तुकनवाजी के दौर में

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भाषाई विविधता और वैचारिक असहमतियों का सम्‍मान करने वाले विलक्षण पत्रकार। पहले रंगकर्मी। राजस्‍थान पत्रिका से पत्रकारीय करियर की शुरुआत। वहां से प्रभाष जी उन्‍हें जनसत्ता, चंडीगढ़ संस्‍करण में स्‍थानीय संपादक बना कर ले गये। फिलहाल जनसत्ता समूह के कार्यकारी संपादक। उनसे om.thanvi@ expressindia.com पर संपर्क किया जा सकता है।

♦ ओम थानवी

दिल्ली की मुख्यमंत्री आहत हैं। पिछले पखवाड़े शरद यादव के घर एक समारोह में मिलीं तो उनकी बेरुखी जाहिर थी। प्रगति मैदान के सामने रहती थीं, तब नाश्ते पर बुलाया था। मोतीलाल नेहरू मार्ग वाले बड़े घर में आ गयीं तो खाने पर बुलाया। खाने से लेकर घर की सजावट तक में उनकी सुरुचि से मैं बड़ा प्रभावित हुआ। तारीफ की। मगर कृष्ण बलदेव वैद के प्रति उनके बर्ताव पर टीका करना भी अपना फर्ज समझा।

फिर हिंदी अकादमी में वे अशोक चक्रधर को उपाध्यक्ष बना कर ले आयीं। साहित्य से चक्रधर का कोई लेना-देना नहीं है। मुक्तिबोध पर कभी पीएचडी जरूर की थी। जामिया में पढ़ाने भी लगे। लेकिन मशहूर हुए हास्यकवि के नाते। तुकों में उन्हें महारत हासिल है। इसी के चलते चुनाव में कांग्रेस के नारे लिखे। पुरस्कार में दो संस्थाएं मिलीं – हिंदी अकादमी और केंद्रीय हिंदी संस्थान। शीला दीक्षित पर उनके तुकांत जादू का असर था या स्वयं के अल्पज्ञान का जोर, कि सरे मंच महात्मा गांधी की अमर कृति ‘हिंद स्वराज’ को अशोक चक्रधर का लिखा बता आयीं। इस विराट भूल का कभी सुधार भी नहीं किया।

मैं उन्हें पढ़ा-लिखा समझता था। डॉ रामविलास शर्मा और त्रिलोचन जी के सम्मान में उनके घर गयीं तो संवेदनशील भी लगीं। लेकिन शलाका सम्मान के निर्णय को रुकवाने से निर्णायक समिति के साथ-साथ शलाका पुरुष कृष्ण बलदेव वैद का जो अपमान हुआ, वह बहुत नागवार गुजरा। अशोक चक्रधर की ताजपोशी से मोहभंग ही हो गया।

फिर इसी हफ्ते चक्रधर मिले। खिसियानी हंसी, बात-बात में तुकें खोजते – ‘रम, जिसमें है दम!’ – उन्होंने तुक्का चलाया : मुझे मालूम है, वैद प्रकरण में छप रही खबरों के पीछे कौन है। इस तरह की संशयात्मा वृत्ति से अच्छी तरह वाकिफ हूं। जब खुद शक के घेरे में खड़े हों तो दूसरों पर साजिश मढ़ने को छोड़कर और कुछ सूझता नहीं। मैंने कहा – आपका इशारा मेरी तरफ है, या अशोक वाजपेयी की तरफ? वे सकपका गये। बोले, किसी का नाम नहीं ले रहा हूं। पर कोई इस सबके पीछे है जरूर।

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मंच के आदमी की जुबान कुछ न कुछ बोलने को मचलती है। वरना वैद विवाद अकादमी में चक्रधर के आसीन होने के पहले का है। तब मुकुंद द्विवेदी उपाध्यक्ष थे। अपने से पहले के विवाद पर चुप रहना विवेकसम्मत होता। लेकिन उन्होंने अखबारों में बयान दिये। लोगों से मिले तो वैद के साथ किये गये सलूक के खिलाफ लेखकों के खड़े होने को शक से देखा। जनसत्ता में खबरें छपती रहीं तो इसे ‘अभियान’ समझा गया।

षड्यंत्र-संधान जैसे हिंदी में आम प्रवृत्ति हो गयी है। एक और लेखक मिले, जो केदारनाथ सिंह के साहसिक कदम को स्वैच्छिक मानने को तैयार न थे। संबंधों को जानते हैं, इसलिए शक की सुई शायद हमारी तरफ डोल रही होगी। पुरुषोत्तम अग्रवाल के निर्णय के पीछे अशोक वाजपेयी की ‘प्रेरणा’ ढूंढ़ने वाले शंकालु भी मिले।

वैसे यह अपने में अजीब बात थी कि प्रस्तावित पुरस्कारों को स्वीकार करने की सम्मति देकर लेखकों ने एक बड़े लेखक के अपमान को पहले चुपचाप बर्दाश्त कर लिया था। दो वर्षों के पुरस्कारों की एक साथ हुई घोषणा के दो रोज बाद पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अखबारों को फैक्स भिजवाया कि वे पुरस्कार लेने से इनकार कर रहे हैं ; अकादमी अपनी कार्यकारिणी (निर्णायक) समिति का फैसला बहाल करे तभी स्वीकार करेंगे। उन्हें इक्कीस हजार का पुरस्कार घोषित हुआ था।

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इस प्रतिक्रिया की खबर पढ़कर अगली सुबह कोलकाता से केदारनाथ सिंह का फोन आया। उन्होंने पुरस्कार लौटाने की मंशा जतायी। बाद में हमारे दफ्तर में फोन कर उन्होंने अपना बयान भी लिखवाया। बड़े कवि के नाते केदारजी शब्दों में तो किफायत बरतते ही हैं, जीवन में कहीं ज्यादा मितव्ययी माने जाते हैं। दो लाख रुपये के शलाका सम्मान को लेने से उनके इनकार के बाद शीला दीक्षित या अशोक चक्रधर के हाथों दस-बीस हजार रुपये लेने अब कौन जाता। देखते-देखते पुरस्कार लौटाने की घोषणाओं की झड़ी लग गयी। एक रोज अकादमी ने छोटा-सा इश्तहार अखबारों में छपवा दिया – पुरस्कार समारोह अपरिहार्य कारणों से रद्द किया जाता है।

हिंदी साहित्य में यह असाधारण घटना है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि निर्णायक समिति के निर्णय को किसी राजनेता ने चुनौती दी हो और दूसरे सत्ताधारी राजनेता ने निर्णय रद्द कर दिया हो। पुरस्कारों का निर्णय करना समिति का काम है, मुख्यमंत्री का नहीं। यह भी पहली बार हुआ जब साहित्यकार विचारों के भेद और धन की गरज से ऊंचे उठकर सरकार के फैसले के खिलाफ इस कदर एकजुट हो गये। बेहतर होता, वे अपने पुरस्कार की स्वीकृति ही न देते। आखिर वैद विवाद साल भर से खबरों में था। अकादमी की कार्यकारिणी और संचालन समिति के अनेकानेक सदस्य राजनीतिक दखलंदाजी के विरोध में त्यागपत्र दे चुके थे। अशोक चक्रधर को उपाध्यक्ष बनाने पर विरोध बहुत बढ़ गया। पुरस्कारों की स्वीकृति के वक्त वैद के मामले में हुए (या न हुए) अंतिम फैसले की दरियाफ्त की जा सकती थी।

भोली-सी सूरत बनाकर अशोक चक्रधर ने एक दिलचस्प बात कही – वैद को पुरस्कार देने से इनकार कब किया गया, उसकी तो घोषणा ही नहीं हुई। घोषणा क्यों नहीं हुई, जब कार्यकारिणी का निर्णय हो चुका था? संचालन समिति में अकादमी अध्यक्ष के नाते मुख्यमंत्री अपनी सम्मति दे चुकी थीं। पूरे एक साल बाद सर्वोच्च पुरस्कार को छोड़ कर बाकी पुरस्कारों की हू-ब-हू घोषणा कैसे हुई? चक्रधर का फिर चालाकी भरा बयान – वैद खुद कह चुके हैं कि शलाका सम्मान नहीं लेंगे। जब वही ठुकरा चुके तो देने न देने का सवाल ही कहां बचता है? इस पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए वैद जी ने अमेरिका से साफ किया कि झिझक के बावजूद अपनी स्वीकृति दे दी थी। लेकिन बाद में जिस तरह उनकी बेकदरी की गयी, उसके बाद कौन स्वाभिमानी ऐसा ‘सम्मान’ स्वीकार करेगा?

हिंदी अकादमी ने वैद को सर्वोच्च शलाका सम्मान के योग्य समझा। फिर उनकी एक रचना किसी छुटभैये नेता के पत्र के आधार पर ‘पोर्न’ यानी यौनकुत्सा से लिप्त मान ली। इस बिना पर प्रस्तावित सम्मान रोक लिया। यह कृत्य कृष्ण बलदेव वैद, सम्मान का निर्णय करने वाले बौद्धिक समूह, लेखक बिरादरी और वैद के अपने पाठक समुदाय का अपमान है, जो उन्हें इज्जत से पढ़ता है। हो सकता है, किसी रचना को वे पसंद न कर पाएं। लेकिन इससे क्या लेखक के समग्र योगदान को नजरअंदाज किया जा सकता है?

तथ्यों के मामले में बड़बोले प्रवक्ता गुमराह न करें, इसलिए जरा हिंदी अकादमी की फाइल के तथ्य देखें। पुरस्कारों का निर्णय कार्यकारिणी समिति करती है। इस सिलसिले में समिति की बैठक पिछले साल 26 फरवरी को हुई। बैठक की कार्यवाही रपट के मुताबिक डॉ मुकुंद द्विवेदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में सदस्य सचिव ज्योतिष जोशी के अलावा डॉ नित्यानंद तिवारी, डॉ विभा गुप्ता, अर्चना वर्मा, सुरेंद्र शर्मा और अमरनाथ ‘अमर’ मौजूद थे। ‘विचार-विमर्श के बाद समिति ने निम्नलिखित निर्णय लिए… शलाका सम्मान : 2008-2009 के लिए प्रस्तावित नामों पर विचार-विमर्श करके सर्वसम्मति से श्री कृष्ण बलदेव वैद को शलाका सम्मान से सम्मानित करने का निर्णय लिया गया।’

ठीक एक महीने बाद हुई अकादमी की संचालन समिति की बैठक में मुख्यमंत्री ने कार्यकारिणी समिति के निर्णय को औपचारिक स्वीकृति दे दी। पुरस्कृत लेखकों की लंबी सूची पर थोड़ी बहस हुई। पर उस वर्ष के लिए पूरी सूची को मुख्यमंत्री ने अंतत: मान लिया।

इसके चार रोज बाद, 31 मार्च 2009 को, कांग्रेसी नेता पुरुषोत्तम गोयल ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा कि ‘… श्री कृष्ण बलदेव वैद पोर्न साहित्य की रचना करते रहे हैं, जो कि स्तरहीन और अमर्यादित है। यह इस महान पुरस्कार को ओछा बनाता है, नीचा गिराता है और पुरस्कार की गरिमा और भव्यता को कलंकित करता है…’ आगे वैद के उपन्यास ‘नसरीन’ (पत्र में ‘नस्सरीम’) का प्रमाण बताते हुए एक पृष्ठ पर प्रयुक्त मां की गाली को उद्धृत किया गया है।

गोयल के पत्र में यह गाली इतने भारी हर्फों में टंकित है कि उसे बगैर संदर्भ के पढ़े तो एक दफा पुरुष भी चौकेंगे। पत्र के अंत में गोयल ने यह भी लिखा कि ‘… इस आदमी ने श्री अशोक वाजपेयी की शराब संस्कृति के संबंधों के चलते इस पुरस्कार की सिफारिश करवा ली। इसके लिए अकादमी के सचिव के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।’

लेकिन गोयल ने तमाम आरोपों के साथ यह भी लिखा कि विवादास्पद उपन्यास अंश की जांच किसी ‘निष्पक्ष और स्वतंत्र विशेषज्ञ’ से करवा लें। अव्वल तो निर्णायक समिति आप विशेषज्ञ समिति होती है। गोयल के लिखे (या लिखवाये) पत्र को रद्दी की टोकरी के हवाले कर देना चाहिए था। लेकिन मुख्यमंत्री ने पत्र के आधार पर अपनी सरकार के सर्वोच्च साहित्य सम्मान को रोक लेने का निर्देश दिया। गोयल का लिहाज किया, मगर किसी ‘विशेषज्ञ’ की राय उन्होंने नहीं ली।

दुर्भाग्य से हमारे यहां यौन विषय को ही अश्लीलता का पर्याय मान लिया जाता है। अनेक नाटकों और फिल्मों को इस दकियानूसी मानसिकता से जूझना पड़ा है। हिंदी साहित्य में भी आधा गांव, राग दरबारी, मित्रो मरजानी, यारों के यार जैसी प्रतिष्ठित कृतियों को कुछ प्रयोगों की वजह से विवाद में घसीटने के प्रयास होते रहे हैं। ‘आधा गांव’ में कुछ पात्रों की जुबान पर गांव की ठेठ गालियां थीं। वीवी जॉन के वक्त जोधपुर विश्वविद्यालय में उसे पढ़ाया जाने लगा। ऐसा हंगामा मचा कि बाद में उस तेवर की कृति पाठ्यक्रम में रखने की हिम्मत किसी ने शायद ही दिखायी होगी।

गोयल के उस पत्र पर मुख्यमंत्री ने अपने विशेष सचिव केशव चंद्र के लिए हाथ से लिखा : ‘केशव जी, एज वी स्पोक’। भावार्थ यह कि जैसी हमारी बात हो चुकी है, कार्रवाई करो। केशव चंद्र ने अकादमी सचिव को पत्र लिखा कि गोयल के पत्र को देखते हुए पुरस्कार की घोषणा रोक लें और उठायी गयी आपत्तियों पर अपना रुख पेश करें। सचिव ने लंबे-चौड़े जवाब में कई कृतियों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि संदर्भ से काटकर पढ़ें तो शलाका सम्मान पा चुके राजेंद्र यादव और कृष्णा सोबती के लिखे अंश भी अश्लील ठहराये जा सकते हैं। तत्कालीन सचिव के मुताबिक उस वक्त अधिकारी उनके पक्ष से संतुष्ट जान पड़े।

फिर पुरस्कार की अनुमति कहां जा अटकी? सचिव के जवाब पर मुख्यमंत्री की चुप्पी से यही मतलब निकाला जा सकता है कि उन्हें अपनी पार्टी के नेता के आरोप निर्णायक लेखकों और अकादमी सचिव के विचारों से ज्यादा भरोसेमंद जान पड़े। और यही विडंबना है।

संघ परिवार कला-साहित्य की अपनी ओछी समझ के लिए मशहूर है। लगता है जैसे कांग्रेसी नेता भी जब-तब उनसे होड़ लेने की कोशिश करते हों! एक दफा केंद्र के निवर्तमान गृहमंत्री शिवराज पाटील को मैंने निजी तौर पर सुझाया था कि मकबूल फिदा हुसेन के विवादग्रस्त चित्रों के मामले में चित्रकारों की समिति बनाएं और उनकी राय के बाद तय करें कि हुसेन का काम क्या सचमुच अश्लील है। पाटील खीझ कर बोले थे, ‘मैंने अपनी आंख से (हुसेन के) वे चित्र देखे हैं! जो शिकायत करने आये थे, चित्रों के बड़े-बड़े प्रिंट लाये थे।’

शीला दीक्षित शायद कहें, मैंने अपनी आंख से वैद का ‘अश्लील’ गद्य पढ़ा है; पुरुषोत्तम गोयल ने बड़े-बड़े हर्फों में उसे उद्धृत किया था!

काश, नेताओं के पास देखने और पढ़ने के लिए अपनी आंख होती।

दो शब्द लेखक बिरादरी के बारे में। लेखकों में पुरस्कार की लालसा बढ़ती जाती है। पहले लेखक ज्यादा मर्यादित थे। पुरस्कार भी ज्यादा नहीं थे। अब अपनी साख सुधारने के फेर में सरकारें और व्यापारिक घराने संस्कृति का नकाब ओढ़ते हैं। पुरस्कार इनमें सबसे कारगर उपाय है। बड़ी राशि लुभाती है। देने वाले को लागत से कई गुना ज्यादा कीमत का प्रचार बड़े लेखकों के नाम की वजह से मिल जाता है। राजनेता भी इसका पूरा लाभ उठाते हैं। अब लेखकों के नाम से अलग पुरस्कार स्थापित होने लगे हैं। साहित्य अकादेमी के आंगन में महा-कारोबारी सामसुंग की घुसपैठ ताजा मिसाल है। रवींद्रनाथ ठाकुर के नाम पर स्थापित सम्मान के प्रशस्ति-पत्र पर सामसुंग और साहित्य अकादेमी के ‘लोगो’ सुशोभित हैं।

सब जानते हैं, पुरस्कारों से कोई बड़ा नहीं होता। पुरस्कारों के बगैर जो बड़े माने गये, उनकी तादाद पुरस्कृत लोगों से ज्यादा होगी। गांधी जी को शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं मिला। तोलस्तोय-चेखव या मार्सेल प्रूस्त को साहित्य का नोबेल नहीं मिला। सार्त्र को मिला, तो यह कह कर लेने से इनकार कर दिया कि अपनी इज्जत की कीमत पर आलू के बोरे की इज्जत नहीं बढ़ाना चाहता। जैनेंद्र कुमार या विजय तेंदुलकर को ज्ञानपीठ नहीं मिला। साहित्य अकादेमी सम्मान न रेणु को मिला, न भारती, वैद या राजेंद्र यादव को। अज्ञेय, जैनेंद्र, विष्णु प्रभाकर और कमलेश्वर आदि को कमजोर कृतियों पर भूल-सुधार की तरह मिला। नागार्जुन को मिला तो हिंदी में नहीं, मैथिली में लिखने के लिए! लेकिन इस सबसे क्या फर्क पड़ता है।

कृष्ण बलदेव वैद को दिल्ली सरकार ने सम्मानित नहीं किया तो इससे उनकी प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आती। वे बड़े लेखक हैं और हमेशा रहेंगे। लेकिन, जैसा कि हिंदी अकादमी के तत्कालीन सचिव ज्योतिष जोशी ने मुख्यमंत्री के सचिव को अपने जवाब में लिखा था, सरकार वैद को सम्मानित करे या न करे – उन्हें अपमानित करने का हक उसे नहीं पहुंचता।

कुछ लोग पुरस्कारों के रवैये के खिलाफ लेखकों के विरोध को हिंदी अकादमी का विरोध समझ रहे हैं। यह प्रकारांतर से चक्रधर मंडली का समर्थन करना है। लेखकों ने अपनी बिरादरी के प्रतिष्ठित लेखक के साथ हुए बर्ताव का विरोध किया है। यह उनका अधिकार है। वे इस तरह पहली दफा एकजुट हुए और उन्होंने सरकार को उसके कद का अहसास करा दिया। उनका एहतराम कीजिए।

अल्लाह करे जोरे-कलम और ज्यादा!

(सौजन्‍य : जनसत्ता, 28 मार्च 2010)

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