“हम परेशान हैं, ‘डायन’ को बचाना है तो हाईकोर्ट जाइए”

इंडियन एक्‍सप्रेस की खबर का सारांश

महिला आरक्षण बिल यानी महिला सशक्‍तीकरण पर चल रही तमाम उठापटक के बीच सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने डायन प्रथा से जुड़ी एक याचिका को खारिज कर दिया है। बेंच ने डायन प्रथा से जुड़े कानूनों से जुड़े मामले में हाईकोर्ट जाने की सलाह दे दी। एक एनजीओ ने डायन प्रथा को रोकने लिए राज्यों को निर्देश देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली थी। याचिका में छह राज्‍यों झारखंड, छत्तीसगढ़, आसाम, उड़ीसा, बिहार और राजस्थान को इस दिशा में निर्देश देने की मांग की गयी थी। बेंच की अध्यक्षता कर रहे मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन ने राहत देने से इनकार कर दिया और राज्यों की हाईकोर्ट में जनहित याचिका लाने की सलाह दी।

एनजीओ की तरफ से पैरवी कर रही वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की, जिसे खारिज करते हुए बेंच ने कहा कि इस काम के लिए सांसद और विधायक मौजूद हैं। वकील याचिकाकर्ता, मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि याचिका का उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकार को इस मामले में जन जागरूकता लाने की जरूरत को बताना था। इस दलील पर बेंच ने कहा कि इस विषय में सुप्रीम कोर्ट निगरानी नहीं कर सकता है। इसे राज्यों को करना है, इसलिए इन राज्यों की हाईकोर्ट में जाना चाहिए। वकील मानीक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि एक एनजीओ के लिए छह अलग-अलग राज्‍यों में जाकर जनहित याचिका लाना संगठन की क्षमता से बाहर है। (लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को कोई तवज्‍जो नहीं दी।)

सुनवाई के दौरान झारखंड में आठ मार्च की एक घटना, जिसमें एक 55 वर्षीय महिला को डायन बताकर भीड़ ने पीट पीटकर मार डाला था, को साक्ष्य के बतौर पेश किया गया। याचिकाकर्ता वकील ने 17-19 जनवरी के बीच राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नाल्सा) के सहयोग से रांची में हुई तीन दिवसीय कार्यशाला में सामने आये तथ्‍य का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि इन छह में से चार राज्यों में डायन प्रथा को रोकने के कानून तो हैं, लेकिन वे बेअसर हैं और राज्य सरकारें इन कानूनों को लागू करने को लेकर लापरवाह हैं।

♦ मृणाल वल्‍लरी

महिला आरक्षण बिल अभी सिर्फ राज्यसभा में पास हुआ है। जैसा कि कुछ लोगों का कहना है, यह सही है कि महिला सांसदों को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में वोट डालने वाले बहुत सारे सांसद पुरुष थे। लेकिन उनकी वोटिंग की मजबूरियों को भी हम बखूबी समझते हैं। वैसे फिलहाल हम इसे एक ‘प्रगतिशील’ होते समाज की ‘बानगी’ के तौर पर ही देखेंगे कि इस बिल की मुश्किल थोड़ी कम हुई है। अभी तो कई परीक्षाएं बाकी हैं।

खैर, ‘मर्द विधायिका’ ने तो इसे पास कर दिया। लेकिन सेना में स्थायी कमीशन के मसले पर ‘प्रगतिशील’ फैसला देने वाली न्यायपालिका का ही सर्वोच्च शिखर इसे किस नजरिये से देखती है, इसकी बानगी ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में 13 मार्च को छपी खबर में देखी जा सकती है। कृष्णदास राजगोपाल की इस रिपोर्ट ने एक तरह से दूसरा पहलू दिखाने की कोशिश की है कि इस देश की न्यायपालिका की क्या सोच है।

राज्यसभा में पास, लेकिन अधर में लटके महिला आरक्षण विधेयक का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने छह राज्यों की उन महिलाओं को किसी भी तरह की राहत देने से इनकार कर दिया, जो डायन प्रथा के कारण रोज-ब-रोज प्रताड़ित हो रही हैं। इन महिलाओं ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि झारखंड, छत्तीसगढ़, असम, ओडीशा, बिहार और राजस्थान में डायन प्रथा के खिलाफ बने कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए और अदालत उसकी निगरानी करे।

लेकिन केजी बालकृष्णन सहित तीन जजों की पीठ ने इन राज्यों की महिलाओं की ओर से याचिका दाखिल करने वाले गैर-सरकारी संगठन से कहा कि वे इन राज्यों के हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करें। इस पर आपत्ति जताते हुए संगठन की वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने अदालत को तर्क दिया कि महिलाएं चाहती हैं कि सम्मानपूर्वक जिंदगी जीने के लिए सुप्रीम कोर्ट संविधान के इक्कीसवें अनुच्छेद के तहत उनके अधिकारों की रक्षा करे। लेकिन हमारे देश की सर्वोच्च अदालत ने मीनाक्षी अरोड़ा की इस गुजारिश को खारिज करते हुए कहा कि ‘अब आपके लिए ज्यादा महिला सांसद और विधायक आएंगी। हमारे पास पहले से ही काफी समस्याएं हैं।’

मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीड ने जिस तरह से महिला आरक्षण विधेयक का हवाला दिया, उससे किसके सम्मान की रक्षा होती है? यह दुखद और आश्चर्यजनक है।

हम आये दिन अदालत की अवमानना की खबरें पढ़ते हैं। लेकिन क्या हमें अदालत के इस ‘विचार’ में स्त्री अस्मिता की अवमानना महसूस हो रही है? एक तरह से न्यायालय ने अपने अधिकारों के लिए लड़ रही महिलाओं का मखौल उड़ाया है।

सही है कि अदालत किस याचिका को कबूल करे और किसे खारिज करे, इस पर एक साधारण इंसान टिप्पणी नहीं कर सकता। अगर अदालत डायन प्रथा को हाईकोर्ट में ले जाने का निर्देश दे रही थी, तो इसमें आपत्ति की गुंजाइश नहीं भी हो सकती है। लेकिन इन सबके बीच महिला आरक्षण बिल की खिल्ली उड़ाना, और वह भी सर्वोच्च अदालत की ओर से, हजम नहीं हो रहा। क्या न्यायपालिका इस बात से डर गयी है कि विधायिका में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण का भूत न्यायपालिका में भी न पहुंच जाए?

mrinal thumbnail(मृणाल वल्‍लरी। जनसत्ता की युवा जुझारू पत्रकार। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से एमए। सामाजिक आंदोलनों से सहानुभूति। मूलत: बिहार के भागलपुर की निवासी। गांव से अभी भी जुड़ाव। उनसे mrinaal.vallari@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *