थोड़ी मेहनत करें, वक्‍त निकालें और फिल्‍म देख आएं

इंडियन ओशन पर डाकुमेंट्री फिल्‍म की निर्माण कथा

♦ जयदीप वर्मा

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इस लेख के भाग एक में जयदीप वर्मा ने अपनी फिल्म लीविंग होम – द लाइफ एंड म्युज़िक ऑफ इंडियन ओशन के शुरुआती सफर के बारे में बताया था। यहां भाग 2 व 3 (एक ही लंबी पोस्ट में समाहित) में फिल्म को बनाने में आयी दिक्कतें और बनने के बाद इसको परदे तक पहुंचाने के बेहद लंबे सफर की कहानी है। (लीविंग होम सिर्फ एक हफ्ते के लिए (2 अप्रैल से 9 अप्रैल 2010 तक) दिल्ली, बंबई, अहमदाबाद, पुणे, और हैदराबाद में बिग सिनेमाज़ में लग गयी है। हो सके तो जरूर देखिये।) : वरुण ग्रोवर

भाग 2

11 जुलाई 2006 को मेरे साथ हमारी टीम के चार लोग मुंबई सेंट्रल स्टेशन से निकले – दिल्ली के लिए, जहां शूट शुरू होनी थी। आधे घंटे बाद ही मुंबई की लोकल ट्रेन में बम धमाके हुए। हमारा मुश्किलों से भरा सफर शुरू ही हुआ था।

दिल्ली पहुंच कर पता चला कि इंडियन ओशन के एक सदस्य के परिवार में किसी को बड़ी बीमारी की खबर मिली है। वह सदस्य अब शूट नहीं कर पाएगा। मतलब हमें इस शूट के लिए एक बार फिर दिल्ली आना पड़ेगा (जो दो महीने बाद हो पाया…) ये हमारे बजट बढ़ने की शुरुआत थी। मैंने सदस्यों के अलग अलग इंटरव्यू लेने शुरू किये। शुरुआत अशीम से की, जिसने बातचीत में अपना दिल खोल के सामने रख दिया। जितना जोश और ईमानदारी उसके संगीत में थी, उतने ही जोश से उसने बात भी की। वो दिल से चाहता था कि उसके जिंदगी भर के काम को इस रिकॉर्डिंग के ज़रिये भविष्य के लिए संजो कर रख लिया जाए।

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मैंने कैमरा सेट किया और अशीम से कहा कि हम बचपन से सिलसिलेवार चलेंगे। उसने सर हिला दिया। बात शुरू हुए एक मिनट भी नहीं हुआ था कि उसकी आंखों में आंसू आ गये। ये बातचीत का पहला मिनट है बस… गौर कीजिए। लेकिन इसने फिल्म की धारा निश्चित कर दी। हम दोनों को समझ आ गया कि हम कुछ नया करने की कोशिश करने वाले हैं। मीठी बातों वाले इंटरव्यू से कहीं आगे की। शायद बात करने के दौरान अपनी अपनी जिंदगियों को समझने की कोशिश।

और इन कोशिशों के साथ आये अशीम के किस्से – उसके बचपन के, दुनिया को देखने और समझने के। बहुत सारे diversion भी आये – इधर उधर की बेमतलब की बातें जो अक्सर बहुत मजाकिया भी होती थीं। और इन सब से पूरी टीम को प्रेरणा मिली। दिल्ली की उस उबलती गर्मी में, घंटों काम करने और रात को काम के बाद सस्ते होटलों में जाकर सोने की तकलीफ थोड़ी कम हुई।

अशीम के साथ मैंने 20 घंटे की बातचीत शूट की। (पूरी फिल्म 190 घंटों की शूट हुई थी) लेकिन बाद में मुझे लगा कि अगर कैमरा हमेशा चल नहीं रहा होता, तो बहुत से ज़रूरी लम्‍हे छूट सकते थे। एक बहुत ही खास, charged मौके पर जब मैं अशीम और उसकी मां का साथ में इंटरव्यू ले रहा था तो अशीम ने कह दिया कि उसे बहुत दुःख है कि उसका परिवार कभी उसका शो देखने नहीं आया। उसकी मां के चेहरे पर तुरंत दुःख के भाव आ गये और एक बहुत ही छू जाने वाले लम्हे में अशीम अपनी मां को समझाता है कि वो शिकायत नहीं कर रहा, पर साथ ही ये भी जोड़ देता है कि निम्न मध्यवर्ग अपने रोजाना चक्करों में इतना उलझा रहता है कि कभी अपने बच्चों पर भी ध्यान नहीं दे पाता। कई महीनों बाद – जब बैंड अमेरिका में टूर कर रहा था, अशीम ने मुझे वहां से फोन कर के कहा कि शायद ये वाली बात फिल्म से हटा देनी चाहिए नहीं तो उसकी मां को दुःख पहुंचेगा। हमने काफी देर तक बात की और आखिर में उसे एहसास हुआ कि उसने ये बात किसी कारण से ही कही थी, और हम अब उस कारण को नकार नहीं सकते। उसके बाद इस बात को लेकर उसने दुबारा सवाल नहीं उठाया।

फिल्म में मेरे पसंदीदा पांच मिनट ऐसे हैं, जिसमें इस बैंड के चार लोगों के अलावा एक इंसान है। इंद्रजीत दत्ता एक बहुत ही शानदार गिटारिस्ट था, जो 1991 में इस बैंड के original line-up में शामिल था। लेकिन उसने बेहतर job security की तलाश में दो साल में ही ये बैंड छोड दिया। इंडियन ओशन उससे करीब दस सालों से नहीं मिला था, इसलिए मैंने उसे ढूंढने की कोशिश की। वो दिल्ली में CPWD में architect था और फोन पर आधे घंटे बात करने के बाद (जिसके दौरान वो इस फिल्म से किसी भी तरह जुड़ने के एकदम प्रतिकूल था) आखिरकार कुछ देर के लिए करोलबाग स्थित रिहर्सल की जगह पर आने को राजी हो गया। वो अगले दिन आया और एक छोटे से इंटरव्यू में संगीत छोड़ने पर अपना दुःख जाहिर किया। उस समय वहां पर सिर्फ सुस्मित मौजूद था, जिसने उसे थोड़ी देर के लिए रिहर्सल कक्ष में आने को कहा। कुछ देर तक ना-नुकुर करने और ये कहने के बाद कि अब उसे नहीं आता, वो दो घंटे तक बजाता रहा, जिसके दौरान उससे गिटार वापस लेना मुश्किल था। सुस्मित ने उसकी तारीफ की और कहा कि इतनी जल्दी तुम्हारा संगीत लौट आया। थोड़ी देर में अशीम भी आ गया और चुपचाप खड़े होकर सुनता रहा। इंद्रजीत खुद में खोया बजाता रहा। जब उन दोनों की आंखें मिलीं, तो उनमें एक बहुत ही शांत, भावुक, लेकिन जोश भरा अभिवादन था। बाद में मैंने उन्हें एक बांग्ला गाना साथ बजाने को कहा जो वो लोग बीस साल पहले बजाया करते थे। गीत के बोल, जिनका अनुवाद है – ‘तुम मेरे करीब क्यों नहीं, तुम मेरे नज़दीक क्यों नहीं’, आज मुझे दहला देते हैं, और कहीं अंदर तक खराश दे जाते हैं क्यूंकि 2009 में… एक महीने के अंतर पर ही अशीम और इंद्रजीत दोनों ही इस दुनिया से विदा हो गये। इंद्रजीत ने ये फिल्म कभी देखी भी नहीं। दिसंबर 2009 में दिल्ली में एक स्क्रीनिंग होने वाली थी लेकिन नवंबर अंत में ही सुस्मित ने मुझे ये बुरी खबर दी।

फिल्म की लंबाई 190 घंटे के फुटेज से सबसे पहले 240 मिनट बन कर आयी – उससे 150 और फिर 139 मिनट। और अंत में जब इसको बड़े परदे पर रिलीज़ करने की बात हुई तो हमें 139 मिनट को काटकर 115 मिनट करना पड़ा। ये बात इसलिए बता रहा हूं क्यूंकि फिल्म को एक और नज़र से भी देखा जा सकता है। अशीम 2009, दिसंबर में गुज़रा लेकिन उससे एक साल से पहले भी वो फिल्म में ऐसी बहुत सी बातें कह रहा है, जो उसके जाने का संकेत देती हैं। कम से कम छह-सात जगह ऐसा है। फिल्म में उसके गाये हुए अंतिम शब्दों का भावार्थ है – ‘बाती बार बार क्यूं बुझ जाती है’, वो एक बार मजाक के तौर पर ‘समाधि’ लेने की बात करता है, ‘कौन’ गीत का अर्थ समझाते हुए कहता है – ‘जिस मिट्टी से आये हो, उस मिट्टी मिल जाओगे’। फिल्म उसी की गाती हुई आवाज़ से शुरू होती है और उसी की बातचीत से खत्म। ये अजीब सा ही है और हम सब अपनी मान्यताओं के हिसाब से इसका अर्थ लगा सकते हैं। मैं मानता हूं, उसे अंदेशा था।

अगर फिल्म ठीकठाक चल गयी, और इसकी DVD को लोगों ने सराहा तो मैं चाहूंगा कि एक दिन इसका 240 मिनट का संस्करण भी आये। फिलहाल जो आया है, उसमें बहुत सी चीज़ों को छोड़ना पड़ा है। जैसे कि मूल संस्करण में ‘डेज़र्ट रेन’ गीत का 9 मिनट का original version है, जो मेरे लिए एक फैन के हैसियत से, बहुत ही शानदार है।

लेकिन पहले तो सफर था इस फिल्म को बड़े परदे तक पहुंचाने का। पर हमें नहीं पता था ये कैसे होगा।

भाग 3

“मुझे फिल्म में बहुत मज़ा आया, लेकिन अच्छी नहीं लगी।”

एक सज्जन, मैं जिनकी बहुत इज्ज़त करता हूं, उन्होंने कुछ महीने पहले ‘लीविंग होम’ देखकर ये कहा। नहीं उन्हें फिल्म हल्की-फुल्की नहीं लगी, बहुत सी चीज़ें थीं जो याद रह जाती हैं; नहीं उन्हें फिल्म बातूनी नहीं लगी, इसमें आज के समय के लिए बहुत जरूरी संवाद हैं; नहीं उन्हें कहीं भी बोरियत नहीं हुई, और संगीत तो शानदार था… पर पसंद नहीं आयी।

मुझे लगता है इस तरह के रीएक्शन को समझाया जा सकता है, हालांकि पूरी निश्चितता से नहीं। आजकल लोग किसी भी चीज़ को, जिसमें मनोरंजन हो, उसे शक की निगाह से देखते हैं। शायद यही वजह है कि इंडियन ओशन का संगीत भी बहुत seriously नहीं लिया जाता। वो बीच में फंसे हैं – उनका संगीत इतना कमर्शियल नहीं है कि मुख्यधारा कहला सके, लेकिन इतना आसानी से समझ आने वाला है कि उन्हें विदेश में भारतीय एग्ज़ोटिका या भारत में exclusive बुद्धिजीवी की श्रेणी भी नहीं मिलती। लेकिन कम से कम इस मामले में तो पक्का है कि फिल्म ठीक बनी है। फिल्म की sensibility भी बिलकुल वही है, जो इस बैंड के संगीत की है।

बैंड के हर सदस्य के लिए फिल्म का अलग मतलब था। राहुल राम के लिए फिल्म इंडियन ओशन के पुराने फैंस के लिए थी जो अपने पसंदीदा बैंड के बारे में और गहराई से जानना चाहते थे। सुस्मित चाहता था कि ये कहानी दर्ज हो जाए कि कैसे उसने ये बैंड शुरू किया और कैसे शुरुआती दिनों में उसकी मेहनत और लगन से बैंड आगे बढ़ पाया। एक औपचारिक तौर पे देखा जाए तो सुस्मित उस ज़रूरी दौर में, जब बैंड अपनी आवाज़ ढूंढ रहा था, बैंड का अग्रणी ही था, और वो चाहता था कि फिल्म के जरिए ये बात मुकम्मल हो सके (जो बेशक होनी भी चाहिए और हुई भी है…)। अमित, जो बैंड का सबसे युवा सदस्य है, उसके लिए ये फिल्म इतिहास को दर्ज करने का तरीका भी थी और भविष्य की पूंजी जैसी भी। लेकिन अशीम इस फिल्म को एक अलग ही नज़र से देख रहा था – वो नज़र जो इस फिल्म को लेकर मेरी खुद की समझ के बहुत करीब थी और मुझे बहुत प्रेरणा भी देती थी। वो इस फिल्म के जरिये अपनी कहानी कहना चाहता था, खुद को टटोलना चाहता था, और समझना चाहता था।

फिल्म के दौरान मेरी ये भी कोशिश थी कि मैं कहीं न दिखूं। इसलिए फिल्म में न तो कोई voice-over है – और न ही कहानी आगे बढ़ाने का कोई और कृत्रिम यंत्र। मेरे ख्याल से ये इस फिल्म की सबसे बड़ी जीत है कि इसमें इसके बनाने वाले हमेशा गायब हैं और पूरा ध्यान सिर्फ बैंड के सदस्यों और उनके भव्य संगीत पर है। लेकिन बात ये थी कि किसी को भरोसा नहीं था कि ऐसी कोई फिल्म बड़े परदे पर आ सकती है। ऐसा भारत में पहले नहीं हुआ था और हमारे देश में जो पहले नहीं हुआ हो, वो बाद में भी नहीं होता (जैसा अशीम कहता था – हमारे यहां ‘creative confidence’ की बहुत कमी है….)। फिल्म को बड़े परदे पर दिखाने की बात को लेकर हंस कर मुझे कमरों से निकाला गया था और अक्सर बदतमीजी का सामना करना पड़ा था।

लेकिन जो चीज़ मुझे आगे बढ़ाती रही वो सिर्फ ये ज्ञान था कि ये एक बहुत ही अपूर्व सांस्कृतिक अवसर है – जो शायद दुनिया के इतिहास में भी बहुत कम ही हुआ हो। इंडियन ओशन, अपने आप में इतना अनूठा और once-in-a-generation संगीत बनाने वाला होने के बावजूद मुख्यधारा का हिस्सा नहीं है। इतने अद्भुत और आसानी से समझ में आने वाले संगीत के बावजूद। और इस वजह से ये फिल्म एक बहुत ही रोचक स्पेस में है – एक मुख्यधारा के दर्शकों को सिनेमा हॉल में एक महान लेकिन कम मशहूर बैंड को अपना महानतम संगीत बजाते हुए देखने का मौका। इन दोनों के मिलने से क्या होता है, ये देखना ही अपने आप में बहुत मजेदार होगा, ऐसा मुझे लगता है। लेकिन कहीं से कुछ पॉजिटिव नहीं था।

और तब, अक्टूबर 2009 में अशीम कोमा में चला गया। उन दस हफ़्तों में, जब अशीम दो संसारों के बीच जूझ रहा था – मैंने सबको बता दिया कि फिल्म छह महीने में आ जाएगी। कैसे, कहां, मैं कुछ नहीं जानता था। और फिर क्रिसमस के दिन, अशीम चला गया। उसको खोने के तीखे दर्द के बीचोबीच मैं पिछले दो-तीन सालों के बारे में ही सोचता रहा, जो मैंने इस सफ़ेद हाथी समान फिल्म को बनाने में लगा दिये थे। वो साल जो मैंने बहुत ही मुश्किल से, हर पल खुद से सवाल करते हुए काटे कि क्या ज़रूरत थी ये फिल्म बनाने की। लेकिन अब, अचानक से वो सब ख्याल गायब हो गये। बल्कि मैं और अधिक आशावान हो गया। मुझे खुशी हुई कि ये फिल्म बन गयी – ये जादू रिकॉर्ड हो गया। अशीम सदा के लिए इस फिल्म में गाएगा। ये बहुत मायने रखता था, कम से कम मेरे लिए।

अशीम की याद में आये शोक संदेशों ने मुझे एक बार फिर यकीन दिलाया कि इंडियन ओशन को चाहने वाले बहुत लोग हैं। मेरे मित्र मो पालामोर की कंपनी पैलाडोर ने अपने क्लब रीलोड के लिए फिल्म की तीन स्क्रीनिंग्‍ज़ रखी। और उस दौरान बिग सिनेमा – जिसके सीओओ आशीष सक्सेना खुद इंडियन ओशन के बड़े फैन हैं – ने फिल्म बड़े परदे पर रिलीज करने की बात की।

इसके बाद और अच्छे लोग जुड़ते गये। रंजन सिंह, जिन्होंने फिल्म की मार्केटिंग संभाली और फिल्म को आज इस पैमाने तक ले कर आये, जहां बहुत से लोग इसकी रिलीज़ के बारे में जानते हैं, मेरे लिए रंजन पहले ऐसे मार्केटिंग वाले इंसान थे, जो पैसा नहीं काम देख रहे थे। रंजन की पूरी टीम (उनकी PR in-charge अमृता हल्दीपुर सहित) बहुत ही असरदार रही – हमारी उम्मीदों से कहीं ज्यादा।

पोस्ट-प्रोडक्शन का काम संभाला विवेक सच्चिदानंद (साउंड डिजाइन) और रंगनाथ (साउंड एडिटर) ने। और साथ में था परम (फिल्म का सिनेमेटोग्राफर, आर्ट डायरेक्टर, वेब कन्सल्टंट, और अब पोस्ट-प्रोडक्शन का इन-चार्ज भी)। फिल्म के इस बहुत ही जरूरी अंतिम दौर में परम ने बहुत अच्छे से साथ दिया। अमित किलम के भाई सुमित ने ये काम वैसे ही खत्म किया, जैसे चार साल पहले शुरू किया था – मेरे साथ खड़े हुए, सबसे मज़बूत साथी की तरह।

लोग पूछते हैं, इस फिल्म से मेरी क्या उम्मीदें हैं। सच यह है कि कोई नहीं। एक कारण तो ये है कि मैं बहुत ही थक गया हूं – कुछ चाहने की भी हिम्मत नहीं है। दूसरा कारण है कि मेरे पूर्व अनुभव मुझे कोई उम्मीद नहीं देते। जिस सिस्टम में ये फिल्म घुस रही है, जिसमें इसे अपनी जगह बनानी है – वो वैसा ही है, या कहूं कि दिन पर दिन और बिकता जा रहा है। और वैसे भी सब जानते हैं कि ये फिल्म commercially नहीं चलने वाली है – बल्कि सच तो ये है कि इसका रिलीज़ होना ही बहुतों की उम्मीदों से आगे का है।

मैं बस यही चाहता हूं कि जो लोग बॉलीवुड के गिरते स्तरों पर अक्सर बोलते हैं, चिंता जताते हैं, वो अब अपना फ़र्ज़ पूरा करें। ये फिल्म आपके घर के आस-पास नहीं लगेगी। इसको देखने के लिए आपको मेहनत करनी पड़ेगी। आपको इसे फिल्म न मानकर एक उत्सव मानना होगा – जिसमें आपका शामिल होना ज़रूरी है। बस यही एक तरीका है, जिससे ये फिल्म बिना निशान छोड़े गायब नहीं हो जाएगी।

हमें हर रोज बताया जा रहा है कि हमने इतिहास रच दिया है – ये भारत की पहली नॉन-फिक्शन फिल्म है, जो थियेटर में रिलीज़ हो रही है। लेकिन हमें कोई भ्रम नहीं है कि इस प्रोजेक्ट को यह दर्ज़ा सिर्फ इंडियन ओशन के संगीत की वजह से मिला है। हां, मैंने और मेरी टीम ने इस पर मेहनत की है, हो सकता है कोई personal stamps भी हों कहीं किसी तरह से, लेकिन अंत में ये सिर्फ संगीत का ही जादू है।

उन चार बन्दों ने, उन सात सुरों के साथ क्या किया, बस यही सच है। बाकी सब, जैसा कि कहते हैं, बस डीटेल्ज़ हैं।

प्रस्‍तुति एवं अनुवाद : वरुण ग्रोवर, सौजन्‍य : मिहिर पंड्या

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