हिंदी के हुसैन का सम्‍मान बड़ा, पुरस्‍कारों की ऐसी की तैसी

ये दो दिनों से जनसत्ता में छप रही खबरें है कि जिन लेखकों को दिल्‍ली सरकार ने इस बार शलाका सम्‍मान से लेकर तमाम दूसरे पुरस्‍कार देने का एलान किया था, उन लेखकों ने सम्‍मान और पुरस्‍कार ठुकरा दिया है। हिंदी के वरिष्‍ठ लेखक कृष्‍ण बलदेव वैद को पिछले साल दिल्‍ली सरकार ने शलाका सम्‍मान देने का एलान किया था लेकिन कांग्रेस के एक छुटभैया नेता ने मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित से शिकायत की कि बलदेव के साहित्‍य में अश्‍लीलता भरी-पड़ी है। इसका असर हुआ और सरकार बलदेव को शलाका सम्‍मान देने के अपने फैसले से पीछे हट गयी। इस बार इस सम्‍मान की घोषणा हुई और कवि केदारनाथ सिंह को शलाका सम्‍मान देने का फैसला किया गया, तो केदारजी को गवारा नहीं हुआ। पूरी तफसील के साथ पहले आप जनसत्ता की खबर पढ़े, फिर आगे बात करेंगे : मॉडरेटर

kedarji and other writers

कवि केदारनाथ सिंह ने हिंदी अकादमी की ओर से घोषित शलाका सम्‍मान लेने से इनकार कर दिया है। यह निर्णय उन्‍होंने कथाकार कृष्‍ण बलदेव वैद के साथ अकादमी के अपमानजनक बर्ताव की जानकारी मिलने पर किया है। शलाका सम्‍मान की राशि इस साल दुगुनी करके दो लाख रुपये कर दी गयी थी। देश में संभवत: पहली बार किसी साहित्‍यकार ने इस तरह पुरस्‍कार का परित्‍याग किया है। इस बीच विभिन्‍न श्रेणियों में घोषित हिंदी अकादमी के पुरस्‍कार लेने से रेखा जैन, गगन गिल, पंकज सिंह और विमल कुमार ने भी इनकार कर दिया है। आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने शुक्रवार को ही साहित्‍यकार सम्‍मान लेने से मना कर दिया था।

इन सभी लेखकों का कहना है कि भले अकादमी को पुरस्‍कार लेने की सहमति दे दी गयी थी, लेकिन वैद के मामले में अकादमी ने उन्‍हें जान-बूझ कर अंधेरे में रखा। केदारनाथ सिंह के शब्‍दों में, ‘वैदजी महत्‍वपूर्ण रचनाकार हैं। उनसे शलाका सम्‍मान की स्‍वीकृति हासिल करने के बाद उन्‍हें पुरस्‍कार से वंचित किया गया है। जाहिर है, इस खुलासे के बाद स्थितियां बिल्‍कुल बदल गयी हैं और मेरा जमीर पुरस्‍कार स्‍वीकार करने की अनुमति नहीं देता।’ अपनी मां की बीमारी के सिलसिले में कोलकाता में मौजूद सिंह ने जनसत्ता से कहा, ‘मैं अनुभव करता हूं कि इस पूरी स्थिति पर फिर से विचार करना चाहिए। अन्‍यथा मैं अपने पूर्व निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए प्रस्‍तावित सम्‍मान को स्‍वीकार करने में असमर्थ हूं।’

पुरस्‍कारों के इतिहास में ऐसा शायद पहली बार हुआ है कि एक साथ इतनी बड़ी तादाद में लेखकों ने पुरस्‍कार ठुकराया है और दूसरे वरिष्‍ठ लेखक के हक में एकजुट हो गये हैं। रेखा जैन को 2009-10 का बाल साहित्‍य सम्‍मान दिये जाने की घोषणा अकादमी ने की थी, जिसकी राशि पचास हजार रुपये है, जबकि गगन गिल और पंकज सिंह को 2008-09 के साहित्‍यकार सम्‍मान और विमल कुमार को साहित्‍य कृति सम्‍मान के लिए चुना गया है। साहित्‍यकार सम्‍मान की राशि 21 हजार रुपये और साहित्यिक कृति सम्‍मान की 11 हजार रुपये है।

रेखा जैन ने कहा कि पुरस्‍कार की राशि का कोई महत्‍व नहीं है। कृष्‍ण बलदेव वैद से हमारे परिवार के पुराने रिश्‍ते हैं। उनका अपमान मुझे स्‍वीकार नहीं है, इसलिए पुरस्‍कार भी। पचास हजार रुपये लेखक के सम्‍मान के सामने कोई मायने नहीं रखते। यह राशि पचास गुना होती, तो भी उसे लौटाने में मुझे झिझक न होती। गगन गिल ने कहा कि जैसी परिस्थितियां सामने आयी हैं, उनमें मैं पुरस्‍कार लेने में असमर्थ हूं। यह पुरस्‍कार का विरोध नहीं है, लेखक के साथ हुए बर्ताव का विरोध है। अकादमी लेखक को सम्‍मानित करे या न करे, उसे अपमानित करने का कोई हक नहीं है। पंकज सिंह ने पुरस्‍कार को अस्‍वीकार करने की जानकारी देते हुए कहा, ‘मैं आधे-अधूरे और तोड़े-मरोड़े गये निर्णय को अनैतिक मानता हूं। जिस समिति ने हमारे नामों का फैसला किया, उसी ने शलाका सम्‍मान के लिए कृष्‍ण बलदेव वैद का नाम तय किया था। अगर पूरे निर्णय को लागू किया जाता, तो हमें यह सम्‍मान लेकर खुशी होती। लेकिन जिस तरह शलाका के बारे में खामोशी बरती गयी, उससे स्‍पष्‍ट तौर पर षड्यंत्र की बू आती है।’

इस बीच कथाकार असगर वजाहत ने कहा कि उनके विचार में सहमति देने के बाद पुरस्‍कार लेने से इनकार करना अनैतिक है। नहीं लेना हो तो पहले कह देना चाहिए।

शनिवार को जनसत्ता में छपी खबर

पुरुषोत्तम अग्रवाल ने हिंदी अकादमी का पुरस्‍कार ठुकराया

वरिष्ठ कथाकार कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान देने का हिंदी अकादमी की कार्यकारिणी का फैसला उलट दिये जाने की साहित्य जगत में व्यापक प्रतिक्रिया हुई है। हिंदी के वरिष्ठ आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अकादमी का साहित्यकार सम्मान लेने से शुक्रवार को यह कह कर इनकार कर दिया कि वैद को शलाका सम्मान न दिये जाने की स्थिति में सम्मान स्वीकार करना उन्हें उचित नहीं लगता। अग्रवाल ने अकादमी के सचिव को लिखे पत्र में वैद को शलाका सम्मान नहीं दिये जाने की जानकारी अखबारों के जरिये मिलने का उल्लेख करते हुए कहा है कि अखबारों से ही यह भी मालूम हुआ कि वैद को शलाका सम्मान न दिये जाने का फैसला उनके लेखन पर लगाये गये तथाकथित अश्लीलता के आरोपों के कारण किया गया है। उन्होंने इस स्थिति को चिंताजनक बताते हुए कहा है कि ‘साहित्य और कला में श्लीलता-अश्लीलता के फैसले इतने सपाट ढंग से नहीं किये जा सकते। साहित्येतर कारणों से जूरी की संस्तुति की उपेक्षा करना अनुचित है। यह स्थिति केवल एक वरिष्ठ लेखक के ही प्रति नहीं, साहित्य मात्र के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान के अभाव की सूचना देती है।’

उन्होंने लिखा है कि साहित्य के सामाजिक दायित्व की चर्चा बहुत की जाती है। इसी के साथ यह भी जरूरी है कि समाज और सामाजिक-राजनीतिक सत्ता की विभिन्न संस्थाएं भी साहित्य, कला, ज्ञान और विचार की साधना और उसकी स्वायत्तता का सम्मान करना सीखें। अग्रवाल ने अपने पत्र में समाज में असहिष्णुता के बढ़ते जाने और कभी आस्थाओं तो कभी श्‍लीलता-अश्‍लीलता के नाम पर चित्रकारों, लेखकों, विद्वानों और विचारकों पर हमले किये जाने का उल्लेख करते हुए कहा है कि असहिष्णुता का ऐसा विस्तार लोकतंत्र को खोखली औपचारिकता में बदल कर रख देगा। सर्जनात्मकता का सम्मान लोकतांत्रिक संस्कार को पुष्ट करने के लिए जरूरी है। शासन द्वारा सर्जनात्मकता का सम्मान कोई कृपा नहीं, बल्कि समाज को सहिष्णु और संवेदनशील बनाने में सर्जनात्मक उपक्रम के योगदान के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है। यह बताते हुए कि हमारे समाज में सर्जनात्मक उपक्रमों के विशिष्ट चरित्र का सम्मान करने की प्रेरणादायी परंपरा रही है।

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