कांग्रेस की ओर बढ़ते नीतीश के कदम, तैयारी पूरी
♦ सुशांत झा

दरअसल नीतीश ने इस खेल का तानाबाना पिछले लोकसभा चुनाव से पहले ही बुन लिया था। एक योजना के तौर पर जॉर्ज की अध्यक्ष पद से रुखसती करवायी गयी थी और शरद को बिठाया गया था। उसकी फौरी वजह तो एक ये थी कि जॉर्ज के नाम पर प्रभुनाथ सिंह और दिग्विजय सिंह जैसे असंतुष्ट नीतीश को परेशान कर रहे थे लेकिन असली वजह ये थी कि जॉर्ज, कांग्रेस से दोस्ती के नाम पर कभी सहमत नहीं होते। जॉर्ज को निपटाने के बाद शरद आये और नीतीश को तत्काल असंतुष्टों से छुटकारा मिल गया। लेकिन शरद भी जॉर्ज जैसे ही लोहियाइट थे, वो भी नीतीश-कांग्रेस के किसी भी संभावित जुगलबंदी के घनघोर विरोधी थे। दरअसल, जॉर्ज को रास्ता से हटाने भर के लिए शरद का इस्तेमाल किया गया था। लेकिन इस बीच वो तमाम असंतुष्ट जो जॉर्ज के इर्द-गिर्द मंडराते थे, वे शरद के पाले में आते गये। शरद का गुट बनते देख नीतीश ने जॉर्ज को फिर से राज्यसभा भेज दिया। जॉर्ज कुछ भी कह और बोल सकने की हालत में नहीं थे और उनके नाम पर सियासी चालें चली जाती रहीं। इस बीच शरद यादव को एक कड़ा संकेत तब दिया गया था जब लोसकभा में नीतीश कुमार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रामसुंदर दास को संसदीय दल का नेता चुनवा लिया। ये शरद के लिए बड़ा धक्का था।
कई लोग नीतीश को लोकतांत्रिक तानाशाह मानने लगे और बिहार में तमाम फैसले केंद्रीकृत आधार पर लिये जाने लगे। कैबिनेट तो कैबिनेट, नीतीश ने बिहार में गठबंधन को भी अपने वजूद का एहसास नहीं होने दिया। बिहार सरकार वन मैन शो बन गयी और सरकार का मतलब नीतीश होने लगा। इससे पार्टी में कुछ और असंतुष्ट पैदा हो गये। नीतीश घटनाओं को अपने हिसाब से मोड़ रहे थे, वे एक ऐसे मौके पर जाकर एनडीए से नाता तोड़ना चाहते थे, जब वे एक मुकम्मल ब्रांड बन जाएं और कांग्रेस से मनमाफिक समझौता कर पाएं।
दूसरी तरफ नीतीश के कभी बालसखा रहे और पारिवारिक स्तर तक दोस्त बन चुके ललन सिंह तब शरद खेमे में चले गये जब नीतीश ने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा को पार्टी में वापस ले लिया। ललन सिंह को पार्टी की सूबेदारी छोड़नी पड़ी और नीतीश ने एक लो-प्रोफाइल भूमिहार नेता को सूबे की कमान सौंप दी। दूसरी तरफ शरद कोटे के एमपी, ज्यादातर यादव सांसदों ने भी अलग लाइन लेनी शुरू कर दी। जनता का पोपुलर सेंटीमेंट नीतीश को अपने साथ दिख रहा था लेकिन असंतुष्टों ने पार्टी का सामाजिक समीकरण बिगाड़ना शुरू कर दिया। वंद्योपाध्याय कमेटी की रिपोर्ट पर इन असंतुष्टों ने पार्टी की हवा खराब कर दी और पिछले विधानसभा उपचुनाव में नीतीश के ज्यादातर उम्मीदवार खेत रहे। ये नीतीश के लिए खतरे की घंटी थी। सूबे का लगभग पूरा सवर्ण खेमा उनसे नाराज होता दिख रहा था। शरद यादव का खेमा इस कोशिश में लग गया कि नीतीश को अगले विधानसभा चुनावों में इस कदर ‘साध’ लिया जाए कि वे एक ‘मजबूर’ मुख्यमंत्री भर रहें।
इन तमाम घटनाओं ने नीतीश को अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए और मजबूर कर दिया। नीतीश ने तय कर लिया कि अगला चुनाव कांग्रेस के साथ लड़ना है और पुरानी वार्ताओं के सूत्र जिंदा कर लिये गये। महिला आरक्षण बिल पर नीतीश ने तलवार खींच ली और शरद को खुलेआम चुनौती दे दी। अब ये तय करना नहीं था कि नीतीश, कांग्रेस के साथ जाएंगे या नहीं – अब ये तय करना था कि क्या शरद यादव जेडी-यू में रहेंगे या जेडी-यू अपने वजूद में रह पाएगा?
((अगली कड़ी में पढ़िए – कौन जाएगा किसके साथ?))
(सुशांत झा। मिथिला में जन्म। आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई। मोहल्ला लाइव के नियमित कंट्रीब्यूटर। जुझारू युवा पत्रकार। आंदोलनी विरासत। ई मेल jhasushant@gmail.com)












सुशांत जी, आपके दोनों लेख सरसरी तौर पर देख गया। आपके निष्कर्ष ठीक हैं लेकिन विश्लेषण पूरी तरह वायवीय। धृष्टता के लिए क्षमा करेंगे- पर भाई जरा अपने सूत्रों को दुरूस्त करें और उनकी विश्वसनीयता जांच लें। आपके दोनों लेखों में न सिर्फ अनेक तथ्यात्मक भूलें हैं बल्कि अधिकांश तथ्य सर के बल खडे दिखते हैं।
हां, यह सही है कि विधान सभा चुनाव के बाद कांग्रेस-जदयू का समझौता हो सकता है। इसके अलावा, एक कोशिश यह भी हो रही है कि लालू-नीतीश एक बार फिर साथ हो जाएं। बिहार में कांग्रेस की बढती सर्वग्रासी चादर से बचने का यही एक उपाय इन दोनों के पास है। चौंकिए नहीं, यह संभावना, कांग्रेस-जदयू गठवंधन की संभावना से अधिक ठोस है।
बहरहाल, आपने एक मौजूं विषय उठाया है।
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