे में अंदाजा लगाना भी थोड़ा मुश्किल होता कि देश की सर्वोच्च संस्था ‘तोहफे’ में मिली इस सुविधा से अब तक वंचित थी। यों अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सौवीं वर्षगांठ का मौका करीब है और मीरा कुमार ने महिलाओं के लिए अलग से प्रसाधन कक्ष बनवाने जैसे काम को महिला दिवस से नहीं जोड़ा है। लेकिन मुझे कहीं न कहीं यह एक तोहफा जैसा ही लग रहा है, क्योंकि कई दूसरी जगहों से लेकर अपनी नौकरी करने के संस्थानों तक में महिला टॉयलेट ढूंढ़ने के मामले में मैं खुद इस समस्या से दो-चार हो चुकी हूं।
दरअसल, संसद भवन परिसर में जो कमी वहां किसी भी नौकरी में लगी महिला को हर बार खलती थी, उस पीड़ा को आखिरकार एक महिला लोकसभा अध्यक्ष ने ही समझा। यहां मैं यह बताने की जरूरत महसूस नहीं करती कि भारतीय संसद कितना पुराना है। छह दशक से ज्यादा समय से यहां हमारे देश के भाग्य-विधाता बैठते हैं और यहां इस सबसे ‘मामूली’ समस्या पर निगाह एक महिला की जाती है। जबकि यह उम्मीद की जानी चाहिए कि महिलाओं के लिए अलग से प्रसाधन कक्ष का नहीं होना सभी संवेदनशील लोगों की निगाह में एक समस्या होगी। सवाल है कि अब तक कुर्सी पर बैठे पुरुष कर्ता-धर्ताओं ने संसद परिसर में घंटों बैठी महिला पत्रकारों और पुलिसकर्मियों या दूसरी कर्मचारियों की इस बुनियादी जरूरत के बारे में कभी सोचने की जरूरत क्यों नहीं समझी। लोकसभा अध्यक्ष के पद पर एक महिला को पहुंचने में जितना वक्त लगा, उतना ही इस सर्वोच्च निकाय में महिलाओं के लिए अलग प्रसाधन कक्ष बनने में। क्या यह उदाहरण हमारी समूची सामाजिक सत्ता-संरचना और मनोविज्ञान की भी व्याख्या करता है?
संसद भवन का उदाहरण सामने रखें तो दिल्ली या समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में छोटी से लेकर बहुत बड़ी कंपनियों या संस्थानों में अगर महिलाओं के लिए अलग से टॉयलेट बनाए गए हों, तो इसे उनकी उपलब्धि कही जानी चाहिए। लेकिन आज भी कई ऐसे संस्थान मिल जाएंगे, जहां स्त्रियों के लिए यह समस्या आम है। कोई संस्थान एक आकर्षक स्वागत कक्ष पर बेहिसाब खर्च कर सकता है, लेकिन महिला प्रसाधन कक्ष बनवाना उसकी प्राथमिकता सूची में नहीं होता।
इसके बाद हम दूसरी किन जगहों से उम्मीद करेंगे? सामान्य जगहों या सड़कों की हालत किससे छिपी है। समाज ने तो नैतिकता-अनैतिकता, शर्म और हया के अपने नियम-कायदे गढ़ रखे हैं। इस हिसाब से जो काम एक पुरुष के लिए ‘सामान्य’ और ‘प्राकृतिक’ जरूरत है, जिसे वह ‘कहीं भी’ पूरा कर सकता है, वहां महिलाओं के लिए हजार अघोषित प्रतिबंध, जिनका पालन करना उनकी मजबूरी है। लेकिन लोकतंत्र, आम इंसानों में बराबरी लाने और मानवीयता को प्राथमिकता देने के दावे पर टिकी सरकारों की प्राथमिकता सूची में इस समस्या के लिए जगह कहां है? दिल्ली जैसे शहरों के कुछ खास इलाकों में दो या चार किलोमीटर में किसी चमक-दमक में दबे कुछ प्रसाधन कक्ष जरूर बनवा दिए गए हैं, लेकिन क्या वास्तव में यही और इतना ही इस ‘बीमारी’ के इलाज के लिए काफी है?
मजदूरों के बीच काम करने वाले मेरे एक दोस्त ने बताया कि नोएडा में कई कारखाने ऐसे हैं, जहां के संयुक्त टॉयलेट में भी दरवाजे तक नहीं हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि महिलाएं टॉयलेट में ज्यादा वक्त न बिताएं और काम में जुटी रहें। इस तरह के कारखानों या फैक्ट्रियों में एक महिला कामगार से उनके मर्द सुपरवाइजर किस ‘खतरनाक’ तरीके से पेश आते हैं, यह नजदीक से देख कर ही समझा जा सकता है। यह है हमारी समूची व्यवस्था में पसरा मर्दवादी इंतजाम, जिसमें एक महिला की सबसे बुनियादी जरूरतों के साथ भी ऐसा घिनौना खेल खेला जाता है।
हमारे समूचे समाजशास्त्र में ये बातें इतनी घुली-मिली हुई हैं कि इससे उपजने वाली समस्याओं पर विचार करना हमें जरूरी नहीं लगता। महिलाओं की आम दिनचर्या में ढल चुकी इस बात पर शायद ही कभी हमारा ध्यान जाता हो कि घंटे-दो घंटे या इससे ज्यादा वक्त के लिए घर से बाहर निकलने के ठीक पहले महिलाएं टॉयलेट क्यों जाती हैं; पानी-चाय या कोई भी पेय लेने की जगह वे थोड़ा-सा कुछ खाना क्यों पसंद करती हैं; और कमजोरी, सिर-दर्द या पेट की बीमारियों से लेकर कई रोगों के पीछे शरीर में पानी की कमी कितना बड़ा कारण है, यह शायद बताने की जरूरत नहीं।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के सौवें साल पर देश के संसद भवन परिसर को मीरा कुमार का यह तोहफा दरअसल इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि अपनी जरूरतों की पहचान और समस्याओं का निदान कोई संबंधित वर्ग ही बेहतर तरीके से कर सकता है। तो क्या देश की आधी आबादी के लिए अपनी तकलीफों से लड़ाई और वाजिब जगह हासिल करने की खातिर तैंतीस फीसद आरक्षण के प्रश्न का कोई जवाब है?
(मृणाल वल्लरी। जनसत्ता की युवा जुझारू पत्रकार। दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए। सामाजिक आंदोलनों से सहानुभूति। मूलत: बिहार के भागलपुर की निवासी। गांव से अभी भी जुड़ाव। उनसे mrinaal.vallari@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









बेहद सादगी से लिखे गए इस आलेख ने सोचने पर मजबूर किया.
इस बात पर शायद ही कभी हमारा ध्यान जाता हो कि घंटे-दो घंटे या इससे ज्यादा वक्त के लिए घर से बाहर निकलने के ठीक पहले महिलाएं टॉयलेट क्यों जाती हैं; पानी-चाय या कोई भी पेय लेने की जगह वे थोड़ा-सा कुछ खाना क्यों पसंद करती हैं; और कमजोरी, सिर-दर्द या पेट की बीमारियों से लेकर कई रोगों के पीछे शरीर में पानी की कमी कितना बड़ा कारण है.
यहाँ तक आते-आते विचलित हुए बिना न रह सका.
गाँवों में शौच के लिए जानेवाली महिलाओं के झुंड.एक लोटे पानी का आसरा और बार-बार खड़े होने की मजबूरी.कैसे-कैसे संक्रमणों के लिए ज़िम्मेवार है.मृणाल जी हो सके तो कभी इस पर भी निगाह डालें.
shashi ji aap ke Tippane per kya kahun ? kya mahilaon ne he mahila ke sare samasyaon ke thekedare le rakhe hai? kuch aap bhe karo.
सादगी और संज़ीदगी, दोनों का ही एहसास है आपकी लेखनी में,वैसे आपका नाम मृणाल पांडेय बनाम मृणाल वल्लरी वाले लेख में चर्चा में रहा है।
अमर आनंद
राजीव कुनवार जी,आप सही कह रहे हैं.शुक्रिया,आपने हमें इस लायक समझा.
मृणाल जी,
आधी आबादी को एक तिहाई हिस्सेदारी न देने वाली मानसिकता की जीती जागती मिसाल पेश की आपने.
60 सालों में ही मर्द बेचारे महिलाओं से आजिज़ आ गए हैं. और महिलापक्ष का विरोध नए फैशोन की तरह वापसी कर रहा है.
मर्दों की उत्तर-आधुनिकता !
इस ज़रूरी लेख के लिए बधाई!
Sheeba Aslam Fehmi
CONGRATS , MAM BAHUT HI BADIYA LIKHA HAI AAPNE . KAASH AGAR HUMARA SAMAJ IN BUNIYADI JARURUTON KO SAMJHTA TO HUME YH SAB KEHNE KI JARURT NAHI PADTI. ANAYAS HI HUMARI PRAVRTI BAN GAYI HAI . HUMARI UNIVERSITY JNHA KAYI LAKH LGA KAR STUDIO TO BNAYA GYA HAI , LEKIN DPT KA ALAG SE WASHROOM NAHI HAI EVEN YH KABHI SAAF BHI NAHI HOTA . PAR SHAYAD KISI KO IS CHEEJ SE FARK NAHI PADTA ….. THANKS FOR THIS WONDRFUL ARTICLE.
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