बज्ज पर महिला आरक्षण के बाजे में कुछ ‘कंकड़’ भी थे
बज्ज पर दिलीप मंडल की दो चार लाइनों की टिप्पणी पर आयी प्रतिक्रियाएं

महिलाओं का सशक्तीकरण वंचित जाति और धार्मिक समूहों का हक छीनकर ही परवान चढ़ेगा क्या? जेंडर और सोशल डायवर्सिटी एक साथ लाने का कोई तरीका नहीं है? कांग्रेस, बीजेपी और लेफ्ट के एक साथ खड़े होने में आपको कोई साजिश नहीं दिखती तो आप महान हैं या फिर बेहद भोले हैं। लेकिन दोनों की ही सूरत में या कोई तीसरी सूरत हो तो भी, बातचीत चलती रहेगी ऐसी उम्मीद है। जिस तरह सात सांसदों को सदन से पूरे सत्र के लिए बर्खास्त कर दिया गया वो खतरनाक है।

रेयाज़-उल-हक़ : सहमत। आज मीडिया में जिस तरह ‘यादव ब्रिगेड’ को गाली दी गयी है, वह भी शर्मनाक है। अचानक महिलाओं के लिए पैदा हुआ कारपोरेट मीडिया का यह प्रेम दरअसल महिलाओं के लिए प्रेम नहीं है, इसमें महिला ‘सशक्तीकरण’ की ओट में ऊंची जातियों और संपन्न घरानों-समूहों-वर्गों का वर्चस्व बनाए रखने की कोशिश है। आखिर दलित-पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए उनका सोता सूख क्यों जाता है। आरक्षण की बात भीख में नहीं की जा रही हैं, इसके लिए वर्षों से दबाव रहा है और जब आरक्षण देना मजबूरी बन गई है तो जुगत लगाई जा रही है कि इससे संपन्न वर्गों को कोई हानि न हो। घर की दुकानदारी घर में ही रहे।
शिशिर यादव : ये आरक्षण अच्छे परिवार में पैदा होने वाली महिलाओं को मौका देगा, मुस्लिम, पिछड़ों, आदिवासियों को नहीं। जिस तरह ‘यादव ब्रिगेड’ को गाली दी गयी है, वह भी शर्मनाक है।
दिलीप मंडल : सवाल ये भी है कि कुछ लोग संसद में दलित, ओबीसी, मुस्लिम और नॉन क्रीमी लेयर महिलाओं को क्यों नहीं देखना चाहतीं? एम्पावरमेंट तो पहले उनका हो, जिसको सबसे ज्यादा जरूरत है। इस देश में दलित और मुस्लिम महिलाओं से पीछे कौन है? ये नीति से ज्यादा नीयत का सवाल है।
रेयाज़-उल-हक़ : वे दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए इसे लाएंगे नहीं। हां, ओबीसी आरक्षण की तरह लोकसभा की सीटें बढ़ा कर भले ला दें तो ला दें।
मज़्कूर आलम : हम आम आदमियों की जो सबसे बड़ी ताकत थी आंदोलन। उसे सत्ता में बैठे लोगों ने पिछले साठ सालों में पहले तो अपनी ताकत से अप्रासंगिक बनाने की कोशिश की। उसके बाद हमें एक-दूसरे के दुख-दर्द से काट दिया। जिससे हुआ यह की अरे यह यादवों की समस्या है, न इससे मुसलमानों को क्या लेना। ये फलां की समस्या है, इससे हमें क्या! हमारी मांगें तो सरकार मान ही लेती है। इस मानसिकता का सबसे बड़ा नतीजा यह निकला कि पूरा जनमानस किसी भी समस्या को टोटैलिटी में देखता ही नहीं। वह सिर्फ अपनी जमात तक जा सिमटा है। जमात के अंदर यह हाल है कि खुद तक सिमट गया है। इसी वजह से कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं हो पा रहा है, जिससे कि कोई उम्मीद बंधे। रहा सवाल महिलाओं का, तो यह आज भी सबको मालूम है कि वह अपना वोट अपने विवेक से नहीं, ‘घरवाले’ के विवेक से देती है। इसीलिए उनकी फिक्र कोई क्यों करे। हां, इस नाम पर यह राजनीति जरूर हो रही है कि अगड़ों के जमात से जो सत्ता निकलती जा रही है, उसे फिर अपने कब्जे में कर लिया जाए।
शिरीष खरे : आपकी चिंता जायज है। मौजूदा महिला आरक्षण विधेयक से देश के सवर्ण और प्रभावशाली परिवार और ज्यादा मजबूत होंगे। देश के वंचित समुदाय तो वंचित ही रह जाएंगे। यह सच है कि अब देश के हर दल की सोच और उनका एजेंडा एक जैसा हो गया है। जहां तक सदन में सांसदों की हाजिरी का सवाल है, तो शिक्षा अधिकार विधेयक 2008 के वक़्त भी लोकसभा और राज्यसभा में सांसदों की हाजिरी कोई ज्यादा नहीं थी। उस वक़्त राज्यसभा में 29 सदस्यों ने इस विधेयक के विरोध में अपना मत रखा था। मगर जब बारी आयी तो एक भी सदस्य ने विधेयक के विरोध में मत नहीं दिया। सरकार बहुत तेजी से नीतिगत बदलाव करती जा रही है और इस देश के करोड़ों लोगों को न तो भरोसे मे लिया जा रहा है और न ही उनका प्रतिनिधित्व करने वालों को ही इससे कोई लेना देना है। इस तरह के बदलाव केवल कुछ लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। हमारे असरदार विरोध नहीं कर पाने से उनका काम आसानी से चल रहा है।
नासिरुद्दीन हैदर खां : अंग्रेज कहा करते थे, आजादी के लिए हिंदुस्तानी तैयार नहीं। कुछ लोग फायदा उठाएंगे। आज भी कुछ लोग कहते मिल जाएंगे कि हिंदुस्तानी लोकतंत्र के लिए तैयार नहीं। दोस्तो, डेढ़ दशक कम नहीं होता। एक रट्टा लगाये हैं। कोई फार्मूला ही दे देते। क्या अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण में आरक्षण मिल जाएगा तो समस्या खत्म हो जाएगी। उसमें कौन सी किशनगंज की सकीना, सिमडेगा की टप्पो या बिजनौर की सीमा गुर्जर आएगी। उसमें भी वही क्रीमी लेयर आएगी। यह लड़ाई हक देने और न देने की है। इतने ही ईमानदार यादव त्रयी होते तो उनकी पार्टियों में महिलाओं की हालत कुछ और ही होती। कुछ तो उदाहरण पेश किया होता। कुछ तो मॉडल दिया होता।
अगर याद नहीं है तो याद कीजिए- शाहबानो मामला। रातों रात बिल तैयार हुआ और पूरी मर्द बिरादरी ने उसे तुरंत पास कर दिया। पंद्रह साल नहीं लटका वह। चूंकि वह महिलाओं का हक छीन रहा था, दे नहीं रहा था। हक देने के लिए दिल बड़ा और कड़ा दोनों होना चाहिए। जबानी जमा खर्च से काम नहीं चलने वाला।
आवेश तिवारी : दिलीप जी, ये विचार महिलाओं को खुद करने दें कि महिला आरक्षण के मौजूदा तामझाम में कितनी बेईमानी है। आप अगर यहां वंचित समुदायों या फिर धार्मिक समूहों की बात कर रहे हैं, तो आप सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्यूंकि आप पुरुष समुदायों में ऐसी अंतर्स्थिति के स्थापित होने के पक्षधर रहे हैं। निस्संदेह वहां ये आवश्यक भी है, लेकिन अगर हम महिलाओं की बात कर रहे हैं, तो हमें सिर्फ महिलाओं की बात करनी होगी। क्यूंकि वहां परिस्थितियां भिन्न हैं। आरक्षण की मौजूदा व्यस्था ने क्या परिवर्तन किया है, वो हम देख रहे हैं। लगातार टुकड़ों-टुकड़ों में छिन्न-भिन्न हो रहे एक पूरी तरह से कुंठित समाज में महिलाएं ही आखिरी उम्मीद हैं। ये जरूर है कि इस रूप में नारी आरक्षण के लागू होने के अपने खतरे हैं। लेकिन कभी-कभी छोटे खतरों का विश्लेषण कर बड़े खतरों को टाला जा सकता है।
दिलीप मंडल : अगर महिला आरक्षण को सही मायने में विशेष अवसर का सिद्धांत साबित होना है, तो महिलाओं को सिर्फ महिला के तौर पर देखना अनुचित होगा। इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि वो अगड़ी महिला हैं, वो दलित महिला हैं, वो ओबीसी महिला हैं और वो अल्पसंख्यक महिला हैं। महिला कोटे के अंदर कोटे का वही आधार है, जो आरक्षण का आधार है। यानी जो कमजोर है, उसे विशेष अवसर मिले, ताकि वो भी लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी निभाये। साथ ही महिला आरक्षण के अंदर अगर क्रीमी लेयर भी लागू हो तभी आरक्षण का फायदा उन्हें मिलेगा, जिनको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। इन उपायों के बगैर लागू किया गया महिला आरक्षण प्रतिगामी कदम साबित हो सकता है और अगर इसे मौजूदा स्वरूप में लागू किया गया तो हो सकता है कि अगली संसद की सामाजिक संरचना बदल जाए। इस कानून को पारित कराने को लेकर कांग्रेस-बीजीपी और वामपंथी दलों की एकता भी कई सवाल खड़े करती है।
रजनीश सिंह : क्या कमजोर, वंचित और शोषित होने का एक ही कारक है अनुसूचित जाति-जनजाति, ओबीसी और धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक होना? अब रामविलास पासवान को आरक्षण मिला तो क्या उनकी पत्नी को भी अलग से आरक्षण देने की जरूरत है? जब जाति को इतना बड़ा सच ही मानते हैं तो जाहिर है जातिवादी राजनीति को भी जस्टीफाई करते होंगे। यह भी जानते ही होंगे की ओबीसी की इतनी संख्या है कि उनकी महिलाएं किसी सवर्ण जाति के वोट के आसरे नहीं रहेंगी। तो फिर महिला आरक्षण बिल से इतना क्यों खौफ खा रहे हैं। लेफ्ट और भाजपा का किसी खास मुद्दे पर एक साथ आना आपको साजिशपूर्ण लग रहा है और जिसको नहीं लग रहा है वो बेहद भोले हैं तो आपको सपा, राजद का कांग्रेस से सहमिलन में क्या लगता था और जदयू, भाजपा प्रेम? कथित प्रगतिशीलता की तमाम तहों को खोलेंगे तो ज्यादा बढ़िया रहेगा, ‘अन्यथा अपनी ढपली अपना राग’ से आगे नहीं बढ़ पाएंगे।
दिलीप मंडल : रजनीश, आपकी वर्गीयचेतना आपको महिला आरक्षण में क्रीमी लेयर की मांग करने के लिए प्रेरित क्यों नहीं करती। आरक्षण की चर्चा में क्रीमी लेयर की बात न आना कितना अजीब है। ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ।









बिलकुल सही कहा आपेन , महिलाओं का सम्मान आवश्यक है ..आपकी ही तरह मैने भी एक ब्लॉग लिखा है आशा है आपको पंसद आएगा अपनी राय जरुर दे http://bit.ly/9Ctt9K
Dilip Mandal, Riyazul Haq, Mazkoor Alam, Sireesh Khare,aur Shishir Yadav- saheban bilkul sahi hain. Yeh oonchi zaat k mardon-aurton ka shadow boxing muqabla tha. Unki gharwaliyon ka jeetna tay tha!
Unhe mubarak ho, hameN (is desh k dalitoN ko)zabardasti khush hona aata nahi, muafi!
Sheeba Asalm Fehmi
@आवेश@रजनीश,
अगर बिना सवाल खड़ा किए महिला आरक्षण पास हो जाता तो सब ठीक, विकास और महिला सशक्तिकरण की बात आप लोगों को तो तभी याद आती है, जब दलितों, अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और आदिवासियों की बात होती है……….
सवर्ण सत्ता का एक उदाहरण पेश करना चाहता हूं…
सेक्शन20(1) के तहत यूजीसी ने 1956 में केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में ST/SC का आरक्षण लागू किया…
31 मार्च 2009 तक केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में इन जातियों के अध्य़ापकों का पद है-12229…
लेकिन 53 सालों में केवल 714 अध्यापक ही मिल पाये हैं इन केन्द्रीय विश्वविद्यालयों को…
आवेश जी, अब आपको एक गूढ़ सवाल बताता हूं…
पूर्वी जर्मनी-पश्चिमी जर्मनी, उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया, क्रान्ति के समय वियतनाम के दो केन्द्र….जानते हैं क्यों?
क्योंकि एक तरफ जनता अमानवीय तंत्र को उखाड़ फेकने पर उतारू होती है तो दूसरी तरफ मानवता के भैड़िए अपना सेफ जोन बना रहे होते हैं…
मान लीजिए भारत में अगर ऐसा कभी हुआ तो पता कीजिए आप किस ओर होंगे…
इस टिप्पड़ी के लिए मांफी…फिर भी कहता हूं-सोचिए( अच्छा-बुरा सब आपके मन होगा, किसी को दिखेगा नहीं)
…
ऐसा नहीं है कि समाजवादी शासन आ जाने पर महिला-पुरूषों के सारे अंतर्विरोध खत्म हो जाएंगे…बल्कि यह ऐसा प्लेटफार्म होगा, जहां से महिलाएं अपने मुक्ति की शुरूआत करेंगी…
यह किसकी टिप्पड़ी हैं सीपीएम वाले अच्छी तरह जानते हैं…लेकिन देश के दक्षिणपंथियों-पूंजीपतियों के साथ मिलकर उन्होंने महिला-मुक्ति जैसे शब्द का गुड़-गोबर बना दिया है…
मीडिया का यादव ब्रिगेड पर टूट पड़ना अनुचित है तो वह सब कुछ जो दो दिनों में सदन में हुआ वह सब उचित ही होगा.
इस विरोध में चिंता और दूरदर्शिता उतनी नहीं थी जितनी सत्ता की चाहत. आश्चर्य इस बात का है जहाँ से पिछड़ी जाति का पुरुष चुनाव जीत सकता है, वहां उसी जाति की स्त्री क्यों नहीं. और ये सब तो भोली बातें है की अगर सवर्ण तबके की महिला लड़ रही है तो वह बीस ठहरेगी. महिला किसी परिवार से, जाति से आए , भारतीय चुनाव व्यवस्था का ये अकाट्य यथार्थ है कि चुनाव जीतते अंततः पुरुष ही हैं. मैं उँगलियों पर गिनी जा सकने वाली महिलाओं की बात नहीं कर रहा. ये स्थिति बदल जाये- तो अच्छा होगा. पर लड़ाई अभी लम्बी और तीखी है. और इसके लिए जरूरी है कि इन्हें बांटा न जाये. दलितों को आरक्षण प्राप्त है, पर कितने घरों कि स्थिति बदल गयी… इसे दलित नेता ही बेहतर जानते जोंगे, सामाजिक बदलाव का एक दूसरा तरीका भी होता है, जो निश्चय ही सत्ता के गलियारों से होकर नहीं गुजरता है, वह दूसरी प्रकृति का होता है… बिहार में एक अच्छी और बेहद अच्छी चीज पिछले दो-तीन सालों से देखने को मिल रही हैं. मैं पंचायती राज में ५० प्रतिशत आरक्षण की बात नहीं करूँगा. मैं बिलकुल दूसरा उदाहरण दूंगा, आप सुबह के ९-१० बजे यहाँ कि सड़कों पर आइए और देखिए कि किस तरह बच्चियां साइकलों पर अपनी धून में चलती जाती हैं इन बच्चियों में बड़ी संख्या उनकी है जो अपने घर में पढने वाली पहली पीढ़ी की हैं. ये क्या बन जाएँगी इसका सवाल नहीं है. पर ये बेटियां बहुत कुछ कहती हैं, और ये परिवर्तन कोई शोर शराबे से नहीं बल्कि यूँ ही सपनों से सपनों के जुड़ते जाने से हुआ है.
आरक्षण से कोई बदलाव नहीं लाया जा सकता है, हाँ चाँद लोगों की किस्मत अवश्य बदल सकती है, और बदली भी है, सामाजिक परिवर्तन और बदलाव का कोई भी रास्ता शेष समाज को काट के, छोड़ के सार्थक रूप से तय नहीं किया जा सकता.
मुझे पता है की आरक्षण के विरोध क्या उसके स्वरूप पर सवाल उठाना भी सामंती और ऐसे ही विशेषणों से अभिषिक्त होने का निमंत्रण देना है, फिर भी कहूँगा आरक्षण बहुसंख्यक आबादी की आवारागर्दी है.
दिलीप जी आपको क्या लगता है कि ओबीसी, मुस्लिम और नॉन क्रीमी लेयर की महिलाओं को अगर अलग से आरक्षण दे दिया जाएगा तो बड़ी संख्या में भगवतिया देवी जैसी महिलाएं संसद पहुंच जाएंगी? आरक्षण के बाद भी लालू यादव, रामविलास पासवान, मुलायम सिंह यादव के कुनबे ही संसद में नज़र आएंगे। जरुरत आरक्षण की नहीं जरूरत मानसिकता बदलने की है।
ये मानसिकता कैसे बदलेगी मृत्युंजय भाई – कुछ टिप्स भी दीजिए।
मानसिकता दरअसल चीज ही बुरी है और जिद्दी भी है। बदलती ही नहीं। कसाई की मानसिकता नहीं बदलती। हत्यारे की मानसिकता भी नहीं बदलती। चिदंबरम की आदिवासियो की जमीन छीनने की मानसिकता नहीं बदलती। उद्योगपति की कमाने की मानसिकता नहीं बदलती। बीजीपी नहीं बदलती। कांग्रेस नहीं बदलती। लालू मुलायम की भ्रष्ट होने की मानसिकता नहीं बदलती। कमजोर की गंवाने के बाद भी सहने की मानसिकता नहीं बदलती। मानसिकता चीज ही बुरी है और जिद्दी भी।
@अजय जी , ये जरुरी है क्या कि किसी ओर रहा ही जाए |जिसे आप सवर्ण सत्ता बताते हैं उसका एक और उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता हूँ उत्तर प्रदेश में पिछले ५ मार्च को घोषित मेडिकल के परास्नातकों की प्रवेश परीक्षा में अनुसूचित जाति के केवल ४५ छात्र ही पास हुए यानि कि इतने ही लोगों ने निर्धारित न्यूनतम ४० फीसदी अंक या उससे अधिक प्राप्त किया जबकि प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों के लिए ८० सीटें रिक्त हैं |अब बताइए ऐसी परिस्थितियों में क्या किया जाना चाहिए ?
महोदय, बिना बुनियादी ढाँचे को बदले बेसिर पैर के आरक्षण व्यवस्था को लागू करने के दुष्परिणाम हमारे सामने हैं ,दलित या अल्पसंख्यक आरक्षण की बदौलत साम्यता स्थापित करने की कोशिश बेईमानी हैं ,इस देश में सिर्फ और सिर्फ बेहद सशक्त और दीर्घगामी अर्थ आधारित आरक्षण व्यवस्था लागू किये जाने की जरुरत है ,देश की ढेर सारी समस्याओं का समाधान भी इसी में निहित है |
आपने अभी से तय कर लिया कि आप किस ओर होंगे इसलिए आप यह बात कह रहे हैं ,महोदय ,दलितों पिछड़ों और आदिवासियों की बात के साथ ही साथ महिला सशक्तिकरण की बात भी कही जाती है |
दिलीप मंडल जी या आप या और कोई अगर ये सोचता है कि देश के दलितों पिछड़ों और आदिवासियों का दर्द बयान करने का सिर्फ उनका सलीका सही है तो वो गलत हैं और एक अलग तरह की अस्पृश्यता को जन्म दे रहे हैं ,महिलाओं को बांटने कि साजिश में आप लोग भी मुलायम और लालू के साथ शामिल न हो ,यही विनती है और अपेक्षा भी
आवेश जी, महिलाओं की बांटने की साजिश से आपका क्या मतलब है। फिर तो पुरुषों को भी क्यों अमीर गरीब, ग्रामीण शहरी, पुलिस पब्लिक, उत्पीड़क और उत्पीड़ित, चिंदबरम-आदिवासी में क्यों बांटा जाए? सभी पुरुष भी तो पुरुष हैं। सभी देशवासी तो देशवासी हैं। वो अमेरिकी सैनिक भी तो आदमी ही है, जिसकी गोली से इराकी बच्चों के शरीर के टुकड़े उड़ जाते हैं। सभी इंसान ही हैं। इंसान और इंसान के बीच भेदभाव करना तो गलत है? तो लगाएं नारा-अमेरिकी सैनिकों और इराकी नागरिकों की एकता जिंदाबाद और उनके बीच बंटवारा करने वाले मुर्दाबाद।
ये तो पुरुषों के साथ अन्याय है कि सभी महिलाओं को आप बराबर मानते हैं और उन्हें बांटने की साजिश का विरोध करते हैं लेकिन पुरुषों को बांटते रहते हैं। ये कैसा न्याय है। ओबीसी को तो क्रीम लेयर-नॉन क्रीमी लेयर के आधार पर बांटने को लेकर एक व्यापक सहमति बनाई गई है। तो किसी को बांटेंगे और किसी को नहीं, ऐसा कैसे चलेगा। महिला एक होमोजीनियस वर्ग है, जिसमें सभी एक समान है, और कोई उन्हें बांटने की साजिश कर रहा है, ये कहने का तर्क मेरी समझ में नहीं आ रहा है।
बांटने की साजिश का सीधा मतलब लालू और मुलायम की जबान बोलना है ,अगर उन्हें या फिर पूरे समाज को बांटा जा सकता है तो वो सिर्फ आमिर और गरीब के आधार पर ,चाहें वो महिलायं हो या पुरुष |हालाँकि ऐसा नहीं हुआ क्यूँ कि न सिर्फ राजनीति में बल्कि साहित्य ,पत्रकारिता ,न्याय हर क्षेत्र में मुलायम ,लालू और वी पी सिंह के वंशज मौजूद हैं ,इस बात को आप भी नकार नहीं कर सकते कि देश का दलित आज भी उसी स्थिति में है जो आरक्षण व्यवस्था के लागू किये जाने से पहले था ,अगर कुछ बदला होगा तो हमें जरुर बताइयेगा |हाँ एक चीज जरुर हुई है कि दलितों में भी एक अभिजात्य वर्ग पैदा हो गया है जिसका पोषण मायावती जैसे लोग करते रहे हैं,और जो खुद भी शोषक की भूमिका में दलित पुनरोत्थान को सबसे बड़ा नुकसान पहुंचा रहा है | मैंने अब तक जितना देखा पाया है दलितों के उस हिस्से में जो अभिजात्य नहीं है सिर्फ हताशा ,निराशा और समाज से अलग थलग धकेल दिए जाने से जुडी कुंठा ही नजर आती है |
महिलाओं बांटे जाने का विरोध हम सिर्फ और सिर्फ इसलिए करते हैं क्यूँकि हिंदुस्तान में महिलायें चाहे वो किसी भी धर्म जाति से आती हो कि स्थिति और देश में दलितों कि स्थिति में तनिक भी अंतर नहीं है ,कहीं कहीं अगड़ी जाति की महिलाएं दलितों से अधिक शोषित और दमित हैं तो कहीं बेहद कम |कल हमारे छोटे भाई ने भी कहा कि अगर मौजूदा प्रारूप में आरक्षण को लागू किया गया तो नेताओं नौकरशाहों की पत्नियाँ और बच्चे संसद और विधानसभाओं का हिस्सा बन जायेंगे ,आम महिला को कोई लाभ नहीं मिलेगा ,वो बिलकुल सही है बिना आरक्षण के भी देश में यही हो रहा है ,लेकिन अगर देश में अर्थ आधारित आरक्षण व्यवस्था लागू की जाति तो शायद ये संभव नहीं होता |और हाँ भाई मेरे इस कहने का मतलब ये न लिया जाए कि मै दलितों या अल्पसंख्यकों की मौजूदा स्थिति से संतुष्ट हूँ मेरा विरोध सिर्फ इस बात पर है कि तरीका जातिगत नहीं होना चाहिए समस्या के समाधान को लेकर हमारे आपके सोच में अंतर हो सकता है लेकिन मै भी वहीँ देख रहा हूँ जहाँ आप |
दलितों में भी अभिजात्य पैदा हो गया है तो इस पर चिंता कैसी? ये तो अच्छी बात है। दो हजार साल से जो प्रक्रिया रोक कर रखी गई थी, वो लोकतंत्र में (चाहे उसकी कितनी भी आलोचना हो और आलोचना में जितनी भी सच्चाई है) शुरू हुई है। ये तो शुभ है। वैसे जाति का भेदभाव खत्म होते ही आरक्षण फौरन खत्म कर दिया जाना चाहिए। मैं भी इसी पक्ष में हूं।
बिलकुल सही ! भेदभाव ख़त्म होते ही आरक्षण हटा देना चाहिए!
दिलीप मंडल से अक्षरअक्षः सहमत!
शीबा असलम फ़हमी
It is very interesting to note that those who always criticized the emergences of elite class within the dalits, follow the political line of congress & BJP.
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