पूर्वजों ने जिस मार्ग का संधान किया, उसी पर चलें



♦ पंकज झा

इस लेख में जाहिर विचारों से मोहल्‍ला लाइव की परोक्ष या अपरोक्ष रूप से न तो सहमति है, न असहमति। यानी हमारा इस लेख पर कोई विचार नहीं है। हम मानते हैं कि परंपरा और संस्‍कृति के नाम पर विचारहीनता की पूजा करने वाले हिंदू विचारकों पर सिर्फ दया ही की जा सकती है : मॉडरेटर

बिहार मूल के लेकिन दुनिया भर में फैले मैथिल ब्राह्मणों में ‘पंजी प्रथा’ के बारे में बाहर के लोगों को शायद कम मालूम होगा। पिछले करीब सात सौ वर्षों से चले आ रहे इस पंजीकरण के माध्यम से दुनिया के कोने-कोने में रह रहे इस जाति के लोग अपने पूर्वजों के बारे में भी जानकारी प्राप्त करते हैं। उनके अनुसार रक्त का शुद्धिकरण कायम रखना इस माध्यम से संभव होता है। अभी हाल ही में इस लेखक को भी इस प्रथा की प्रासंगिकता के बारे में अनुभव लेकर आश्चर्यचकित हो जाना पड़ा। छत्तीसगढ़ में रच-बस गये एक मैथिल परिवार को अपनी बेटी की शादी के लिए मूल-गोत्र पता करना था। जब वो यहां से सौराठ (मधुबनी) अपना ही परिचय जानने पहुंचे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। अपने परिवार के बारे में जितना उनको नहीं पता था उससे कई गुना ज्यादा जानकारी वहां के पंजीकार ने उन्हें दे दी। उनके पिता, पिता के पिता, उनके पिता, फिर मातृ कुल के लोगों के बारे में, किसकी शादी कहां हुई, कौन कहां किस गोत्र और मूल में ब्याहा गया था आदि-आदि। तो समस्या केवल हरियाणा की खाप पंचायतों में ही नहीं है। उत्तर भारत के लोग भी अपनी सामाजिक परंपरा के प्रति वैसा ही लगाव रखते हैं और चाहते हैं कि उस परंपरा के अनुसार गोत्र-मूल-जाति आदि की पूरी शुद्धता कायम रखें। कुछ रंच मात्र अपवादों को छोड़कर बिना किसी खास अवरोध-विरोध के यह प्रथा आज भी कायम है। तुलसी ने मानस में लिखा भी है ‘प्रथम मुनिन्ह जेहि कीरति गाई, तेहि मगु चलत सुगम मोहि भाई’ यानी पूर्वजों ने अपने चिंतन एवं कर्म के द्वारा जिस मार्ग का संधान किया है, उस पर चलना ही सुगम है।

निरुपमा पाठक की मौत के बहाने हमें चीजों को हर कोण से देखना और समझना होगा। वास्तव में कूद कर नतीजे पर पहुंच जाना संभव नहीं है। जिंदगी भर बिन-ब्याहे संबंध में रहने वाली अमृता प्रीतम ने भी अपनी एक किताब में लिखा है कि ‘फैसला वही लोग दे सकते हैं जो पूरा सच नहीं जानते’। वास्तव में हर कोण से सोचने पर आपके लिए कोई राय बना लेना मुश्किल ही होगा। मोटे तौर पर लोगों ने इस प्रकरण पर निरुपमा के नजरिए से और उसमें अपनी प्रेमिका या दोस्त तलाश कर ही कुछ लिखा या सोचा है। हालांकि कहीं से भी उनका सोचना गलत नहीं है। एक संभावना से भरपूर लड़की का यका-यक अपने बीच से चले जाना किसको मर्माहत नहीं करेगा? अपने अंदर हृदय रखने वाला आखिर कौन होगा जो हिल न जाए इस प्रकरण से? बावजूद इसके, सबका चिंतन इकतरफा ही कहा जाएगा। चीजों को समग्रता में ही देख कर आप किसी निष्कर्ष तक पहुंच सकते हैं।

आप निरुपमा में अपनी ‘बहन’ को देख कर सोचें। गिरफ्तार होकर जा रही उस महिला के चेहरे में अपनी मां को तलाशें। विवश बाप के किंकर्तव्यविमूढ़ चेहरे को, थाने में बैठे दोनों भाइयों में खुद को रख कर सोचें तब देखें, कितना मुश्किल होगा किसी एक को कसूरवार ठहराना। कानून का बिलकुल अपना तरीका है। वह अपने हिसाब से फैसला सुनाएगा भी। अगर यह हत्या है, तो निश्चित ही सजा भी मिलेगी। पेट में पल रहे अवैध शिशु को मार डालने का भी जुर्म कायम किया जाएगा। लेकिन इस सबसे अलग हटकर आप समाज के नजरिये से सोचें, अतिवादी नजरिया और एकांगी सोच से खुद को मुक्त करें। जैसा कि ऊपर चर्चा की गयी है, आप व्यक्तिगत तौर पर क्या मानते हैं, क्या नहीं – इससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। लेकिन भारतीय समाज में जाति, गोत्र, मूल आदि बड़ी सच्चाई है और उससे मुंह मोड़ना इतना आसान भी नहीं है।

सामान्यत: सामाजिक परंपराओं के मामले में कानून से भी न्यूनतम दखल की ही अपेक्षा की जाती है। आप देखेंगे कि हिंदुओं से अलग बाकी हर पंथ और संप्रदाय के लिए वैवाहिक मामले में उनकी मान्यताओं को ही कानून का जामा पहना दिया गया है। अलग-अलग धर्मों के अपने-अपने विवाह कानून उदाहरण हैं। लेकिन हिंदुओं को ऐसी सुविधा नहीं मिली है। आजादी के बाद जब मान्य परंपराओं के उलट इस समूह पर कोई कानून थोपने का प्रयास किया गया तो भी लोगों द्वारा वक्त की नजाकत एवं नवाचार को अपनाने की अपनी सहिष्णुता के कारण सबको स्वीकार भी किया गया। तबके राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के विरोध के बावजूद नेहरू ने नये समाज के अनुसार कानून बना कर देश को सभ्य बनाने का प्रयास किया और मोटे तौर पर कानून और हिंदू समाज के बीच कोई खास संघर्ष का सामना नहीं करना पड़ा। जहां ‘दहेज’ को गैरकानूनी मानते हुए भी सामान्यत: कानून ने अनावश्यक दखल देना जरूरी नहीं समझा तो पिता की संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार होने पर भी बेटियों ने कभी उस तरह से दावा नहीं किया। सामान्यत: इन चीजों में टकराव की नौबत भी नहीं आयी।

आप गौर करें… जब अपने छोटे कस्बों की भारी बोर दोपहरों से झोला उठाकर निरुपमा चली होगी तो पिता का सीना गर्व से चौड़ा ही तो हुआ होगा। एक बड़े संस्थान में अपनी बेटी का एडमिशन करवाते समय कहां उस मां ने सोचा होगा कि इस झोले में वो अपनी अजन्मी-अवैध संतान को लेकर लौटेगी। दिल्ली में रह कर ढेर सारे गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने वाली पीढ़ी को उस कस्बाई शर्म से क्या लेना-देना? अपनी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हुए, एक भविष्य के मटियामेट हो जाने की संवेदना में स्वयं को भी शामिल करते हुए, उस पीड़ा की अनुभूति से स्वयं को भी एकाकार करते हुए यह जरूर चाहूंगा कि हम सभी अपनी भावनाओं पर थोड़ा नियंत्रण रखते हुए हर पहलू पर विचार करें। इसी तरह जब हरियाणा के लोग अपनी खाप पंचायतों के माध्यम से एक ही गोत्र में शादी करने वाले पर कहर बरपाते हैं तो उस पर भी आखिर थोड़ा हमें सोचना ही होगा। कम से कम इतना तो जरूर निवेदन करना होगा कि आप आज के समाज में गोत्र-जाति आदि चीजों को बिलकुल खारिज नहीं कर सकते हैं। महर्षि अरविंद से लेकर गांधी तक सबने जाति की उपादेयता भी स्वीकार की ही है। लेकिन इसका मतलब कहीं से ये नहीं है कि किसी परिवार या पंचायत द्वारा किसी की हत्या किये जाने को जायज ठहराएं। लेकिन अगर समाज की अपनी कुछ मान्यताएं हैं और वो उस पर चलना चाहता है तो आप जोर-जबरदस्ती अपना नियम लादने का प्रयास भी नहीं कर सकते। इस हादसे के बहाने कस्बों से महानगरों तक आये लड़के-लड़कियों को यह जरूर सोचना होगा कि वह बिलकुल ही अपनी जड़ से कट कर यहां नहीं आये हैं।

मत कर गुमान इतनी परवाज पे परिंदे
आना तुझे पड़ेगा आखिर इसी जमीं पर।

आखिर पिता के हिस्से के सपने और उनके रीति-रिवाज ही अपनी पीठ पर लाद कर हम किसी रेलवे स्टेशन से दिल्ली या मुंबई की ओर प्रस्थान करते हैं। निश्चित ही कई मामलों में हमारी यह पीढ़ी भाग्यशाली है, जिसको अपने ढंग से उड़ान भरने का मौका मिला है। आप अगर पिता के नाम पुत्री के इस नये पत्र पर गौर करेंगे तो वास्तव में उसके बहाने मध्यवर्गीय हर भारतीय परिवार का पिता उसमें दिखेगा। धमकी के साथ-साथ अपनी पुत्री को सब कुछ माफ किये जाने का आश्वासन भी तो था उसमें। साथ ही इस मामले को नीरू के अलावा उस लड़के के नजरिये से भी देखने की जरूरत है। आखिर जिस लड़के के कारण भी उसका ऐसा छीछालेदर हुआ, वह अभी कहां है।

किसी भी तरह का कोई निष्कर्ष न देते हुए भी यह आग्रह तो किया ही जा सकता है कि बेटे-बेटियां ये जरूर समझें कि माता-पिता से ज्यादा अपना भला चाहने वाले (अपवादों को छोडक़र) कोई नहीं है। फिर 22-23 वर्ष की यह उम्र ऐसी जरूर होती है, जिसमें भले ही पेशेवर रूप में हम सफल हो गये हों लेकिन अपना भला-बुरा सोचने की ज्यादा समझ नहीं होती। एक अमृता प्रीतम द्वारा वर्णित संदर्भ ही याद आ रहा है, जिसमें एक विदेशी कहानी के माध्यम से उन्होंने यह साबित करने का प्रयास किया है कि बहुधा हमें खुद ही पता नहीं होता कि आखिर हमें चाहिए क्या। और जब तक पता चलता है तब तक कोई विकल्प ही बाकी नहीं रहता।

अभी-अभी कोरबा (छत्तीसगढ़) से एक खबर आयी है, जिसमें एक पुराने जान-पहचान वाले लड़के से अभिभावक द्वारा शादी तय कर देने पर भी ऐन शादी के दिन लड़की ने आत्महत्या कर ली। 2-3 दिन पहले की ही बात है। इस लेखक की एक मित्र अपने आफिस के बारे में बता रही थी जहां ‘ब्राम्हण लॉबी’ ने उसका काम करना मुश्किल कर दिया है। तो 3-4 साल की मित्रता के बावजूद पहली बार पता चला कि वह लड़की ब्राम्हण नहीं है। तो शादी-विवाह के मामले से अलग ‘जाति’ आजकल अप्रासंगिक हो ही गयी है। ये तो बुरा हो राजनीति का जिसने आज-तक जातिवाद नाम के कोढ़ को जिंदा रखा है। अन्यथा लोग तो शादी-विवाह के अलावा भूलने ही लगे थे इस बीमारी को। लेकिन समाज में जब तक वैवाहिक संबंध में जाति की प्रासंगिकता बची है, तब तक शायद निरुपमाओं को कोई निर्णायक कदम उठाने से पहले अपनी मां के उम्मीद रूपी आंचल पर गौर करना ही होगा। अपनी पीढ़ी को बहुत सी ऐसी आजादी मिली है, जो पहले जन्मे लोगों को मयस्सर नहीं थी। कुछ आजादी हमें आने वाली पीढ़‍ियों के लिए ही सुरक्षित छोड़ देनी होगी। यही कीमत होगी शायद अपने को मिली आजादी का उपयोग करने की। लेकिन इस घटना से मर्माहत हो कर समाज से भी इतना तो प्रार्थना की ही जा सकती है कि प्लीज अब तो बड़े बन जाइए…!

(पंकज झा। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री लेनेवाले पंकज झा वर्तमान में छत्तीसगढ़ भाजपा के मुखपत्र दीपकमल के समाचार संपादक हैं। इसके साथ ही वे विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं के लिए मुक्त लेखन भी करते हैं। उनसे jay7feb@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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