नदिया के पार के लेखक-निर्देशक गोविंद मूनिस नहीं रहे

govind moonis

2 जनवरी 1929 को उन्नाव (उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे गोविंद मूनिस आरंभ में साहित्यिक कहानियों के लेखक थे। 1952 में वे कोलकाता आये और ऋत्विक घटक के साथ बतौर सहायक निर्देशक काम करना शुरू किया। 1953 में गोविंद मुंबई आ गये। यहां उन्होंने सत्येन बोस की लगभग सभी फिल्‍मों में बतौर सहायक निर्देशक काम किया। इन फिल्‍मों में जागृति (1955), बंदिश (1955), मासूम (1960), चलती का नाम गाड़ी (1957) और दोस्ती (1964) जैसी हिट फिल्‍में शामिल हैं। दोस्ती के लिए मूनिस को सर्वश्रेठ संवाद लेखक का फिल्‍मफेयर अवार्ड दिया गया। सत्येन बोस के साथ काम करते हुए उन्होंने राजश्री प्रोडक्‍शन की फिल्‍मों के लिए संवाद भी लिखा। बाद में नदिया के पार से तो उन्होंने एक इतिहास ही कायम किया।


बुधवार, 5 मई की शाम पांच बजे मशहूर फिल्‍म नदिया के पार के लेखक-निर्देशक गोविंद मूनिस का निधन हो गया। बुधवार की ही देर रात उनकी अंत्‍येष्टि भी कर दी गयी। यानी वो सिनेमा के आज के लिए इतने भी जरूरी नहीं रह गये थे कि उनके अंतिम दर्शन के लिए उनकी मृत देह को एक रात या सुबह नसीब हो पाती। अखबारों में यह खबर कहीं नहीं है। यह सूचना हमें रांची से प्रभात खबर के संवाददाता निराला ने दी। निराला उनके निकट के लोगों में थे। श्रद्धांजलि के तौर पर हम नदिया के पार के 25 साल पूरे होने पर गोविंद मूनिस का प्रभात खबर में प्रकाशित इंटरव्‍यू को पुनर्प्रकाशित कर रहे हैं : मॉडरेटर

गोविंद मूनिस नदिया के पार के लिए जाने जाते हैं। आप इस बारे में क्‍या सोचते हैं?

मुझे गर्व है कि मेरी पहचान की रेखा नदिया के पार फिल्‍म है। जिस तरह पाथेर पंचाली के लिए सत्यजीत राय, मदर इंडिया के लिए महबूब खान, शोले के लिए रमेश सिप्‍पी जाने जाते हैं, उसी कतार में मुझे लोग नदिया के पार से जानें, तो यह गर्व की बात है। वैसे मुझे करीब से जाननेवाले हमेशा “दोस्ती” फिल्‍म की पटकथा व संवाद लेखक के तौर पर पहले से प्रोत्साहित करते रहे हैं। उस फिल्‍म के लिए मुझे श्रेष्‍ठ संवाद लेखक का फिल्‍मफेयर अवार्ड मिला था। चलती का नाम गाड़ी, आंसू बन गये फूल, आसरा जैसी फिल्‍मों के संवाद लेखक के रूप में भी पहचान है।

नदिया के पार बनाने की प्रेरणा कहां से और कैसे मिली?

हिंदी फिल्‍मों में ग्रामीण जीवन, हिंदी पट्टी की संस्कृति की कमी शुरू से ही खलती रही थी मुझे। मैं सोचता था कहीं इसे उभारूंगा जरूर। पहले भोजपुरी फिल्‍म “मितवा” बनायी। उसके बाद पंडित केशव प्रसाद मिश्र का उपन्यास “कोहबर की शर्त” मेरे हाथ लगी। मुझे उस उपन्यास को पढ़कर लगा कि इस पर फिल्‍म बने तो ग्रामीण जीवन, संस्कृति उभरकर सामने आएगी। 1969 में इस उपन्यास को पढ़ा और उसके बाद 11 वर्ष मुझे अपने सपने को पूरा करने का इंतजार करना पड़ा। इसके लिए मैं सेठ ताराचंद बड़जात्या व राजकुमार बड़जात्या का शुक्रगुजार रहूंगा कि उन्होंने मुझे यह अवसर दिया।

नदिया के पार बने 25 साल हो गये। इतने वर्षों बाद आप दर्शकों से क्‍या कहना चाहेंगे?

मैं बस इतना ही कह सकता हूं कि दर्शकों का हमेशा शुक्रगुजार रहूंगा।

अभी जबकि बॉलीवुड में तकनीकी स्तर पर बहुत तेजी से बदलाव हो रहे हैं, ऐसे में क्‍या नदिया के पार जैसी फिल्‍म के लिए कोई स्कोप बनता है?

तकनीकी बदलावों का स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन इनका इस्तेमाल कहानी के साथ न्याय की शर्त पर ही होना चाहिए। इसका ध्यान रखा जाना चाहिए कि कहानी की आत्मा को ठेस न पहुंचे। वैसे सादगी भातीय दर्शकों को हमेशा से भाती रही है। इसलिए नदिया के पार जैसी फिल्‍मों का स्कोप हमेशा बना रहेगा।

क्‍या आप ग्रामीण दर्शकों को संदेश देने के लिए फिर से कोई फिल्‍म बनाने की आकांक्षा या योजना रखते हैं?

अगर अवसर मिले तो मैं फिर से नदिया के पार जैसी फिल्‍म बना सकता हूं, क्‍योंकि इस तरह के विषय से मैं अपने आपको काफी निकट पाता हूं। मैं खुद गांव में पैदा हुआ हूं। मैं गांव और वहां की संस्कृति से हमेशा जुड़ा रहा हूं।

नदिया के पार के बाद आपकी फिल्‍में – ससुराल, बाबुल, बंधन बांहों का – वैसी सफल नहीं हो पायी… जैसा कि फिल्‍म आलोचक कहते हैं…?

नहीं, ससुराल और बाबुल दोनों सफल रहीं। लेकिन नदिया के पार जैसी सफलता को दुहराना काफी मुश्किल काम है। बहुत कम निर्देशक ऐसा कर पाये हैं। और जहां तक दूसरी फिल्‍मों का सवाल है तो उनकी मार्केटिंग ठीक से नहीं हो पायी। फिल्‍म की मार्केटिंग बहुत मायने रखती है। लेकिन मैंने जितनी फिल्‍में की, सभी के प्रति मेरा समर्पण एक जैसा रहा। और मैं अपने काम से हमेशा संतुष्‍ट रहा हूं।

कुछ लोग कहते हैं, नदिया के पार के असल लेखक केशव प्रसाद मिश्र हैं। लेकिन फिल्‍म में आपने उन्हें कोई श्रेय नहीं दिया? यह कहां तक सच है?

कहानी के लिए केशव प्रसाद मिश्र को श्रेय दिया गया है। हां, उपन्यास का नाम फिल्‍म में नहीं गया है। दरअसल उपन्यास के फिल्‍मांकन का अधिकार राजश्री प्रोडक्‍शन ने खरीद लिया था। फिल्‍म हम आपके हैं कौन में भी कहानी का श्रेय केशव प्रसाद मिश्र को दिया गया है।

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नदिया के पार की शूटिंग के दौरान अभिनेता सचिन को समझाते गोविंद मूनिस

नदिया के पार की शूटिंग के समय के कुछ यादगार क्षणों के बारे में बताइए।?

नदिया के निर्माण से कई रोचक और यादगार बातें जुड़ी हुई हैं। मैं एक सबसे अधिक रोचक घटना के बारे में बताता हूं। हमलोग बिजयपुर गांव में शूटिंग कर रहे थे। केराकट तहसील के इस गांव में दो नदियों – साई और गोमती का संगम होता है। यहां एक रिवाज है कि शादी के बाद विवाहिता को पड़ोसियों के द्वारा आमंत्रित कर उसे गुड़ और दही दी जाती है। इसके बाद बिदाई स्वरूप दुल्‍हन को कुछ नकद भी दिया जाता है। हमलोगों ने गुंजा की शादी का फिल्‍मांकन रात में किया। अगली सुबह साधना सिंह को गांव की महिलाओं ने आमंत्रित किया और फिर विवाह के बाद के सारे रस्म पूरे किये गये। साधना सिंह ने भी उन्हें महसूस नहीं होने दिया कि वह सचमुच की बहू नहीं हैं।

गांव और गांव की संस्कृति फिल्‍मों से गायब क्‍यों होती जा रही है? कभी-कभार गांव दिखते भी हैं तो ये पंजाब और राजस्थान के गांव होते हैं। ऐसा क्‍यों है?

गांव या गांव की संस्कृति से अपिरिचत लोग भी गांव की पृष्‍ठभूमि पर फिल्‍म बनाते हैं तो सब कुछ समेटने के चक्‍कर में ऐसा कर बैठते हैं। वे गांव की वास्तविक संस्कृति या परंपराओं को समझने की कठिनाई से बचना चाहते हैं।

एक निर्देशक होने के नाते आपको नदिया के पार का कौन-सा दृश्य सबसे ज्‍यादा पसंद है?

जब वैद्य जी गूंजा की शादी का प्रस्ताव लेकर ओमकार के पास आते हैं। चंदन के सामने वह यह प्रस्ताव रखते हैं। उस दृश्य में सभी की प्रतिक्रिया और भाव बहुत महत्वपूर्ण थे। जैसे वैद्य जी, ओमकार, चंदन और काका। इस दृश्य को फिल्‍माने के पहले मैंने बहुत सोचा। लेकिन जब इसका फिल्‍मांकन हुआ और मैंने इसके रशेज देखे तो मुझे काफी संतुष्‍टि हुई। दूसरा दृश्य फिल्‍म का लगभग अंतिम दृश्य है, जब गुंजा पलंग पर लेटी हुई है। और चंदन उसे बता रहा होता है कि गुंजा की ओमकार के साथ विवाह के प्रस्ताव के समय उसे क्‍यों खामोश रहना पड़ा था। भावों के तारतम्य और बहाव को बरकरार रखने के लिए मैंने इस सीन को एक ही ट्राली पर शूट किया था। बाद में इस दृश्य में कुछ संपादन किया गया।

इन दिनों भोजपुरी फिल्‍मों का बूम-सा आया हुआ है। क्‍या इसका यह अर्थ निकाला जा सकता है कि गांव की फिल्‍मों की मांग बढ़ी है? इस दिशा में क्‍या आपकी भी कोई योजना है?

मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि साधारण दर्शक इन हाइटेक फिल्‍मों से ऊब चुका है। मिक्‍सड कल्‍चर वाली फिल्‍में जो सिर्फ अभिजात्य वर्ग को ध्यान में रख कर बनायी जाती हैं और जिनका वास्तविकता से नाम मात्र का लेना देना रहता है, से उकता चुके दर्शक को साधारण भोजपुरी फिल्‍म के रूप में एक विकल्‍प मिला है। मैं कामना करता हूं कि यह ट्रेंड जारी रहेगा। और हमें वास्तविकता, जीवन से जुड़ी और फिल्‍में देखने के लिए मिले। इस पीढ़ी के लिए मैं और फिल्‍में बनाना चाहता हूं। सच कहूं तो मैं भी एक भोजपुरी फिल्‍म शगुन की चूड़ी के नाम से पिछले वर्ष बनानेवाला था। लेकिन कुछ कारणों से यह योजना सफल नहीं हो पायी। मैं बहुत शिद्दत से एक ऐसे निर्माता या फिनांसर की तलाश में हूं जो विषय की समझ रखता हो और मुझे नदिया के पार जैसी कलात्मक आजादी दे सके।

हम आपके हैं कौन को नदिया के पार का आधुनिक संस्करण कहा जाता है। क्‍या आप इससे सहमत हैं? और क्‍या यह आपको अच्‍छा लगा था?

हां यह सच है। मुझे यह पसंद भी आया। सूरज ने यह चमत्कारिक काम किया। हम आपके हैं कौन को फिल्‍माने के पहले से सूरज ने मुझे पूरी स्क्रिप्‍ट सुनायी थी। और फिल्‍म के बन जाने के बाद भी उसने मुझे ट्रायल शो दिखाया। वह एक दृष्‍टिसंपन्न निर्देशक है।

बहुत सारे निर्माता/निर्देशक शिकायत करते हैं कि दर्शकों का टेस्ट आज बदल गया है। और यही कारण है कि फिल्‍मों में सेक्‍स और हिंसा का चलन बढ़ रहा है। आप इससे कितना सहमत हैं?

इस संबंध में मैं कुछ नहीं कहना चाहता हूं।

क्षेत्रीय सिनेमा का क्‍या भविष्‍य आप देखते हैं। विशेषकर हिंदी पट्टी जैसे, भोजपुरी, मैथिली…

एक समझ के साथ फिल्‍म निर्माता यदि अपनी गंभीरता को बरकरार रखते हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं कि क्षेत्रीय सिनेमा एक बड़ा फलक बनाने की ओर अग्रसर है। रशियन निर्देशक पुदोकिन ने एक बार कहा था – यथार्थवादी होना काफी नहीं है, यथार्थ को समझना भी जरूरी है।

2007 नदिया के पार का 25वां वर्ष है। इस मौके पर आप क्‍या कहना चाहेंगे?

मैं बहुत सम्मान महसूस करता हूं। मैं उन दर्शकों का बहुत ऋणी हूं जिन्होंने अब तक इस फिल्‍म को देखना जारी रखा है। इसके साथ ही मैं इस फिल्‍म की पूरी यूनिट का भी आभारी हूं, जिन्होंने समर्पण के साथ इसके निर्माण में हिस्सा लिया। उनका काम आश्चर्यजनक था। फिल्‍म में काम करनेवाले बहुत सारे लोग नये थे, जिनका सहयोग मुझे न मिला होता तो मैं शायद अपने सपने को पूरा नहीं कर पाता। इन कलाकारों में साधना सिंह, शीला डेविड, मिताली, इंद्र ठाकुर जैसे लोग थे। और जिन स्थापित कलाकारों का सहयोग मिला उनमें – लीला मिश्रा, राम मोहन, विष्‍णु कुमार व्‍यास, रंजना सचदेव और इनसे आगे सचिन जैसे कलाकार हैं।

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