अच्‍छी भली भोजपुरी को गंदी गंदी बना रहा है मीडिया

♦ आशीष तिवारी

(इस लेख में मीडिया का तात्पर्य इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया से है)

Bhojpuri News Channel

लगभग डेढ़ सालों से भोजपुरी में पत्रकारिता करते हुए इस बात का एहसास शायद ही कभी हुआ हो कि गांव दुआर से चल कर टीवी के चौखटे स्क्रीन तक पहुंचने वाली भोजपुरी का वाकई कोई भला हो रहा है। यकीनन यह एक बड़ा कदम रहा होगा, जब किसी संस्थान ने एक ऐसे टीवी चैनल की अवधारणा को पटल पर लाने का निर्णय किया होगा, जिसकी भाषा भोजपुरी हो। उसके बाद भारतीय मीडिया जगत की क्षेत्रीय समाचार सेवाओं में अपनी अलग पहचान रखने वाले एक अन्य ग्रुप ने भी भोजपुरी में भारत का पहला न्यूज चैनल खोलने का साहस किया।

यही नहीं, इस न्यूज चैनल पर अंगिका, मैथली जैसी भाषाओं में भी समाचार प्रसारित किये जा रहे हैं। मुनाफे की सोच रखने वाले न्यूज चैनलों के बीच भोजपुरी भाषा के चैनलों को संघर्ष करते देखना किसी भी पुरबिया व्यक्ति के लिए सुखद अनुभव है। लेकिन इसके साथ ही जैसे जैसे यह टीवी चैनल अपनी उम्र बढ़ाते जा रहे हैं, इनसे उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं, जो स्वाभाविक भी है। भारतीय मीडिया जगत में भोजपुरी का हिस्सा अभी नाम मात्र का ही है। भले ही पूरी दुनिया में इसे बोलने वालों की संख्या 25 करोड़ के आसपास हो लेकिन भारतीय मीडिया में इसकी भागीदारी बहुत कम है।

दरअसल भोजपुरी टीवी चैनलों ने अपनी शुरुआत से भोजपुरी भाषा को ही केंद्र में रखा है। हालांकि उन्होंने इस बात का दावा जरूर किया कि वो न सिर्फ भोजपुरी भाषा बल्कि भोजपुरिया समाज को एक नयी दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन शायद अभी यह हो नहीं पा रहा है। भोजपुरी में प्रसारित होने वाले चैनलों की अंतर्वस्तु पर जरा एक नजर डालिए।

पूरे कंटेंट को हम दो भागों में बांट देते हैं – पहला समाचार और दूसरा मनोरंजन। चलिए पहले बात समाचारों की कर लेते हैं। भोजपुरिया समाचार चैनलों में स्पष्ट विचारधारा का अभाव साफ परिलक्षित होता है। खास तौर पर भोजपुरिया समाज से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय पहलुओं के साथ जोड़ पाने में अक्सर बिखराव नजर आता है। एक विस्तृत राष्ट्रीय सोच का अभाव बुद्धजीवी पुरबिया समाज को सालता है। यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि भोजपुरी समाचार चैनलों का टार्गेट ग्रुप भोजपुरिया क्षेत्रों में रहने वाले लोग ही हैं पर इससे भी यह बात तो साबित होती ही है कि राष्ट्रीय स्तर पर भोजपुरी को स्थापित करने के लिए इन चैनलों के पास कोई कार्ययोजना नहीं है।

उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड से आने वाली अपराध, धर्म, कला और संस्कृति से जुड़ी खबरों को को महज भोजपुरी भाषा का चोला पहना कर प्रस्तुत कर देना ही काफी नहीं है। क्या इस माटी ने मंगल पांडेय, जयप्रकाश नारायण और लोहिया जैसे क्रांति दूत नहीं दिये हैं? क्या इनकी छवि के सहारे इस माटी से और सपूत नहीं पैदा किये जा सकते? क्या गंगा-जमुना का सिंचित क्षेत्र महज अपराध, ठगी, पुलिस उत्पीड़न, मानवाधिकार हनन, भूख, गरीबी और ऐसी ही फसलों कि उगा रहा है। आज देश में नक्सलवाद एक बड़ा मसला है। यूपी, बिहार और झारखंड इससे बुरी तरह प्रभावित है। क्या यहां के लोगों की आवाज होने का दावा करने वाला भोजपुरी मीडिया इस मुद्दे को ठीक से कवर कर पा रहा है? भोजपुरी मीडिया के अगुवा होने का दम भरने वालों को इस समाज की जड़ों को तलाशना होगा। अपने मीडियावी चोले से भोजपुरी मीडिया के अग्रदूतों को इस समाज की वास्तविक विचारधारा को आगे बढ़ाना होगा।

चलिए अब समाचारों से इतर छोटे परदे पर भोजपुरी के मनोरंजन जगत की बात करते हैं। यूं तो भोजपुरी भाषा में मनोरंजन के नाम पर कुछ भी परोस देने वाले कई चैनल हैं लेकिन जिनके ऊपर जिम्मेदारी ज्यादा है, वो भी इस समाज के साथ इंसाफ नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल शुरुआत में इन चैनलों ने ग्लैमर के तड़के के साथ खूब नाच-गाना दिखाया। लगा कि भोजपुरिया लोक संस्कृति को एक नयी पहचान मिल गयी। पर अभी के हालात में ऐसा कह पाना शायद किसी के लिए आसान नहीं होगा। भोजपुरी भाषा के टीवी सीरियल्स की ही बात कर ली जाए तो घर घर में झगड़ा ही नजर आएगा या फिर खेत-खलिहान को लेकर साजिशों का दौर। सवाल यह कि क्या भोजपुरिया समाज में यही सब हो रहा है। इसके अलावा क्या कुछ भी ऐसा नहीं है, जो सकारात्मक हो और टीवी पर आ सके।

इस बारे में भोजपुरी के कुछ विद्वानों से भी बातचीत हुई। विश्व भोजपुरी सम्‍मेलन के अंतर्राष्ट्रीय महासचिव और साहित्यकार अरुणेश नीरन जी इस मुद्दे पर बेहद तल्ख राय रखते हैं। उनका साफ कहना है कि भोजपुरी मीडिया भी अब बिकाऊ माल परोस रहा है। समाज या भाषा की उन्नति में योगदान देने में भोजपुरी मीडिया कुछ नहीं कर पा रहा है। नीरन जी के तीखे तेवरों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि ‘यह मीडिया भाषा का नाश कर रहा है’। भोजपुरी के स्वभाव को समझे बिना सामाजिक सरोकारों की बात बेमानी है। यही नहीं, समाचारों के साथ साथ मनोरंजन के नाम पर परोसी जा रही अश्‍लीलता से भी नीरन जी खासे नाराज दिखे। उनका मानना है कि भोजपुरी की लोककला के व्यवसाय से अपसंस्कृति आयी है। भोजपुरी की उत्सव धर्मिता इन चैनलों ने समाप्त कर दी है।

वहीं समकालीन भोजपुरी साहित्य पत्रिका के उप संपादक प्रवीण तिवारी भी कुछ अलग राय नहीं रखते हैं। मीडियावी भोजपुरी से समाज और भाषा के भले के सवाल पर छूटते ही कहते हैं, ‘कुछ भला नहीं होने वाला’। प्रवीण जी का मानना है कि आज जो भोजपुरी मीडिया चला रहे हैं, उन्हें तो मूल भोजपुरी की जानकारी ही नहीं है। वो तो महज एक रास्ता बना रहे हैं, जिस पर चलकर वो अपना व्यावसायिक हित साध सकें। हिंदी चैनलों की नकल में भोजपुरी की मूल परंपरा, साहित्य, संस्कृति, लोकगीत सब का बेड़ा गर्क हो रहा है। मीडियावी भोजपुरी ने एक लोक संस्कृति के लोप को आमंत्रण दे दिया है।

इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि मीडियावी भोजपुरी से स्वयं उनका समाज ही संतुष्ट नहीं है। यानी अगर यही तरीका रहा, तो न तो मुद्दे कि बात हो पाएगी और न ही पहचान बन पाएगी। हां एक बाजार जरूर तैयार हो जाएगा, जहां अब तक बिकाऊ न बन पायी भोजपुरी की बोली लग सकेगी। लिहाजा अगर इन टीवी चैनलों को भोजपुरी भाषा और समाज के लिए कुछ करना है तो बाजारवाद, नकल और पुरस्कारों की दौड़ से हट कर इस समाज के अंतर्मन से जुड़ना होगा। एक विस्तृत, राष्ट्रीय विचारधारा के साथ आगे बढ़ना होगा और अगर ऐसा नहीं कर सकते तो शायद उन्हें इस बात का हक नहीं कि वो भोजपुरी को बाजारू चीथड़ों में मुस्कुराते दिखाएं।

(आशीष तिवारी हमार टीवी के वाराणसी संवाददाता हैं)

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