सचमुच क्‍या इतनी ही खोखली है हमारी डेमोक्रेसी

ये एक पेंटिंग बड़ी दिलचस्‍प है, जो हम मोहल्‍ला लाइव के पाठकों के लि‍ए विशेष तौर पर छाप रहे हैं। होता यह है कि हम इंडियन डेमोक्रेसी के कई विद्रूपों को दिखाने के लिए लेख छापते रहते हैं। फिर भी बातें श्रोता समाज के दिलों में नहीं उतर पाती। किसी विद्वान ने कभी यह बता दिया था कि एक तस्‍वीर हजार शब्‍दों के बराबर होती है। हम इसी सूत्र का सिरा पकड़ कर एक पेंटिंग आपसे शेयर कर रहे हैं। पें‍टर हैं संजय कुमार तिवारी। ये कोई पेशेवर चित्रकार नहीं हैं। पेशे से चार्टर एकाउंटेंट हैं, लेकिन शब्‍द, समाज और संवेदना में ऐसे डूबे रहते हैं कि कभी जंगल-पहाड़ की ओर निकल पड़ते हैं, तो कभी कूची ले‍कर महीनों कैनवास के सामने बैठे रहते हैं। ये जो पेंटिंग आप यहां देख रहे हैं, इसमें कई कमाल हैं। संसद देश के गरीब-मजलूम ढो रहे हैं। उस पर इलीट क्‍लास की मैम सवार हैं। अमेरिकी साम्राज्‍यवाद का नुमाइंदा उन्‍हें अपने भाले की नोंक पर रखे हुए है। भारतीय गणतंत्र का प्रतीक अशोक स्‍तंभ अमेरिका और यूरोपीय संघ के चिमटानुमा झंडों के बीच अटका पड़ा है और डेमोक्रेसी के इस पूरे ड्रामे से बाहर है मुस्लिम समाज। उनकी औरतें बगैर चेहरों के पेंटिंग में दिख रही हैं। दूसरी तरफ चीन इस पूरे माजरे को इत्‍मीनान से देख रहा है। मैंने देखा तो मुझे लगा कि दरअसल यही बात है – इतनी ही खोखली है हमारी डेमोक्रेसी : मॉडरेटर

sanjay tiwari painting democracyकलाकार : संजय कुमार तिवारी, ए 101, माता सुंदरी रोड, नयी दिल्‍ली 110002

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