मनुष्य का देखना : चित्रकार होता है और नहीं होता है

अखिलेश के साथ पीयूष दईया की बातचीत

Akhilesh Image

Painting By Akhilesh 1

Painting By Akhilesh 2

पीयूष दईया : एक आधुनिक की तलाश एक जनजातीय या लोक कलाकार की तलाश से किन मायनों में भिन्न व विशिष्ट है? वे कौन से तत्व हैं जो एक छोर पर तो दोनों को अंतर्संबंधित करते हैं तो दूसरी ओर कहीं अलगाते भी हैं?

अखिलेश : एक आधुनिक चित्रकार की तलाश और एक जनजातीय/लोक कलाकार की तलाश जिन किन्हीं भी मायनों में भिन्न है यह हमारे देखने का फर्क है। एक कलाकार आधुनिक परिवेश में रह रहा है, तमाम तरह की आधुनिक सुख-सुविधाएं तथा यांत्रिकी आदि उसके जीने में मदद कर रही है। दूसरी तरफ एक कलाकार इन सब से वंचित अपने प्राकृतिक वातावरण में सृजन कर रहा है। दोनों के बीच का यह फर्क एक बड़ा फर्क है। एक प्रकृति से दूर, दूसरा प्रकृति के बीच रह कर सृजन कर रहा है। तलाश के मायनों में आधुनिक और लोक कलाकार दोनों एक हो कर ही रच रहे हैं। दोनों एक कलाकार की भांति ही रचते हैं। प्रकृति से जुड़ा होना और तथाकथित सुख-सुविधाओं से पूर्ण होना, दोनों मायने नहीं रखता है। वे मनुष्य की तरह अपनी अभिव्यक्ति को खंगालते नजर आते हैं। उनके सफल या विफल होने को देखने-सुनने-पढ़ने वाले रसिक तय करते हैं। यहां पुपुल जयकर का यह कहना याद आता है: Indian folk art should be regarded not only as an essential constituent of Indian art, but also and more importantly, as a clue to the latter’s history, and this is the first place becuse of its long and continous traditions, in second because of its wide dissemination throughtout the Indian sub continent and last but not least, because of its identification with the people as a whole. यह नैरंतर्य ही भारतीय चित्रकला की आधारभूत शक्ति है। यह विचित्र सी बात है कि आधुनिक मनुष्य ने अपने को खेमों में बांट रखा है। राजनीतिक व्यवस्था के लिए यह जरूरी है कि वह तरह-तरह के खेमों में बांट कर लोगों के बारे में उनके उत्थान-पतन के आंकड़े संसद में प्रस्तुत करे लेकिन एक कलाकार के संदर्भ में यह बात महत्वपूर्ण नहीं जान पड़ती। एक कलाकार, कलाकार है – वह जिन भी परिस्थितियों में रहता है उनमें सृजन करता है। चाहे वे आधुनिकतम सुविधाएं हों बल्कि जिन्हें हम सुविधाएं कहते हैं क्या वे सुविधाएं हैं? यह भी देखना जरूरी है। या नहीं।

कलाकार अपनी कलाकृति में खुद का निवेश करता या खुद को पाता है। यह दोनों ही आपस में गहरा संबंध रखते हैं। एक मनुष्य होने के नाते उसका सृजन महत्वपूर्ण है। बजाय उसकी सामाजिक या राजनीतिक कोटि। चित्रकला के तत्व या उससे मिलने वाला आनंद दोनों को एक धरातल पर लाता है: वह लोक हो या आधुनिक शहर में रहने वाला कलाकार। यही तत्व है जिससे वह संतोष या परिपूर्णता या निष्फल रहने पर उसे फिर से पाने की कोशिश करता है। एक ऐसा तत्व जो आधुनिक कलाकार में भी उतना ही सक्रिय है, जितना कि लोक कलाकार में। हर कलाकार दूसरे से अलग है। अपने देखने-समझने-सोचने के ढंग में। एक कलाकार की दृष्टि उसे दूसरे कलाकार से अलगाती है। दृष्टि को अपने कैनवास पर उकेरने के लिए वह किन रूपाकारों की मदद लेता है, इसका संबंध उसके इर्द गिर्द के वातावरण और परिस्थितियों पर भी निर्भर है। जिन चीजों से वह चमत्कृत होता है उन्हें अपने चित्रों में पाने की कोशिश करता है या हो सकता है वह अपने चित्रों में उन चीजों को जगह देता हो, जिनसे उसका सामना पहली बार होता है। या वह नितांत काल्पनिक रूपाकारों से सामना कर रहा हो। वह एक संसार रचने की कोशिश करता है : उसकी कामना ही उसका सृजन है। कामना के अलावा कोई और चीज उसको प्रेरित नहीं करती लगती है। कामना से कल्पना और कल्पना से कलाकृति, यह सब जुड़े हुए हैं। मेरी नजर में लोक और आधुनिक कलाकार के बीच ही नहीं बल्कि किन्हीं भी दो कलाकारों के बीच का बड़ा फर्क यह है कि वे दोनों अपने ढंग से देखते हैं। दोनों की पहुंच अलग है। दोनों की समझ अलग है। दृष्टि अलग है।

पीयूष दईया : बहुधा ऐसा होने लगता है कि किसी जीवन, संस्कृति व भाषा में सबसे ज्‍यादा प्रचलित शब्द अंततः संदिग्ध-से नजर आने लगते हैं। उदाहरण के लिए लोक और Folk को लेते हैं। पिछले दशकों में उपर्युक्त शब्दों को लेकर पुनर्चिंतन शुरू हुआ है – नृतत्वशास्त्र से लेकर चाक्षुष कलाओं तक के संदर्भ में। कलाओं के लोक-रूपों की पश्चिमी व पौर्वात्य अवधारणाओं/सरणियों व जीवन-दर्शन के सैद्धांतिक व बुनियादी फर्कों की ऊंचाई व संश्लिष्ट जटिलता पर आप किस तरह से मनन करते हैं?

अखिलेश : Folk से ही संभवतः यह शब्द बना हो – लोक। प्रकारांतर से देखने पर पता चलता है कि इस तरह की श्रेणियां या विभाजन अकसर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते किये गये हैं। इन विभाजनों से मनुष्य के होने में कोई बदलाव नहीं आता है। मेरे खयाल से ऐसा नहीं होता होगा कि यदि वह Folk/फोक है तो नाक से खाना खाने लगे, शहरी है तो मेज पर बैठ कर छुरी-चम्मच से खाना खाता है। खाना मनुष्य का स्वभाव है : चित्र बनाना मनुष्य की प्रतिभा से संचालित है। वर्गीकरण में बांटने की कोशिश करना हमेशा गलती कर रहा होना है। मनुष्य की एक ही तरह की संवेदनाओं को विभिन्न परिस्थितियों में पाने पर हम उन्हें शब्द देकर समझने की कोशिश करने लगते हैं। लोक और शहरी कोटियां हैं। प्रचलन में हैं। शर्मनाक हैं। इस तरह के विभाजन इस तरह की राजनीतिक सुविधा के लिए बनाये जाते हैं। शहरी बोलते ही समझ में आ जाता है कि गांव और जंगलों में रहने वाले मनुष्यों के बारे में विचार नहीं किया जा रहा है। लोक बोलते ही समझ जाते हैं कि शहर में रहने वाले लोगों के बारे में बातचीत नहीं कर रहे हैं। यह भाषिक सुविधा मनुष्य की बनायी हुई है।

सृजन में इन कोटियों से कोई फर्क नहीं पड़ता। नृतत्वशास्त्र की अपनी समस्या है। वह इन सारे लोगों का अध्ययन करने की कोशिश करता है। यह भी हो सकता है कि मनुष्य के अपने जानने की जिज्ञासा में यह सारी कोटियां बनायी जा रही हों। धीरे धीरे वह अपने तक पहुंचने की कोशिश कर रहा हो। यह कहां तक ठीक या गलत है, इस पर नृतत्वशास्त्रियों को अलग से विचार करना चाहिए। स्वामीनाथन का कहना था कि शहरी लोग यह अधिकार कैसे पा सकते हैं कि उन्हें लोक/जनजातीय समुदायों का अध्ययन करना है?

हमें अपना अध्ययन करना चाहिए। मनुष्य होने के नाते अपने बारे में जानना, ज्‍यादा बेहतर समझना है। खुद को चित्रों में ज्‍यादा मुखर रूप में अभिव्यक्त कर सकना है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि ऐसा करना ही ठीक होगा, किंतु विभाजन हमेशा दूरी पैदा करते हैं। यह दूरी खत्म करने की कोशिश पहली बार भारत भवन में हुई। वहां तथाकथित आधुनिक कला के साथ साथ तथाकथित आदिवासी और लोक कला को साथ साथ रखा गया। अक्सर आदिवासी कलाकारों की अभिव्यक्ति ज्‍यादा सहज, ज्‍यादा आकर्षक, ज्‍यादा मजबूत नजर आती है बजाय उन बहुत सारे चित्रकारों के, जिनके चित्र आधुनिक कला दीर्घाओं में लगे हैं। यह फर्क है एक कलाकार होने और एक कलाकार का मुखौटा पहन कर कलाकार होने का। यह फर्क साफ नजर आता है। स्वामी एक बड़ा काम कर रहे थे, जब वे इस भेद को मिटाने की चेष्टा कर रहे थे। वे बड़े स्तर पर सफल भी रहे। स्वामीनाथन आदिवासी लोक कलाकारों के अलावा एक प्रयोग और कर रहे थे। शहर में रहने वाले कमजोर वर्ग के लोगों को भी चित्र बनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में उनहोंने अपने रसोइए, ड्राइवर, दर्जी, दीर्घा परिचर, भृत्य आदि कई लोगों को चित्र बनाने को उकसाया। उनकी प्रदर्शनियां दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद में लगायीं, कैटलॉग लिखे। शहर में रहने वाले इन लोगों की छोटी चालाकियों के चलते स्वामी यहां निष्फल रहे। स्वामी के जाते ही ये कलाकार स्वतः ही मर गये।

1982 में भारत भवन शुरू होने के बाद चित्रकला के संसार में सभी लोगों का ध्यान इस तरफ गया। कई देशों ने अपनी आदिवासी व लोक कलाओं की ओर ध्यान देना शुरू किया। उनकी प्रदर्शिनयां आयोजित की जाने लगी। सन 2000 के समाप्त होते न होते लूव्र में भी एक आदिवासी लोक कला दीर्घा की शुरुआत हो गयी। यह क्या बात थी, जिस पर सारी दुनिया का ध्यान गया? यह मनुष्य की अभिव्यक्ति है।

पहली बार ऐसा हुआ कि सीधे कला को जगह दी गयी, पिछड़े हुए काल की कलाकृतियों की तरह नहीं बल्कि इसी समय में की जाने वाली कला की तरह। स्वामीनाथन ने पिकासो से एक कदम आगे जाकर यह काम किया है। पिकासो ने अफ्रीकन कला रूपों का अपने लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने एक नयी चित्र-भाषा गढ़ी। सारा संसार प्रभावित हुआ। इस कदर कला संसार बदला कि रोथको जैसे चित्रकार भी पैदा हुए। पश्चिम में देखने का ढंग बदला। न सिर्फ देखने का ढंग बदला बल्कि कला के साथ दुनिया भर के लोगों के संबंध भी बदले। पहली बार चित्रकला जनसामान्य की कला की तरह जानी जाने लगी। इससे पहले ऐसा लगभग नहीं था। कला की पहुंच सिर्फ एक तबके के लोगों तक थी। पिकासो ने अफ्रीकन कला रूपों को अपने चित्रों में ला कर एक बड़ा परिवर्तन लाया। एक साथ एक ही object को कई तरह से देखने का प्रस्ताव रखा। विश्व कला दृष्टि में यह महत्वपूर्ण विचार था। इस विचार से पूरी दुनिया की कला बदली। इसके साथ ही उसने नयी तरह से देखना प्रस्तावित किया। डेविड हॉकनी कहते हैं, पिकासो ने पहली बार दोनों आंखों से देखना चित्रित किया : As Picasso grew older and older he became more and more energetic and more and more things happend in his work. Then you begin to understand what he was doing, you are hardly surprised he could not stop the work was much too interesting. There is nothing else like it; no other artist got anywhere near it, strangely enough people didn’t see it. I never doubted, Picasso, I never doubted his integrity and I never believed for one moment that he churned out stuff which was all the same. When people say this they prove that they don’t understand his work.

स्वामीनाथन किसी आदिवासी कला रूप को अपने चित्र में लाने की कोशिश नहीं करते। वे स्वयं आदिवासी कलाकारों को उस मंच पर ले आते हैं, जहां तथाकथित शहरी कलाकार खड़े हैं। स्वामी ने जनजातीय कलाकारों को उतनी ही तवज्जो दी, जितनी कि वे शहरी कलाकार को दे रहे थे। उन्होंने हमारे देखने में प्रमुख फर्क पैदा किया। आदिवासी और लोककला हमारे समय की उतनी ही महत्वपूर्ण कला है, जितनी तथाकथित आधुनिक कला। हम यह मान लेते हैं कि शहर में की जाने वाली कला ही कला है या मुख्यधारा की कला है। ऐसा नहीं है। जंगलों या गांवों में रहने वाले कलाकारों द्वारा भी उतना ही सुंदर, आकर्षक और मजबूत रचा जा रहा है, जितना कि शहर के किसी विद्यालय में पढ़ कर एक कलाकार करता है। यह स्वामीनाथन का प्रमुख हस्तक्षेप था। स्वामीनाथन जादुई लिपि में लिखते हैं – परंपरा मेरे लिए जानी-मानी शैलियों और रीतियों का ही रस्मी दोहराव भर नहीं है : वह निरंतर बदलती हुई परिस्थितियों और कालों में विभिन्न तरीकों से अपनी अभिव्यक्ति की खोज करती हुई मानवात्मा का नैरंतर्य है। अपने मूल अर्थ में अक्षरशः परंपरा का मतलब ही वह परम आत्मा है, जिसे काल नहीं छू सकता, जो अपने आप में अविकार्य है।

जनजातीय/लोक कला के साथ मेरा संबंध हालांकि बहुत गहरा नहीं रहा है लेकिन जब मैं महाविद्यालयी दिनों में लैंडस्केप/भू-दृश्य चित्रण के लिए मालवा के गांवों में जाया करता था, तब इन कला रूपों से मेरा सामना होता था। वे मुझे आकर्षक लगते थे। मैं अपना थोड़ा बहुत समय उनके साथ गुजारता था। भारत भवन आने के बाद इसका महत्व समझा। स्वामीनाथन का साथ उसमें एक और हस्तक्षेप था। भारत भवन के कारण मध्य प्रदेश के कलाकारों को काफी लाभ हुआ। उनके देखने समझने में फर्क आया। कलाओं के लोक रूपों और पश्चिमी और पूर्वी अवधारणाएं भेदरूपी संकेत हैं। इन सारे संकेतों से परे जाकर कला संसार है। वह संसार सुंदर और अकल्पनीय है।

पीयूष दईया : यह एक सर्वव्याप्त मान्यता रही है कि लोक-साहित्य सामूहिक चित्त की अभिव्यक्ति है। क्या लोक-कलाओं के बारे में भी ऐसा कहा जा सकता है?

पिथौरा बावसी की कथा चित्रांकित करने वाला एक कलाकार वही घोड़ा बनाता है जो कि दूसरा कलाकार भी बना रहा होता है। इन दोनों घोड़ों में क्या एक कलाकार की वैयक्तिक प्रतिभा, दक्षता व चारित्रिकता की ऐसी छाप हम नहीं देखते जो कि उन्हें एक दूसरे से भिन्न बनाती है? एक व्यक्ति-आत्म के तौर पर एक लोक कलाकार की छाप को आप एक लोक-कला-रूप का अध्ययन करते हुए कितना महत्व देते हैं?

दूसरा, एक समुदाय की कला को हम दूसरे समुदाय की कला से अलगाते हुए आसानी से पहचान कर मूल्यांकित कर लेते हैं, लेकिन एक समुदाय की लोक-कृति, जैसे कुछ कलाकारों द्वारा सामूहिक रूप से बनायी गयी पिथौरा बावसी की चित्रकथा, उसी समुदाय-विशेष के कुछ दूसरे कलाकारों द्वारा बनायी गयी पिथौरा बावसी की चित्रकथा से भिन्न हो सकती है। बहुत संभव है कि वही चित्रकथा एक समूह के कलाकारों द्वारा बनाये जाने पर हमें अद्भुत लगे लेकिन दूसरे समूह के कलाकारों द्वारा बनाये जाने पर निष्प्राण मालूम हो। इसमें भी यह जरूरी नहीं है कि ऐसा एक जीवनावधि में घट जाए : सदियों का समय इस पूरी प्रक्रिया में अंतर्बद्ध है। सदियों की प्रक्रिया – पीढ़ियों की फलश्रुतियों – में परिष्कार लाते व बढ़त लेते व्यक्ति-आत्म और सामूहिक चित्त के इस जटिल घात-प्रतिघात व फिनोमिना को आप कैसे समझते हैं?

अखिलेश : यह मान्यता कि लोक साहित्य सामूहिक चित्त की अभिव्यक्ति है, लोक कलाओं के बारे में कहा जाता है कि वे एक समुदाय की अभिव्यक्ति है। हम थोड़ा आगे बढ़त लें। पिकासो की कला भी एक सामूहिक चित्त की अभिव्यक्ति है। एक समुदाय, जिसे मनुष्य कहा जाता है, की अभिव्यक्ति है। यह कहना कि एक कलाकार की अभिव्यक्ति, व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है या शहर में रहने वाले कलाकार की अभिव्यक्ति उसकी अपनी अभिव्यक्ति है, ठीक नहीं होगा। कलाकार सब चीजों – अपने समुदाय के लोगों, अपनी मान्यताओं, अपनी प्रथाओं, अपनी रूढ़ियों, अपने विश्वासों – के बीच सृजन करता है। उसका मानस इन सबसे बिंध कर उसका देखना पैदा करता है। यह महत्वपूर्ण है। वह एक मनुष्य के रूप में रचना करता है। वह रचना मनुष्य-रूपी समुदाय को संबोधित है। मनुष्य का मन एक मनुष्य के मन की तरह काम नहीं करता बल्कि वह एक समुदाय के मन की तरह भी काम करता है। उसमें समुदाय की सारी मान्यताएं भी मौजूद होती हैं : उसकी धारणाएं, उसकी रूढ़ियां, उसके विश्वास, उसके अंधविश्वास आदि सब उसके साथ होते हैं। इन सब से संचालित हो वह अपना संसार रचता है। इसी संसार से वह सब सीखता, संवारता-जानता-देखता है और पुनर्परिभाषित करता है।

मेरी नजर में यह मानना देखने का एक गलत ढंग है, जिसमें शहरी कलाकार की अभिव्यक्ति एक व्यक्ति की अभिव्यक्ति है और लोक कलाकार की अभिव्यक्ति एक समुदाय की। यदि यह सर्वव्याप्त मान्यता है तब यह एक सर्वव्याप्त गलत ढंग है। ऐसे गलत ढंग हम सालों से पालते-पोसते आ रहे हैं। उनके साथ अपना एक सुदृढ़ संबंध बना लेते हैं। जब तक यह सिद्ध नहीं हुआ कि पृथ्वी गोल है, तब तक यह सर्वव्याप्त मान्यता थी कि पृथ्वी चपटी है। अब इसका क्या किया जा सकता है? मनुष्य की मूर्खता का छोर पकड़ना मुश्किल है।

पिथौरा का कलाकार – पेमा फत्या – एक पिथौरा बनाता है। पेमा का भांजा – जो इन दिनों उससे सीख रहा है – वह भी पिथौरा बनाता है। दोनों के पिथौरा में जमीन-आसमान का अंतर है। दोनों के चित्रांकित घोड़ों और अन्य देवी देवताओं में भी। यह अंतर एक व्यक्ति के देखने का अंतर है। यह पेमा के भांजे की दक्षता है कि वह घोड़ा एक दूसरे ढंग से देखता है, पेमा से अलग। यह उसकी वैयक्तिक प्रतिभा भी है। यह प्रतिभा उसको पेमा से अलगाती है। किंतु पेमा और उसका भांजा दोनों एक समुदाय की अभिव्यक्ति कर रहे हैं। यह अभिव्यक्ति हमें हर जगह मिलती है। हर जगह उसका एक रूप मौजूद है। मसलन, जब क्रिसमस मनाया जाता है, तब उस दौरान किये जाने वाले सारे काम हम rituals/अनुष्ठानों की तरह क्यों नहीं देखते हैं? ऐसी क्या समस्या है कि जो आधुनिक मनुष्य करे वह उसका आधुनिक और सभ्य होना है और ऐसे ही किसी एक त्यौहार पर कुछ काम गांव व जंगलों में रहने वाले लोग करें तब वह उनके या उनके समुदाय के पिछड़े होने के संकेत की तरह देखे जाते हैं? ऐसी दूरी, ऐसा भेदभाव, ऐसा अलगाव हम अपनी ही तरह के दूसरे मनुष्यों के साथ इतने गहरे से रेखांकित करने की कोशिश करते हैं जैसे कि हम कोई बहुत ही महत्वपूर्ण काम में लगे हुए लोग हैं, जो शहर में रह रहे हैं और जंगलों या गांवों में रहने वाले शेष लोगों को सभ्य होने की जरूरत है। मैं एक उदाहरण देना चाहूंगा। भोपाल में मेरे एक मित्र हैं। बहुत पढ़े-लिखे-समझदार। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की है। उनका मानना है कि वे कलाओं में बड़ी दखल रखते हैं और यह भी कि मध्य प्रदेश में उनके अलावा और कोई महत्वपूर्ण कलाकार नहीं है। वे अपने सामने किसी और को कलाकार समझने की जुर्रत भी नहीं करते हैं। अपनी अहम्‍मन्‍यता में वे जनगढ़ सिंह श्याम के सामने असहाय दिखते हैं।

जनगढ़ मंडला जिले के एक छोटे से गांव, पाटनगढ़, से आता है और एक कलाकार के रूप में विश्व प्रसिद्ध होता है। मेरे पढ़े-लिखे मित्र के सामने, देखते ही देखते। जनगढ़ को वे तथाकथित रूप से अनपढ़, गंवार, और एक आदिवासी समझते हैं। जनगढ़ पढ़ा-लिखा नहीं था, किंतु वह एक महत्वपूर्ण कलाकार की तरह अपनी छाप छोड़ कर गया है। ऐसी छाप छोड़ने की मेरे मित्र की भी इच्छा है किंतु उनमें प्रतिभा नहीं है, जो जनगढ़ में थी। अब हम इसे किस तरह से देखें? शहर में रह कर पढ़-लिख कर समझदार मनुष्य की विडंबना की तरह? स्वामीनाथन कहते हैं – चित्र के आमने सामने प्रश्न करने वाला और विश्लेषण करने वाला मस्तिष्क लटका रहता है, जैसे वह पहले था और मैं किसी ऐसी चीज के सामंजस्य में होता हूं, जो परिभाषाओं को नकारती है। (काल और सृजन) जनगढ़ शायद अपनी कला पर दो वाक्य भी ठीक तरह से नहीं बोल सकता था, लेकिन जनगढ़ की अभिव्यक्ति एक सामूहिक चित्त की अभिव्यक्ति है। न सिर्फ गोंड परधान जाति के विलुप्त रूपों की अभिव्यक्ति बल्कि इस देश और दुनिया के सारे लोगों की अभिव्यक्ति की तरह दिखाई देती है। सिर्फ इसी कारण उसके चित्र फ्रांस, लंदन, जापान, मास्को आदि अनेक तरह की संस्कृतियों से आने वाले सभी मनुष्यों के लिए समान रूप से आकर्षक थे। ये सब उस में कुछ अपना आश्चर्य पाते हैं। अगर हम इस ढंग से नहीं देख पाते हैं, तब कुछ गड़बड़ हमारे भेद करने में है। हम अपने भेद को इतना गहरा कर चुके हैं कि एक सामान्य सहृदय की तरह यह नहीं स्वीकार पाते हैं कि एक तथाकथित अनपढ़ कैसे कलाकार हो सकता है?

हम दावा करते हैं कि एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति ही कलाकार होगा! यह गंभीर समस्या है, समझना चाहिए। विचार करना चाहिए। इस समस्या के कारण हमने अपने देश की कलाओं को दोयम दर्जे का ठहरा रखा है। हमारी गुलाम मानसिकता आज भी उन्हें स्वीकारने को तैयार नहीं है। हम भी उसे वैसे ही देखते-समझते-मानते हैं, जैसा अंगरेजों ने हमारे बारे में लिखा। दरअसल, दो लोक कलाकारों या कला रूपों के फर्क को दो मनुष्यों या समुदायों के बीच के फर्क की तरह ही देखना चाहिए। दोनों मनुष्यों के देखने का अपना ढंग है। उसे एक कैसे मान सकते हैं? दो गोंड कलाकार एक जैसा चित्र क्यों बनाएंगे? यह सब कुछ एक जैसा ही बनने लगा, तब वह इतना उबाऊ होगा कि हम शायद चित्र देखना ही बंद कर दें।

एक समुदाय की कला को दूसरे समुदाय की कला से अलगाते हुए पहचानने पर इन अलगाने के प्रतीकों को देखने का प्रयास है। वे सारे प्रतीक उस समुदाय के अपने परिवेश से उत्पन्न प्रतीक हैं, जिनमें कलाकार रहता है, पला और बड़ा हुआ है। इस परिवेश में उसके देवी देवता अलग हैं, उसके सम्पर्क में आने वाले जीव-जंतु, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे सहित सारा संसार अलग है। दूसरे समुदाय के भीतर कोई दूसरी चीज उनकी जरूरत होती होगी। वे लोग जिन जगहों पर रह रहे हैं, उन जगहों पर मिलने वाले और न मिलने वाले जीवों के अनुसार उनकी जैसी जीवन शैली बन गयी है, वैसा ही सब कुछ उनके चित्रों में, कला रूपों में, आ जाता होगा। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि उड़ीसा के जंगलों में रहने वाले आदिवासी कलाकारों के द्वारा बनायी गयी कलाकृतियों में मनुष्य की अभिव्यक्ति नहीं है। एक मनुष्य की अभिव्यक्ति पूरी दुनिया के मनुष्य की अभिव्यक्ति की तरह ही देखी जानी चाहिए। इसे हम अपने राजनीतिक संकटों या पहचान या अपने तथाकथित देश के वासी होने के कारण स्वीकार नहीं कर पाते हैं। उसको अलगाते हैं। अलगा कर उस पर इतराने की कोशिश करते हैं कि मेरी कला तुम्हारी कला से श्रेष्ठ है! यह कुछ वैसा ही है जैसे एक उत्पाद का दूसरे उत्पाद से भिन्न विज्ञापन देखते हैं। यह विज्ञापन बतलाता है कि कैसे वह दूसरे उत्पाद या वस्तुओं से श्रेष्ठ या ज्‍यादा उपयोगी है। यह सब हमारी अपनी समस्याएं हैं, जिनको हम कलाओं के ऊपर लादने की कोशिश न करें तो ज्‍यादा अच्छा होगा। फ्रांस में इस तरह की बातचीत बड़ी आम है कि पिकासो से महान चित्रकार मातीस था। इसमें एक समुदाय की भावना ही शामिल है। मातीस एक फ्रांसीसी चित्रकार था और पिकासो भले ही पेरिस में रहा हो किंतु आया वह स्पेन से था। स्पेन के लोग चित्रकार नहीं हो सकते हैं और चित्रकला फ्रांस की बपौती है, ऐसा मानना फ्रांसीसियों की अपनी समस्या है। यह पिकासो या मातीस की समस्या नहीं है। जैसे ही हम एक समुदाय से दूसरे समुदाय को पहचानने की कोशिश करते हैं या मूल्यांकित करते हैं या उनको श्रेष्ठ बताने की कोशिश करते हुए दूसरे समुदाय को कमतर ठहराते हैं तब यह सब समस्याएं मनुष्य के मन में उपजी हीन-भावना है। मुझे नहीं लगता कि इन में कलाओं की भूमिका हो सकती है।

जहां तक यह बात है कि एक चित्रकथा एक समुदाय द्वारा बनाये जाने पर अद्भुत लगती है, दूसरे समुदाय द्वारा बनाये जाने पर निष्प्राण लगती है, तब यहां समूह को भी अलगाने की जरूरत नहीं है। पेमा फत्या पिथौरा बनाता है। हो सकता है यही पिथौरा किसी दूसरे कलाकार द्वारा बनाये जाने पर निष्प्राण मालूम हो और उसी समुदाय से, उसी समूह का व्यक्ति बनाये, तब भी वह निष्प्राण जान पड़े। इसमें किसी समूह के अलग होने की बात नहीं है। प्रतिभा की बात है। अगर एक व्यक्ति में प्रतिभा है और दूसरे में नहीं है और दोनों चित्र बनाएं तो एक चित्र निष्प्राण मालूम हो सकता है। ऐसा कुछ कहना कि समूह के अलग होने से चित्रकला कम या ज्‍यादा हो सकती है, यह ठीक नहीं होगा। एक समूह का व्यक्ति दूसरे समूह में रहने लगने पर भी उस समूह के चित्रों को उतना ही जीवंत बनाने लगेगा जितना कि वह अपने समूह में रहते हुए बनाता था। अगर वह एक कुशल चित्रकार है तो।

यह प्रक्रिया पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है या वैयक्तिक होती है, इस पर भी संदेह किया जा सकता है। मेरे खयाल से यह प्रतिभा होने न होने की बात है। यह प्रतिभा ईश्वर देता है। यह पीढ़ी दर पीढ़ी हो सकती है और किसी एक व्यक्ति में भी पायी जा सकती है। एक सामूहिक चित्त के काम करने की या एक वैयक्तिक चित्त के काम करने की बात नहीं है। मसलन, खजुराहो के मंदिर कई पीढ़ियों ने एक के बाद एक काम को जारी रखते हुए बनाये हैं। बहुत सारे इलाके ऐसे भी हैं, जहां बहुत ही खराब शिल्प है। किंतु उसका यह अर्थ नहीं है कि खजुराहो के सारे शिल्प खराब हैं। खजुराहो के प्रमुख शिल्पों को जाहिर है उत्कृष्ट शिल्पियों ने बनाया है। कला में पारंगत लोगों ने बनाया है। और उसी वक्त जिन लोगों को वे सिखा रहे थे – अपनी दूसरी पीढ़ी के लोगों को – उन सबके कामों को भी खजुराहो के मंदिरों में जगह दी गयी है। जाहिर है बड़े स्तर पर काम हो रहा था। बहुत सारे मूर्ति शिल्पों की जरूरत थी। सिखाने के दौरान ही जो शिल्प बने, वे भी वहां लगे हैं। किसी का ध्यान उस पर जाता है या नहीं जाता है यह अलग बात है। खजुराहो में बहुत सारे ऐसे शिल्प हैं जो इस लायक ही नहीं है कि वहां लग सकें। किंतु वे सारे शिल्प भी किसी एक व्यक्ति ने बनाये हैं। वे सामूहिक चित्त के वर्णन ही हैं। सामूहिकता का ही वर्णन है और उसमें अयोग्यता छिपाने की कोशिश नहीं की गयी है। खराब शिल्पों को भी वैसे ही रखा गया है जैसे कि प्रतिभाशाली शिल्पी के बनाये शिल्पों को, मंदिर के गर्भगृह से लेकर बाहरी दीवारों तक लगाये हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी परिष्कार बढ़ता जाता है, ऐसा सच नहीं है। रवींद्रनाथ टैगोर के बाद उनके परिवार में कोई चित्रकार नजर नहीं आता है। ऐसे हम बहुत सारे उदाहरण ले सकते हैं। मसलन, पिकासो के बाद पिकासो के परिवार में कोई चित्रकार नहीं हुआ। यह सब उदाहरण बताने की जरूरत इसलिए हुई कि यह सब सामने मौजूद है और सभी लोग यह देख सकते हैं। महत्वपूर्ण लेखक, महत्वपूर्ण फिल्मकार, और बहुत ही इक्का-दुक्का ऐसे उदाहरण समझ में आएंगे, जिसमें उनके परिवार का कोई व्यक्ति उस क्षेत्र में सक्रिय हुआ है और जरूरी नहीं है कि उसने वही ऊंचाई हासिल की हो, जो उसके पिता ने या उसके दादा ने हासिल की थी। या कलाकार उससे आगे भी निकल सकता है। हम इस तरह से देखें कि यह पीढ़ी दर पीढ़ी हो रहा है या परिष्कार बढ़ता जा रहा है, तब यह गलत होगा। यह सारी समस्या कला की नहीं है। कला घटित होती है अपने होने में। कला को किसी भी ढंग से परिभाषित करना ही गड़बड़ है। कला के लिए कोई भी एक परिभाषा या कोई भी एक ढंग निर्धारित नहीं किया जा सकता कि ऐसे ही जाकर कोई एक कलाकार बनने वाला है या कुछ कला का होने वाला है। चित्रकला की भाषा आकारगत है। वह अपारदर्शी भी है। यह विश्लेषणात्मक समझ की नहीं गुणात्मक बोध की भाषा है। स्वामीनाथन के इस कथन पर रुक कर विचार करने की जरूरत है।

पीयूष दईया : आदि-वासी व लोक-कलाओं व संस्कृति के सर्जनात्मक उद्यम का एक बड़ा हिस्सा अनुष्ठानमूलक व उत्सवधर्मी रहा है। वहां प्रकृति, धर्म और अज्ञात/लोकोत्तर सत्ता के प्रति केंद्रीय संबोधन व व्याप्ति कुछ इस तरह से रही है कि वे कभी इससे स्खलित नहीं होते और उनकी अनुपस्थिति में वे अनाथ जान पड़ेंगी।

आप क्या सोचते हैं कि ऐसा क्यों है?

अखिलेश : आदिवासी और लोक कलाओं के सर्जन का एक बड़ा हिस्सा अनुष्ठानमूलक है ऐसा कहते हुए यह भूल जाते हैं कि ऐसा शहरों में भी है। हम अपने द्वारा किये जाने वाले कार्यों को एक अनुष्ठान की तरह नहीं देखते हैं। किंतु मुझे वह दिखाई देता है या मुझे वह ऐसा ही नजर आता है। क्रिसमस या ईद या दीवाली के अवसर पर जो कुछ भी किया जाता है, जितना भी, जैसा भी किया जाता है वह सब एक अनुष्ठान ही है – उस पर्व-त्यौहार को मनाने का। उसे अनुष्ठान न माने तो क्या मानें? हम उसे उत्सव न मानें तो क्या मानें? हम अपने द्वारा किये जाने वाले कर्मों को इन शब्दों से बाहर रखते हैं और लोक और आदिवासी कला संस्कृति को इससे प्रेरित मानते हैं, तब यह हमारी समस्या है। मुझे नहीं लगता कि उन लोगों के सामने ऐसी कोई समस्या कभी आती होगी। वे लोग भी अपने अनुष्ठानों में, अपने उत्सवों में चूकते हैं, स्खलित होते हैं और उनकी अनुपस्थिति में वे अनाथ भी नजर आते हैं। यह एक आदत की बात है। अगर देश नाम की संज्ञा को एक आदत की तरह देखें तो ज्‍यादा बेहतर होगा। एक परिस्थिति में रहने वाले लोगों की, एक खास तरह की आदतें बन जाती हैं और उसके बगैर वे अपने को अनाथ महसूस करते हैं। जैसे हम अचानक स्वीडन में जाकर रहने लगें, तो वहां की परिस्थितियां यहां से भिन्न हैं और वहां पर हम अपने को खोया सा या असहाय सा महसूस करते हैं। हमें ठंड से बचने के उपाय नहीं मालूम हैं; किसी की मदद भी लेनी होती है। ठीक उसी तरह से वे लोग भी जब यहां आते होंगे, तब भारत जैसे एक समशीतोष्ण देश में रहने के ढंग अलग हैं, जो उनके देश से भिन्न है। उन्हें भी यहां आ कर उतनी ही मदद की जरूरत पड़ती है, जितनी कि हमें वहां। यह मनुष्य की समस्या है। एक परिस्थिति में रहने का आदी होने पर वह दूसरी परिस्थिति में रह रहे मनुष्यों को कमतर मानता है। वह दूसरों पर इस अधिकार के साथ विचार करने की कोशिश करता है जैसे कि उसके अन्दर कोई कमी नहीं है, या वह गलतियां नहीं कर सकता जो दूसरे कर रहे हैं। दूसरी तरह की परिस्थितियों में रह रहा मनुष्य अपनी आदतों के चलते यही करता है। आधुनिक मनुष्य द्वारा किये जा रहे काम ज्‍यादातर आस्थाविहीन है। वह अपने त्यौहारों को भी नकली आस्था के साथ मनाता है। गणेश चतुर्थी पर चौराहे-चौराहे बज रहे भद्दे फिल्मी गीतों की पैरोडी पर बने भजन किस आस्था का प्रदर्शन करते हैं? ऐसे अनेक वार त्यौहार इसी नकली ढोंग के साथ मनाते हुए वह आदिवासियों द्वारा मनाये जा रहे त्यौहारों को अनुष्ठान की तरह देखता है। स्वामीनाथन का शहरी मन भी हिल गया था जब उन्होंने पहली बार बेतुल के जंगलों में कोरकू आदिवासियों को अपनी आस्था से प्रकृति के साथ एकात्म होते हुए सर्पदंश से मर रहे बालक को ठीक होते हुए देखा। उसी के बाद स्वामी का ध्यान 1959 में पहली बार शहरों से हट कर जंगलों में रह रहे इन अप्रतिम, अपने में संपूर्ण, शक्तिशाली, आस्थावान और कर्मठ मनुष्य की तरफ गया। जो कहीं ज्‍यादा रचनाशील कल्पना से भरा हुआ सच्चा मनुष्य था। यह मांगता हुआ समुदाय नहीं था। दूसरों पर आरोप लगाता हुआ, गलतियां छिपाता और समानता की झूठी पुकार लगाता मनुष्य नहीं था।

पीयूष दईया : शास्त्रीय और आधुनिक कलाओं के बरक्स आप लोक कला को किस तरह से देखते हैं? बल्कि सोच-विचार की यह सरणियां मात्र क्या आपको सार्थक व प्रासंगिक लगती हैं? हो सकता है यह कोटिगत धारणाएं सदियों पहले अस्तित्ववान न रही हों या उनके स्वरूपोच्चार कुछ और रहे हो लेकिन आज यह यथार्थ है, सिरे से मिथ्या नहीं। बल्कि संचार व अन्यान्य माध्यमों के जरिये लोक-जीवन को आधुनिकता की मुख्यधारा में लाने की कोशिशों से जनजातीय व लोक-कलाओं में जो संक्रमण व बदलाव आ रहे हैं, उन्हें आप किस तरह से चिन्हित करते हैं? औद्योगीकरण ने बहुत तेजी से बहुत कुछ परंपरिक ज्ञान, तकनीक, कला को नष्ट किया और अब भूमंडलीकरण कर रहा है। यह दिलचस्प है कि लोक-समय की परंपरा व जीवन में उस तरह से हर चंद एक वर्षों में कला-आंदोलन नहीं होते जैसे आधुनिक समय में होते हैं और न ही वहां मार्क्सवादी या कलावादी प्रभृति श्रेणियां विद्यमान रही हैं। बल्कि वहां मुख्यधारा या हाशिया जैसे विचार ही अप्रासंगिक लगते हैं जबकि हमारे समय का यह एक दुखद तथ्य रहा है कि यहां – नागर संरचनाओं में – गंभीर व उच्चकोटि की कला व साहित्य समाज के हाशिये पर है।

यह भी दिलचस्प है कि अक्सर भारतीय सामाजिक संरचना को जातिगत सोपानक्रमों में देखा जाता रहा है लेकिन उसमें यह गौरतलब है कि निम्नवर्ग हो या उच्चवर्ग के कला-रूप या अन्य रचनाभिव्यक्तियां, वे सभी इसी सामाजिक संरचना में बराबर से प्रत्येक वर्ग द्वारा सम्मानजनक नजर व भाव से ही लिये जाते रहे हैं। हो सकता है कहीं एक दलित का मंदिर में प्रवेश वर्जित हो लेकिन उस दलित समुदाय-विशेष की रचनाभिव्यक्तियों पर कभी किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया जाता। सभी अपने स्वायत्त स्वरूप में सर्वांग तरह से खिलती रह सकती हैं।

अखिलेश : शास्त्रीय, आधुनिक और लोक कलाओं में मैं कोई फर्क नहीं देखता हूं, न मुझे यह लगता है कि इस तरह के फर्क में उन्हें देखा जा सकता है। उन्हें ऐसे भेद से देखना चित्र देखने के पहले ही अपने को चित्र से बाहर कर लेना है। इस तरह की कोटियां मुझे प्रासंगिक नहीं लगती। सार्थक नहीं लगती। पूरी दुनिया में की जाने वाली कलाएं मनुष्य द्वारा की जाने वाली कलाएं हैं। चाहे वह किसी भी देश में रहता हो। किसी भी संस्कृति का सदस्य हो। किन्हीं भी परिस्थितियों में रहता हो। मनुष्य यदि चित्र बना रहा है, वह दूसरे मनुष्य के लिए ही है। इसमें परिस्थितिजन्य भेद पैदा करना कि यह लोक है, शहरी या आधुनिक या पिछड़ा है, मुझे प्रासंगिक नहीं लगता। इस तरह के भेद पैदा कर हमने अपने लिए ही तमाम उलझनें पैदा की हैं। हम अपनी उलझनों में रह कर दूसरों की उलझनों को भी सुलझाने की कोशिश करते रहते हैं। यह समझते हैं कि यह उलझनें हमारी नहीं हैं, यह उलझनें दूसरों की हैं, जिन्हें हमें ठीक करना चाहिए। यही बात हम इस तरह से भी कहते रहते हैं कि कई तरह के संक्रमण हैं और कई तरह के बदलाव हैं और इन सबसे कलाएं नष्ट हो रही हैं। हमें देखना चाहिए कि क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है? क्या कलाएं नष्ट हो रही हैं? यदि वे सच में नष्ट हो रही हैं, तब उन्हें नष्ट हो ही जाना चाहिए। वे फिर इस लायक नहीं है कि इन संक्रमणों को, इन बदलावों को झेल सके या आत्मसात कर फिर से कुछ नया प्रकट कर सकें। औद्योगीकरण को भी कलाओं ने अपने ढंग से आत्मसात करने की चेष्टा की। संभव है, उसमें कोई महत्वपूर्ण काम न हुआ हो, किंतु वह हो सकता है इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता और जो हुआ है, उसको खारिज भी नहीं कर सकते। यह सब हो रहा है, बहुत तेजी से हो रहा है, इसे मैं मानता हूं। शायद यह तेजी ही हमें अकबका देती है। हम समझ नहीं पाते कि अभी हमने ब्रश उठाया ही था और कलाएं कंप्‍यूटर से कैसे बनने लगीं। इस तरह की तेजी से अचकचाना भी मनुष्य की समस्या है।

मुझे नहीं लगता कि इससे कला को कोई फर्क पड़ने वाला है या साहित्य को कुछ होने वाला है। यह सब होता रहेगा। कला की चाल अपने ढंग की चाल है। आ रहे और आने वाले बदलावों से भूमंडलीकरण हो रहा है। यह कलाओं को किसी तरह से प्रभावित कर रहा है, यह सच है। किंतु भूमंडलीकरण से कला का अपना रूप नष्ट हो रहा है, यह स्वीकार कर पाना मुश्किल है। इस समय के महत्वपूर्ण कलाकारों को लें : अनीष कपूर, जेफ कून्स, डेमियन हर्स्ट, डेविड हॉक्नी, आदि सब की कलाकृतियां आधुनिक समय के साथ अपना संबंध बनाते हुए अचंभित करती हैं। हम इनसे उतने ही प्रेरित होते हैं जितने कि उन्नीसवीं या बीसवीं सदी की कला से प्रभावित होते रहे थे या जितना कि अपने लोक कला रूपों से। या अन्य कला रूपों से। यह देखना व विचार करना चाहिए कि जब कलाभिव्यक्तियां बदलती है तब क्या उनके देखने का ढंग बदलता है? मुझे नहीं लगता मनुष्य के देखने के ढंग में कोई बदलाव आता है। वह हमेशा वैसा ही देखता आ रहा है। मनुष्य का देखना महत्वपूर्ण है, न कि उसका इन बदलावों से प्रभावित हो कर सोचना समझना। वह कई तरह के परिवर्तनों से रूबरू होता रहता है। ऐसे कई बदलाव जीवन में आते रहते हैं। बदलावों का सामना मनुष्य उतनी ही दिलेरी से करता है, जितना कि वह इन कला रूपों से संबंध बनाता है।

मनुष्य के बच्चे का मर जाना भी उसके जीवन में उतना ही बड़ा बदलाव है, जितना कि कलाकृति में कला रूप का बदलना। इन्हें यदि कला आंदोलनों की कोटियों में रखें या इन्हें मार्क्सवादी या कलावादी श्रेणियों में रखें, तब यह सब मनुष्य की समस्याओं की तरह रेखांकित की जाने वाली चीजें हैं। मुझे नहीं लगता कि यह कला के रस में परिवर्तन लाती हों। रूस की कला की तरफ देखें, उन तिहत्तर सालों में जब वहां मार्क्सवाद पूरी तरह से मौजूद था। वहां की कला में कुछ भी खास नहीं हुआ जबकि वहां से भागे हुए कलाकार – मालेविच, रोथको, कैंडिस्की, मार्क शागाल आदि के कारण दुनिया की कला में महत्वपूर्ण परिवर्तन आये। रूस में उस दौरान के कलाकारों का नाम भी मौजूद नहीं है। उनको कोई जानता तक नहीं है। शायद रूस तक में लोग उन्हें जानते नहीं होंगे। एक विचारधारा से जब कलाकृतियां बनने लगती हैं तब इसका अर्थ यह भी है कि कला की परिभाषा खड़ी कर रहा होना है। मसलन, ऐसा सोचना गलत है कि मार्क्सवादी या कलावादी होने से ही कला का जन्म हो सकता है। चित्रकार होता है या नहीं होता। बस। चित्रकार की अभिव्यक्ति का विचारधारा या उसके सोचने-समझने के ढंग या वह जिन परिस्थितियों में रहता है, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जनगढ़ मार्क्सवादी होता या वह शहर में रहता, तब भी वह अपने ढंग के चित्र बनाता। मुझे इस बात पर पूरा भरोसा है कि मनुष्य का अपना देखना ही महत्वपूर्ण है। सारी कोटियां आधुनिक मनुष्य ने अपने को समझने के लिए अध्ययन हेतु बनायी हुई हैं। अक्सर वह दूसरों को नीचा दिखाने की कोशिश करता है, अपने को श्रेष्ठ बतलाते हुए। समस्याओं का अध्ययन करता है। एक गड्डमड्ड निष्कर्ष पर पहुंचता है और इन झूठे निष्कर्षों को एक बड़े समुदाय पर लागू करने लगता है : खुश होता रहता है कि उसने अब मनुष्य के तरने का ढंग पा लिया है या उसके सुखी और सफल जीवन जीने का ढंग पा लिया है! ऐसी सारी विचारधाराएं, ऐसे सारे विचार असफल रहे हैं, जिसमें एक ढंग से मनुष्य को चलाने की कोशिश हो। चाहे धर्म का सहारा लिया हो या आतंक या राजनीतिक विचारधारा का, वह हमेशा निष्फल ही रहा है। मनुष्य की फितरत ही ऐसी है कि वह कभी भी एक तरह से नहीं रह सकता। अगर इस दुनिया में सात अरब लोग हैं, तब वे सात अरब ढंग से सोचते-समझते हैं। मसलन, यह नहीं कहा जा सकता कि मार्क्स का विचार मार्क्स के अनुसार श्रेष्ठ है, इसलिए सबके लिए श्रेष्ठ है। यह मनुष्य की फितरत है। वह एक विचार में से कोई दूसरा विचार निकाल लेता है। उस पर काम करने लगता है। उसी विचार में से फिर कोई एक तीसरा आ कर कोई तीसरा विचार निकाल लेता है। यह सब ऐसे निरंतर चलने वाला काम है जिसे मनुष्य की फितरत की तरह ही देखा जा सकता है, इस तरह नहीं देखा जा सकता कि एक विचार सबके लिए समान रूप से कारगर हो।

पीयूष दईया : पारंपरिक भारतीय व लोकचित्र शैलियों में ऐसा धोखा होता है कि वहां अनुकृति-तत्व बहुत मुखर-सा है – वे अपनी निजी शैलियों से कुंडलित है लेकिन ऐन इसी क्षण एक उदाहरण सामने आता है : नीलमणि देवी ने एक बार एक परदेसी महिला को यह जवाब दिया कि वे सैंकड़ों घड़े इस तरह बना सकती हैं कि हर घड़ा अलग से पहचाना जा सकता होगा लेकिन तब भी सबमें यह खास बात रहेगी कि ये सारे घड़े एक परंपरा के भीतर के ही होंगे।

शैली, परंपरा व रूढ़ि को समझने व परिभाषित करने के सिलसिले में नीलमणि देवी के ये वाक्य मुझे अद्भुत जाने पड़े। इन तीन शब्दों के आपसी संबंध को आप किन तरहों से उद्घाटित करना चाहेंगे?

– एक पारंपरिक चित्र-शैली में परंपरा का यह पुनर्नवीकरण जिसमें शैली का पुनः पुनः संस्कार इस तरह हो रहा है कि वह न केवल नवोन्मेषित रचनात्मकता को प्रकट कर रही है बल्कि अपनी सांस्कृतिकी को भी। और फिर दूसरे उदाहरण में हम शायद रजा साहब को भी ले सकते हैं, जहां बिंदु एक तरह से रजा-प्रतीक बन चुका है। आपकी नजर में एक परंपरा कब रू‍ढ़‍ि बनने लगती है? और एक शैली कब अपने प्राण-तत्व से चुकने/च्युत होने लगती है? दरअसल, एक कला-दृष्टि तक पहुंचने की यह जो साधनासाध्य यात्रा है, वह संभवतः बहुस्तरीय व बहुल है।

क्या आप अपने विचारों का साझा कर सकेंगे ?

नीलमणि जी के यहां अन्य चीजों के अलावा दो बातें सामने आती है। पहली यह कि एक व्यक्ति के रूप में नीलमणि स्वयं को एक परंपरा के भीतर ही मानती है और दूसरी यह कि वे उस परंपरा की अपनी रचनात्मक संभावनाओं को अपनी व्यक्तिगत प्रतिभा से इस तरह से विस्तार देती व गहरा करती है कि उस में उनकी अपनी कलाछाप भी उसी परंपरा के रूप में ही चिह्नित की जाती है। जाहिर है यह एक बहुत कठिन साधना भी है।

एक धारा वह है जिसमें जनगढ, सोना बाई, गंगा देवी व अन्य कलाकार आते हैं, जिनको हम एक पारंपरिक शैली में काम करने वाला मौलिक कलाकार कहते हैं।

इन कलाकारों को लेकर अभी तक यह असमंजस है कि इन्हें किस रूप में लिया जाय : एक व्यक्ति के रूप में या एक परंपरा के रूप में? बल्कि एक स्तर पर आ कर इस तरह से विचार करना कभी घातक भी हो सकता है क्योंकि व्यष्टि और परंपरा अपने मूलगामी स्त्रोत में संभवतः अभिन्न है।

दरअसल, यह कलाकार एक ऐसे juncture पर खड़े लगते हैं, जिससे एक रास्ता उस ओर जाता है, जिसमें एक असाधारण लोक-कलाकार हमारे सामने आता है और चुपचाप कहीं बिला जाता है और दूसरा रास्ता वह है, जिस पर एक सोनादेवी या एक जनगढ़ चल कर अपनी एक नयी शैली को न केवल जन्म देता व पोसता है बल्कि यही चीज आगे जाकर उसे एक व्यक्ति कलाकार वाले गोलार्ध में कुछ इस तरह से ले आती है कि वह परंपरा मात्र को ही अतिक्रमित करते हुए उसे कहीं पीछे छोड़ देता है।

जैसे संगीत में घराना होता है।

जैसे बनारस का बुनकर अपने कालीन पर एक निश्चित ढंग का ही पैटर्न बनाएगा हर बार, रंग अलबत्ता अलग अलग हो या लखनऊ के चिकन की दस्तकारी में कढ़ाई का अपना एक विशिष्ट व्याकरण है और उसमें कोई फेरबदल उसे चिकन का काम नहीं रहने देगी, जिस तरह बुनकरों का अपनी कला में विचलन उस बुनी गयी वस्तु को बनारस की कालीन नहीं रहने देगी।

तो यहां अब प्रयोगधर्मिता के साथ परिवर्तन का आयाम भी सामने आ जाता है।

इन पहलुओं पर आपकी दृष्टि व सोच क्या है?

इस संदर्भ में फिर परंपरा और प्रयोगधर्मिता का प्रश्न व आयाम भी अनिवार्यतः जुड़ जाता है। हम देखें कि एक लोक-चित्र अपनी परंपरा से मर्यादित होता है और उसकी मूलगामी थीम को बदला नहीं जाता। जैसे पिथौरा में पिथौरा बावसी की चित्रकथा बनायी जाती है। कला में प्रयोगधर्मितापरिवर्तन की अवधारणा एक लोक-कला में कब व किस तरह से सांस लेने लगती है, अपने लिए स्पेस बनाती है? एक आधुनिक चित्र-कृति के बरक्स एक लोक-कला-रूप में प्रयोगधर्मिता के लिए किन रीतियों से गुंजाइश बनने-बचने लगती है? कैसे लोक-कला में परिवर्तन या प्रयोगधर्मिता स्वयं को चरितार्थ करती है?

दरअसल, परिवर्तन अवश्यंभावी है लेकिन परिवर्तनों को उनके ऐन परिवर्तित, घटित होते वक्त पहचानना एक ऊंची व दूसरी बात है क्योंकि इसका अधिकांश – दिशा, प्रयोजन, भविष्य सब अनिर्धार्य, अनिश्चित होता है। एक कला-रूप आगे जाकर किस तरह का आकार ग्रहण करेगा यह कहना संभवतः असंभव है लेकिन फिर भी हर कलाकृति एक खास जमीन पर सांस लेती है व उसके कुछ अंदरूनी तर्क एवं निर्धारक तत्व होते हैं, जिनसे आने वाले दिनों में एक समुदाय की प्रवृत्तियां क्या व किस तरह की होगी इस पर कुछ अनुमान लगाये जा सकते हैं। दूसरे शब्दों में, एक लोक-कला-रूप के संदर्भ में आप परिवर्तन को कैसे समझते हैं और उसमें किन कोणों से दाखि़ल होते हैं?

अक्सर यह कहते सुना जाता है कि परिवर्तन स्वयमेव/spontaneus होना चाहिए तभी वह स्वस्थ होगा कि उसे जबरन नहीं होना चाहिए वरना वह एक विकृति होगी लेकिन यह स्थापित व सामान्यीकृत बात प्रश्नाकुल बनाती है। एक कलाकृति में मोटे तौर पर वह परिवर्तन है जो उसकी अपनी आन्तरिक शक्तियों/inner forces के चलते आता है और दूसरे किस्म का परिवर्तन वह है जो किसी विजातीय तत्व/foreign element के हस्तक्षेप/intruding की वजह से आता है लेकिन कला का इतिहास हमें बहुत बार यह सिखाता प्रतीत होता है कि विजातीय तत्व से आये परिवर्तन भी अंततः स्वस्थ, विलक्षण व उत्कृष्ट हो सकते हैं।

परस्पर अंतर्गुंफित उपर्युक्‍त बिंदुओं पर आपके विचार जानना चाहूंगा।

अखिलेश : पारंपरिक भारतीय चित्रकला और लोक चित्र शैलियों में ही ऐसा धोखा होता हो कि वहां अनुकृति तत्व बहुत मुखर है, यह सच नहीं है। मुझे लगता है, सारी कलाकृतियां एक धोखा हैं। कलाएं मनुष्य को थोड़ी देर के लिए उसके यथार्थ व परिवेश से काट कर एक स्वप्नलोक में ले आती है। स्वप्नलोक से निकलने पर उस धोखे का ज्ञान होता है, जो कलाकृति में मौजूद था। अनुकृति का तत्व हर कलाओं में मौजूद है। अनुकृति किसी भी कला के मूल में बैठा हुआ एक तत्व है। साहित्य या चित्रकला में बगैर अनुकरण या दोहराव के कुछ भी नहीं होता।

नीलमणि देवी का यह कहना कि वे सैकड़ों घड़े इस तरह बना सकती हैं कि उनमें हर घड़ा अलग से पहचाना जा सके, तब वह ठीक ही है। एक ढंग से वह एक परंपरा के भीतर ही होगा, वह एक ही व्यक्ति द्वारा बनाये घड़े हैं। नीलमणि देवी ने अपने जीवन में भी जितने घड़े बनाये हैं वे सब एक दूसरे से अलग हैं। इन सारे घड़ों के अलग होने का कारण उस में बुना गया समय भी है – वह समय जब नीलमणि देवी किशोरी रही होंगी या युवती या वह समय जब वे प्रौढ़ हैं। इन सब अलग अलग समयों में बनाये गये घड़े एक दूसरे से निश्चित ही भिन्न होंगे बल्कि युवावस्था में ही बनाये गये दो घड़े – एक प्रेम करने के पहले और एक प्रेम करने के बाद – एक दूसरे से भिन्न होगा। घड़े बनाने में नीलमणि देवी का अपना मन, मनःस्थिति आदि भी काम कर रही होती है। शैली को इस तरह देखना चाहिए कि वह कलाकार का कलाकृति बनाने का अपना एक ढंग है। अपनी पहुंच/approach है। अपने सरोकार हैं। इन सब से मिल कर एक कलाकृति गढ़ी जाती होगी। इस गढ़त में कलाकार की शैली है। शैली उस अर्थ में नहीं देखनी चाहिए जिस अर्थ में चित्रकार ने एक ही शैली में काम किया है। क्या वह शैली है? क्या वास्तव में वह अभिव्यक्ति है? मुझे लगता है मनुष्य के पास जीवनरूपी समय कम होने के कारण वह कुछ साल या जीवन भर एक तरह के चित्र बनाता रह सकता है। चित्र बनाते हुए मर सकता है। यह जरूरी नहीं है कि एक चित्रकार की जीवन शैली या जीने का ढंग अन्य लोगों के लिए भी प्रामाणिक हो। दूसरे लोग अपने ढंग से जीते हैं। अपने ढंग से समझते हैं। अपने ढंग से चित्र बनाते हैं। शैली एक कलाकार की पहुंच से उत्पन्न होने वाली है। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक चित्रकार अपने जीवन में कई तरह के चित्र बना कर भी शैली का चित्रकार कहलाया जा सकता है। एक दूसरा चित्रकार एक ही तरह के चित्र बना कर भी एक शैली के चित्र बनाने वाले चित्रकार की तरह जाना जा सकता है। दोनों चित्रकार अपनी ही परंपरा से ग्रहण कर काम कर रहे हैं। दोनों के चित्रों में परंपरा का निवेश उतना ही है, जितना उन्होंने जाना-समझा व लिया है। एक चित्रकार की अपनी परिस्थिति में रहने से बनी हुई परंपरा एक तरह का आनुष्ठानिक कर्मकांड है। हो सकता है दूसरी परिस्थितियों में रहने वाले समुदाय के साथ इसका कोई मेल न बैठता हो। एक समुदाय की परंपरा दूसरे समुदाय की परंपरा से भिन्न हो सकती है। अपनी परंपरा से मनुष्य ग्रहण करता व सीखता-समझता है; उसे अपनी अभिव्यक्ति में लाता है, उनमें व्यक्त होता है। ऐसा मनुष्य पाना मुश्किल होगा, जिसे संसार की समस्त परंपराओं का ज्ञान हो। ऐसा नहीं होता मसलन, पिकासो फ्रांस में आकर रहने पर फ्रांसीसी परंपराओं का अनुसरण करने लगा हो। हां, वह उन्हें जानने समझने की कोशिश करता है और अपनी स्पानी परंपराओं में रह कर ही चित्रकला को असंभव ऊंचाइयों पर ले आता है : स्पेन की देशज स्मृति को सार्वभौम बनाता है। शैली एक व्यक्तिगत चीज है, कलाकार के नितांत एकांत से उपजी परंपरा स्थान-विशेष में रहने वाले एक समुदाय के आनुष्ठानिक कर्मकांडों से उत्पन्न पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही अनुष्ठानों की एक शृंखला है। रूढ़ियां वैश्विक भी हो सकती है। उदाहरण लें। चित्रकला में काला रंग दुख की अभिव्यक्ति के लिए प्रमुख रंग की तरह देखा जाता है। लाल रंग युद्ध या प्रेम के प्रमुख रंग की तरह। इन रूढ़ियों से हर चित्रकार अपने ढंग से संबंध बनाता है या नहीं बनाता। कई बार वह उन्हें तोड़ता है, बढ़ाता भी है। यह रूढ़ियां उसकी अपनी परंपराओं से उत्पन्न रूढ़ियां भी हो सकती हैं, अपने समुदाय की मान्यताओं से उत्पन्न रूढ़ियां भी हो सकती है। इन रूढ़ियों से भी चित्रकार चित्रकला से एक संबंध बनाता है। जैसे आंद्रे सिरानो यहूदी परंपराओं को अपने चित्रों में ले आते हैं। उनके रखने में वह सार्वभौम नजर आती है। उन्होंने कहा कि हमारे यहां सफे़द रंग दूध के लिए, पीला रंग पेशाब के लिए और लाल रंग खून के लिए है। यह एक सार्वजनिक सत्य भी है; सभी को स्वीकार हो जाता है। परंपरा चित्रकला की रूढ़ि भी बन जाती है। हो सकता है इन रूढ़ियों को तोड़ने की कोशिश की जाए। हो सकता है इन रूढ़ियों के साथ संबंध बनाते हुए कलाकृतियां रची जाए। सब कुछ मनुष्य के साथ संबंधित है।

एक पारंपरिक चित्र शैली में, परंपरा के पुनर्नवीकरण में, शैली का भी पुर्नसंस्कार होता है। जगन्नाथ जी का उदाहरण लें। पुरी के जगन्नाथ जी के मंदिर में रखी जाने वाली मूर्तियां एकमात्र ऐसी मूर्तियां हैं, जिनकी प्राणप्रतिष्ठा आदिवासी समुदाय द्वारा की जाती है। वे हर वर्ष चित्रित की जाती हैं और पुरानी मूर्तियों का विसर्जन होता है। वे हर वर्ष आकर इसे चित्रित करते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि एक ही चित्रकार आता रहता है और अपने मरने तक वही चित्रित करता है। उसके साथ आने वाले चित्रकार उसके बाद चित्रित करने लगते हैं। इस तरह से यह आगे तक चलता आता है। इस की एक परंपरा बनी हुई है। हो सकता है वह चित्रकार उसे चित्रित करते वक्त उस में कोई एक परिवर्तन ले आता हो। यह उसके अपने ढंग का परिवर्तन है, उसकी अपनी पसंद नापसंद से संचारित होने वाली बात है। हो सकता है वह चित्रकार जगन्नाथ जी की भौंहों के ऊपर एक बिंदु कम लगाये : इसके पहले भौहों के ऊपर दस बिंदु लगते थे, उस दिन नौ लगा दिये। यह लोगों को दिखाई भी नहीं देता है। इस तरह का एक छोटा-सा हस्तक्षेप आगे जाकर उस कलाकृति को पूरी तरह से बदल देने वाला है। आज से सौ साल पहले चित्रित जगन्नाथ जी के छाया-चित्र का आज के चित्रित जगन्नाथ जी के छाया-चित्र से मिलान करने पर दोनों में जमीन-आसमान का फर्क देखा जा सकता है। सौ साल पहले चित्रित जगन्नाथ जी की आंखें आज के जगन्नाथ जी की आंखों से नितांत भिन्न हो सकती हैं। यह भिन्नता एक परंपरा के भीतर घटित हो रही है और यह परंपरा ही उसमें बदलाव लेती आ रही है। यह बदलाव एक व्यक्तिगत बदलाव है। एक कलाकार के द्वारा किया गया छोटा सा बदलाव धीरे-धीरे पूरी तरह से कलाकृति को बदल जाता है। हमारे संस्कार या पारंपरिक शैलियां या परंपराएं आदि सबमें लगातार बदलाव आते रहते हैं। यह लगातार बदलती रहती है। नित नूतन है। आज के समय में की जाने वाली राजपूत लघु चित्रकला आज से सौ साल पहले की जाने वाली राजपूत लघु चित्रकला की तरह नहीं है। दोनों में बहुत फर्क है। आज का आदिवासी नवयुवक जगन्नाथ जी को आज की समझ से, आज की पसंद-नापसंद से, आज के अपने समुदाय की पसंद-नापसंद से चित्रित करता है और उस चित्रांकन में बदलाव आता/लाता है। यह बदलाव इतना छोटा, इतना गैर जरूरी सा होता है कि उस ओर शायद ध्यान भी न जाए लेकिन सौ साल के भीतर जगन्नाथ जी यहां से वहां तक एकदम बदल जाते हैं। जबकि सभी उनकी उस जगन्नाथ जी की तरह पूजा करते हैं, जो स्थापना के वक्त रखे गये जगन्नाथ जी थे। हर बार कलाकृति अपने को नये ढंग से प्रकट करती है। यह नया ढंग इतनी धीमी गति से प्रवेश करता है कि इससे पहले कि उसे महसूस किया जाए या उस पर ध्यान जा सके तब तक एक पीढ़ी गुजर चुकी होती है। और वह परंपरा बन चुकी है।

इस तरह देखना कि रजा बिंदु के प्रतीक की तरह बन चुके हैं या रजा के साथ बिंदु को जोड़ कर देखा जाता है तब यह उनकी कलाकृतियों को देखने से बचने का रास्ता है। ऐसा नहीं है कि रजा ने जीवन में सिर्फ बिंदु ही चित्रित किये हैं। बिंदु का उनके साथ एक प्रतीक के रूप में जुड़ जाना रजा के चित्रकर्म को घटा कर देखने जैसा है। रजा ने यदि बिंदु के चित्र बनाये हैं तो सैकड़ो चित्र ऐसे भी बनाये हैं, जिनमें बिंदु दूर दूर तक नहीं है। रजा को बिंदु-प्रतीक तक सीमित करने की जिद में वे उसी रूप में नजर आने वाले कलाकार की तरह दिखाई पड़ते हैं। यह सुविधा के लिए गढ़ा गया है। हो सकता है इसका रजा के चित्रकर्म से कोई संबंध न हो। एक नितांत नकली आरोपण रजा की चित्रकला पर थोप कर, रजा के चित्रों को देखने से बचने की कोशिश कर ली जाती है। मैं नहीं समझता कि रजा और बिंदु एकजान हो चुके हैं या बिंदु रजा का प्रतीक बन चुका है। यह सीमितता अभिव्यक्ति की अंतिम परिणति की तरह नजर आने लगती है।

यह कहना बहुत मुश्किल है कि एक परंपरा कब रूढ़ि बन सकती है या कब बनने लगती है। इतना जरूर है कि एक समय में किया जाने वाला आधुनिक काम या अपने समय से अलग हट कर किया गया काम परंपरा बन जाता है। वान गॉग के चित्रों का उदाहरण लें। उसके जीवन काल में चित्र खारिज किये जाते रहे जबकि अब वे चित्रकला की परंपरा की तरह स्वीकार्य है। अब कोई भी युवा चित्रकार वान गॉग की परंपरा से अपने को अलगाने की कोशिश नहीं करता है बल्कि वह उस परंपरा के साथ अपना एक गहरा संबंध जताने की कोशिश करता है। आज से डेढ़ सौ साल पहले रहने वाले लोगों के लिए वह एक नितांत अपरिचित चित्रकर्म था। वे अपने को वान गॉग के चित्रों से जुदा पाते थे, उनके साथ अपना संबंध नहीं बना पाते थे। उन्हें लगता था यह एक पागल द्वारा किया जाने वाला काम है; चित्रकला नहीं है। आज डेढ़ सौ साल बाद वान गॉग की कलाकृतियों को चित्रकला की परंपरा के एक चमकदार हिस्से की तरह देखा जाता है। यह हो सकता है कि वान गॉग की अपनी प्रस्तावनाएं अब चित्रकला की रूढ़ियों की तरह नजर आती हों। परंपरा के साथ हम उसे पुनर्परिभाषित करते रहते हैं। रूढ़ि को परिभाषित करने के लिए रूढ़ि के साथ ऐसा संबंध भी बनाते हैं : उसे पूरी तरह से नष्ट कर एक दूसरी बात करने की कोशिश करते हैं।

एक शैली अपने प्राणतत्व तत्काल ही खोने लग सकती है और कई बार हो सकता है अपने भीतर से ऐसी धाराएं प्रवाहित करे जिसमें चित्रकार उसे कई अन्य दिशाओं में ले जा सके। मसनल, जब मुगल आये, तब उनके साथ फारसी चित्रकला भी आयी। यहां पर लघुचित्रों का भरा पूरा संसार था। दोनों के संबंध से मुगल चित्रकला नाम की एक शैली का विकास हुआ। अपने में अद्वितीय शैली का। इस शैली में कुछ हिंदुस्तानी चित्रकला के तत्व मौजूद हैं, कुछ फारसी चित्रकला के। खास तौर पर पारदर्शिता, अलंकरण और हाशिया। चित्रकला की एक नयी परंपरा का जन्म हुआ : बहुत ही दिलचस्प, अत्‍यंत खूबसूरत। इस परिघटना को किस तरह से देखा जाय? – दो परंपराओं के मिलने से एक नयी परंपरा की शुरुआत या कि एक शैली की दूसरी में खत्म होने से दूसरी परंपरा की शुरुआत हुई? ऐसा देखने के पीछे क्या है कि एक शैली खत्म हो गयी है और दूसरी शैली शुरू हो गयी है? बल्कि इस को ऐसे ही देखा जाना चाहिए कि यह उसी शैली का विस्तार है। उसी शैली के कई और रूप प्रकटन एक दूसरी शैली की तरह नजर आ रहे हैं। कला दृष्टियां एक परिस्थिति विशेष में पैदा हुई दृष्टियां है। मनुष्य कुछ विलक्षण ढंग से अपने को अभिव्यक्त करने की दृष्टि खोजता है। या शायद उसके भीतर होती है।

एक कलाकार बनने के लिए तीन चीजों की जरूरत होती है। प्रतिभा, साधना और माहौल। प्रतिभा ईश्वर देता है, इसमें किसी का दखल नहीं है। जितनी प्रतिभा दी गयी है, उतनी ही प्रतिभा के साथ एक व्यक्ति है और उसी के साथ अपना जीवन गुजार सकता है। इसको न ज्‍यादा किया जा सकता है, न कम। ऐसा नहीं हो सकता कि किसी एक कला आंदोलन के कारण या किसी एक खास परिस्थिति में प्रतिभा विकसित हो जाए। कलाकार अपनी कलाकृतियों में प्रतिभा का निवेश करता है। दूसरी बात साधना है। साधना हर कलाकार अपने ढंग से करता है। अपनी समझ, अपनी काम करने की क्षमता के स्तर पर तय करता है कि साधना उसके लिए कितनी जरूरी है। साधना समय कलाकार अपनी तरह से चुनता है। तीसरी बात माहौल की है। चोर के साथ रह कर चित्रकार नहीं बना जा सकता। चित्रकार बनने के लिए चित्रकार के बीच जाकर रहना होता है। वह ऐसा नहीं कर सकता है कि किसी और माहौल में रहे और चित्रकला में अपने को अभिव्यक्त करे। इन तीन चीजों में से पहली ईश्वर देता है और बाकी दो मनुष्य चुनता है। मुझे संदेह है कि इन तीन के बगैर कोई कलाकार हो सकता है।

हर कलाकार अपनी परंपरा के भीतर रह कर ही काम करता है। परंपरा में ही अपनी प्रतिभा का विकास देखता, पाता और खोजता है। उसका परिष्कार होता है। इन्हीं सब परिष्कारों के बीच अपनी शैली तक पहुंचता है। हो सकता है दोहराव से या कमजोरियों से शैली विकसित करे या वैविध्य से।

जनगढ़ या सोनाबाई या गंगा देवी या पेमा फत्या या बेलगूर जैसे अनेक आदिवासी कलाकार हैं, जो किसी एक जनजातीय समुदाय से आते हैं। वे अपनी परंपरा में रह कर अपना काम कर रहे होते हैं। अपने ढंग से खुद को अभिव्यक्त कर रहे होते हैं। इनके कामों को मौलिक काम कहते हैं या मौलिक कलाकार की तरह पहचानते हैं। यह उन सभी के लिए उचित है, जिन का काम हम पहली बार देख रहे होते हैं। मौलिक कलाकार यह भी एक श्रेणी है। लेकिन जैसे ही इन्हें मौलिक कहते हैं बाकी लोग मौलिक नहीं बचते हैं। मौलिक होने के क्या प्रमाण है? इस पर विचार करना चाहिए। क्या इन्हें इसलिए मौलिक कह रहे हैं कि ये एक खास तरह का काम करते हैं या कि ये एक खास समुदाय से आते हैं? या कि ये लोग एक खास परंपरा में काम कर रहे हैं? मुझे लगता है यह बात सभी मनुष्यों पर समान रूप से लागू है। सभी प्राणी मौलिक कहे जा सकते हैं। इस तरह के लोकतांत्रिक देखने के ढंग से चित्रकला के संसार में इतने ज्‍यादा हस्तक्षेप होते हैं कि हर ऐरा-गैरा अपने को मौलिक कलाकार मानते हुए अपने चित्रों को मूर्ख आत्मविश्वास के साथ रखता रहता है। सोचता है उसका काम हुसैन, स्वामीनाथन या गायतोंडे की ही तरह अद्वितीय है। किसी एक व्यक्ति-विशेष की बात को उसी रूप में देखना बेहतर है। उसे एक समुदाय के रूप में देखना एक अवमानना है। मसलन, जनगढ़ सिंह श्याम को परधान गोंड चित्रकार कह कर नकारने की कोशिश हुई है। ऐसे कई लेख हैं, जिसमें परधान चित्रकला की बात है। जनगढ़ प्रतिभाशाली व्यक्ति था। गोंड जातियों में परधान मूलतः संगीतकार होते हैं। जनगढ़ मूलतः संगीतकार था : बांसुरी बजाता, गाने गाता। जिन देवी-देवताओं के स्तुति गान वह करता, उनके रूपों को गढ़ने लगता। चित्रों को चित्रित करने का उसका अपना ढंग था। चित्रकला की एक नयी शैली का जन्म हुआ। जनगढ-कलम। जिसकी शुरुआत जनगढ़ से हुई। जनगढ-कलम को परधान चित्रकला कहना झूठ है। जनगढ़ से पहले परधानों में चित्र बनाने के कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। ऐसे प्रमाण जिन्हें सामने लाकर कहा जा सके कि हां, यही चित्रकला को जनगढ़ ने आगे बढ़ाया है। जनगढ़ को देख कर उसके गांव के अनेक लोगों ने जनगढ़ के ढंग से काम करना शुरू कर दिया। बहुत सारे गोंड, बहुत सारे परधानों ने। हो सकता है दूसरी जाति के लोगों ने भी। यह नहीं कहा जा सकता कि जनगढ-कलम परधान गोंड चित्रकारों द्वारा की जाने वाली चित्रकला है। उसका विस्तार अन्य लोगों में दूसरे रूपों में हो चुका है। जनगढ़ की तरह आज कई लोग चित्र बना रहे हैं, पर वे सब निष्प्राण है। सब एक अवसरवादी चित्रकार की तरह अपने को बरत रहे हैं। कुछ ने जनगढ़ की उड़ान में से अपनी उड़ान खोज निकाली है। जैसे जनगढ़ के बेटे मयंक ने। मयंक ने जनगढ़ से बिलकुल अलग एक दूसरा ढंग खोज लिया है। वह एक प्रतिभाशाली चित्रकार है। जनगढ़ शैली में काम कर रहा है। वेंकट या रामसिंह उर्वेती भी जनगढ़-कलम में ही काम कर रहे हैं। जनगढ़-कलम में विस्तार की संभावना उजागर हुई है। इस तरह से जनगढ़-कलम अपने में एक नयी शैली की शुरुआत है। मेरे खयाल से यह संसार की सबसे नयी शैली है। इसका जन्म 1981-1982 के आसपास होता है। एक परंपरा में ही काम करने वाली चित्रकला का दूसरा अनुभव व कोशिश है। वे उतने ही मौलिक व प्रतिभासंपन्न कलाकार हैं, जितने कि अन्य कलाकार हैं। कोई एक जनगढ़ या सोना बाई जैसा कलाकार आता है, अपनी शैली को जन्म देता है। पालता पोसता है। हो सकता है उनके बाद उस शैली का क्षरण होने लगे या वह खत्म हो जाए। मुगल आक्रमण होने पर बड़े इलाकों में मुगलों का राज शुरू हुआ। उन रजवाड़ों के यहां काम करने वाले कलाकार जान बचाने के लिए पहाड़ों की तरफ जाकर बस गये। वहां की भिन्न परिस्थितियों में, उस परिवेश का चित्रांकन शुरू हुआ जिसमें वे रहने लगे थे। बूंदी, भसौली, कांगड़ा आदि अनेक चित्र शैलियों का विकास हो गया। इस तरह उन चित्रकारों के अनुभव का दायरा बदला और उसका विस्तार भी हुआ। उन्होंने अपने पहले के चित्रों को दोहराया नहीं। वे दूसरे रजवाड़ों में जाकर दूसरी चित्र शैलियों का विस्तार करने लगे। उन चित्र शैलियों को विकसित करने का कारण बने। ऐसा कहना ठीक नहीं कि वह परंपरा मात्र को पीछे छोड़ रहा है। वह दरअसल परंपरा के विस्तार में चला गया है। यह परंपरा का नये ढंग से प्रकटन है। कलाकार कुछ जोड़ देता है, कुछ हटा लेता है। उसकी पसंद-नापसंद काम करती है।

चित्रकला के संदर्भ में जिसे आप प्रयोगधर्मिता कह रहे हैं, क्या वह प्रयोगधर्मिता है? कला के संदर्भ में विज्ञान में प्रयुक्त होने वाली भाषा का प्रयोग करना गलत है। विज्ञान में प्रयोग की एक परंपरा है और उन प्रयोगों के होने न होने के परिणाम स्वरूप कई तरह की चीजों की खोज हुई। आविष्कार हुए। किंतु कला में कोई दो रसायन मिल कर किसी तीसरी चीज को जन्म नहीं दे रहे हैं। अगर इस शब्द का इस्तेमाल ही करने की मजबूरी है, तब यह कहा जा सकता है कि एक व्यक्ति की प्रतिभा दूसरी परिस्थिति में किसी तीसरी चीज को जन्म दे रही है – तब वह एक परिवर्तन के रूप में दिखाई देता है। इस परिवर्तन को नयी शुरुआत या काम की तरह देखा जा सकता है। बूंदी शैली भसौली से भिन्न है। मालवा के चित्र तंजावुर के चित्रों से भिन्न है। इन में भिन्नता किस बात की है? इस पर ध्यान जाना चाहिए। यह भिन्नता एप्रोच की है। यह भिन्नता परिवेश, परिस्थितियों, पसंद नापसंद की है। चित्रकार मन में अपनी शैली के प्रति जिस तरह से जागरूक होता है, अपनी परंपरा व रूढ़‍ियों से जिन चीजों को चुनता बुनता है, अपनी पसंद नापसंद को जिन तरहों से उस में शामिल करता है, वह सब प्रयोगधर्मिता के अंतर्गत आ सकते हैं। वह सारे बदलावों को आत्मसात करता है और चित्र विस्तारित रूप में सामने आते हैं।

जब यह कहा जाता है कि लोकचित्र परंपरा से मर्यादित है और उसकी मूलगामी थीम बदली नहीं जाती है (जैसे पिठौरा बावसी की चित्रकथा बनायी जाती है) तब यह भी देखना जरूरी है कि यह पिथौरा किसी एक खास समय व खास त्यौहार पर बनाये जाने वाला चित्र है। पिथौरा के अलावा भी भील भिलालों में बहुत चित्र रूप मौजूद हैं। वे चित्र भी उन्हीं की अभिव्यक्ति हैं, उन्हीं की कला में सांस लेकर जीवन पाते हैं। चाहे वह गाथला हो, चाहे बलि के लिए प्रतीक के रूप में चढ़ाये जाने वाले घोड़े या अन्य जानवरों की कलाकृतियां। भील समुदाय के बीच जितने भी आनुष्ठानिक कर्म हैं, उनमें प्रयुक्त होने वाली सामग्री की तरह ये कला रूप नजर आते हैं। उनमें गहरा अंधविश्वास भी इस रूप में नजर आता है कि वह फलां तत्व के बगैर तो नहीं हो सकता है। जैसे यह मानना कि नयी फसल का आगमन पिथौरा को चित्रित किये बगैर नहीं हो सकता है। जैसे यह मानना कि कोई व्यक्ति अगर वीरता से मारा जाता है, तो उसके लिए गाथला का निर्माण जरूरी है। इन बातों को एक समुदाय के अपने विस्तृत रूप में ही देखना बेहतर है। परिवर्तन आदि अक्सर दिखाई देते हैं। आज से सौ साल पहले की गाथलाएं आज से बहुत भिन्न हैं। उनमें जबरदस्त परिवर्तन नजर आता है। यह परिवर्तन किस चीज का है? यह परिवर्तन कलाकार की पहुंच/approach का है। एक समय में रहने वाले कलाकार के दृश्य-परिदृश्य का असर दूसरे समय में रहने वाले चित्रकार के ऊपर कैसे हो सकता है? एक कलाकार के समय में उसके अपने दृश्य परिदृश्य हैं जिनसे वह संचारित होता है, अपना काम करता है।

परिवर्तन स्वयमेव होता है, स्वतःस्फूर्त। परिवर्तन किन अर्थो में परिवर्तन है, यह भी जांचने की जरूरत है। क्या ये परिवर्तन मोटे तौर पर दिखाई देने वाले ऐसे परिवर्तन के रूप में हैं कि कागज पर बनाने वाले चित्रों को कैनवास पर बना दिया? वे कौन से परिवर्तन हैं, जिन्हें रेखांकित करने की कोशिश है? सदियों से मनुष्य अपने देखने को ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा है। देखने को ढूंढ़ने की कोशिश में वह खुद को दिखाई पड़ने वाले उन सारे आकारों से मुतासिर होता और उन आकारों का भी सहारा लेता है, जिन्हें वह लगातार नहीं देखता है। वे उसके स्वप्न या उसकी कल्पनाओं में जन्म लेने वाले आकार हैं। यह सब घटक/ingredients की तरह काम आते हैं, किंतु मूल में कलाकार क्या कर रहा है? मूल में वह अपने देखने का ढंग ही उदघाटित करने की कोशिश कर रहा है। परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। एक खास संदर्भ में परिवर्तन कहने का मतलब है कि आज से पचास साल पहले लोग ऐसे नहीं करते थे और आज ऐसा कर रहे हैं। यह एक ऐतिहासिक संदर्भ है। अतीत से संबंध नजर आता है। किसी भी चित्रकला को यूं नहीं देखा जाता कि भविष्य में ऐसी पेंटिंग होने वाली है, इसलिए एक चित्र में ऐसा बनाया हुआ है। दावे का आधार, परिवर्तन का आधार पूर्व में किये गये कामों के आधार पर ही गढ़ते हैं और अक्सर यह गढ़ना अपनी अक्षमता को ही सिद्ध करता है कि नये परिवर्तन से लोग साम्य नहीं बिठा पा रहे हैं। कि अपना तादात्म्य नहीं स्थापित कर पा रहे हैं। कि अपने देखने को बदलना नहीं चाह रहे हैं। कि एक मजबूर, असहाय व्यक्ति की तरह जीवन जीना चाहते हैं जिसे किसी तरह का परिवर्तन मान्य नहीं है और मानो जो कुछ भी बदला जा रहा है वह एक व्यक्ति की सनक या पागलपन है। या एक व्यक्ति का अपना मसला है जिसका दूसरों से कोई संबंध नहीं है। वान गॉग की पीढ़ी ने परिवर्तन नहीं स्वीकार किया और उसके डेढ़ सौ साल बाद आने वाली पीढ़ी ने स्वीकार किया। इसका क्या अर्थ लगाये? – कि वान गॉग के समय में रहने वाले लोग मानसिक रूप से इतने सक्षम नहीं थे कि वे भविष्य में की जा रही चित्रकला के संकेतों को पढ़ कर उन परिवर्तनों को अपना लेते और उसे समाज में एक जगह प्रदान करते। यह काम डेढ सौ साल बाद होता है। इस परिवर्तन को एक परिवर्तन की तरह न देख कर आवश्यकता की तरह देखा जा सकता है। चित्रकला में बदलने की जरूरत थी। जैसे वान गॉग से पहले का चित्रकला का संसार कुछ उबाऊ और नीरस सा हो चुका था। उसमें परिवर्तन चाहिए था। यह परिवर्तन वान गॉग के चित्रों से आया। जितनी हिकारत से उस वक्त वान गॉग का नाम लिया जा रहा था, उतने ही गर्व से आज उसका नाम लिया जाता है कि वह चित्रकला का एक पुरोधा है। जो परिवर्तन एक समय में स्वीकार नहीं है, वही परिवर्तन कुछ समय बाद आंतरिक शक्ति है। उसका एक पक्ष परंपरा के रूप में प्रस्तुत/प्रकट होता है। कलाकर्म के लिए ऐसी कोशिश करना एक तरह की गलती है कि वह एक परिभाषा के भीतर बंध जाए।

पीयूष दईया : अक्सर यह सुनने में आता रहा है कि आधुनिक भारतीय कला में अमूर्तन पश्चिम से लिया गया/आया उपहार या श्राप है। आकृतिमूलक व विमूर्त कृतियों को लेकर अलग अलग थ्योरी रही हैं। जनजातीय/लोक-समाज-जीवन के कला-रूपों में अमूर्तन की धारणा को आप किस तरह से समझते व जगह देते हैं?

अखिलेश : यह बात एक बड़े पैमाने पर मानी जाती रही है कि अमूर्तन पश्चिम से आया है। एक मायने में यह ठीक भी है। आधुनिक समय में अमूर्तन का एक बड़ा आधार पश्चिम में दिखाई देता है। उससे संवाद भारतीय चित्रकारों का भी रहा है। स्वयं में अमूर्तन पर बात करें। मुझे नहीं लगता कि अमूर्तन को चित्रकला में उपहार या श्राप की श्रेणी में रख कर देखा जा सकता है। आधुनिक अमूर्तन ही अमूर्तन के रूप में उपलब्ध नहीं है बल्कि इसके पहले भी हमारे यहां की कलाओं में अमूर्तन मौजूद है। लघुचित्रों से लेकर आदिवासी कलाओं तक। अन्य देशों की कलाओं में भी अमूर्तन मौजूद है। अमूर्तन से क्या तात्पर्य है, इस पर विचार करना चाहिए। मेरे खयाल से अमूर्त उसे कह रहे हैं, जिसमें कोई मूर्त रूप नहीं दिखाई दे रहा। इसका एक सीमित दायरा है। ऐसे बहुत सारे चित्र हैं, जिनमें आकृति चित्रण भरपूर है, किंतु उनमें अमूर्तन भी दिखाई देता है। क्या वह अमूर्तन, अमूर्तन की तरह नहीं दिखाई देता है? या फिर आकृतियों के बरक्स अमूर्तन देखने की कोशिश नहीं की जाती? जितने भी भाव हैं, वे सब अमूर्त हैं। सारे रस अमूर्त हैं। अमूर्त वह भी है जो अव्यक्त है, जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। जो बयान के परे है। जब कहते हैं कि यह बयान के परे है, तब भाषा की सीमा की बात है। या अपनी भाषा की समझ की सीमा की बात है। एक दृश्य देखते हैं, कहते हैं कि यह बहुत ही अजीब दृश्य है। शब्दों के बाहर है। कि इस दृश्य को शब्द में नहीं बतलाया जा सकता। ऐसा कहना भी अपनी सीमा की बात कर रहा होना है। मिठाई खाने के अनुभव को कि मिठाई खाने का स्वाद कैसा है या इसके बाद कैसा अनुभव होता है, शब्द में बतला पाना मुश्किल होगा। थोड़ी और मेहनत करनी पड़ेगी, भाषा को थोड़ा और समृद्ध करना पड़ेगा। भाषा में उन सारी जगहों पर जा सकने की क्षमता भरनी होगी जहां वह अव्यक्त को व्यक्त कर सके। शब्द अमूर्तन और शब्द मूर्त दोनों बेकार है जब दोनों ही व्यक्त व सामने है। इस तरह की श्रेणियों में विभाजन करना बंद कर देना चाहिए। चित्रकला के संदर्भ में अमूर्तन बगैर किसी आकृति के है। आकृति चित्रण से मतलब सिर्फ मानव-आकृति से नहीं है बल्कि ऐसी किसी भी परिचित आकृति से है, जिसे मनुष्य जानता है। चाहे वह एक फूल हो या एक पक्षी या एक पशु या वृक्ष हो। जानी पहचानी आकृतियों व रूपाकारों के चित्र, वे सब मूर्त हैं। रूपाकारों के अपरिचित होने पर सब अमूर्त रूप हैं। अपने चित्रों में मैं अपरिचित रूपाकारों को एक परिचित आकार देता हूं। और वह फिर अपरिचय के कोहरे में गुम हो जाता है। लोगों के लिए वह अमूर्तन है। एक अमूर्त आकार है, जिससे पहली बार उनका परिचय होता है। अपरिचय से घबरा कर वे उसे अमूर्तन कहते हैं। ऐसी कोई चीज नहीं है, जो अमूर्त है। चित्रण के बाद वह दर्शक के सामने मूर्त रूप में मौजूद है। छूकर-जान-देख सकते हैं। फर्क इतना भर है कि उसे कोई नाम नहीं दे पा रहे हैं, इसलिए वह अमूर्तन है। अमूर्तन वह है, जिसका नाम मनुष्य के पास नहीं है। ऐसी कई चिड़ियाओं को हम जानते हैं, जिनके नाम हमें मालूम हैं। किंतु ऐसी कई चिड़ियाएं भी हैं, जिनके नाम नहीं हैं। एक चिड़िया नाम से उन चिड़ियाओं को जान लेते हैं। मनुष्य नाम से मनुष्य को जान लेते हैं। अपरिचित आकार – जिसका कोई नाम नहीं है – हर दर्शक के लिए अमूर्त होता है। इस अ-नाम अमूर्त को आदिवासी लोक समुदाय में बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया जाता है। उनके स्वीकार्य के पीछे उनकी आस्था काम कर रही होती है। वे रंगों की महक से महकना जानते हैं, रेखाओं के साथ बहना जानते हैं, अपरिचित आकारों के साथ सीधा संबंध बना लेते हैं। समझने की दृष्टि के भीतर न ला कर अनुभव के रूप में लेते हैं। देखने से पैदा हो रहा अनुभव उन का देखना है। आकृतिमूलक होना या न होना/अमूर्त या मूर्त होना नहीं है। एक बड़े अर्थ में बहुत सारी आदिवासी चित्रकला के रूपाकार अक्सर यथार्थवादी चित्रण के खिलाफ है। यथार्थवादी चित्रण में हूबहू चित्रण किये जाने पर जोर है। एक जनजातीय चित्रकार मेंढक भी बनाएगा तो वह अपने ढंग का एक मेंढ़क होगा। ऐसे ही मानवाकृति भी; अपनी उस एनॉटॉमी/Anatomy और प्रर्पोशन/Proportion के बाहर, जिसे पश्चिम से लेकर हमने भी अपनी चित्रकला के अंग की तरह स्वीकार लिया है। उन्हीं पश्चिमी मापदंडों से हमने अपनी चित्रकला को भी देखना-जानना-समझना और उसे एक प्रमाण की तरह मान कर तौलना शुरू किया। यह एक ऐसी बात है, जिस पर किसी का ध्यान नहीं गया है कि कैसे हमने अपनी कला को जांचने-परखने के औजार पश्चिम से उधार लेकर उन्हें जांचना-परखना शुरू किया। यह दुर्भाग्य है। एक समय व जगह पर रह कर काम करने का ढंग नितांत वैयक्तिक होगा। एक समुदाय द्वारा किये जा रहे कामों को किसी दूसरे समुदाय के द्वारा निर्धारित किये गये प्रमाणों के आधार पर नहीं जांचा परखा जा सकता। उसे उसी की सीमा में, उसी के बनाये नियमों के अनुसार देखना होगा। जनजातीय समाज में अमूर्तन को लेकर सहज ही एक स्वीकार्य भाव है। उनके मन में प्रमाण रूप जैसा कुछ नहीं है। उनके लिए उनकी अपनी आस्था ही प्रमाण के रूप में काम करती है। वे अपने देवी-देवताओं का चित्रण करते हैं। और वे प्रामाणिक होते हैं। शहरी मनुष्य की आस्था टूटी हुई – बिखरी हुई है। उसे अपने देखने पर भरोसा नहीं है। वह देखना नहीं चाहता। इन्हें मैं Visually illitrate कहूंगा। मेरा अपना अनुभव है कि अनपढ़ व्यक्ति को पढ़ाया जा सकता है किंतु Visually illitrate की आंखें खोलना असंभव है। चित्र देखना पढ़ कर भी नहीं जाना जा सकता, उसे देखना ही होगा। तब मूर्त-अमूर्त की कोटियों की व्यर्थता खुद ही सिद्ध हो जाएगी।

पीयूष दईया : पिछले कुछ दशकों से आधुनिक कलाकारों का ध्यान लोक व जनजातीय रूपों की समृद्ध व अविश्वसनीय विरासत की ओर गया है। कुछ कलाकारों ने अपना चित्र-संसार निर्मित करने में इन जातीय व स्थानीय रूपों से गहरी प्रेरणा भी ग्रहण की है। आधुनिक कलाकारों की जनजातीय व स्थानीय रूपों के बीच यह आवाजाही एक स्वस्थ लक्षण है जो कि इन लोक व जनजातीय रूपों की ताकत, सामर्थ्य व गहराई को भी व्यक्त करता है। लॉरी बेकर का कहना था कि वास्तुकला की शिक्षा उन्होंने महात्मा गांधी से पायी। गांधी ने कहा था कि अच्छा मकान वही है, जिसे बनाने में इस्तेमाल की गयी सारी सामग्री पांच मील के दायरे में उपलब्ध हो। आपको इस दिशा में ऐसे किन आधुनिक कलाकारों का काम प्रभावित करता व उत्कृष्ट लगता है और क्यों, जिन्होंने अपने जातीय चरित्र व स्वभाव से प्रेरणा ली है?

अखिलेश : हर कलाकार अपने आसपास मिल रही सामग्री का इस्तेमाल कर अपना मानस तैयार करता है। बाद में वह भले ही अपनी कलाकृति के तत्वों के रूप में वह सारी सामग्री पांच मील के दायरे के बाहर से भी खींच लाता हो। उसकी समझ पांच मील के दायरे में पली और बढ़ी समझ है। गांधी जी ने वर्धा में सेवाग्राम बनाने के लिए कहा, इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री पांच मील के दायरे में मिलने वाली सामग्री ही हो। गांधी का इशारा किफायत की तरफ था। अपनी जरूरत की चीजों को अपने आसपास से ही ले सकना चाहिए। अगर वे उपलब्ध नहीं हैं, तो उसकी आकांक्षा नहीं करनी चाहिए। काश! हम हमारे घर में ऐसा भी सामान लगा सकें, जो हमारे इलाके में मिलता हो। गांधी मनुष्य के संयमन की बात कर रहे थे। गांधी से प्रेरणा लॉरी बेकर ही नहीं बल्कि काम कर रहे सभी ले सकते हैं। यह आवाजाही लगातार जारी है। इसमें आधुनिक/लोक/जनजातीय कलाकार सब अपने को बरतते रहे हैं। कई पिथौरा में देख सकते हैं कि एक रेलगाड़ी भी चलती हुई नजर आ रही है। पिथौरा के चित्रकार और पिथौरा की परंपरा व उस समुदाय के अनुष्ठानों में रेलगाड़ी का कोई स्थान नहीं है, किंतु चित्रकार के जीवन में उसका एक स्थान है कि उसने पहली बार रेलगाड़ी देखी। उसे अच्छा लगा, प्रभावित हुआ। और पिथौरा में रेलगाड़ी का चित्रांकन किया। अचानक से उसके चित्र में आया यह तत्व उन सभी को आकर्षित करेगा जो उस पिथौरा या उस समुदाय के दर्शक हैं। ऐसा ही एक पिथौरा भारत भवन में है। चित्र के एक तरफ एक व्यक्ति है और दूसरी तरफ एक स्त्री है। इस व्यक्ति का लिंग पूरे चित्र में इस कोने से उसकोने तक गया हुआ है। व्यक्ति स्त्री के साथ संभोगरत है। कहना न होगा कि चित्रकार ने इस दस फीट के चित्र में अपनी कामना भी चित्रित कर दी है जबकि पिथौरा एक आनुष्ठानिक चित्र है। एक अनुष्ठान के लिए किये जाने वाले चित्र में भी चित्रकार की कामना जगह पाती है। पिछले कुछ दशकों से ही नहीं बल्कि शुरू से ही इस तरह की आवाजाही लगातार चित्रकला के संसार में है। अन्य कला संसारों में भी होगी। यह देखना चाहिए कि किस वक्त यह भेद पैदा हुए कि यह लोक कला है और यह शास्त्रीय कला है। क्या यह भेद उचित है? अनुभव के स्तर पर एक आदिवासी कलाकृति और एक तथाकथित आधुनिक मनुष्य द्वारा बनायी गयी कलाकृति देखने में कोई फर्क नहीं है। बशर्ते कि वे श्रेष्ठ कलाकृतियां हों। बगैर यह जाने की यह कलाकृति किसने बनायी है उस कलाकृति से दर्शक जुड़ जाता है। कलाकृति का आनंद लेता है। रसानुभव करता है। यह जानना क्यों है कि यह कलाकार आधुनिक है या लोक/जनजातीय/आदिवासी है? जान लेने पर उसकी अभिव्यक्ति के भेद की बात क्यों करने की कोशिश करते हैं? ऐसा करने में मंशाएं निश्चित ही उस कलाकृति से रस प्राप्त करने की बजाय कुछ और करने की है। मुझे लगता है कि रचना-अनुभव को श्रेणियों में नहीं बांटा जा सकता। अनुभव का संसार उतना ही विस्तृत व विशाल है जितना कि देखने की निर्बंधता।

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *