रवीश कुमार का कुत्ता पुराण और भाषा का जातिवाद
रवीश कुमार कुत्तों के सम्मान की रक्षा करना चाहते हैं। वे कहते हैं कि लालू और मुलायम की तुलना किसी और से हो सकती थी। इसलिए वे चाहते हैं कि हम सब कुत्तों के सम्मान में मैंदान में आ जाएं। दिलीप मंडल ने उनसे इस टिप्पणी को हटाने का अनुरोध किया है। दिलीप की राय में इस टिप्पणी की भाषा में जातीय घृणा है। इसलिए रवीश गडकरी को जी कहते हैं और लालू-मुलायम के साथ जी नहीं लगा पाते। इस सवाल पर फेसबुक में जबर्दस्त बहस हुई है। भारतीय समाज और इंटरनेट के कुछ उलझे तारों को समझने में यह बहस मदद कर सकती है। इसलिए उधार लेकर यहां पेश हैं : मॉडरेटर

Ramnish Kumar Dil jeet liye Ravish bhai …
Anindita Neogy agree ravish ji…ye log is adjective ke bhi kaabil nahin hai
Avtansh Chitransh वाह! …गड़करी उत्तर भारत के नेता बन गये……और कोई है भाई
Sarvesh Upadhyay main kuch nahee janta …mere tommy ko gussa aa gya hai
Sharma Santosh गुरूदेव राजनीति के केंद्र में आने के लिए नए नेता ऐसे बयानों से सुर्खियां में आते रहते हैं और बीजेपी में तो ये बहुत पुरानी परंपरा रही है। कांग्रेस भी कुछ कम नहीं कल दिन में दिग्विजय ने आडवाणी का हिंदू आतंकवाद का जनक बताया। शाम गडकरी की रही।
Vikas Mishra रवीश जी, कुत्ते और आदमी को इतनी सहजता से अलग नहीं कर सकते। दोनों एक दूसरे में समाए हुए हैं। कुत्तात्मकता पूरे जींस में इस कदर समाया हुआ है कि जमीर बहुत थोड़े में बिक जाता है। स्वीकार कीजिए कि कुत्तात्मकता अभिन्न हिस्सा बनता जा रहा है अन्यथा नीरा राडिया जैसी भद्र महिलाएं पैदा कैसे होतीं?
खुदा खैर करे!
Tanushri Srivastava bahut badiya sir,is incidence ka issse behtar interpretation nahi ho sakta.
Drigraj Madheshia ravish ji apne bilkul thik kaha. vafadar to kutte gote hain in dono se vafadari ki ummid to nahi ki ja sakti
Pankaj Sharma yea u r rite sir, these politician dont deserve to be even called dog.
Dilip Mandal “these politicians” मतलब अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, नारायण दत्त तिवारी, प्रणव मुखर्जी, नितिन गडकरी आदि आदि। क्या ये सचमुच कुत्ता कहे जाने के भी लायक नहीं हैं। पंकज शर्मा ये आप कैसे कह सकते हैं।
Dilip Mandal @रमनीश,दो इंसानों को कुत्ते से भी नीचा बताने से आपका दिल खुश हो गया लगता है।
@ अनंदिता, ये लोग मतलब कौन लोग?
Dilip Mandal दोस्तों, अगर रवीश ने अपना कमेंट हटा लिया तो आप लोग जो उनकी बात को डिफेंड कर रहे हो, उन्हें खुद को जवाब देना भारी पड़ेगा। इसलिए जरा सोच समझकर कमेंट कीजिए। आप पब्लिक डोमेन में हैं।
Gunjan Singh sahi kaha apne …
Chandan Kumar dilip ji dwara uthaye gaye sawalon ka jawab to apko dena hi chahiye
Dilip Mandal @ गुंजन सिंह, धन्यवाद।
Dilip Mandal बीजेपी झारखंड में जेएमएम का, महाराष्ट्र में शिव सेना का, हरियाणा में चौटाला का तलवा चाटती है। पंजाब में वह अकालियों के तलवे चाटती है। काग्रेस यही काम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ करती है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बीएसपी के तलवे चाट चुकी है। लालू के तलवे तो कांग्रेस ने लगभग 10 साल तक चाटे हैं। तो वही उपमा दें कांग्रेस और बीजेपी के बड़े नेताओं को।
Avtansh Chitransh @दिलीप जी क्यों परेशान हो रहे हैं…रविश जी ने बड़े सधे तरीके से कुत्तों के सम्मान के लिए लोगों को बुलाया है…अब आप बुलाए गए इन लोगों से किसके सम्मान के लिए लड़ रहे हैं… आपको खुद ही समझ लेना चाहिए…भैंस के आगे बीन बजाए।
Dilip Mandal वैसे भैंस का जिक्र करके आप जहां पहुंचना चाह रहे हैं, ये गाड़ी वहां जाती नहीं है। वैसे आपकी बुद्धि और बिहार के समाजशास्त्र के बारे में आपकी समझ का मैं आदर करता हूं।
Dilip Mandal जो लोग इस ह्यूमर में शामिल हैं उनकी सोशल प्रोफाइलिंग होनी चाहिए। कौन हैं जो लालू और मुलायम को कुत्ते से भी निकृष्ट बताने पर आनंद ले रहे हैं। जरा वक्त निकालिए और तमाम नामों को पढ़ लीजिए।
रिडल ऑफ ट्वेंटिफर्स्ट सेंचुरी पोस्ट मॉडर्न इंडिया।
और ये लोग कहते हैं कि वे जाति को नहीं मानते, जिनकी नसों में जाति बह रही है।
Chandan Kumar @dilip Ji – sahi kah rahein hain aap. ab bas apko sari Jamat ek sur mein apko JATIVADI karar de degi.. swal hoga… aap kytun itna likh rahe hain? apko kyun bura lag raha hai …..aap bhi yadav hain kya? aise sawalon se apka munh band karne ki koshish ab hogi
Dilip Mandal @चंदन जी, मेरी राय इससे अलग है। वे ज्यादा नहीं कहेंगे। इस पर ज्यादा विवाद नहीं होगा। मेरा निजी अनुभव है कि ऐसे मामले में जातिवादी लोग चुप्पी साध लेते हैं। “कॉन्सपिरेसी ऑफ साइलेंस” कहते हैं ना। ज्यादा बोलेंगे तो ज्यादा धुलाई होगी। वे ज्यादा बोलकर खुद अपनी ही पिटाई कर रहे होंगे। वे जानते हैं कि तर्क उनके साथ नहीं हैं। इस विमर्श में तथ्य, सत्य और न्याय तीनो जातिविरोधियों के साथ हैं।
जो बोल रहे हैं वे अबोध हैं। जो समझदार हैं वे खामोशी साध चुके हैं।
Jeet Bhati सर अब आपकी खैर नहीं… लालू आप पर भी लाल हो जाएगें।
Amaan Ahmed Azad kya khoob kaha hai ravish ji
Arsh Singh lolzzzzzzzzzzzz sir
Arun Sathi bakbas
Pradeep Kumar Raghav ठीक कहा , आपने गडकरी को आरजेडी और सपा से नहीं कुत्तों से माफी मांगनी चाहिए
Munna Amlendra Simgh गडकरी इतने राजनीति में पक्के में नही कि मुलायम और लालू की इस कदर बेइज्जती करे …..शायद गडकरी यह भूल रहे है कि जितनी उनकी उम्र है उससे भी ज्यादा इन दोनों नेताओं की राजनीतिक उम्र है…..राजनीति में माना कि सब चलता है लेकिन गडकरी को पता होना चाहिए कि मुंबई नही दिल्ली की राजनीति कर रहे है
Madhukar Chopra Kutton ka yeh apmaan, nahin sahega Hindusthan.
Sharad Singhal @Rajesh ji, I agree with you completely that FB for me is to learn,I also agree with you that Truth will liberate us .
In any understanding there are 2 things :
1.Janna 2. Manna , most of us do the “Manna” without trying to know “Janna” having said this I am trying to know Janna of Jaati pratha/caste system hence I do not agree that this pratha was part of our ancient system (as u mentioned sadiyon se) no way I told you in previous post Hindus used to go for Toilet in open , they still do in villages, this means there cannot be bhangis that time, nor anyone to carry night soil!! please understand when there were no toilets in houses how could there be anyone to clean it ??
British brought with them commodes, now to clean them ,they used poor subjugated Indians to do this cleaning work, gradually we the Indian Brown sahibs(Educated in English, British educated) started to emulate British(we still copy west without going in depth).
The British simultaneously attacked our educational system and started so called caste system.
We have British documents to prove what I have mentioned.
Sharad Singhal Mandal ji Dr Tiwari,Dinkar ji ne kis sandarbh mein yeh sab likha hai usko bhee janna padega, main koi baat maanta nahin jab tak ke jaan na loon.
Having said that if they did write or say to hurt us, then we should definitely ridicule it / criticise it , after all they were victim of their casteist mindset, which is what British wanted “Divide and Rule”
I am aware that I am an OBC but I do not care because these “names/medals” have been given to us by British and accentuated by Congress
Rohit Singh Gadkari ji ne bilkul sahi kaha hai .
Sharad Singhal Our history has been written by British/other invaders and then by JNU, where is any referece given by an Indian which is ever taken in account, what I mean to say is whenever people give reference about Indian culture/history they give reference of Foreign writers.
When you talk of India, give reference of “Indian authors of that period”
Avijit Gautam Bhaut badiya sir….
Sharad Singhal Thanks Gautam Buddha
Anjule Maurya wawo………………sir…..i agree with you
Rahul Dabas गडकरी जी नेता..उनके लिये कोई नियम नहीं..लेकिन आप ऐसा कहें ये नहीं जचता..। लोकतंत्र के लिये दल की दलदल चाहिये और नेता भी..तो कुत्ता कहते कत्तई ठीक नहीं, मेरे दोस्त।
Sharad Singhal Thanks Anjule, Actually I can go on and on about Jaati pratha, how it started etc. By the way Good News is that it will end soon,mainly because of the younger generation,people like you
Bhupesh Sharma Ravish Ji , Aaj Kal tho kutto ke Liye Blood bank bhi khul gaye hain, ab aap samajh hi sakte hain ki ye kitne wafadar hote hain jo hum log bhi inki dekh bhaal kar rahe hain, Aur Gadkaari ji ne Kitni badi galti ki thi aap bhi samajh hi gaye honge, waise mujhe pata chala hai ki Gadkari ji ne apni jo Baat wapas le li hai, Uss se KUTTON mai khushi ki lehar hai, aur unhone apni hadtaal wapas le li hai….
Anjule Maurya singhal sir itni aasan nahi hai ye chij aBHI halat dekh ke to lagta hai is bimari ko khat hone mein shadiyon ka samay lagega…
Dilip Manda………..ke sawal sahi hain…
Praveen Kumar Bhatt kya baat hai yaad rakhne layak
Dilip Mandal गडकरी ने अपनी बात वापस ली है और अपनी अज्ञानता की बात मानी है। राजनीति की जितनी भी निंदा करें, वो संस्था ज्यादा लोकतांत्रिक होने के लिए बाध्य है। विचार-विमर्श के क्षेत्र में थोड़ा भी लोकतंत्र होता तो यहां वाह-वाह करने वाले भाट इस बारे में कुछ विचार करते कि गडकरी ने अपनी कही बात वापस क्यों ले ली।
Vandani Rawat agar mayawati ki tulna ki jaye, to kisse ki jayegi?
Dilip Mandal @Vandani Rawat, मायावती से इतनी नफरत क्यों है?
Ashish Jain maja aa gaya ravish ji….soch se pare ek ravish hamaara
Yogesh Pandya Ravishbhai, you are right, Main question is- ye apaman kiska hai? Log Kutta palte he, aur ab god bhi lete hai…. Lekin Shriman Gadakari Jee- ab aage jakar ye nahi kar payenge..?
मैंने यह नहीं कहा है कि लालू और मुलायम कुत्ते से भी गए गुजर हैं। मैंने यही कहा है कि आप इनकी तुलना किसी और चीज से कीजिए। मैंने लिखा है कि हमें कुत्तों को सम्मान से देखना चाहिए। जानवर का अनादर क्यों करें। ब्लाग पर भी एक बार लिखा था कि जो लोग कुत्तों को लेकर गाली देते हैं मुझे अच्छा नहीं लगता।
Nikhil Anand I appreciate progressive RavishJi to start this debate. i read all the comments and It seems to be a conspiracy by some vested interests to portray Laloo, Mulayam, Mayawati and all the politicians belonging to deprive section as worse than the Dogs. Do ppl think that politics has come to this low after Mandal….What is the contribution of Mandir …
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Dilip Mandal समाजशास्त्र और भाषा की पढ़ाई करने वालों के लिए बेहतरीन कोर्स मटेरियल। टिप्पणी न हटाने के आपसे फैसले से घोर असहमति है, लेकिन लेकिन ऐसा न करने के आपके अधिकार का उससे भी ज्यादा सम्मान है। आप देख ही रहे हैं कि लोग अब आपसे उम्मीद कर रहे हैं कि आप मायवती के लिए लिए भी लालू-मुलायम-कुत्ता जैसी कोई बात कहें।” agar mayawati ki tulna ki jaye, to kisse ki jayegi?” आप जानते हैं कि लोग आपसे क्या सुनना चाहते हैं।
आपकी इस टिप्पणी से जातीय नफरत बढ़ेगी।
Sushant Jha गडकरी की भाषा शर्मनाक है, लेकिन इस कुत्ता विमर्श को लालू-मुलायम के अपमान और इसके समाजशास्त्रीय विश्लेषण तक सीमित रखना ठीक नहीं…गडकारी का राजनीतिक निहितार्थ कहीं ज्यादा शातिराना है…वे लालू-मुलायम को गाली देकर उत्तर भारत की अल्पसंख्यक राजनीति के संभावित ध्रुवीकरण को रोकना भी चाहते हैं जो जाने-अनजाने कांग्रेस की तरफ जा रही है…लालू-मुलायम को टारगेट कर उन्होने मुस्लिम मतों में संभावित विभाजन का सपना संजोया है…पता नहीं यह कितना सफल होगा…









Nahin ji..Mujhe to laga ki Ravish Kumar ‘kuttawaadi’ hain.
लगता है रविश को नीतीश कुमार ने ‘सप्रेम भेंट’ देना शुरू कर दिया है। लगे रहिए
I appreciate progressive RavishJi to start this debate. i read all the comments and It seems to be a conspiracy by some vested interests to portray Laloo, Mulayam, Mayawati and all the politicians belonging to deprive section as worse than the Dogs. Do ppl think that politics has come to this low after Mandal ? What is the contribution of Mandir Movement in the growth of Indian society and politics ? Before you understand the Politics learn to understand the Politics Of Linguistics. Everyone can enjoy all the shit on Internet before the vast and majority of section join you online. The people who believe that all the knowledge comes with the culture and civilisation and hierarchy is a gift of birth now trying to learn…Sab Kuchh Badal Sakte Hain Jaat Nahi. But besides all the learning sometimes you are unmasked and exposed. I appreciate Ravish a lot for his social- political understanding and sensitivity but going through the language of the comment am shocked. I am in a dock like situation and put this question further…Is Ravish Kumar a Castiest?
ham bhi yahi mante haiN. Agar Gadkari ne aisi tippni Rahul Gandhi ya Atal Bihari par ki hoti tab bhi kya Ravish aisa status lagane ki himmat karte ? Chhadm pragatisheeloN ke ye pure ke pure kai gut aise hi haiN.GaoN, gharibi aur jaatioN ke mare ye kabhi khud Lalu, Mulayam jaisi samajik haisiyat rakhte the. Zara kisi ne sir par par hath kya fira diye, ye unhiN ki bhasha bolne lage.
इस बहस का अगला चरण ये हो सकता है कि कोई लालबुझक्कड़ रवीश की जाति न खोज ले…जैसे हाल ही में राजकिशोर की ‘खोज’ ली गई थी। कुल मिलाकर आपकी किसी मुद्दे पर प्रतिवद्धता जाति से ही निर्धारित होगी-ऐसी खतरनाक कोशिश की जा रही है। इसलिए अगर बहस के मैदान में उतरना है तो रवीशजी को भी मंडल, झा या यादव, पाठक बनना ही होगा…तभी ये तय हो पाएगा कि रवीशजी दिल से सेक्यूलर हैं या सिर्फ पहनावे-ओढावे से…! खुदा खैर करे। उनका तमाम काम और लेखन लालू-मुलायम पर की गई उनकी महज एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी से खत्म करने की बड़ी वेशर्म कोशिश है ये। क्या लालू-मुलायम वाकई इतने ‘महान’ हैं कि वे ह्यूमर के दायरे से भी ऊपर उठ चुके हैं? कल को तो उन पर कार्टून बनाने वाले पर भी फतवा जारी हो सकता है। इरफान भाई सावधान! दरअसल मंडलवादी( या उत्तर भारत के पिछड़ावादी?)अभी तक भाषाई विमर्श से आगे नहीं निकल पाए हैं-उन्होंने दक्षिण के पिछड़ावादियों से अगर सीख ली होती तो बहुत कुछ जमीनी विमर्श कर चुके होते। लेकिन नहीं-भाषाई विमर्श की जो परंपरा लालू-मुलायम ने 90 के दशक में शुरु की थी-मंडलवादी उससे चिपके पड़े हैं। आपको याद है लालू का वो भाषा विमर्श जब उन्होंने ‘भूराबाल साफ करो’ और कुछ खास जातियों के लिए ‘कुकुर’ शब्द का इस्तेमाल किया था?(माफ कीजिएगा-कृपया इसे आप सदियों के शोषण से जोड़ने का प्रयास न करें, बात तहजीब की हो रही है) आपको याद है मुलायम सिंह के इशारे पर कुछ गुंडों ने एक दलित नेता के बलात्कार की कोशिश की थी-जो आजकल यूपी की मुख्यमंत्री हैं? तो ये है लालू-मुलायम का भाषाई और समाजिक विमर्श। फिर आप को क्यों मिर्ची लगती है कि रवीश ने-वो भी महज ह्यूमर में-श्री श्री 1008, महामंडलेश्वर, प्रात:स्मरणीय, परमपूजनीय लालू और मुलायमजी की तुलना कुत्तों से न करने की बात कही। कृपया, ठंढ़े दिमाग से सोचिए-क्या ये वाकई बहस का मुद्दा है। क्या सवाल ये नहीं होना चाहिए की लालू-मुलायम कब तक समाजिक न्याय को महज पिछड़ों के मानसिक सशक्तिकरण से जोड़कर अपनी राजनीति चलाएंगे? उत्तर भारत की पिछड़ा राजनीति में लालू-मुलायम मॉडल फ्लाफ शो साबित हुआ है…यहां के पिछड़ों को दक्षिण भारतीय मॉडल चाहिए जो आईडेंटी पोलिटिक्स की बात तो करे- लेकिन उससे ज्यादा जमीनी स्तर पर काम करे।
Read this topic in the above concern:
http://mohallalive.com/2010/05/08/seminar-in-jnu-on-lohiya/
बुद्धिजीवी एक ब्राह्मणवादी अवधारणा है : धीरुभाई शेठ
बुद्धिजीवी और श्रमजीवी के रूप में लोगों का विभाजन जातिवादी फ्रेम के तहत हुआ। इस तरह बुद्धिजीवी एक ब्राह्मणवादी अवधारणा ठहरती है। यह बात सीएसडीएस के पूर्व निदेशक और वरिष्ठ राजनीतिक समाजशास्त्री धीरूभाई शेठ ने डॉ राममनोहर लोहिया के जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर जेएनयू में ‘सामाजिक चुनौतियां और बुद्धिजीवियों का दायित्व’ विषय पर आयोजित एक विचार गोष्ठी में कही। उन्होंने कहा कि इस देश में दो सत्ताएं हैं – व्याख्या सत्ता और राजसत्ता। व्याख्या सत्ता राजसत्ता को नियंत्रित करती रही है। बुद्धिजीवी वर्ग की ताकत को ऐतिहासिक रूप में समझने की जरूरत है। साथ ही उन्होंने हैरानी भी जतायी कि आज के बुद्धिजीवियों की बात आम जीवन की समस्याओं से मेल नहीं खाती हैं, यह लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
Atal Bihari se Zyada humour pasaNd kaun hoga. Ek tho unke liye bhi koi status lagayie na. Jab brahman balatkar bhi karta tha aur gali bhi deta tha tab nahin na vimarsh yad aata tha kisi ko. Bahas to is par hona chahiye ki ye sansthanik shadayantra kab tak hamara dost bankar, hamare adhinasth ka bahurup dhar kar, hamaare hitaishi ka chehra lagakar hame thagta rahega.
वर्ग,जाति और लिंग से परे भी कोई आइडेंटिटी होती है क्या??
समाज का न्यायशास्त्र तो ये कहता है की एक पुजारी या ब्राह्मण कभी बलात्कार नही कर सकता / भंवरी देवी बलात्कार काण्ड का अध्ययन करें / दलित न्यायाधीश के कुर्सी छोड़ने पर नए सवर्ण न्यायाधीश को कुर्सी और परिसर गंगाजल से धुलवाना पड़ता है…ऐसे उदहारण समाज में आते रहते है / दलित दूल्हा आज भी घोड़े पर चदकर देश के कई इलाके में शादी करने नही जा सकता है / निरुपमा की हत्या पर ब्राह्मण समाज जूलूस निकलता है / बबलू श्रीवास्तव को कायस्थ समाज वीर समझता है / यादव में लालू और दलित में मायावती मिले जिनके पीछे इन जातियों के लोग गोलबंद हो गए / आपके नाम से पहले लोग आपकी जाति जानना चाहते हैं / जाति कोई शिव का धनुष नही जो कोई राम आएगा और तोड़ देगा / लोग जाति के नाम पर या तो चुप हो जाते है, मोडेस्ट दिखने की कोशिश करते है या फिर कहते है की आई डोंट बिलीव इन कास्ट… ऐसा बोलने वालो में अधिकांश संख्या उन लोगो की है जो कहते है की आई हेट पोलिटिक्स / देश में अब जो अपकमिंग सेक्शन है ये उसके खिलाफ एक साजिश है depoliticise करके हाशिये पर रखने की / जाति बहस और विमर्श से टूटेगा / मुखौटे वाला प्रोग्रेसिव नही चाहिए पर वो जिसकी निति और नीयत दोनों साफ़ हो / बहस के लिए रविशजी और दिलीपजी को बधाई ….उम्मीद है की असहमति के बावजूद भी साथ रहने की गुंजाइश बनी रहेगी….तभी लोकतंत्र जिन्दा रहेगा /
‘तंज करने की कोशिश+हमें कुत्तों को सम्मान से देखना चाहिए।’
ऎसी मासूमियत पे कुर्बान्!! Menka ji kahan hain?
इस अदा पर कौन न मर जाए ऐ खुदा!
रवीश का गुनाह-ए-अजीम यहीं है कि वो अभी तक कुमार क्यों बने हुए हैं-वे यादव या पांडे क्यों नहीं हैं? लगता है वो कुमार हैं इसलिए छद्म-प्रोग्रेसिव भी हैं!चलिए मान लेते हैं-शायद इसबार जनगणना अधिकारी तो जरुर पता कर लेगा कि वे क्या हैं- अफसोस, हमें पता नहीं चल पाएगा! लेकिन निखिलजी, हमें ये नहीं पता समझ में आ रही कि ‘i dont beleive in caste’ कहने से अपकमिंग तबका कैसे हाशिए पर चला जाएगा। आपका कहना सही है कि जब कुछ खास लोगों के लिए जाति मुफीद थी तो सब ठीक था-अब वहीं कह रहे हैं कि ‘i dont beleive in caste’ । लेकिन, अपकमिंग तबका उस चक्र को उल्टा करने पर क्यों आमादा है-ये समझ में नहीं आता। जिस व्यवस्था में उसे ही सबसे ज्यादा क्षति उठाना पड़ा हो वो उसी को क्यों सीने से चिपकाना चाहता है-महज इसलिए कि अभी उसका वक्त आ गया है। ये उसके लिए महज एक तात्कालिक लाभ होगा-दूरगामी नहीं। याद रखिए, समाज के व्यापक वर्ग को तभी फायदा होगा जब जाति का पूरी तरह उन्मूलन हो। और हां, बहस और विमर्श जातिवाद की धार को कमजोर करने के तरीके हो सकते हैं लेकिन उसे खत्म करने के नहीं। जातिवाद- आर्थिक सशक्तिकरण, घनघोर शहरीकरण, और ग्राम्य व्यवस्था के कमजोर होने से ही खत्म होगा-सिर्फ विमर्श से नहीं। विमर्श करके लोग अपने-2 घरों में जाएंगे और फिर बेटी-बहनों के लिए मेट्रीमोनियल में अपनी जाति का दूल्हा खोजेंगे। वैसे भी बहस तो हमारे यहां पिछले 60 साल या कहें कि बुद्ध-महावीर के वक्त से नहीं चल रहा? याद रखिए-बाबा मार्क्स का कथन आज भी प्रासांगिक हैं-Money is the prime mover of History…not ideas…भारत का जातिवाद, अम्बेदकर-नेहरु के संविधान से नहीं टूट रहा…ये तो कॉरपोरेट ऑफिसों के चमचमाते ग्लास हाउसों और संस्थानों में ‘हारमोनल फोर्स’ की वजह से टूट रहा है…तो चलिए इस बात की कोशिश करें…कि ये हारमोनल फोर्स, अपनी अभिव्यक्ति का ज्यादा मौका पाए…लेकिन उसके लिए मौजूदा ग्रामीण व्यवस्था का ध्वंश होना जरुरी है। बाबा साहब अम्बेदकर भी कुछ ऐसा ही सोचते थे-उनका कहना था कि समाज के व्यावक वर्गों का हित गांव में असुरक्षित है…क्योंकि गांव, अशिक्षा, अंधकार, और अत्याचार के केंद्र है। चलिए उम्मीद है, हम फिर भी बहस करते रहेंगे।
Dilip Mandal @चंदन जी, मेरी राय इससे अलग है। वे ज्यादा नहीं कहेंगे। इस पर ज्यादा विवाद नहीं होगा। मेरा निजी अनुभव है कि ऐसे मामले में जातिवादी लोग चुप्पी साध लेते हैं। “कॉन्सपिरेसी ऑफ साइलेंस” कहते हैं ना। ज्यादा बोलेंगे तो ज्यादा धुलाई होगी। वे ज्यादा बोलकर खुद अपनी ही पिटाई कर रहे होंगे। वे जानते हैं कि तर्क उनके साथ नहीं हैं। इस विमर्श में तथ्य, सत्य और न्याय तीनो जातिविरोधियों के साथ हैं।
जो बोल रहे हैं वे अबोध हैं। जो समझदार हैं वे खामोशी साध चुके हैं।
लगता है कि रवीश कुमार को उनका सेंस आफ ह्यूमर और sensitivity towards dogs’ emotions भारी पड़ने जा रही है !!
लोगों को ध्यान मैं इरफान के बनाए ताजा कार्टून पर दिलाना चाहुंगा जिसमें उन्होंने रवीश वाला एंगल ही लिया है। उन्होंने भी नेताओं के दुखे हुए दिल के बजाए कुत्तों की आहत भावनाओं को समझने की कोशिश की है !
एक ग्रीक दार्शनिक ने कहा था कि यदि मेढ़क सोच सकते तो वो अपने भगवान को एक सर्वशक्तिशाली मेंढ़क बताते !! यदि आज वह दार्शनिक जिंदा होता तो जरूर कहता कि यदि कुत्तो के पास अपने आइडियालाग होते तो भारतीय नेता एक दूसरे की छिछालेदर में कुत्तों का अपमान हर्गिज न करने पाते !!
chhorho yaar, aisa hangaama mat machayo jaise log apne-apne indian idol ko safal banane ke liye machate hain. patrakarita aur sahitya ka bhi koi indian idol hone wala hai kya ? KyoN Ravish kumar ko Anu Malik bana rahe ho ?
आपने जानबूझ कर फेस बुक मेरी टिप्पणी कों हटा दिया है. यह बौद्धिक ईमानदारी नहीं है.बहरहाल यदि रवीश भी जातिवादी है तो मीडिया में किसी भी अन्य सवर्ण/ ओ०बी०सी०/ अल्पसंख्यक से प्रो-दलित होने की उम्मीद नहीं की जा सकती. फिर क्या दलित अपनी अलग मीडिया या देश की मांग करेंगे.?
भारतीय संस्कृति में जानवरों का महत्व शूद्रों और अतिशूद्रों से ज्यादा। जान भी जानवरों की ज्यादा कीमती है। हरियाणा के दुलिना में गायों को ले जा रहे दलितों की हत्या के बाद पंडितो ने यही व्य़ाख्या की थी। PUDR की रिपोर्ट का एक अंश-
“Responding immediately to the killings, on 16 October itself the VHP and the Shiv Sena held a demonstration in Jhajjar and submitted a memorandum to the Deputy Commissioner demanding that no action be
taken in the incident .The killers were glorified as heroes
who had avenged the cow “our mother”. VHP leader
Parmanand Giri openly stated that those who had killed
the ‘gau-hatyare’ must be honoured.”
http://www.pudr.org/index.php?option=com_docman&task=doc_view&gid=119
कुत्ता जीवन साथी है, गाय माता है, उल्लू लक्ष्मी जी का वाहन है, चूहा गणेश जी का, मोर कार्तिकेय जी का, बैल शिव का, बंदर तो साक्षात हनुमान हैं और इंसान?
insaan agar sab jaanwaroN ka jod ho to mahaan hai, thoda kam-kam ho to hindu aur musalman hai aur agar vaastav me insaan hai to kude-daan ka saaman hai.
Dilip Mondal jee Aap desh ki 85% abadi ke bare me sochate hai.apko salaam.
बात अब रवीश की चलताऊ टिप्पणी से कहीं आगे पहुंच गई है। अच्छा होता यदि आपमें से कोई सुधीजन इस विषय पर एक गंभीर और विशद लेख लिखते, बजाय फुटकर प्रतिक्रियाओं के। दिलीप जी की बात सही जान पड़ती है तो रवीश की आत्मस्वीकृति भी ठीक है। पर बात को आगे ले जाएं। यहीं मत छोड़ दें।
[...] कुत्ता पुराण और भाषा का जातिवाद [14 May 2010 | 20 Comments | ] डेस्क ♦ रवीश कुमार कुत्तों के [...]
Ravish Ji,Aap ko pata hona chahiye Patrakarita mein Virodhabhaas nahien chalta to phir tommy kyoon,khul ker kehna hi to patrakarita hai,jismein aap sehej hi saksham hain.
रवीश कुमार से ऐसी टिप्पणी की क़तई उम्मीद नहीं थी। आप किसी के विचारों या फिर विचारधारा से असहमत हो सकते हैं लेकिन इसके ये मतलब नहीं कि आप नका इस तरह अपमान करें। लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव देश के नेता है किसी जाति विशेष के नहीं। राजनीति मे इनका अपना एक योगदान है जिसे नकारा नहीं जा सकता। अगर ये दोनों वफादार नहीं हैं तो रवीश बताएं कि राजनीति मे कौन किसका वफादार रहा है। अगर रवीश को ये समझ नहीं आता तो उन्हे भारतीय राजनीतिक इतिहास के पन्ने फिर से पलट कर देखन चाहिए। ये तो शुक्र है कि बहस ब्लॉग औप फेसबुक पर चल रही है। अगर रवीश संसद मे होते तो उनके इन शब्दों को कार्यवाही से निकाल दिया जाता और उन्हे इनके इस्तेमाल के लिए सदन से माफ़ी भी मांगनी पड़ती। मैं दुआ करूंगा कि रवीश संसद में जाएं और फिर ऐसी भाषा बोलकर दिखाएं…।
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