वीएन राय सेकुलर हैं और सांप्रदायिक तथा जातिवादी भी!

♦ दिलीप मंडल

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सेकुलर होकर भी कोई जातिवादी हो सकता है। भारतीय संदर्भो में कोई व्यक्ति सेकुलर होकर सांप्रदायिक भी हो सकता है (संदर्भ – पश्चिम बंगाल सरकार और सरकारी नौकरियों में मुसलमान। 27 फीसदी आबादी के हिस्से 2.1 फीसदी नौकरियां (1))। किसी सेकुलर के अवसरवादी और मौकापरस्त होने में तो कोई वैचारिक-नैतिक बाधा भी नहीं है। राजीव गांधी के सेकुलर शासन को अयोध्या में ‘राममंदिर’ का ताला खुलवाने और अयोध्या से चुनाव प्रचार शुरू करने में कोई दिक्कत नहीं हुई। (2)

मनमोहन सिंह का सेकुलर होना उन्हें आदिवासियों की जमीन हड़पने से नहीं रोकता। लालू प्रसाद का सेकुलरवाद उन्हें भूमिहारों की रणवीर सेना का संरक्षक होने से नहीं रोकता। मुलायम सिंह सेकुलर हैं, इसके बावजूद वे दलित विरोधी हो सकते हैं। सीपीएम सेकुलर है इसके बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार दलितों-पिछड़ों और आदिवासियों की जमीन हड़पकर उसे कंपनियों के हवाले कर सकती है। बशीर बद्र का सेकुलर होना उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी फैन्स क्लब में शामिल होने से नहीं रोक सका। (3)

अब नीचे लिखा उद्धरण देखें जो वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालट की साइट पर कुलपति विभूति नारायण राय के बारे में है। (4)

“विभूति नारायण राय देश में मौजूद कट्टरवादी एवं सुधारविरोधी ताकतों के विरूद्ध खड़े होने वाले शख्‍स़ रहे हैं। इन ताकतों ने उनके उपन्‍यास शहर में कर्फ्यू पर प्रतिबंध लगाने की मांग तक की।”

अरविंद शेष ने जब कहा कि क्या एक किताब लिखने की वजह से किसी शख्स को सेकुलर मान लिया जाए और उसे इस वजह से सौ खून करने की छूट मिल जानी चाहिए तो अचानक दिमाग में कुछ खटका। शहर में कर्फ्यू घर में रखी है। किताब में प्रकाशन का साल दिखा 1986। क्या 1986 पढ़कर आपके जेहन में कुछ घंटियां बजती हैं। ये वो दौर था, जब राजीव गांधी दो साल पहले लोकसभा में 400 से ज्यादा सीटें जीतकर प्रधानमंत्री बने थे। बीजेपी का उभार उस समय शुरू हो चुका था। सेकुलर बनने का उससे अच्छा समय और क्या हो सकता था? सवाल ये है कि जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, तब विभूति नारायण राय ने क्या सेकुलर लिखा। जरा सोचकर देखिए। सिवा एक किताब के उन्होंने एनडीए के लंबे कार्यकाल में कुछ भी सेकुलर नहीं लिखा। और एक किताब भी इसलिए क्योंकि वह पिछली सरकार के समय शुरु हुआ शोध था।

देखिए विभूति नारायण राय के इंटरव्यू के अंश (5)

♦ वाजपेयी के शासनकाल में आपकी कोई किताब आयी थी?
सांप्रदायिक दंगों वाली किताब उसी समय आयी है। जब ये लोग सरकार में थे।

♦ वो तो पहले का किया हुआ काम था।
हां, लेकिन छपी तो इन्हीं के जमाने में थी। जब ये सरकार में थे। जब मैं इलाहाबाद में एसएसपी था, तो मुरली मनोहर जोशी और ये क्या नाम है इसका सिंघल … (अशोक सिंघल) … हां ये मेरे घर पर माइक लेकर चढ़ गये और गाली-गलौज करते रहे। उन्होंने कहा कि अगर शहर में कर्फ्यू पर फिल्म बनेगी, तो सारे सिनेमाहाल जला दिये जाएंगे। हिंदी के सौ लेखकों ने अलग-अलग शहरों से दस्तखत करके इसकी निंदा की है। आप चाहो तो वो भी मैं आपको दिखा सकता हूं।

सेकुलर होने की सुविधा हो और उसमें फायदा हो तो कौन कैरियरिस्ट है, जो सेकुलर नहीं बनना चाहेगा? ऐसे मौकापरस्त सेकुलर तो इस समय हिंदी साहित्य की मुख्यधारा हैं। सेकुलर बनकर कांग्रेसी राज, मुलायम राज और सीपीएम राज में मलाई खाने वालों की कमी नहीं है। शिवसेना के मुखपत्र सामना के पूर्व संपादक संजय निरुपम भी आजकल सेकुलर हैं। विभूति नारायण राय के चाहने वालों का कहना है कि दंगों में उनकी भूमिका बेहतरीन रही। हालांकि विभूति नारायण राय की मान्यता है कि अगर दंगे 24 घंटे में न रुके तो अफसरों को सस्पेंड कर देना चाहिए। इस कसौटी पर वे कितने खरे उतरते हैं, इसकी मीमांसा की जानी चाहिए। उत्तर प्रदेश में जब मुलायम सिंह की सरकार थी, तब कई अफसरों ने दंगों के दौरान अच्छी भूमिकाएं निभायी थीं क्योंकि शासन ने दंगों से निबटने में सख्ती बरतने का फैसला किया था और सारे अफसर इस फैसले को लागू कर रहे थे। इसका पुरस्कार विभूति नारायण राय आज तक बटोर रहे हैं।

इतने भर से किसी का सेकुलर होना कैसे साबित हो जाता है। और फिर सेकुलर होने से किसी आदमी का सांप्रदायिक न होना कैसे साबित होता है और ये कैसे सिद्ध होता है कि वो आदमी गले तक जातिवाद के कीचड़ में नहीं डूबा है। अब ज्योति बसु को ही लीजिए। पिछले सौ साल में भारत में उनसे बड़ा सेकुलर कौन हुआ? लेकिन उनके राज्य में मुसलमानों और दलितों की जैसी दुर्गति हुई उसकी मिसाल और कहां मिलेगी। उनका बिखेरा रायता अब बुद्धदेव के समेटे नहीं सिमट रहा है।

तो विभूति नारायण राय को हम क्या मानें? प्रगतिशील, क्योंकि उन्होंने दंगों को लेकर किताबें लिखी थीं? क्योंकि वो दंगों के दौरान उत्तर प्रदेश में पोस्टेड थे और शासन के आदेशों का पालन कर रहे थे? या फिर सांप्रदायिक, क्योंकि उन्‍होंने वर्धा में एक मुसलमान छात्र को ज्यादा नंबर दिये जाने का विरोध किया था। या फिर जातिवादी और दलित विरोधी क्योंकि उनके विश्वविद्यालय के दलित छात्रों ने पूरी चार्जशीट (6) उनके खिलाफ लिखी है; क्योंकि उन्होंने एक दलित प्रोफेसर को अंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस में शामिल होने और जातिवादी नारे लगाने के आरोप में नोटिस भेज दिया (7) ; क्योंकि जिस बैठक में अनिल चमडिया की नियुक्ति रद्द की गयी उसी बैठक में अनिल राय अंकित की नियुक्ति को स्वीकृति दी गयी; या फिर एक बूढ़ा होता तानाशाह, जो किसी की परवाह नहीं करता और सबको ठेंगे पर रखता है, क्योंकि व्यवस्था उसे ऐसा करने की छूट देती है। क्योंकि दलित विरोधी होना इस देश में कोई गर्हित कर्म नहीं है।

dilip mandal(दिलीप मंडल। सीनियर टीवी जर्नलिस्‍ट। अख़बारों में नियमित स्‍तंभ लेखन। दलित मसलों पर लगातार सक्रिय। यात्रा प्रिय शगल। इन दिनों भारतीय जनसंचार संस्‍थान, नयी दिल्‍ली में रेगुलर क्‍लासेज़ ले रहे हैं। उनसे dilipcmandal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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