आइए… वर्धा में अंकित एक विभूति से भी मिलिए…
♦ आलोक तोमर

अपने नाम के पहले डॉक्टर लगाना किसको अच्छा नहीं लगता। मैं पहले दर्जे में एमए करने के बाद भी पीएचडी नहीं कर पाया क्योंकि रोजगार के गम ज्यादा थे। मगर पैसा ले कर तीन चार पीएचडी थीसिस मैंने भी लिखी हैं क्योंकि पैसे चाहिए था। वह मेहनत की कमाई थी और उनके आधार पर डॉक्टरेट पा कर कई मित्र विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं।
मगर इन दिनों गजब हो रहा है। विश्वविद्यालयों में ऐसे ऐसे चोर गुरु हैं जो इंटरनेट की कृपा से अध्याय के अध्याय उड़ा कर रातों रात किताब तैयार करते हैं और अंग्रेजी में अपना नाम तक ठीक से नहीं लिख पाने के बावजूद उनके खाते में अंग्रेजी की दर्जनों किताबें हैं। ऐसा ही एक कारनामा दुनिया के अकेले हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में हुआ। इस विश्वविद्यालय का नाम महात्मा गांधी के नाम पर है और इसका कुलपति बनने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस के एक सबसे बड़े अधिकारी और अपने मित्र विभूति नारायण राय ने पुलिस से इस्तीफा दे दिया।
हिंदी विश्वविद्यालय में पत्रकारिता भी पढ़ाई जाती है। यहां पत्रकारिता विभाग के प्रमुख अनिल राय अंकित नाम के एक विद्वान हैं, जिन्होंने इंटरनेट से चोरी करके दर्जनों किताबें अपने नाम से छपवा ली है। जाहिर है कि वे अपने शिष्यों को बौद्धिक चोरी का अच्छा प्रशिक्षण दे सकते हैं। इसके पहले वे मिर्जापुर में पढ़ा रहे थे और वहां भी धड़ल्ले से चोरी कर रहे थे। नेटवर्किंग ऐसी कि रायपुर में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय खुला, तो ये महोदय वहां भी मौजूद थे। फिर विभूति नारायण राय ने उन्हें वर्धा बुला कर अपने यहां पत्रकारिता विभाग का अध्यक्ष बना दिया। वे पहुंचे, इंटरव्यू दिया, चुने गये और उसी दिन उन्होंने काम भी संभाल लिया। ऐसी भर्तियां तो युद्ध के दौरान भी सेना तक में नहीं होती। दिलचस्प बात यह है कि जिस तारीख को वे वर्धा में विभागाध्यक्ष के तौर पर काम कर रहे थे, उसी तारीख में रायपुर में भी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थे।
अंकित प्रतिभाशाली हैं, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। आखिर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अधिकतम आठ लोगों को अपने अधीन पीएचडी करवाने की अनुमति हर प्रोफेसर को दी है। मगर अंकित चौदह लोगों को पीएचडी करवा रहे हैं। उनकी चोरी चकारी की कहानी जब एक टीवी चैनल पर, जिसका हिस्सा मैं भी हूं, प्रसारित हुई तो कोई दस साल बाद विभूति जी ने फोन किया। उन्होंने कहा कि जो दिखाया जा रहा है वह झूठ है और अगर एक भी दस्तावेज उन्हें मिल जाए, तो वे अंकित की एक मिनट में छुट्टी कर देंगे।
विभूति नारायण राय काफी सम्मानित साहित्यकार हैं। पुलिस में रह कर पुलिस के खिलाफ उपन्यास लिख चुके हैं और फिर भी निलंबित नहीं हुए। उनके लेखन और दोस्ती दोनों का मैंने हमेशा मान रखा है। विभूति से कहा कि वे चैनल के ऑफिस आ जाएं और पूरे रिकॉर्ड देख लें। चैनल के प्रधान संपादक राहुल देव से बात भी करवा दी। मगर विभूति नहीं पहुंचे। कुछ दिन बाद विश्वविद्यालय से चैनल में पत्र आया कि आपने जो कुछ दिखाया है, वह सच है तो इसके बारे में शपथ पत्र दीजिए। यह एक कुलपति की नहीं, पुलिस वाले की भाषा थी। आप जानते हैं कि पुलिस में अगर किसी को नहीं पकड़ना है, तो उसके बारे में एक के बाद एक सबूत मांगा जाता रहता है। अगर पकड़ना है, तो पहले हवालात में बंद कर दिया जाता है और फिर सबूत तैयार किये जाते हैं।
अनिल राय अंकित के खिलाफ कई किलोग्राम सबूत मौजूद है। विभूति भाई पढ़ने-लिखने वाले आदमी हैं और उनकी आत्मा जानती होगी कि असलियत क्या है। लेकिन उनके भीतर जो पुलिस वाला बैठा है, वह तो मुठभेड़ में भी सिर्फ आत्मरक्षा में गोली चलाता है, जिसमें कुछ मारे जाते हैं और कुछ अंधेरे का लाभ उठा कर फरार हो जाते हैं। विभूति नारायण राय अंकित को अंधेरे का लाभ दे रहे हैं। बहुत दबाव के बाद जांच बैठा दी गयी है, मगर जांच के लिए वाराणसी से अंकित के एक पुराने शुभचिंतक को बुलाया गया है और आप जानते हैं कि ऐसे में क्या होता हैं!
विभूति नारायण राय हिदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में वे गॉड फादर की तरह काम कर रहे हैं।
अनिल राय अंकित का जो होगा, सो होगा और उनसे पत्रकारिता पढ़ने वाली पीढ़ियों का भविष्य कैसा होगा, यह बाद की बात है लेकिन भारतीय पुलिस सेवा में एक संवेदनशील अधिकारी के तौर पर शिनाख्त रखने वाले विभूति नारायण राय एक स्थापित चोर की रक्षा में अपनी छवि और अस्तित्व को खतरे में क्यों डाल रहे हैं, यह समझ में नहीं आता।
वैसे अपने विभूति भाई खतरों के खिलाड़ी है। साहित्य में भी और जीवन में भी। बहुत साल पहले जब इलाहाबाद में पूर्ण कुंभ हुआ था तो विभूति कुंभ जिले के पुलिस अधीक्षक थे। कानून और व्यवस्था के अलावा उनका काम यह भी था कि मेला परिसर में नशीले पदार्थ न आएं और कोई भी मांसाहारी आहार नहीं लाया जाए। विभूति भाई ने बहुत कृपा कर के कुंभ परिसर में ही तंबुओं के बने अपने बंगले में मुझे ठहराया था और साहित्य की नगरी इलाहाबाद के कई नामी साहित्यकार रोज शाम नियमित तौर पर इस तंबू में जमा होते थे और शराब के लंबे दौरों के बाद मुर्गे पकाये जाते थे। आधी रात के बाद जब यह आतिथ्य संपन्न होता था, तो मोटर बोट में बैठ कर कुछ पुलिस वाले बोतलों और हड्डियों का विसर्जन संगम में कर आते थे।
बगल में तत्कालीन डीआईजी त्रिनाथ मिश्रा का तंबू वाला बंगला था। यह वे ही मिश्रा जी हैं, जो बाद में सीबीआई के डायरेक्टर बने। यह विभूति नारायण राय की बहादुरी की एक कहानी है, जिसमें मुजरिम के तौर पर मैं भी शरीक हूं। इसलिए मुझे हैरत नहीं होती कि अगर विभूति नारायण राय ने अनिल राय अंकित को बचाने का जेहादी रास्ता अपना ही लिया है, तो वे आखिरी दम तक कोशिश करेंगे। मगर विभूति भाई मित्र हैं इसलिए उन्हें बता देना अपना फर्ज है कि जेहादियों का आखिर में होता क्या है? अंकित पुराना चोर है और चोरी के लिए नया ठिकाना तलाश कर लेगा, मगर विभूति भाई आप नाहक शहीद हो जाएंगे।
(आलोक तोमर। युवा तेवर वाले वरिष्ठ जुझारू पत्रकार। जनसत्ता से पत्रकारीय फलक का विस्तार। राजनीति से लेकर अंडरवर्ल्ड तक पर उन्होंने कलम चलायी। फिलहाल सीएनईबी न्यूज चैनल से जुड़े हैं। उनसे aloktomar@hotmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)









आलोक जी, चोर गुरू और उसके संरक्षक का कुछ हो न हो आपने दमदार तरीके से बात रखी है।
janab aap kafi late ho gaye hain.ab to unhone(anil ji ne)nayi kitaben refrence ke sath chapwa lii hain,ab aap kuch nahi kar sakte.ek aur chalaki ho chuki hai.isliye ab kuch nahi bigad sakte.yehi bat aapko pehle se lagkar karni chahiye thi chidiyan chug gayi khet.
ankit ki chori pakadne ke liye s. s. kushwaha committee banai gayi hai..
kushwaha ji par bhi kuchh FIR lodged hai..
khas baat yah hai ki ankit ji bahut dambh k sath yah kahte fir rahe hai ki kushwaha mera kuchh nahin bigad lega…
jahir hai kushwaha se unki pyari si najdiki touch rahi hogi….
ab kitabon k naye edition k bad is chor ko pakadna mushkil hai….
deshwalon aise choron se bach k rahna..
Respected Tomar ji, sabse pehle maim clear kar dena chahta hu ki main ankit ka koi shubhchintak nahi hu aur mujhe bhi unke krityo se ghrina hai. Lekin aapne apne lekh me kuchh baate aisi likhi hain jinko or aap ka dhyan dilana jaruri hai. Ankit Mirzapur me nahi balki Jaunpur me padha rahe they. Raipur me ankit professor nahi balki reader they.Aap jaise kai thesis likhne wale vidwan ko ye anter samajhna chahiye. Aap ne likha hai ki ankit ki niyukti yuddh ke dino sainiko ki bharti se bhi tej hui. ye bhi galat hai. Form lagbhag ek sal pehle bhara gaya tha ya kam se kam 2008 me. interview jun 2009 me hua aur joining lagbhag ek mah bad july 09 me huyi thi. Aapne likha hai ki ankit ek hi tarikh me raipur aur wardha dono me professor they. ye bhi galat hai. Aap document check kar le. joinin ke samay wardha me ankit ne Raipur ka releaving certificate aur NOC submit kiya tha. jahir hai aapko kisi ne in galat tathyo ki suchna de kar gumrah kiya hai. Ab aate hain aap per. Aap Allahabad ke kumbh ki ghatna ka jikra karte huye vyang kiya ki vibhooti ji bade himmat wale hain. aap us samay to kumbh ke pavitra kshetra me murga aur daaru ka bhakshan karte rahe aur itne din bad uska majak bana rahe hain. kya ye achchha nahi hota ki aap us waqt iss baat ka khulasa karte ki ek jimmedar officer jiski jimmedari thi ki kumbh ke pavitra khsetra me mansahar aur madak padarth na istemal ho,khud hi aisa kam kar raha hai. aap aaj keval apne ko muzrim kah kar kaise bach sakte hai,jabkin clear hai ki aapne us woqt murg daaru ke liye ptrkarita ke peshe ki pavitrata tak pe rakh di. issi prakar aap ne ankit ke baare to chori ka aarop lagaya hai lekin un choro ka name kyo nahi disclose karte jinki thesis kathit taur pe aapne likhi iske sahare ve aaj universities me padha rahe hain. wo kaun sa bauddhik gyan denge. is liye ankit se koi matlab na hote huye bhi jab aap jaise log unpe koi comment karte hain to koft hoti hai. apne apne khsetra me sabhi chor hain chahe ankit ho ya aap.
“अपने विभूति भाई खतरों के खिलाड़ी है। साहित्य में भी और जीवन में भी। बहुत साल पहले जब इलाहाबाद में पूर्ण कुंभ हुआ था तो विभूति कुंभ जिले के पुलिस अधीक्षक थे। कानून और व्यवस्था के अलावा उनका काम यह भी था कि मेला परिसर में नशीले पदार्थ न आएं और कोई भी मांसाहारी आहार नहीं लाया जाए। विभूति भाई ने बहुत कृपा कर के कुंभ परिसर में ही तंबुओं के बने अपने बंगले में मुझे ठहराया था और साहित्य की नगरी इलाहाबाद के कई नामी साहित्यकार रोज शाम नियमित तौर पर इस तंबू में जमा होते थे और शराब के लंबे दौरों के बाद मुर्गे पकाये जाते थे। आधी रात के बाद जब यह आतिथ्य संपन्न होता था, तो मोटर बोट में बैठ कर कुछ पुलिस वाले बोतलों और हड्डियों का विसर्जन संगम में कर आते थे।”
यह उदाहरण काफी है विभूति नारायण राय के असली चरित्र को बताने के लिए। आलोक तोमर जी को इसके लिए बधाई।
अब “शहर में कर्फ्यू” के असली पन्ने भी उधेड़े जाएं। वर्धा के पूरे प्रसंग में विभूति नारायण राय का जो चरित्र खुल कर सामने आया है, उससे हम क्यों यह नहीं मान लें कि महज एक किताब “शहर में कर्फ्यू” की वसूली जा रही कीमत भी एक खोखली बुनियाद पर टिकी है। क्या इसमें कोई शक की गुंजाईश है कि इस किताब का सहारा विभूति नारायण राय ने पूरी तरह से प्रायोजित तरीके से लिया था? क्या ऐसा संभव नहीं है कि ऐसा जातिवादी और भ्रष्ट चरित्र का मालिक अगर इस तरह की किताब लिखता है तो उसने किसी गरीब लेखक को पैसे देकर किताब लिखवा लिया होगा?
यूरोपीय देशों में तो ऐसा खूब होता है कि कुछ पैसे भुगतान करके किसी निर्धन लेखक की किताब कोई तेल बेचने वाली कंपनी का मालिक हथिया लेता है और रातो-रात लेखक बन जाता है। जो हो, विभूति नारायण राय ने निश्चित तौर पर सोच-समझ कर एक किताब के सहारे हिंदी की दुनिया में अपनी जगह बनाई और “किसी तरह” यहां तक पहुंचे हैं। बहुत सारे हिंदी वाले महान कविताएं लिखते और उसके उलट भयानक जातिवादी और सांप्रदायिक, घनघोर अत्याचारी चरित्र लेकर जीते मिल जाएंगे। अब विभूति नारायण जैसे तमाम लोगों के इस तरह के पाखंड पर भी लोगों को सोचना होगा।
जै हो।
आलोक तोमर जी आप किसके साथ मित्रता का धर्म निभा रहे हैं- विभूति नारायण राय के साथ या कुछ कुंठित लोगों के साथ? आप लिखते हैं विभूति भाई पढ़ने-लिखने वाले आदमी हैं,पर लगता है आपने पढना-लिखना छोड़ दिया है क्योंकि एक तो आप बार-बार एक ही बात दुहरा रहे हैं और आपको लिखने के लिए फैक्ट की भी सही जानकारी नहीं है,लिखने के लिए पहले अपने फैक्ट सुधार लिजिए.वैसे भी लगता है आप CNEB के बंद होने से पहले भी अपना आपा खोने लगे हैं.कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको चैनल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है?
आलोक तोमर जी के लेखन के लिए बधाई ! उनके ‘कुंभ प्रसंग’ पर एक ताजा वाकया हम बताना चाहते हैं। दि. 29, 30 और 31 जनवरी को हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में ‘कथा समय’ का आयोजन हुआ। इसमें असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, संजीव, गंगा प्रसाद विमल, वीरेन्द्र यादव, भगवान दास मोरवाल, सूरज प्रकाश, अजीत राय (साहित्यिक दलाल), तेजेन्द्र शर्मा, वंदना राग समेत कई हस्तियों ने गांधीजी की भूमि को धन्य किया। हिंदी विश्वविद्यालय आर्डिनेन्स के अनुसार विश्वविद्यालय परिसर में मांसाहार (नॉनवेज) वर्जित है। दि. 30 जनवरी को महात्मा गांधी की पूण्यतिथि भी है। लेकिन गांधी के नाम पर, गांधी की भूमि पर स्थापित इस विश्वविद्यालय में 30 जनवरी की रात खुलेआम ‘नानवेज पार्टी’ का आयोजन हुआ, जिसमें उपर्युक्त लोगांे सहित विश्वविद्यालय के कई प्राध्यापकों, छात्रों, कर्मचारियों ने गांधीजी के प्रति अपनी ‘श्रद्धांजलि’ व्यक्त करते हुए ‘नॉनवेज’ का लुत्फ उठाया। उसमें महामहिम कुलपति श्री. विभूति नारायण राय भी शामिल थे। भोजन से पूर्व सोमरस-पान कुलपति आवास पर ‘खास अतिथियों’ के लिए पहले ही संपन्न हो चुका था। हम यह बताना जरूरी नहीं समझते कि वर्धा में शराब पर पूर्णतः कानूनी रोक है।
आलोक तोमर जी के लेखन के लिए बधाई! उनके ‘कुंभ प्रसंग’ पर एक ताजा वाकया हम बताना चाहते हैं। दिनांक 29, 30 और 31 जनवरी को हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में ‘कथा समय’ का आयोजन हुआ। इसमें असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, संजीव, गंगा प्रसाद विमल, वीरेंद्र यादव, भगवान दास मोरवाल, सूरज प्रकाश, अजीत राय (साहित्यिक दलाल), तेजेंद्र शर्मा, वंदना राग समेत कई हस्तियों ने गांधीजी की भूमि को धन्य किया। हिंदी विश्वविद्यालय आर्डिनेंस के अनुसार विश्वविद्यालय परिसर में मांसाहार (नॉनवेज) वर्जित है। दिनांक 30 जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि भी है। लेकिन गांधी के नाम पर, गांधी की भूमि पर स्थापित इस विश्वविद्यालय में 30 जनवरी की रात खुलेआम ‘नानवेज पार्टी’ का आयोजन हुआ, जिसमें उपर्युक्त लोगों सहित विश्वविद्यालय के कई प्राध्यापकों, छात्रों, कर्मचारियों ने गांधीजी के प्रति अपनी ‘श्रद्धांजलि’ व्यक्त करते हुए ‘नॉनवेज’ का लुत्फ उठाया। उसमें महामहिम कुलपति श्री विभूति नारायण राय भी शामिल थे। भोजन से पूर्व सोमरस-पान कुलपति आवास पर ‘खास अतिथियों’ के लिए पहले ही संपन्न हो चुका था। हम यह बताना जरूरी नहीं समझते कि वर्धा में शराब पर पूर्णतः कानूनी रोक है।
होशियार! वर्धा विश्वविद्यालय में अगले महीने शैक्षणिक पदों हेतु साक्षात्कार आरंभ हो रहे हैं। जोड़ घटाव गुणा भाग जारी है। पासे फेंके जा रहे हैं, गणित भिड़ाए जा रहे हैं। मार्केट में पहले से ही कई नामों के भाव चढ़ उतर रहे हैं। पता चला है कि ‘राइटर इन रेजिडेन्स’ आलोकधन्वा भी ‘किंग मेकर’ की भूमिका में हैं। आजकल इंटरव्यू के लिए प्रतीक्षित प्रत्याशी विवि गेस्ट हाउस में ‘दादा’ (आलोकधन्वा) से रोज आर्शीवाद लेते हैं… और सुनिए, ‘चोर गुरू‘ भी अपने चेलों के चयन के लिए लगा हुआ है। बाप रे! जनसंचार विभाग में अभी तो एक ही है, और आ जाएं तो सीएनईबी का काम बढ़ जाएगा। विभूति जी भी चोर गुरू के खानदान को फलने-फूलने से क्यों रोकेंगे। हां, छात्रों की चिंता किसे है! यदि किसी छात्र ने चूं-चपड़ किया तो सीधा ‘रस्ट्रीकेशन’!!
hamane bhi suna, alok dhanva is jod-guna ganit ke liye calculator bane hue hai. unke pichhe chelo ki bhid lagi huee hai.
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