कोइराला का निधन नेपाल के लिए ‘अप्रत्यक्ष वरदान’

Girija Prasad Koirala

नयी दिल्ली, 20 मार्च। नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला के निधन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और नेपाली राजनीति के जानकार आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा है कि कोइराला का निधन नेपाल के लिए ‘अप्रत्यक्ष वरदान’ (ब्लेसिंग इन डिसगाइज) साबित हो सकता है और वहां की राजनीति में आया ठहराव समाप्त हो सकता है। श्री वर्मा ने यह बात बीबीसी लंदन की हिंदी समाचार सेवा के साथ एक भेंटवार्ता में कही।

बीबीसी द्वारा यह पूछे जाने पर कि कोइराला की मृत्यु का भारत-नेपाल संबंधों पर कितना असर पड़ेगा, श्री वर्मा ने कहा कि ‘जहां तक दोनों देशों के संबंधों की बात है, उनके न रहने से बहुत ज्यादा फर्क नही पड़ेगा क्योंकि वह रिप्लेसमेंट भारत ने पहले से ही ढूंढ लिया था। भारत ने जब देखा कि गिरिजा प्रसाद कोइराला काफी अस्वस्थ हैं और उनकी प्रासंगिकता भी धीरे धीरे कम होती जा रही है, तो जैसा कि दस्तूर है ऐसी सरकारों के लिए जो दूसरे देशों में अपने लिए जगह ढूंढती है, भारत ने भी ऐसा किया। उसने माधव नेपाल के रूप में जीपी कोइराला का एक रिप्लेसमेंट ढूंढ लिया है।’

बीबीसी ने उनसे सवाल किया कि माओवादियों से निपटने में नेपाली कांग्रेस का नेतृत्व और खासकर जीपी कोइराला की छवि काफी काम आ रही थी। अब जब वो नहीं रहे, तो माओवादियों के खिलाफ जो लड़ाई है उसे अगर भारत के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो कैसे आप देखते हैं?

इसके जवाब में श्री वर्मा ने कहा कि ‘इस संदर्भ में गिरिजा प्रसाद कोइराला की भूमिका बहुत मिलीजुली रही है। 2006 से पहले जब वह सत्ता में थे, उस समय माओवादियों के खिलाफ उन्होंने काफी दमन चलाया था। किलो सेरा टू नामक अभियान के दौरान माओवादियों का जो दमन हुआ, वह जीपी कोइराला के समय ही हुआ था। लेकिन 12 सूत्री समझौते के साथ जो शांति प्रक्रिया शुरू हुई, माओवादियों के साथ सात पार्टियों के गठबंधन से, उसमें भी गिरिजा प्रसाद कोइराला की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी। फिर जनआंदोलन के बाद 2006 में जो विस्तृत शांति समझौता हुआ, उसमें भी कोइराला की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी। प्रधानमंत्री की हैसियत से उन्होंने और एक विद्रोही नेता के रूप में प्रचंड ने समझौते पर हस्ताक्षर किये थे।’

प्रश्नकर्ता ने उनसे जानना चाहा कि सेना में माओवादियों के शामिल किये जाने के सवाल पर शांति प्रक्रिया में जो गतिरोध पैदा हो गया है, उसके बारे में अब आप क्या सोचते हैं?

इसके जवाब में श्री वर्मा ने कहा कि ‘कोइराला के निधन से जो शून्य पैदा हुआ है, उससे निश्चित तौर पर नेपाल में कुछ समस्याएं पैदा हो सकती हैं लेकिन मैं मानता हूं कि इसे नेपाल के लिए एक ब्लेसिंग इन डिस्गाइज (अप्रत्यक्ष वरदान) कहा जा सकता है। अभी जो एक गतिरोध, एक ठहराव की स्थिति पैदा हो गयी थी, कई दिनों से नेपाली सेना के वक्तव्य देखने को मिल रहे हैं, जिनमें सेना के साथ जनमुक्ति सेना के एकीकरण को लेकर बेचैनी झलकती है। अब मुझे लगता है कि ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज होगी। यह गतिरोध टूटेगा और लड़ाई किसी न किसी सिरे पर पहुंचेगी। या तो सेनाओं का एकीकरण सुचारू रूप से होगा या पीएलए और सेना के बीच मुठभेड़ होगी।’

Anand Swaroop Verma(आनंद स्‍वरूप वर्मा। एक पंक्ति में आजकल इन्‍हें नेपाली मामलों का जानकार का कहा जाता है। आनंद स्‍वरूप वर्मा भारत में कॉरपोरेट पूंजी के बरक्‍स वैकल्पिक पत्रकारिता के लिए लंबे समय से संघर्षरत हैं। समकालीन तीसरी दुनिया पत्रिका के संपादक हैं और नेपाली क्रांति पर उन्‍होंने अभी अभी एक डाकुमेंट्री फिल्‍म बनायी है। आनंद जी ने कई किताबें भी लिखी हैं।)

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