महिला आरक्षण की छतरी तले यौन कदाचार बढ़ेगा?

♦ दिलीप मंडल

incredible-india

राजनीति के क्षेत्र में महिला आरक्षण का उप-उत्पाद (बाइ प्रोडक्ट) नेताओं के यौन भ्रष्टाचार में बढ़ोत्तरी की शक्ल में नजर आ सकता है। भारतीय राजनीति में यौन भ्रष्टाचार का पक्ष अक्सर दबा दिया जाता है, जबकि राजनीति का यह एक अभिन्न अंग रहा है। इसकी सार्वजनिक चर्चा अक्सर नहीं होती, लेकिन इसके बारे में सभी जानते हैं। इसे भारतीय राजनीति का सर्वज्ञात रहस्य भी कहा जा सकता है। ये ऐसा कदाचार है, जो मोहल्ला और पंचायत स्तर से लेकर राजनीति के शिखर पर मौजूद है।

भारत में सत्ता यानी पावर के साथ हरम और भरे पूरे रनिवास की अवधारणा पुरानी है और भारतीय राजनीति कम से कम इस मायने में समय के साथ नहीं बदली है। लोगों की मानसिकता ऐसी बना दी गयी है कि प्रभावशाली लोगों के यौन कदाचार को बुरा भी नहीं माना जाता और नेताओं के कई स्त्रियों के साथ यौन संबंधों को उनके शक्तिशाली होने के प्रमाण के तौर पर देखा जाता है। एकनिष्ठता की भारतीय अवधारणा महिलाओं पर तो लागू होती है पर पुरुषों पर लागू नहीं होती। हिंदू धर्म की किताबें बताती हैं कि – “पत्नी को दुश्चरित्र पति का त्याग नहीं करना चाहिए, प्रत्युत अपने पतिव्रत धर्म का पालन करते हुए उसको समझाना चाहिए।” हिंदू संस्कृति व्यभिचार का किस हद तक समर्थन करती है, इसे जानने के लिए ये प्रश्नोत्तर पढ़ें :

“प्रश्न : यदि कोई विवाहिता स्त्री से बलात्कार करे और गर्भ रह जाए तो क्या करना चाहिए?
उत्तर : जहां तक बन पड़े स्त्री के लिए चुप रहना ही बढ़िया है। पति को पता चल जाए तो उसको भी चुप रहना चाहिए। दोनों के चुप रहने में ही फायदा है।”

पश्चिमी समाजों के मुकाबले भारतीय समाज में अनैतिक होने की कई गुना ज्यादा छूट है। यहां की सनातनी शास्त्रीय परंपराओं में बेटी, बहन, गुरुपत्नी आदि के साथ रिश्ते बनाने की मान्यता रही है। हिंदू धर्मग्रंथों को पढ़ें तो कभी किसी महिला को खीर खिलाने से बच्चा पैदा हो जाता है, तो किसी के पसीने की बूंद मुंह में गिरने से गर्भ ठहर जाता है, तो किसी का दर्शन ही किसी महिला के गर्भवती होने का कारण बन जाता है। संतानों के लिए यज्ञ कराने का मतलब आप सहज ही समझ सकते हैं। आजकल भी बाबा लोग बेऔलाद दंपतियों को संतान दिलाने के लिए स्पेशल पूजा कराते रहते हैं। ऐसे अनैतिक किस्सों से उत्तर वैदिक धर्मग्रंथ भरे पड़े हैं। खजुराहो से लेकर कोणार्क और देश भर के सैकड़ों मंदिर इन अनौतिक कहानियों के गवाह हैं। यूरोप या अमेरिका जैसी नैतिकता अगर भारतीय समाज के प्रभुवर्ग में होती, तो कई नेताओं को राजनीति छोड़नी पड़ती। यूरोपीय और अमेरिकी देशो में यौन विचलन के लिए नेताओं को सत्ता गंवानी पड़ी है, लेकिन भारत में एक नारायणदत्त तिवारी को छोड़कर ऐसी कोई और मिसाल नहीं मिलती। हमारे देश के प्रभुवर्ग में यौन शुचिता को लेकर आग्रह नहीं है। दुखद ये है कि आम जन में भी ऐसा आग्रह नहीं है।

ऐसे भारतीय समाज और राजनीति में अगर महिला आरक्षण लागू होता है, तो यह यौन कदाचार को बढ़ावा देने का एक और माध्यम बन सकता है। आखिर इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि भारत में राजनीतिक दलों का स्वरूप पुरुष प्रधान है और महिला आरक्षण लागू होने के बाद भी ये बदलने वाला नहीं है? अगर राजनीतिक दलों में नैतिकता होती और वे सचमुच महिलाओं का भला चाहते तो पार्टी की संरचना में महिलाओं को स्थान दे सकते थे। इसके लिए न तो कानून बनाने की जरूरत है और न ही संविधान को बदलने की। पुरुष प्रधान राजनीतिक संरचना में जब आरक्षण की वजह से बड़ी संख्या में महिलाओं को टिकट देने की बारी आएगी, तो इसके खतरे समझे जा सकते हैं। महिलाओं का सशक्‍तीकरण अगर नीचे से होता, तो उनके शोषण के खतरे कम होते। किसी महिला का सशक्त होना उसे यौन संबंधों की दृष्टि से भी स्वतंत्र बनाता है। लेकिन महिला आरक्षण के समर्थक ये नहीं मानते कि पहले महिलाओं को आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक रूप से समर्थ बनाया जाए। ऐसा होने के बाद महिला आरक्षण की जरूरत ही क्यों होगी?

साथ ही महिलाओं को आर्थिक रूप से समर्थ बनाये बगैर उन्हें बेहद खर्चीले चुनाव में झोंक देना भी उन्हें पुरुष सत्ता की शरण में जाने को बाध्य करेगा। जिस देश में संपत्ति में महिलाओं की नाम मात्र की हिस्सेदारी हो वहां महिला उम्मीदवार करोड़ों का चुनाव खर्च कहां से निकालेंगी। राजनीति में पैसा अब कितना महत्वपूर्ण हो गया है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस समय देश की लोकसभा में 306 करोड़पति सांसद हैं जबकि राज्यसभा में 54% सासंद करोड़पति हैं। बड़े राजनीतिक दलों के लिए लोकसभा चुनाव लड़ने का औसत खर्च प्रति सीट चार करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया है। ऐसे में महिलाओं के आर्थिक सशक्‍तीकरण के बिना उनका राजनीतिक सशक्‍तीकरण स्वाभाविक रूप से कैसे मुमकिन है? इसलिए सबसे पहले तो ये जरूरी है कि उत्तराधिकार में महिलाओं को वास्तविक अर्थों में बराबरी दी जाए, क्योंकि कागजी बराबरी का कोई मतलब नहीं है। जमीन और घरों के सभी पट्टों और रजिस्ट्री में महिलाओं के नाम होने को अनिवार्य बनाया जाए।
बहरहाल, इस बात को लेकर कोई सदेह नहीं हो सकता कि महिला आरक्षण विधेयक, महिला सशक्‍तीकरण को ऊपर से थोपने का जरिया है। इसे स्वाभाविक प्रक्रिया तभी कहा जाएगा जब देश में महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति बदले और इसका असर संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या की शक्ल में नजर आए। जिस देश में जमीन के मालिकों में सिर्फ 9.5 फीसदी महिलाएं हों, उस समाज के एक हिस्से में महिलाओं के राजनीतिक आरक्षण को लेकर जो उत्साह और उल्लास का भाव नजर आ रहा है, वह आश्चर्यजनक है। जमीन के मालिकाने का ये आंकड़ा भी सिर्फ कागज पर ही है क्योंकि महिलाएं बेशक जमीन का इस्तेमाल कर लें, लेकिन ग्रामीण भारत में ऐसे मौके बिरले ही आते हैं जब कोई महिला अपनी मर्जी से जमीन बेच पाती हो। अगर कोई महिला पैत्रिक संपत्ति पर दावा करे और इसके लिए अदालत जाए, तो उसे भद्र महिला नहीं माना जाता।

जो लोग, नेता और बुद्धिजीवी महिलाओं के राजनीतिक सशक्‍तीकरण के लिए इतने उद्धत और उत्साहित हैं, वे अपने परिवारों में संपत्ति के उत्तराधिकार को लेकर भी यही उत्साह दिखाते, तो समाज में कमजोर तबकों और वंचितों को भी रास्ता दिख जाता। इस तरह समाज में व्यापक तौर पर महिलाओं की हालत बेहतर होने का रास्ता खुलता। यह बहुत गंभीर सवाल है कि कोचिंग सेंटरों में बेटों को भेजने के लिए जो उत्साह समाज में दिखता है, वो बेटियों के मामले में नजर क्यों नहीं आता? महिलाओं को राजनीतिक आरक्षण देने से पहले, ऐसे कई सवाल हल होने चाहिए क्योंकि इन सवालों का संदर्भ और असर कुछ महिलाओं के संसद और विधानसभाओं में पहुंचने की तुलना में कई गुना बड़ा है। दशकों से सीबीएससी और बारहवीं के तमाम बोर्ड इम्तहानों में लड़कों से बेहतर रिजल्ट लाने वाली लड़कियां आईआईटी, आईआईएम और देश की तमाम और शिखर संस्थाओं और कोर्स में क्यों नजर नहीं आतीं, इसका जवाब मांगा जाना चाहिए। अगर समाज में प्रचलित पुत्र-मोह इसमें बाधक है तो सरकार इन शिक्षा संस्थाओं में आरक्षण का प्रावधान लाकर सकारात्मक हस्तक्षेप कर सकती है।

महिलाओं की स्थिति अगर आज भी बुरी है, तो इसके कारणों की शिनाख्त होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने महिला आरक्षण विधेयक पर राज्यसभा में चर्चा के दौरान ये माना कि “विकास प्रक्रिया का लाभ उठाने में महिलाओं को दिक्कत होती है। परिवारों में उनके साथ भेदभाव होता है, मारपीट होती है। शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा के मामले में उनके साथ पक्षपात किया जाता है।” अब इस बात की चर्चा होनी चाहिए कि समाज ही नहीं, लोकतांत्रिक देश का कानून भी किस तरह महिलाओं को वंचित बनाये रखने में भूमिका निभाता है। हिंदुओं के उत्तराधिकार से जुड़े कानून महिलाओं के खिलाफ झुके हुए हैं। कॉरपोरेट जगत में चेयरमैन और प्रेसिडेंट जैसे शिखर पदों पर महिलाएं लगभग अनुपस्थित हैं। कई उद्योगपति परिवारों में पुत्र न होने पर संपत्ति भतीजे या भांजे या दामाद को या फिर दत्तक पुत्र को स्थानांतरित कर दी गयी। आम भारतीय परिवारों में भी ऐसा होना बेहद आम है। लेकिन इस चलन को बदला जाए, इसकी कोई कोशिश नहीं की जाती। मठों और आश्रमों की अकूत संपत्ति पर महिलाओं का भी अधिकार हो, इसकी कोई पहल धार्मिक नेतृत्व, समाज या सरकार की तरफ से आज तक नहीं हुई है।

देश में महिलाओं की साक्षरता दर कम है और स्कूलों में लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट ज्यादा है, लेकिन ऐसी समस्याओं को अब तक ठीक नहीं किया जा सका है। शिशु मृत्यु के मामले में आंकड़े लड़कियों के खिलाफ झुके हुए हैं, जबकि वैश्विक आंकड़ा और चिकित्सा विज्ञान के मुताबिक बालकों की तुलना में बालिकाओं में जीवनी शक्ति ज्यादा होती है। महिलाओं के प्रति समाज के नजरिये का ही असर है कि इस देश में प्रति 1000 पुरुष 933 महिलाएं हें। महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में लाने से पहले ऐसे सैकड़ों कार्यभार हो सकते हैं, जिन्हें भारत की राजसत्ता और भारतीय समाज को पूरा करना चाहिए। नौकरशाही में महिलाओं की पर्याप्त उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए यूपीएससी को तमाम नियुक्तियों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करनी चाहिए। शैक्षणिक पदों पर भी महिलाएं अच्छी संख्या में नजर आएं, इसके लिए शिक्षा विभागों और यूजीसी को आरक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए। महिलाओं के इस तरह के सशक्‍तीकरण और आरक्षण का विरोध कोई भी राजनीतिक दल नहीं करेगा और इस तरह की आम सहमति बनाने में मुश्किल नहीं होनी चाहिए। महिला सशक्‍तीकरण के कई रास्ते हैं। महिला आरक्षण विधेयक अगर उनमें से एक होता तो शायद इसे लेकर संदेह पैदा नहीं होता। लेकिन अब ये विधेयक और इसे लेकर राजनीतिक दलों की नीयत संदेह के घेरे में है।

आगे पढ़ें : महिला आरक्षण से महिलाओं का भला कैसे होगा?

dilip mandal(दिलीप मंडल। सीनियर टीवी जर्नलिस्‍ट। अख़बारों में नियमित स्‍तंभ लेखन। दलित मसलों पर लगातार सक्रिय। यात्रा प्रिय शगल। इन दिनों भारतीय जनसंचार संस्‍थान, नयी दिल्‍ली में रेगुलर क्‍लासेज़ ले रहे हैं। उनसे dilipcmandal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *