गांधी की ही तरह कानू के लिए भी जगह नहीं थी

♦ विश्‍वदीपक

‘कांग्रेसी शासन के 25 साल बाद भी जनता के सामने सिर्फ और सिर्फ अंधकार छोड़कर कुछ नहीं। 41.2 फीसदी लोग हमेशा भुखमरी की हालत में रहते हैं, जिनकी मासिक आय 20 रुपये से कम है…

भूख और कष्ट से मरना भारत में आम बात हो गयी है। यहां तक कि यहां विद्वान वैज्ञानिक भी आत्महत्या करते हैं। ’

(पार्वथीपुरम नक्सलवादी षडयंत्र केस के मुकदमे में विशाखापट्टनम में स्पेशल मजिस्ट्रेट की अदालत में कानू का 31 मई 1973 को दिया बयान। वीर भारत तलवार की किताब नक्‍सलबाड़ी के दौर में से लिया गया संदर्भ)

kanu_sanyal_outlook

…तो कॉमेरेड कानू सान्याल ने आत्महत्या ही की है? अदालत के सामने कानू ने जो बयान 31 मई, 1973 को दिया था, उसे 37 साल बाद अपने ही उदाहरण से सही साबित कर दिखाया। ऐसा लगता है कि नियति के साथ अपने साक्षात्कार में कानू ने 23 मार्च को अपनी मौत की तिथि के तौर पर मुकर्रर किया था और जिंदगी में किये गये दूसरे वायदों की तरह उन्‍होंने उसे पूरा भी किया। मुझे यकीन है, कानू ने मरते वक्त ‘इंकलाब जिंदाबाद’ ‘भगत सिंह जिंदाबाद’ का नारा लगाया होगा। अगर भाव और विचारों का पोस्टमार्टम करने की कोई तकनीक होती, तो इस बात की पुष्टि हो जाती कि कानू के दिमाग में मरते वक्त भगत सिंह की ही तस्वीर रही होगी।

कानू के दिमाग में भगत सिंह की तस्वीर ही नहीं थी, भगत सिंह का तरीका भी था। कानू जहर भी खा सकते थे लेकिन उन्होने जानबूझ कर फांसी का विकल्प अपनाया। बस जरा सा फर्क रह गया। 23 मार्च 1931 लाहौर सेंट्रल जेल में (अब पाकिस्तान) को भगत सिंह को फांसी पर चढ़ाने वाले दूसरे थे – गोरों की एक प्रजाति थी और कानू सान्याल को फांसी लगाने के लिए मजबूर करने वाले देशी प्रजाति के हैं, जिसे भगत सिंह ‘काले अंग्रेज’ कहते थे।

कुलदीप नैयर ने अपनी किताब The Martyr Bhagat Singh – Experiments in Revolution में लिखा है कि मरने से दो घंटे पहले भगत सिंह के वकील प्राणनात मेहता को उनसे मिलने की इजाजत दी गयी थी।

मेहता ने उनसे पूछा कि देश के नाम वो क्या संदेश देना चाहेंगे?
किताब से बिना नजरें उठाये भगत सिंह ने कहा, ‘साम्राज्यवाद का नाश’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’…
मेहता – ‘क्या आपकी कोई इच्छा है?’
भगत सिंह – ‘हां, मैं इस देश में दोबारा जन्म लेना चाहूंगा ताकि मैं इसकी सेवा कर सकूं।’

अगर कानू फांसी लगाने से ऐन पहले किसी को खुद से मिलने की इजाजत देते तो साबित हो जाता कि उनकी आखिरी ख्वाहिश वही थी, जो भगत सिंह की थी।

गलत हैं वो लोग, जो कहते हैं कि कानू ने अवसाद और निराशा में मौत को गले लगाया है। मरने से पहले कानू ने दोपहर का खाना खाया था और फिर सुकून से मौत को गले लगाया। ऐसी विश्रांत मौत का इंतजार कोई क्रांतिवीर ही कर सकता है। (हालांकि ये बात सही है कि अगर कानू की जगह गांधी परिवार का कोई कुत्ता भी मरा होता, तो ज्यादा चर्चा होती। हो सकता है किसी घाट में या किसी वन में उसके लिए शोकसभा आयोजित की जाती… बहरहाल, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दिमाग कानू की मौत के बाद लकवाग्रस्त हो गया था। कानू के लिए मीडिया को कोई विशेषण सूझ नहीं रहा था)।

कॉमरेड कानू ने निराशा और परेशानी में नहीं बिल्कुल सुचिंतित तरीके से मौत का फैसला किया था। आत्महत्या का उनका फैसला सौ फीसदी राजनीतिक फैसला है – उतना ही सार्वजनिक जैसी उनकी जिंदगी थी। ये बात अलग है कि अब इसके बाद वो कोई और फैसला नहीं ले पाएंगे। लेकिन इसके असर से इनकार नहीं किया जा सकता। भगत सिंह के शहीद दिवस के दिन मौत को गले लगाकर कानू ने जो संदेश देना चाहा है, उसमें वो सफल साबित हुए हैं। जिस ‘प्यारी मातृभूमि भारतवर्ष’ (प्रसिद्ध ‘पार्वथीपुरम नक्सलवादी षडयंत्र केस’ के मुकदमे के दौरान कानू ने भारत (जिसे मनमोहन सिंह और राहुल गांधी ‘इंडिया’ बनाने पर तुले हैं) की तकदीर बदलने का सपना कानू ने देखा था, उसे पूरा करने के लिए ही उन्‍होंने मौत का रास्ता अपनाया। कानू की मौत उनकी आखिरी सफलता थी। और यही उनका आखिरी प्रतिरोध भी था।

हम लोगों की याददाश्‍त को जैसे काठ मार गया (मास हिस्टीरिया का ऐसा नमूना और कहां किस देश समाज में मिलेगा?) लेकिन कानू को बखूबी याद था कि 23 मार्च भगत सिंह का शहीद दिवस है। इतिहास को बदलने वाली तवारीखों और घटनाओं का महत्व कानू को बखूबी पता था। ये अकारण नही है कि कानू ने चारू के साथ मिलकर लेनिन के जन्‍मदिवस पर 1969 में एमएल की स्थापना की थी और जब मरने की बारी आयी तो उन्‍होंने भगत सिंह के शहीद दिवस का चुनाव किया।

कानू इस बार मौका चूकना नहीं चाहते थे। जिस जिंदगी को पिछले 78 साल से तलाश रहे थे, उसे वो अगले एक साल तक भी ढोने के मूड में नहीं थे। उन्‍हें मालूम था कि अगर इस बार चूक गये, तो फिर 2011 का इंतजार करना पड़ेगा। तब तक गंगा थोड़ा और सूख जाएगी और रावी का पानी थोड़ा और गंदला हो जाएगा। लिहाजा नक्सलबाड़ी आंदोलन के जनक और चारू मजूमदार के दोस्त कानू सान्याल ने चारू की मौत के ठीक 38 साल बाद (चारू की मौत 17 जुलाई 1972 को अलीपुर सेंट्रल जेल में हुई थी) 23 मार्च की दोपहर जब नक्सलबाड़ी के आसमान पर सूरज चमक रहा था, इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

कानू की मौत ने वक्त को दो पाटों में बांच दिया है। समय वैसा ही नहीं रह गया जैसे वो 24 घंटे पहले था। आज के बाद इतिहास में ये तारीख इसलिए भी याद की जाएगी कि इस दिन भगतसिंह शहीद हुए थे, कि इस दिन कानू सान्याल शहीद हुए थे, कि इस दिन पाश शहीद हुए थे। (अगर इतिहास लिखने का काम कांग्रेसी मार्क्सवादियों और राष्‍ट्रवादियों ने नहीं किया तो)।

लोग कहते हैं – कानू नक्सलवाद/माओवाद (कृपया नक्सलवाद और माओवाद के बीच क्लासिकल विभेद न करें) के भटकाव से परेशान और क्षुब्ध थे। इसीलिए उन्‍होंने आत्महत्या की। अक्सर बीबीसी और आलोक पुतुल के साथ कानू के उस इंटरव्यू को भी कोट किया जाता है, जिसमें कानू ने माओवादियों को ‘आतंकवादियों’ की संज्ञा दी थी – लेकिन क्या ये पूछा जा सकता है कि अगर हम और आप जिंदा हैं तो क्यों? क्या हमारा ‘जीना’ किसी गहन आस्था या जीवन के बेहद खूबसूरत होने का परिणाम है या फिर हम महज इसलिए जिंदा हैं कि हम संवेदनाशून्य हो चुके हैं। और हमारे अंदर आत्महत्या करने का भी दम नहीं है।

इमाइल दुर्खीम बोलता था कि आत्महत्या वैयक्तिक नहीं, सार्वजनिक मामला है और कानू ने इसे सही साबित कर दिखाया। कानू की मौत हम सबकी मौत है। क्या पता अगर दुर्खीम जिंदा होता, तो वो अपनी किताब में कानू का उदाहरण भी शामिल करता।

एक बात और याद रखना चाहिए कानू की आत्महत्या हमारे खिलाफ कानू की नाराजगी तो थी ही, खुद कानू के खिलाफ उनका स्वयं का विद्रोह भी था। यही वो बिंदु है, जहां पर कानू भगत सिंह से अलग हो जाते हैं। चाहकर भी वो भगत सिंह नहीं बन सकते – भले ही उन्‍होंने मरने के लिए वही तरीका और तारीख अपनाया, जो भगत सिंह का था।

कानू बुनियादी रूप से हिंसा के खिलाफ नहीं थे। न ही हो सकते। रणनीतिक रूप से वो फिलवक्त हिंसा की खिलाफ थे लेकिन ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ माइंड सेट वाले लोगों को कानू के इस वक्तव्य का प्रचार-प्रसार ऐसे किया, जैसे वो हिंसा के विचार के ही खिलाफ थे। अगर हिंसा के आधार पर कानू के विचार को ढाल बनाकर राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के औजार के तौर पर हिंसा को खारिज किया जाता है, तो भगत सिंह को भी खारिज करना होगा। अगर कानू मूल रूप से हिंसा के खिलाफ हुए होते, तो नक्सलबाड़ी न हुआ होता और न ही कानू सान्याल से हम परिचित हुए होते। और कानू ने रणनीतिक तौर पर ही सही, ये बात नहीं कही होती, तो शायद उन्‍हें आत्महत्या का रास्ता नहीं अपनाना पड़ता। तब कानू मारे जाते और हम उन्‍हें शहीद कहते।

आखिर में एक बात और… अब जबकि कानू नहीं हैं, हम उन्‍हें क्या नक्सलवादी-गांधीवादी कहने का साहस जुटा सकते हैं?

ठीक गांधी की तरह कानू भी एक तरह से पार्टीविहीन हो गये थे। वो मार्क्सवादी होते हुए भी गांधीवादी होते जा रहे थे। जैसे आज किसी भी ‘गांधी’ (सिवाय राहुल गांधी) के लिए कोई जगह नहीं है, ठीक उसी तरह कानू के लिए भी स्पेस सिकुड़ रहा था। और यही वजह है कि उन्‍हें आखिर में जान देनी पड़ी।

Vishwadeepak copy(विश्‍वदीपक। तीक्ष्‍ण युवा पत्रकार। आजतक से जुड़े हैं। रीवा के रहने वाले विश्‍वदीपक ने पत्रकारिता की औपचारिक पढ़ाई आईआईएमसी से की। विश्‍व हिंदू परिषद के डॉन गिरिराज किशोर से लिया गया उनका इंटरव्‍यू बेहद चर्चा में रहा। उनसे vishwa_dpk@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *