देश भर में फैले एफएम गोल्ड के श्रोताओ एक हो
साल भर से प्रजेंटरों को नहीं मिला है भुगतान
♦ विनीत कुमार
करोड़ो रेडियो लिस्नर (श्रोताओं) के दिलों पर राज करनेवाला AIR FM GOLD 106.4 आज खुद चंद लोगों की अफसरशाही और मनमानी का अड्डा बनकर रह गया है। कार्यक्रमों के प्रसारण का जो स्तर और भीतर की जो हालत है, उसे देखकर किसी के भी मन में ये सवाल जरूर उठेगा कि सूचना, मनोरंजन और जागरुकता के नाम पर देश के मेहनतकश लोगों के खून-पसीने की करोड़ों रुपये की कमाई को जिस तरह पानी में बहाया जा रहा है, उसके लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं? इस माध्यम को कमजोर करने के जो कुचक्र रचे जा रहे हैं और देश के इस एफएम चैनल को कैसे किसी ऊटपटांग निर्देश जारी करनेवाले लोगों के हाथों सौंप दिया गया है, उनसे सवाल किये जाएं? हालात ये है कि संसद भवन के ठीक बगल में चलनेवाला ये चैनल अब धीरे-धीरे कबाड़खाना की शक्ल में तब्दील होता जा रहा है।
इसे चलाने के लिए करोड़ों रुपये के बजट तैयार किये जाते हैं, पैसे भी आवंटित होते हैं लेकिन लापरवाही और भीतरी गड़बड़ियों की वजह से करीब सालभर से प्रजेंटरों को कोई भुगतान नहीं किया जाता है, सही चीजों को हटाकर भारी ठेके देकर नयी गैरजरूरी चीजें लगायी जाती है, चालू हालत की चीजों को कबाड़खाने में डाल दिया जाता है। चीजों के रखरखाव का जो आलम है उसे देखते हुए किसी भी रेडियोप्रेमी का खून खौल जाए। दुर्लभ और कीमती रिकार्ड्स छतों पर फेंक दिये गये हैं जिसे कि कोई पूछनेवाला नहीं है। कुछ के पैकेट खोले तक नहीं गये और काफी कुछ कबाड़ियों के हाथों औने-पौने दामों पर बेच दिया गया। पूरे सिस्टम के डिजिटलाइज हो जाने की वजह से पुरानी मशीनें और सामान म्यूजियम के नाम पर साइड कर दिये गये हैं जिसका कुछ भी मेंटेनेंस नहीं है।
शुरुआती दौर से जुड़े जिन लोगों ने इसे देश का नंबर वन एफएम चैनल बनाया, वो इस पूरी स्थिति को लेकर दुखी हैं। वो अभी भी दिन-रात इसकी बेहतरी के लिए काम करने को तैयार हैं। लेकिन भीतर का माहौल ऐसा है और इस किस्म की बदहाली है कि कोई चाहकर भी व्यक्तिगत स्तर पर बहुत कुछ नहीं कर सकता। इनके बीच लंबे समय से इन सब बातों को लेकर गहरा असंतोष रहा है। पिछले दिनों (17 फरवरी, 2010) AIR FM GOLD की बिगड़ती हालत और कार्यक्रमों के गिरते स्तर को लेकर रेडियो प्रजेंटरों ने इसकी शिकायत ऑल इंडिया के डायरेक्टर जेनरल से की थी। उस शिकायत पत्र में साफ कहा गया था कि इस चैनल को चलाने के लिए विज्ञापन की जो जरूरत है, उसे लेकर कोई मार्केट स्ट्रैटजी अपनाने के बजाय गलत हथकंडे अपनाये जा रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा एसएमएस आधारित कार्यक्रमों को शामिल करने से कार्यक्रम की क्रिएटिविटी खत्म होती है।
इधर जिन कायक्रमों और जिंग्लस को शामिल किया गया है, वे एफएम गोल्ड की ब्रांड इमेज के अनुकूल नहीं है। लेकिन इस दिशा में किसी भी तरह की संतोषजनक कारवाई न होने की स्थिति में अब उन्होंने save fm gold movement का एलान किया है। इस कड़ी में 26 अप्रैल 2010 को एक बार फिर ऑल इंडिया रेडियो की डायरेक्टर जेनरल को शिकायत पत्र लिखकर बद से बदतर होती चैनल की स्थिति से अवगत कराने की कोशिश की है। फिलहाल वो अपनी सारी कारवाई संबंधित अधिकारियों और विभागों के प्रति शिकायत दर्ज करके कर रहे हैं फिर भी किसी भी तरह का सुधार नहीं होता है तो जल्द ही सड़कों पर उतर आएंगे और फिर ये आंदोलन सिर्फ प्रजेंटरों का न होकर हम सब रेडियोप्रमियों का होगा।
एफएम गोल्ड के भीतर जो भी गड़बड़ियां हैं, वो कोई एक स्तर पर नहीं है। इस संबंध में अगर आरटीआई डालें जाएं, तो संभव है कि आकाशवाणी के भीतर बड़े पैमाने पर घोटाले निकलकर सामने आएं जिसमें कि पैसे को लेकर भी घपले शामिल हो सकते हैं। इस बात की संभावना इसलिए भी जतायी जा रही है कि पिछले एक साल से करीब साठ एफएम गोल्ड के प्रजेंटरों, जो कि चैनल की आवाज हैं, जिनके कारण लोग चैनल से सीधे-सीधे जुड़ते हैं, उन्हें कोई भुगतान नहीं किया गया है। इस बात की शिकायत पर केंद्र के वित्तीय अधिकारी की तरफ से जवाब मिला कि उनका पैसा कॉमनवेल्थ के लिए लगा दिया गया है, इसलिए ऐसा हुआ है।
लेकिन मामला ये नहीं है। इस पर डिप्टी डायरेक्टर जेनरल राजकमल ने प्रजेंटरों को साफ कहा कि आपलोगों के लिए दो करोड़ रुपये अलग से जारी किये गये हैं और कॉमनवेल्थ से आपकी पेमेंट का कोई संबंध ही नहीं है। उस काम के लिए अलग से 25 करोड़ रुपये आकाशवाणी को दिये गये हैं। ऐसे में सवाल उठते हैं कि एक ही संस्थान को लेकर दो अलग-अलग वर्जन क्या कहते हैं?
इन दिनों रेडियो प्रजेंटरों पर दबाव बनाकर एक ड्राफ्ट पर साइन करवाया जा रहा है, जिसमें ये लिखा है कि प्रजेंटर एक महीने में छह से ज्यादा किसी भी विभाग, चैनल में कार्यक्रम नहीं करेंगे। इस पर साइन करने का मतलब होगा कि प्रजेंटर अपनी मर्जी से छह से ज्यादा कार्यक्रम नहीं करना चाहते हैं जबकि ये छह कार्यक्रम करके भी उनका क्या होगा? एक कार्यक्रम के लिए उन्हें 1600 रुपये मिलने का प्रावधान है। पहले ये राशि लगभग इसकी आधी हुआ करती थी। बढ़ी हुई ये राशि उन्हें अभी मिली नहीं है। राजधानी या इंद्रप्रस्थ चैनल में ये राशि मात्र 400 रुपये है। अधिकांश लोगों को कम से कम तीन के बाद चार या पांच कार्यक्रम करने को मिलते हैं। अगर उन्हें 6 कार्यक्रम मिल भी गये तो कुल 9,600 रुपये बनते हैं। कुछ प्रजेंटर जो कि पार्टटाइम के तौर पर काम करते हैं, उन्हें छोड़ दें तो बाकी के जो पूरी तरह इस पर ही निर्भर हैं उन्हें अगर सालभर तक दस हजार के आसपास की ये रकम भी नहीं मिलती है तो उनकी हालत क्या होगी – इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं।
इस पर भी साइन करवाने के पीछे की राजनीति ये है कि कोई भी व्यक्ति अगर कैजुअल स्टेटस पर 90 दिनों तक संस्थान में काम कर लेता है, तो परमानेंट होने की उसकी दावेदारी बढ़ जाती है। इसलिए पूरी कोशिश होती है कि ऐसी स्थिति आने ही न दिया जाए। कागजी तौर पर ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि वो महीने में छह दिन ही कार्यक्रम देंगे। इस संबंध में जब एक प्रजेंटर ने साइन करने से ये कहते हुए मना कर दिया कि आप हमें लिखित तौर पर दिखाएं कि किस ऑफिशयल ऑर्डर के तहत ऐसा है, तो प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव रीतू राजपूत का साफ कहना है कि अब हर बात के लिए फाइलें तो नहीं खोली जा सकती। वैसे भी आकाशवाणी से जुड़ते समय ही उसके कागजात में इतने क्लाउज पहले से शामिल होते हैं कि प्रजेंटर के हाथ-पैर पूरी तरह बंध चुके होते हैं। वो ज्यादा कुछ कर नहीं सकता। लेकिन उसके बाद पेक्स (प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव) की मनमानी के बीच सर्वाइव करने का एक ही तरीका है कि वो महज एक चमचा बनकर रह जाए।
भाषा में बोल्ड हूं, इतना कायर हूं कि एफएम गोल्ड हूं
भाषा को लेकर आकाशवाणी सहित एफएम गोल्ड में ऊटपटांग प्रयोग जारी है। चैनल की पेक्स रीतू राजपूत का जबरदस्ती का हिंदी प्रेम स्टूडियो के भीतर चस्पाये निर्देशों से लेकर कार्यक्रम में प्रयोग किये जानेवाले शब्दों, संबोधनों में भी साफ तौर पर दिखाई देता है। यहां प्रजेंटरों के लिए सूत्रधार शब्द का प्रयोग किया जाता है और एसएमएस पैगाम हो जाता है। वैयाकरणिक तौर पर ये दोनों शब्द प्रयोग तो गलत हैं ही, दूसरी बात कि ये हिंदी को सहज बनाने के बजाय हास्यास्पद ज्यादा बनाते हैं।
भाषा को लेकर आकाशवाणी सहित चैनल के भीतर का एक और गड़बड़झाला है। ऑडिशन की लंबी प्रक्रियाओं के बाद, जिसमें कि तीन से चार लोग ही पास हो पाते हैं, वाणी सर्टिफिकेट कोर्स नाम से पांच दिनों की ट्रेनिंग दी जाती है। इस ट्रेनिंग के लिए पास हुए लोगों से पांच हजार रुपये लिये जाते हैं। कोर्स के पीछे का तर्क है कि वो इसमें भाषा-दक्षता, विशेषता और व्यावहारिक प्रयोग के बारे में जानकारी देंगे। लेकिन दिलचस्प है कि ये ट्रेनिंग सिर्फ हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू के लोगों के लिए है। बाकी नेपाली, तमिल, मलयालम या दूसरी भारतीय भाषाओं के लिए नहीं है। विदेश प्रसारण सेवा में जो भाषाएं शामिल हैं, उनके लिए भी नहीं। वो बिना किसी तरह की रकम या ट्रेनिंग लिये प्रवेश पा जाते हैं। पिछले महीनों इस बात को लेकर काफी हंगामा भी हुआ जिसमें कि आकाशवाणी की विदेश प्रसारण सेवा ने नेपाली को विदेशी भाषा करार दे दिया।
बहरहाल, ऐसा इसलिए है कि इतनी बड़ी आकाशवाणी के पास इन भाषाओं की ट्रेनिंग देने की कोई व्यवस्था नहीं है। लेकिन इसका नतीजा पांच हजार देकर आये लोगों के बीच के असंतोष का पनपना है और ये भाषाई भेदभाव का मामला बनता है। वो पांच हजार में पांच दिन कोई गंभीर ट्रेनिंग के बजाय खाने-खिलाने के तौर पर काट देते हैं। अगर इस तरह पांच हजार लेकर एक कमाई का जरिया ही बनाना है तो फिर ये काम बाकी भाषाओं के साथ क्यों नहीं? पिछले दिनों से आकाशवाणी के भाषा संबंधी रवैये को लेकर संसदीय राजभाषा समिति जो भी जांच कर रही है जिसमें कि नेपाली और फ्रेंच विशेष रूप से शामिल हैं, इस कड़ी में बाकी के भाषाई सवाल शामिल किये जाते हैं तो कई और गड़बड़ियां सामने आने की गुंजाइश बनती है।
“वो भूली दास्तां” उर्फ कंटेंट और पुराने रिकॉर्डर का कबाड़
कंटेंट के स्तर पर एफएम गोल्ड का बुरा हाल है। मैं पिछले तीन महीने से लगातार इस चैनल को आब्जर्व कर रहा हूं। इसमें कोई निराला की कविता तोड़ती पत्थर को सिनेमा के गीत से जोड़ दे रहा है तो कोई शिवरात्रि के मौके पर आदिम जमाने के क्लास नोट्स पढ़ने लग रहा है। अधिकांश विशेष अवसरों के कंटेंट बदलते नहीं है। मसलन होली, दीवाली से लेकर तमाम आर्थिक-राजनीतिक घटनाएं तेजी से बदल रहे हैं लेकिन प्रस्तुति के स्तर पर कोई प्रयोग नहीं है। दूसरी बात कि जो ब्रॉडकास्ट हो रहा है, उसके पीछे कंटेंट को लेकर अगर ऑथेंटिसिटी और अकाउंटेबिलिटी की बात की जाए तो चैनल के पास शायद ही कोई संतोषजनक जवाब हो। अखबारों की कतरनों के बूते बनायी जानेवाली अधिकांश स्क्रिप्ट के पीछे कोई रिसर्च नहीं है। इस कंटेंट से ही जुड़ा एक बड़ा सवाल
बजनेवाले संगीत का भी है।
रेडियो प्रजेंटर के लिए ये भारी सिरदर्द का काम है कि वो जो भी ट्रैक बजाये, चाहे वो लिस्नर की फरमाइश पर ही क्यों न हो, उसे वो खुद मैनेज करे। म्यूजिक प्लेयर डिजिटलाइज हो जाने की वजह से पुराने सारे रिकार्डर बेकाम के हो गये हैं। करोड़ों रुपये की धरोहर बेकार हो गयी जिसकी कोई खोज-खबर नहीं है। एआईआर ने उसे गंभीरता से न लेकर डिजीटल फार्म में नहीं बदलवाया। नतीजा एक बड़ा भारी संसाधन बेकार हो रहा है। अगर जो मटीरियल यहां मौजूद हैं, तो वो भी सरकारी टाइम-टेबल से ही मिलने हैं – जिसमें कि दस से पांच की ड्यूटी के बीच लंच ब्रेक भी शामिल है, बाबू के नहीं होने की भी कहानी है। कुल मिलाकर एफएम गोल्ड के स्टॉक का कोई सीधा लाभ न तो लिस्नर को मिल रहा है और न ही प्रजेंटर को कोई सुविधा मिल पा रही है। अब एफएम गोल्ड पर जो बजता है वो समझिए प्रजेंटर का अपना जुगाड़ है। वो घर से, बाजार से जहां से भी हो, सीडी लाये और एफएम गोल्ड पर बजाये। पहले ये पैनड्राइव में लाया करते लेकिन वायरस आ जाने का हवाला देकर ऐसा नहीं करने दिया जाता। ऐसे में ये सवाल जरूर उठता है कि तब कार्यक्रम को बेहतर बनाने में प्रोग्रामिग टीम की तरफ से क्या एफर्ट लगाये जा रहे हैं।
तकनीकी रूप से बात करें तो देशभर में चलनेवाले प्राइवेट एफएम चैनलों को प्रसारण सुविधा देने का काम स्वयं आकाशवाणी के ट्रांसमीटर से होता है। लेकिन ये बिडंबना देखिए कि निजी चैनलों के लिए जहां 20 किलोवाट का ट्रांसमीटर है वहां एफएम गोल्ड मात्र ढाई किलोवाट के ट्रांसमीटर पर चल रहा है। आधिकारिक रूप से इसे 5 किलोवाट पर चलाने का प्रावधान है। तकनीकी रूप से बहुत गहराई में न भी जाएं तो इतना तो समझ ही सकते हैं कि आकाशवाणी चैनलों जिसमें कि गोल्ड भी शामिल हैं, फ्रीक्वेंसी को लेकर एक-दूसरे पर जो चढ़ा-चढ़ी होती है, उसके पीछे इसी तरह की हरकतें जिम्मेदार हुआ करती होगी। एफएम गोल्ड डिजिटल फार्म में है फिर भी रेडियो सिटी या मिर्ची की तुलना में उसकी आवाज में स्पष्टता कम है।
पैसा न कौड़ी, बाजार में दौड़ा दौड़ी
और अंतिम बात कि माध्यम और प्रसारण का सारा खेल विज्ञापन का है, उसकी ब्रांडिंग और रेवेन्यू का है लेकिन एफएम गोल्ड की कहानी इस मामले में भी अलग है। चैनल को बेहतर विज्ञापन मिले इसके लिए कोई मार्केटिंग स्ट्रैटजी नहीं है। आकाशवाणी की साइट पर इसका कॉलम बुत्त पड़ा है, कहीं कोई अपडेट नहीं है। हैरानी की बात है कि जिस आकाशवाणी की ऑडियो रिसर्च यूनिट इसके सबसे ज्यादा सुने जाने का दावा करती है वही चैनल RAM (रेडियो ऑडिएंस मेजरमेंट) में शामिल नहीं है। ये RAM टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट जारी करनेवाले TAM का ही भाई है, जो कि रेडियो के लिए रेवेन्यू खड़ा करने का पैमाना है। मामला साफ है कि इस चैनल को बाहर की दुनिया से कोई लेना-देना नहीं है। जो भी विज्ञापन आते हैं, वो सराकारी तोड़-जोड़ का नतीजा है, जनहित में जारी का प्रसाद है।
इन जनहित में भी क्या प्रसारित हो रहा है, इस पर बारीक नजर नहीं है। पिछले दिनों जेएनयू के प्रोफेसर चमनलाल ने कंडोम अपनाने के जनहित में जारी विज्ञापन पर जो लेख लिखा, उसे पढ़कर मामला और साफ हो जाता है। चैनल तुम्हारा वाला तो सिंकदर निकला, दिनभर में पंद्रह से बीस बार जरूर बोलता है लेकिन खुद ही कई मोर्चे पर लड़खड़ा रहा है।
और ये सब कुछ हो रहा है स्वनामधन्य कवि लक्ष्मीशंकर वाजपेयी की नाक के नीचे, जिनकी कविताओं की पंक्तियों से बीच-बीच में सरोकार, मानवता, नैतिकता जैसे शब्द उड़-उड़कर कवि सम्मेलनों की शोभा बढ़ाते हैं। वाजपेयी के कंधे पर रखकर छोड़े जानेवाले रितू राजपूत के निर्देशों पर गौर करें तो अंदाजा लग जाएगा कि कैसे देश के कभी इतने मशहूर रहे चैनल का सत्यानाश करने की कवायदें की जा रही है और ये महज चंद लोगों को खुश करने का अड्डा बनकर रह गया है, जहां देर रात महिला प्रजेंटर को घर से दो किलोमीटर पहले ही छोड़ दिया जाता है और वीमेन सेल चुप्प मार जाता है। भीतर बहुत बड़ा सडांध है, घपला है, धोखा है। ये सब हमें रेडियो लिस्नर की हैसियत से कंटेंट और प्रस्तुति के स्तर पर दिखाई देता है जबकि भीतरी तौर पर कहीं न कहीं ये भारी वित्तीय गड़बड़ी की मामला हो सकता है, शोषण और सांकेतिक हिंसा का मामला हो सकता है। ऐसे में, आज मजदूर दिवस है। हम हर साल इस मौके पर मजदूर आंदोलनों की जरूरतों, अधिकारों और उनके भविष्य को लेकर बात करते हैं। इन दिनों आकाशवाणी और न्यूज चैनलों के भीतर काम कर रहे कलाकारों, पत्रकारों, स्क्रिप्ट लेखकों से बात करके, उनकी जो हालत मैंने देखी है, मेरी आप सबसे अपील है कि देशभर के मजदूरों पर बात करने के क्रम में आज उन्हें भी शामिल कर लें।
(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्ण मीडिया विश्लेषक। ओजस्वी वक्ता। दिल्ली विश्वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्लॉग राइटर। कई राष्ट्रीय सेमिनारों में हिस्सेदारी, राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। ताना बाना और टीवी प्लस नाम के दो ब्लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
विनीत कुमार की बाकी पोस्ट पढ़ें : mohallalive.com/tag/vineet-kumar














अभी भी इतना ही पैसा मिलता है ? वैसे हमने एक ज़माने में युववाणी पर 10-20 रूपये में भी प्रोग्राम किए हैं. अच्छा लिखा है.
एक बात तय है… सरकारी रेडियो-टी.वी. का कुछ नहीं हो सकता, नाहक खून सुखाने से कुछ फ़ायदा नहीं… यहां सब कुछ स्लो मोशन में होता है, वाक़ी सब भले ही lightening speed पर चल रहे हों.
खेल गांव में जब नवीनतम स्टूडियो बना था तो यहां का equipment एशिया में बैस्ट था. उसकी वो भद पीटी गई, कोई क्या कहे. इस देश में टैक्स पेयर की कोई सुनवाई नहीं है. रही सही कसर नेताओं ने पूरी कर रखी है. इसे सरकारी भांड की तरह जो इस्तेमाल किया जाता है. इसे प्राइवेट करके सभी बाबूओं की ज़िम्मेदारी निश्चित कर देनी चाहिये कि घाटा हुआ तो वसूली उन्ही से की जाएगी.
यहां के पक्के कर्मचारी मान कर चलते हैं कि कैज़ुल अक़्ल से पैदल होते हैं. दो-दो कौड़ी के वो बाबू भी अपनी क्रियेटिव राय देने से नहीं चूकते जिनकी ड्यूटी, केवल फ़ोन पर यह सूचित करने की होती है कि आपको कब प्रोग्राम देना है.
जोकरों की संस्था है ये.
Moordhanya kavi Shri Lakshmi Shankar Vajpayee “Shikhandi” Akashvani Dilli ke Kendra nideshak hain unhen ye lekh padhkar is mamle mein tatkal kaarrvai karni chahiye agar kuchh ka sakne ki takat rakhte hain to.
This report calls for a serious introspection on the part of Channel-bosses ! As a listener i feel deeply hurt, cheated and sad by this report!
शुक्रिया विनीत,
मई दिवस पर शायद यह भी ग़ौर किया जाना चाहिए कि इस चैनल को बहुत सारे सुननेवाले
असंगठित, कुटीर उद्योग/वर्कशॉप में काम करने वाले मज़दूर होते हैं – ग़ाज़ियाबाद,
फ़रीदाबाद, बुलंदशहर से लेकर बिहार के किसी कोने तक. उनकी फ़रमाइशें सुनो, जो कि अक्सर
पुराने क्लैसिक बन चुके गानों के लिए होती हैं, या उनका समर्पण सुनो तो ये बात साफ़ हो
जाती है. कम-से-कम इस मामले में यह चैनल बाक़ियो से अलग है, कि इसका श्रोता वर्ग अब भी
विविध है, सिर्फ़ मेट्रो का मध्यवर्ग नहीं है.
ये बात मुझे तब समझ में आई थी जब शाम में निवेश-संबंधी मशविरे वाले कार्यक्रम के तहत एक
आदमी ने जिज्ञासा की थी कि उसके पास बैंक ख़ाता नहीं है तो वह शेयर कैसे ख़रीद सकता है?
ये सही है कि आम तौर पर यहाँ भी उथलापन आता जा रहा है. लोग फ़िल्मी गानों पर सवार
होकर हिन्दी साहित्य का घटिया ट्यूटोरियल पढ़ते हुए, मुग़ल-ए-आज़म के किसी गीत को
निराला की रचना बताते हैं! ये सब सही है, लेकिन यहीं पर इरफ़ान जैसे मँजे हुए प्रस्तोता भी
हैं, जो फ़िल्म और संगीत के इतिहास में काफ़ी डूब कर नायाब मोती निकाल ले आते हैं, प्यार से
बातें करते हैं, और उनको सुनने वाले भी हैं. और ये सब वो अपनी तरफ़ जुगाड़ लगाके करते हैं,
रेडियो के सड़ रहे अभिलेखागार से उनको कोई मदद नहीं मिलती, जैसा कि उनके ब्लॉग से साफ़
हो जाता है. जो कुछ अच्छा यहाँ बचा है, उसको बचाए जाने की ज़रूरत है, बल्कि और बेहतरी
की ओर ले जाए जाने की ज़रूरत है. अपन लोग तो बाक़ी रसूख़दार लोगों से अपील ही कर सकते
हैं कि वे आवाज़ से आवाज़ मिलाएँ, और सरकारी एफ़.एम. में सद्बुद्धि फैले कि वह अपनी
लोकप्रिय ताक़त का यूँ बंटाढार न करे, लेकिन फिर भी अगर उन्होंने इसे निजी चैनलों के आगे
निहत्था करके पछाड़ने का मन बना ही लिया है, तो क्या होगा! रेडियो को लेकर मेरा अपना
तजुर्बा भी यही है कि वहाँ घुस के रिसर्च करना आसान नहीं है, इतिहास को झुठलाने की
कोशिश करता हुआ गोपनीयता का अभेद्य दुर्ग है वह, जहाँ परिंदा भी पर नहीं मार सकता.
रंग दे बसंती का हौलनाक संदेश यूँ ही नहीं था!
रही प्रोफ़ेसर चमन लाल की बात, तो एक टिप्पणीकार – किसी ‘धर्म’ ने – मोहल्ला लाइव
में उनको अच्छा टोका है. माफ़ करना मुझे कंडोम के उस विज्ञापन में कोई बुराई नहीं नज़र
आती. काफ़ी होशियार विज्ञापन है वो, और इसको लेकर न लाल साहब को परेशान होने की
ज़रूरत है, न प्रधानमंत्री को, जिनके नाम ख़त लिखा है उन्होंने.
नीचे देखें
रविकान्त
धर्म said:
चमनलाल जी,
भारतीय संस्कृति उदार है? इससे बड़ा फ्रॉड कुछ भी नहीं हो सकता। हम एक अनैतिक और
अविकसित समाज में हैं। यूरोपीय और अमेरिकी नैतिकता को हमारे देश में लागू कर पाना संभव
नहीं है। हम अपने मंत्रियों, प्रधानमंत्रियों तक से नैतिक होने की अपेक्षा नहीं करते। हमारे
मंदिर की नग्न यौन क्रीड़ारत, अप्राकृतिक मैथुनरत मूर्तियां, मंदिरों की देवदासियां,
देवदासियों का ईश्वर से संसर्ग और वर्तमान समय में देश के हजारों मंदिरों में ईश्वर की संतानें,
कुंभ मेले के दौरान कंडोम की बंपर सेल, राधा का पति और राधा-कृष्ण का रास, खीर खाने से
बच्चे पैदा होना, देवता के आशीर्वाद से पुत्र का जन्म, आधुनिक समय में संतान प्राप्ति के लिए
बाबाओं की स्पेशल पूजाएं, 2010 के स्वामी नित्यानंद, हजारों नित्यानंदों की बहुचर्चित स्पेशल
पूजाएं, इच्छाधारी बाबा, बाबाओं का सेक्स रैकेट, बाबा की कृपा, गोद में बच्चा, पुत्र
कामेष्टि यज्ञ, एकनिष्ठता का क्षद्म, नारायण दत्त तिवारी की नैतिकता, नैतिकता की
अनैतिक संतानें। इस देश में प्रभुवर्ग की संस्कृति जारकर्म को सत्यापित और स्थापित करती है।
इसलिए कृपया कंडोम के ऐड से विचलित न हों।
http://mohallalive.com/2010/04/28/an-all-india-radio-advertisement-open-call-for-sexual-indulgence/
This is tip of the iceberg…. ‘abhi Ishq ke imtehaan aur bhi hain’…. what is the output of channel bosses…. and what are their credentials…. are they qualified to do what they do… and do’nt do…. all these things are to be looked into….
I tried once speaking to Smt Rajput.
She is absolutely snobbish, her attitude was atrocious and insulting.
Why can’t they dump her some where else, and get hold of somebody cultured enough to sit there. So called AIR bosses don’t do much else.
How anything like this can happen in 21st century India?
But in a spineless place like Delhi it is possible. In a place like Kerala and Bengal such glaring horrors are rare as people have sense of protest. We from Kerala are with you.
He He He… (Pehle main hansugi) he he he….
Reetu Rajpoot ek jeeta jaagta shabd-kosh hai… jo teen shatabi pehle chhapa gaya thaa…. lekin jo chikan ka kurta pehne abhiman ki hawa se aur phoolta hi chala ja raha hai… aaj ke yug men aise obselete shabd-kosh ki jagah sirf dust bin hai…
He he he… achcha hogá unhen kisi ‘koode ke tokri men susajjit kar diya jaye’(Susajjit is her own word)
He he he….
Ooper Sandip ji ki tippani se main sahmat hoon.Sunane me aaya hai ki fm gold ki vartman programme executive ko kendra nideshak Shri Lakshmi Shankar Vajpayee”Shikhandi” ka sanrakshan prapt hai.Ye kitna sach hai nahin maloom kyonki Shikhandi ji jaise samvedanshil kavi se aisi asha nahin ki ja sakti.lekin agar Shikhandi ji aisa kar rahe hain to unke jaise labdhpratishtha kavi ke liye ye sharm ki baat hai.Phir hum bhala kaise unki kavitayen sunkar prerit ho sakenge.Sundar lekh ke liye sadhuvad.
Mrs Ritu Rajput ko kaam se adhik gift lene me anand aataa hai. Agar vey kaam me man lagattee to apne senior presenters ko sun kar bhee bahut kuchh seekh jatee. Jis aurat ko Krishna Chandar film lyricist lagta ho aur Bulo C. Rani male music director, us_se kya ummeed kee jaa sakti hai? She is good for nothing.
Pichhle do saal men jo ladke ladkiyan audition men paas huey ahi aur panel par aaye hain unko sun kar spasht ho jaataa hai ki kin pareekshakon ne unhen yogya samjha hoga! “Heen pratibhaayein, Heentar ko pasand karti hain” taaki vey apni banaaii duniyaa mein chain se rahti aayein. 28 saal mein 28 baatein bhee nahin seekh sakeen Mrs Rajput.
casual ko casually lene wale ye kyon nahi samajh pate kicasuals ke bina unki koi hasti hi nahi….itna bada channel ap inhi ke dam par chala rahe…khud to shayad apko cansole bhi theek se handle karna nahi ata hoga
मैं ऍफ़ ऍम रेनबो 100.7 लखनऊ से जुड़ा एक मज़दूर हूँ…लम्बे अरसे से आकाशवाणी से सम्बद्ध हूँ… जब ऍफ़ ऍम का जन्म भी नहीं हुआ था. मैंने रेडियो का सुनहरा कल भी देखा है और भविष्य के सपने संजोये अतीत की बुझती हुई आँखें भी…इस लिए इस हालत पे खून के आंसू बहाने के सिवाए और कुछ नहीं सूझता. सम्बंधित पेक्स कितनी दोषी हैं लखनऊ में बैठ कर मैं फैसला नहीं कर सकता पर कहीं न कहीं कुछ ग़लत हो रहा है जिसे तत्काल प्रभाव से ठीक किया जाना ज़रूरी है न सिर्फ़ दिल्ली बल्कि हर उस स्टेशन पर जहाँ पर भी असंतोष पांव पसार रहा है. वर्ना आकाशवाणी प्रतिभाओं की हत्या के पाप से स्वंम को कभी मुक्त नहीं कर पायेगा… सच बोलने का गुनाह करता रहा हूँ … इस अपराध में मेरा सर क़लम कर दीजिये प्लीज़!
मैं ऍफ़ ऍम रेनबो 100.7 लखनऊ से जुड़ा एक मज़दूर हूँ…लम्बे अरसे से आकाशवाणी से सम्बद्ध हूँ… जब ऍफ़ ऍम का जन्म भी नहीं हुआ था. मैंने रेडियो का सुनहरा कल भी देखा है और भविष्य के सपने संजोये अतीत की बुझती हुई आँखें भी…इस लिए इस हालत पे खून के आंसू बहाने के सिवाए और कुछ नहीं सूझता. सम्बंधित पेक्स कितनी दोषी हैं लखनऊ में बैठ कर मैं फैसला नहीं कर सकता पर कहीं न कहीं कुछ ग़लत हो रहा है जिसे तत्काल प्रभाव से ठीक किया जाना ज़रूरी है न सिर्फ़ दिल्ली बल्कि हर उस स्टेशन पर जहाँ पर भी असंतोष पांव पसार रहा है. वर्ना आकाशवाणी प्रतिभाओं की हत्या के पाप से स्वंम को कभी मुक्त नहीं कर पायेगा… सच बोलने का गुनाह करता रहा हूँ … इस अपराध में मेरा सर क़लम कर दीजिये प्लीज़!
http://anwarvoice.blogspot.com
This is naved sddiqi,FM RJ from lucknow.
I will put all the frames right,just all the indian anchors ,support me.
visit http://www.nregataskforce.blogspot.com
ye sulabh complex ke bagal me situated ek bada SULABH COMPLEX Hai.achchha hua iss sulabh complex me ab nahi jana padta.yaha do muhe kutte sarkari tag gale me daale,har kisi par jhapatate hai.yaha tak ki apni biradari ko bhi kab nooch baithe pata nahi….baaqi isse zyada mai kya likho, logon ne jitna iska mahima mandan kiya hai….shayad yeuss se bhi badhkar hai..
Ye SULABH COMPLEX ke bagal me situated Ek bada SULAB….Nahi nahi DURLABH COMPLEX hai…yaha par do muhe rabies wale,gale me sarkari tag daale do muhe kutte bhatakte,hai…iss se zyada samman ke saath iska mahima mandan… aur logo ne pahle hi kar rakkha hai…..
……………kuch baki nhi hai kahne ko……..All India Radio kaamchoron ka ek adda ban chuka hai……kai jagah kam ker chuka hun……mager all india radio ya puure prasar bharti tantra hi bhrasht jagah nhhi dekhi……….ek daur tha jab radio k naam ka matlab aakashwani tha ….aur aaj….?…..bus apni peeth khud thap-thapane ke lat lag chuki hai esko……
Ye aur kuch nhi….patan ki raah hai……aisa hi rha tho. Kya kahun…kya hoga un ka jo radio sunte hain….bhul jayenge naam All India Radio ka…..
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