कोडरमा के “खाप” में सारे सनातनी एक साथ



♦ रीतेश

अपने एक गुरुजी कहा करते थे कि सच बोलने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि आपको याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती कि आपने क्या कहा था और कब कहा था। झूठ बोलने में सबसे बड़ा झंझट है कि आपको हमेशा ये याद रखना होता है कि आपने कब, किससे, क्या कहा था। निरुपमा पाठक हत्याकांड में पाठक परिवार हालांकि सम्मिलित रूप से झूठ बोल रहा है बावजूद इसके निरुपमा के पापा कुछ कहते हैं तो उनकी माता कुछ और। ये उन दोनों के बयान, मुकदमों की कॉपी से भी साबित हो जाता है। वो झूठ इसलिए नहीं बोल रहे हैं कि झूठ बोलना उनकी फितरत है। उनकी दिक्कत ये है कि सच से बचने के लिए वो जो कह रहे हैं, उसे याद नहीं रख पा रहे हैं कि उन्होंने सोमवार को क्या कहा, मंगलवार को क्या कहा या बुधवार को क्या कहा था। नतीजा हुआ है कि वो पहले दिन कुछ कहते हैं और तीसरे दिन कुछ और। झूठ बोलने का नुकसान यही है।

सच बोलते तो हमेशा एक जैसी बातें करते जैसे प्रियभांशु रंजन ने किया। उसने अंतरंग संबंध कबूल किया लेकिन ये भी कहा कि उसे नहीं पता था कि नीरू मां बनने वाली थी। पुलिस वाले बहुत परेशान हुए, उन्होंने प्रियभांशु से भी कई बार पूछा, घुमा-घुमाकर पूछा लेकिन उसका जवाब एक ही था क्योंकि उसे सचमुच नहीं मालूम था। जब यहां पेंच फंसा तो कुछ अखबारों ने महिला डॉक्टरों से बातचीत करके ये बताया कि मेडिकल कारणों से संभव है कि गर्भ के बारे में नीरू को ही पता न हो। ये बात फिर भी कई की समझ में नहीं आ रही। बहरहाल, आईआईएमसी एल्युमनी एसोसिएशन और निरुपमा को न्याय अभियान से जुड़े हजारों लोगों को यकीन है कि प्रियभांशु रंजन सच कह रहा है। निरुपमा की हत्या हुई है और हत्या उसके घर के लोगों ने ही की है या करवाई है और वो सुसाइड नोट की आड़ में सच छुपा रहे हैं।

कोडरमा के प्रभावशाली पाठक परिवार के बयानों से हम विचलित नहीं होंगे। 7 मई को एक ही दिन में जेल से कोर्ट और कोर्ट से थाना तक का सफर तय करने वाली सुधा पाठक की शिकायत ने देश के कई बड़े वकीलों को हैरत में डाल दिया। सीजेएम साहब ने उस शिकायत पर आदेश जारी करने से पहले पुलिस से रिपोर्ट क्यों नहीं मांगी, ये सवाल हर किसी के मन में है। इस शिकायत के आधार पर दर्ज मामले में प्रियभांशु रंजन पर बलात्कार, शादी का झांसा देकर संबंध बनाने और खुदकुशी के लिए निरुपमा को उकसाने या मजबूर करने का आरोप लगाया गया है।

हमारा 200 फीसदी यकीन है कि निरुपमा की हत्या की गयी है। बावजूद, उसके परिवार के खुदकुशी के दावे को पुलिस की जांच वैज्ञानिक तरीके से अगर साबित कर भी देती है तो भी आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप, उसकी जवाबदेही पाठक परिवार पर बनती है, न कि प्रियभांशु रंजन पर। पाठक परिवार को ये सलाह किसी वकील साहब ने दी होगी कि प्रियभांशु रंजन को मुकदमे में लपेटो क्योंकि हत्या के मामले में वह अहम गवाह होगा। बाद में समझौता करके उसे बरी कर देना और खुद भी बच लेना। निरुपमा को न्याय अभियान पाठक परिवार के वकीलों को साफ करना चाहता है कि ये अभियान ऐसा कोई समझौता नहीं होने देगा और निरुपमा को न्याय दिलाने की लड़ाई में कोई भी गवाह हॉस्टाइल नहीं होगा। अगर ऐसी किसी कोशिश में प्रियभांशु भी पाठक परिवार से हाथ मिलाते नजर आए तो उनके खिलाफ भी लड़ाई लड़ी जाएगी क्योंकि यह अभियान निरुपमा को न्याय दिलाने की जिद के साथ शुरू हुआ है।

पाठक परिवार के प्रभाव में कोडरमा के दो-तीन पत्रकार ‘सूत्रों का कहना है, बताया जाता है’ जैसी लफ्फाजी के साथ तथ्यों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। जिस एसएमसएस को आखिरी एसएमएस बताया जा रहा है, वो एसएमएस प्रियभांशु को 28 अप्रैल की रात 8 बजे से मिलना शुरू हो गया था और 29 अप्रैल की सुबह 5:39 बजे जब वही एसएमएस आया तो वह तीसरी बार था। कोडरमा पुलिस के अधिकारी शिव प्रसाद जब दिल्ली आए थे तो उन्होंने पूछताछ के दौरान बुलाए गए बच्चों को नसीहत दी कि बच्चों को घर वालों की मर्जी से शादी करनी चाहिए, दूसरी जाति में शादी नहीं करनी चाहिए, उनकी भी एक बेटी और एक बेटा है, अगर वो निरुपमा की तरह करेंगे तो उन्हें भी ये मंजूर नहीं होगा। ऐसी घटिया सोच वाले अधिकारियों के दम पर मामला सुलझाने निकली राज्य पुलिस क्या खोजेगी, क्या निकालेगी, ऊपर वाले को ही पता होगा।

कोडरमा में कोई चुनाव हो रहा है तो राजनीतिक दलों के नेता भी इस मामले में पाठक परिवार के साथ नाइंसाफी की आवाज उठा रहे हैं। ये उनकी राजनीति है। हमने राजनीति को अब तक इसमें शामिल नहीं किया है। लेकिन निरुपमा को न्याय दिलाने के लिए हमें राजनेताओं के दरवाजे खटखटाने और उनसे मदद मांगने से कोई परहेज नहीं है। कोडरमा के कांग्रेस जिलाध्यक्ष ओझा साहब प्रियभांशु को तुरंत गिरफ्तार करने की मांग कर रहे हैं जबकि कांग्रेस के राज्य प्रभारी केशव राव पाठक परिवार के प्रभाव को देखते हुए मामले की सीबीआई से जांच की वकालत कर रहे हैं। निरुपमा को न्याय अभियान की तरफ से कोडरमा खाप पंचायत को उनकी नैतिकता और सनातनी सोच मुबारक हो। निरुपमा को न्याय दिलाने के लिए हम सर्वोच्च न्यायालय तक जाएंगे। रास्ते में पाठक परिवार के साथ कोडरमा का सर्वदलीय खाप भी आता है तो हमें परवाह नहीं है।

निरुपमा की हत्या हुई है, यह साबित करने के लिए इतने सारे सबूत हैं कि हमें यकीन है कि पूरे देश के सनातनधर्मी एकजुट हो जाएंगे तो भी पाठक परिवार को नहीं बचा पाएंगे क्योंकि कानून की लड़ाई सनातनी नैतिकता की दुहाई पर नहीं, तथ्य और सबूत पर लड़ी जाएगी। हम जीतेंगे, निरुपमा के हत्यारे हारेंगे क्योंकि इसके बिना निरुपमा की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। निरुपमा की लड़ाई हमारे लिए सत्येंद्र दुबे और मंजूनाथ की लड़ाई है और हम अपील करते हैं कि आईआईएम और आईआईटी के मित्र भी हमारी मदद करें क्योंकि निरुपमा धार्मिक भ्रष्टाचार से लड़ते हुए शहीद हुई है।

आज की यह पोस्ट तथ्य कम और भाषण ज्यादा है, इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। शनिवार को निरुपमा को न्याय अभियान हत्याकांड से जुड़े उन सबूतों के आधार पर सिर्फ ठोस बात रखेगा, जो सबूत सबके सामने हैं। पाठक परिवार से प्रभावित लोग उन सबूतों को नजरअंदाज करके नैतिकता की रट लगाए बैठे हैं। पुलिस की जांच में सामने आई ऐसी कोई चीज जो हमारी जानकारी में नहीं है, वो जाहिर तौर पर इसमें शामिल नहीं होगी।

ritesh(रीतेश निरुपमा को न्याय अभियान से जुड़े हैं और निरुपमा पाठक जिस संस्थान में पढ़ाई के दौरान प्रियभांशु रंजन के करीब आयीं, उस संस्थान के पुराने छात्रों के संगठन आईआईएमसी एल्युमनी एसोसिएशन की ऑनलाइन गतिविधियों को संचालित करते हैं। रीतेश से riteshiimc@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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