दुनिया के कुछ पेड़ अक्‍तूबर में अपने हरे पत्ते गिराते हैं

आलोकधन्‍वा के साथ एक पूरी दोपहर, एक पूरी शाम



♦ मिथिलेश श्रीवास्‍तव

वह एक दिन बहुत अच्‍छा गुजरा। हमने कोई बड़ा काम नहीं किया, इसलिए बड़े काम कर के इस समाज को उपकृत करने के अहंकार से हम बचे। किसी पर हमने एहसान नहीं किया इसलिए बदले में कुछ पाने की अदले-बदले की भावना नहीं आयी। हमने अपने को साधारण मनुष्‍य समझा और फुटपाथ पर चलते हुए तेज रफ्तार से चलने वाली कारों की ज्‍यादतियां सहीं। गिलहरियां हमारे सामने से गुजरीं, तो हमने उन्‍हें पकड़ने की कोशिश की। अपनी नाकाम कोशिश पर हमें पछतावा नहीं हुआ। गिलहरियां पकड़ना आसान काम नहीं है, हमने ऐसा सोचा। पके हुए केले की दुकान पर केले खरीदने गये लेकिन हमने केले नहीं खरीदे। हर केले में हमें ऐब दिखा। सब्जियों और फलों की मदर डेयरी गये जहां केले, पपीते जैसे फलों को छू कर उनके भीतर की सड़न का पता लगाना चाहा। स्‍पर्श हमारे लिए महत्‍वपूर्ण था। सब्‍जी बेचने वाले को डांटा कि वह फलों में अपने नाखून न गड़ाया करे। दुनिया को स्‍वस्‍थ और बेहतर बनाना है तो फलों और सब्जियों को नाखूनों से बचाना होगा। आलू और प्‍याज पर नजर तक नहीं डाली। नेनुआ को देखा, छुआ और सूंघा। उससे एक अजीब सी देसी गंध आ रही थी। उस गंध ने हमें अपने घर की याद दिला दी जहां हमने अपने बचपन में मड़इयों पर फैली हुई लतरों के भीतर से नेनुए को तोड़ा था। उस समय उनसे वैसी ही गंध आती थी। वह एक ऐसी गंध थी जिसे केवल हम ही पहचान सकते थे। घर की याद में तड़पना एक बड़ी व्‍यथा है। थोड़ी देर के लिए हम इस व्‍यथा से तड़पे। तड़पते हुए हमने कहा – कविता नेनुए की गंध में है। हवा को सूंघ कर दुर्दिनों का पता लगाना चाहा।

मिट्टी के ढूह पर कुत्ते के पांच पिल्‍लों को उछलते-कूदते हुए हमने देखा। कवि मित्र आलोकधन्‍वा को उनसे बेइंतहा डरते हुए देखा। गोमती गेस्‍ट हाउस के प्रांगण में इन पिल्‍लों को देख कर वे भयभीत हुए कि वे गेस्‍ट हाउस में कैसे आएंगे-जाएंगे। पिल्‍ले उन्‍हें काटने को दौड़ेंगे। कुत्ते के पिल्‍लों से एक कवि को डरते हुए देख कर दुनिया में मासूमियत के बचे रहने का यकीन हुआ। मैंने कहा, छोटे बच्‍चे कुत्ते भला कैसे काटेंगे। वे छोटे बच्‍चे कुत्ते बड़े हो रहे हैं। उनके बड़े होने से एक कवि का भय बढ़ रहा था। उनको आश्रय देने वालों को उन्‍होंने मन भर कोसा, और अंत में कहा, “लेकिन ये बच्‍चे कितने सुंदर हैं!”

बाबर लेन के दोनों ओर के पेड़ों को गौर से देखा जो भले ही फल न देते हों, छाया और हरियाली उनके पास है। मन स्‍पर्श की अनुभूतियों से भर जाता है। पेड़ों के नीचे गिरे हुए हरे पत्तों की ढेर देखी। जिज्ञासा यह जानने की हुई कि अक्‍तूबर के महीने में इन पेड़ों से हरे पत्ते कैसे गिरे। सड़क से गुजरने वाले सभी अजनबियों और निवासियों से पत्तों के गिरने का कारण हमने पूछा। बच्‍चों से पूछा कि पत्ते कैसे गिरे। किसी को कुछ नहीं पता था। क्‍या अक्‍तूबर के महीने में पेड़ अपने हरे पत्ते गिराते हैं? पतझड़ के महीने में पीले पत्तों को पेड़ों से टूटते और गिरते हमने खूब देखा है। हमने कहा, किसी ने पेड़ों को जोर से झकझोरा होगा। झकझोरने से हरे पत्ते नहीं गिरते। पेड़ सुंदर दिखें इसलिए उनकी टहनियों की कटाई-छंटाई की जाती है। पेड़ों पर कटाई-छंटाई के निशान नहीं थे। हमने यह आविष्‍कार किया कि दुनिया के कुछ पेड़ अक्‍तूबर महीने में अपने हरे पत्ते गिराते हैं। इस आविष्‍कार पर हम थोड़ा इठलाये। हम अर्थात मैं और आलोकधन्‍वा। इस पहेली का यही समाधान हमें अच्‍छा लगा।

हमने उस आदमी को याद किया जो कमल के सुंदर फूल को देख कर तैरना भूल गया और डूबने, डूबने को हो गया। हमने उस घटना को याद किया जब दूरदर्शन पर आलोकधन्‍वा को बोलना सुनते हुए उनसे अगला प्रश्‍न करना मैं भूल गया। हमने उस दोस्‍त को याद किया, जो गिलहरी के जीवन जैसा सरल और साधारण जीवन जीना चाहता है। हमने उन तमाम जहीन दोस्‍तों को याद किया जो शक्ति के रास्‍ते कभी नहीं चले, जो सत्ता के केंद्रों से दूर खड़े रहे और एक साधारण जीवन जीते हुए अपने लिए हाशियों को पसंद किया। आलोकधन्‍वा की कविता “किसने बचाया मेरी आत्‍मा को” को याद किया। दो कौड़ी की मोमबत्तियों, उबले हुए आलू, मि‍ट्टी के बर्तनों, नुक्‍कड़ नाटक के आवारा छोकरों, जंगली बेर सरीखी चीजों के प्रति अपना आभार व्‍यक्‍त किया। जल्‍दी उतर आयी जाड़े की रात का आभार व्‍यक्‍त किया, जिसने हमें और चलने से बचाया।

(मिथिलेश श्रीवास्‍तव। कवि-संस्‍कृतिकर्मी। अखबारों-पत्रिकाओं में नाट्य समीक्षाएं, सांस्‍कृतिक रपटें। आधार प्रकाशन से छपी कविता पुस्‍तक किसी उम्‍मीद की तरह से चर्चा में आये। दिल्‍ली में रहते हैं। उनसे 9868628602 पर संपर्क किया जा सकता है।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *