निरुपमा के जाने के बहुत बाद, जब गुबार थम जाए

♦ दिलीप मंडल



निरुपमा की हत्या का विरोध करके और उसके हत्यारों को सजा दिलाकर क्या हम कई और निरुपमाओं की होनेवाली हत्याओं को रोक पाएंगे? निरुपमा की हत्या के आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले, यह हममें से ज्यादातर लोग चाहते होंगे। लेकिन यह मामला कुछ व्यक्तियों के अपराध से कहीं बड़ा है। निरुपमा पाठक दिल्ली के एक अखबार में पत्रकार थीं और सिविल सर्विस की परीक्षा पास करके नौकरशाह बनना चाहती थीं। उसे अपने साथ पढ़े एक युवक और पत्रकार प्रियभांशु रंजन से प्रेम था और दोनों शादी करना चाहते थे। लेकिन निरुपमा के परिवार वालों को जाति व्यवस्था के क्रम में कहीं नीचे आने वाले युवक के साथ निरुपमा की शादी की बात पसंद नहीं थी। निरुपमा की पिछले दिनों झारखंड के तिलैया शहर में उसके घर में ही हत्या कर दी गयी। तीन सदस्यीय मेडिकल बोर्ड द्वारा किये गये पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के आने के बाद निरुपमा के परिवार वाले संदेह के दायरे में हैं, और पुलिस ने निरुपमा की माता को गिरफ्तार किया है। इस घटना को लेकर सभ्य समाज में व्यापक क्षोभ है। लेकिन तात्कालिक शोक और क्रोध के बाद अब इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि क्या इसे एक परिवार द्वारा किया गया अलग-थलग अपराध माना जाए। अगर कोई ऐसा सोचता है कि दोषी सिर्फ एक परिवार है और उसे सजा दिलाना पर्याप्त है तो वह अगली निरुपमा की हत्या पर इसी तरह चौंकेगा और फिर इसी तरह का गुस्सा उसके मन में आएगा।

जब निरुपमा कांड का गुबार थम जाएगा और अगर कोई पूछेगा कि किसी की बेटी किसी नीच जाति के युवक के साथ रिश्ते बनाने के बाद गर्भवती होकर घर लौटे और गर्भपात के लिए तैयार न हो, तो वह क्या करेगा, तो सोचिए कि ऐसे सवालों का जवाब किस तरह दिया जाएगा। ऐसे सवाल इस समय भी इंटरनेट पर पूछे जा रहे हैं। निरुपमा की हत्या का विरोध करने वालों से पूछा जा रहा है कि अगर निरुपमा की जगह आपकी बेटी होती, तो क्या आप तालियां बजाते। ऐसे प्रश्नों का उत्तर तात्कालिकता से परे ढूंढना होगा। अगर आने वाले दिनों में और कई निरुपमाओं की जान बचानी है तो उस वर्ण व्यवस्था की जड़ों को काटने की जरूरत है, जिसकी अंतर्वस्तु में ही हिंसा है। निरुपमा की हत्या करने वाले आखिर उस वर्ण व्यवस्था की ही तो रक्षा कर रहे थे, जो हिंदू धर्म का मूलाधार है। अंतर्जातीय शादियों का निषेध वर्ण-संकर संतानों को रोकने के लिए ही तो है।

वर्ण व्यवस्था समाज के ज्यादातर लोगों को बराबर का इंसान मानने से इनकार करती है। यहां तक कि यह व्यवस्था एक सवर्ण को दूसरे सवर्ण से नफरत करने को कहती है और बच्चों तक में ये भाव भरती है कि कायस्थों से बनिये श्रेष्ठ हैं, बनियों से ठाकुर श्रेष्ठ है और ठाकुरों की तुलना में ब्राह्मण उच्च हैं। ब्राह्मणों के अंदर भी वर्णव्यवस्था भेद करती है। बड़ी धोती, छोटी धोती, से लेकर पुजारी, अपुजारी और श्मशान के पुजारी आदि के बीच भी भेद कम गहरा नहीं है। शादी के विज्ञापनों में ब्राह्मण सिर्फ ब्राह्मण नहीं ढूंढता, वह अक्सर किसी खास कटेगरी का ब्राह्मण ढूंढता है। अपने से नीच ब्राह्मण भी उसे स्वीकार्य नहीं है। वर्ण व्यवस्था निरुपमा के प्रेमी की जाति को ‘सवर्णों की सबसे नीची जाति’ कहकर चिन्हित करती है। ये व्यवस्था भेद पैदा करती है, नफरत पैदा करना सिखाती है, ये व्यवस्था निरुपमाओं का भक्षण करके जिंदा है। वर्ण व्यवस्था सिर्फ दलितों और पिछड़ों का हक नहीं मारती, निरुपमा को भी मारती है। यह जरूर है कि निरुपमाओं को तो वह कभी-कभी मारती है, लेकिन वर्ण व्यवस्था हर रोज पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के जीने का हक मारती है।

धर्मेंद्र पाठक (दिवंगत निरुपमा के पिता) और उनके परिवार ने अगर निरुपमा की हत्या की है तो भारतीय दंड संहिता के हिसाब से यह बेशक गुनाह है, लेकिन निरुपमा की शादी रोकने का उनका कृत्य धर्मशास्त्रों के हिसाब से गलत नहीं है। सनातन धर्म की कोई भी व्याख्या निरुपमा पाठक और प्रियभांशु रंजन के विवाह को सही नहीं ठहराती। इस मामले में धर्मेंद्र पाठक ने निरुपमा को लिखी चिट्ठी में जो कहा है, उसमें धर्मशास्त्रों की दृष्टि से कुछ भी गलत नहीं है। धर्मेंद्र पाठक ने लिखा है कि किसी कन्या का अपने से नीच वर्ण के पुरुष के साथ विवाह करना सनातन धर्म के विरुद्ध है। धर्मेंद्र पाठक ने गलत नहीं लिखा है। जिसे भी इस बारे में शक हो, वो सनातन धर्म के किसी भी ज्ञानी या व्याख्याकार से पूछ लें, उनका संदेह दूर हो जाएगा। कुछ लोग धर्मेंद्र पाठक की चिट्ठी को वृद्ध लाचार पिता की गुहार और बिगड़ गयी बेटी को समझाने की कोशिश बता रहे हैं, तो यह चौंकाने वाली बात नहीं है।

सनातन धर्म नीची जाति के युवक और ऊंची जाति की कन्या के विवाह (प्रतिलोम विवाह) की अनुमति नहीं देता। पुराणों, उपनिषदों में हुई एक भी शादी प्रतिलोम विवाह को मान्य करती नहीं मिलेगी। ऐसी शादी वर्णाश्रम व्यवस्था को नष्ट कर देगी, इसलिए प्रतिलोम शादियों को लेकर सनातनी विचारकों में इतनी उग्रता है। प्रतिलोम शादियां (ब्राह्मण कन्या और कायस्थ पुरुष के विवाह की व्याख्या धर्मेंद्र पाठक इसी रूप में कर रहे हैं) जाति व्यवस्था की मूल स्थापना के विरुद्ध है। उच्च वर्ण के लोगों की रक्त शुद्धता, जाति व्यवस्था का मूलाधार है। इसलिए हिंदू धर्म अंतर्जातीय विवाह को मान्यता नहीं देता। वह देवदासी व्यवस्था को मान्यता देता है क्योंकि इसमें ब्राह्मण पुरुष और लगभग सभी मामलों में पिछड़ी और दलित जाति की महिलाओं के संबंध से पैदा होने वाली संतानों को वंश परंपरा का हिस्सा नहीं माना जाता। इस तरह के दैहिक संबंधों में छूत-अछूत का भेद भी नहीं होता। रखैल कही जाने वाली औरतें और वेश्याओं में जातिभेद नहीं किया जाता। ब्राह्मण पुरुष सिर्फ ब्राह्मण वेश्याओं के पास जाए, ऐसा कहीं वर्णित नहीं है। नीची जाति की वेश्या के पास से लौटने के बाद किसी तरह की शुद्धि, स्नान, यज्ञ, हवन आदि की आवश्यकता के बारे में धर्मग्रंथ नहीं बताते। विजातीय व्यभिचारों से धर्म कभी खतरे में नहीं पड़ता।

वंश परंपरा में रक्त शुद्धता की चिंता सनातन धर्म को खूब है। इसलिए नैतिकता और यौन शुचिता के सभी नियम (हां, सभी) सिर्फ महिलाओं को लक्षित करके बने हैं। सनातन धर्म आम राय से कहता है कि बालिका का विवाह रजस्वला होने से पहले अवश्य कर देना चाहिए, ताकि उसके प्रदूषित होने का खतरा न रहे। भारत में विवाह के लिए कन्या की न्यूनतम उम्र तय करते समय इस बात को लेकर भारी विवाद रहा और सनातनी हिंदू नेतृत्व ने इस कानूनी प्रावधान के विरोध में जबर्दस्त अभियान चलाया था। यौन संबंधों के लिए न्यूनतम वैधानिक आयु के निर्धारण का भी इस आधार पर विरोध किया गया था। यह सब अंग्रेजी राज के समय की बात है। लेकिन निरुपमा हत्याकांड जैसी घटनाओं से लगता है कि सनातनी सोच अब भी किसी ठहरे पानी की तरह ही है।

स्त्रियों की यौन शुचिता को लेकर हिंदू धर्म काफी सख्त है। धर्मग्रंथों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत महिलाओं का पुनर्विवाह हो सके। इसके पीछे तर्क यह है कि जब विवाह के बाद कन्या, कन्या ही नहीं रहती, तो कन्यादान कैसे संभव है। इसी कारण से विधवा विवाह भी अधार्मिक माना गया है। स्त्रियों के बिगड़ जाने से रोकने के लिए हिंदू धर्म बेहद चिंतित रहता है। लेकिन पुरुषों के विवाहेतर व्यभिचार से लिए हिंदू धर्म उन्हें किसी तरह की सजा नहीं देता। हिंदू धर्म की एक भी किताब या संहिता स्त्रियों से यह नहीं कहती कि व्यभिचारी पति को तलाक दे देना चाहिए। हिंदू धर्म व्यभिचार को लेकर चिंतित नहीं है क्योंकि व्यभिचार से पैदा होने वाली संतानें वंश परंपरा में नहीं आतीं। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रहे डॉक्टर धर्मवीर ने कामसूत्र की संतानों की पूरी व्याख्या की है।

हिंदू धर्म व्यभिचार को इस हद तक मान्यता देता है कि व्यभिचार के आरोप के साबित होने पर भी सहजता से तलाक नहीं मिल सकता। फैमिली कोर्ट ऐसे मामलों में सुलह-सपाटे की ही कोशिश करता है। अगर वंश परंपरा सार्वजनिक रूप से खंडित न हो तो बाबाओं के आशीर्वाद से बच्चे पैदा होने को भी परिवारों में नैतिक मान लिया जाता है। पुत्र कामेष्टि यज्ञ नैतिक है। वेश्याओं की संतानों से धर्म खतरे में नहीं पड़ता। लेकिन दो अलग अलग जातियों के युवाओं की शादी से पैदा होने वाली संतानें अनैतिक हैं और इसे रोकना हर धार्मिक व्यक्ति का सनातन कर्तव्य है। सात जन्म के बंधनों में बंधे लोग इसी जन्म में यौन बाजार में छुट्टे सांड की तरह घूम सकते हैं और उन्हें न कानून रोकता है, न धर्म। लेकिन जब बात बेटी के अंतर्जातीय विवाह की हो तो हिंदू धर्म से इतनी उदारता की उम्मीद मत कीजिए। धर्मेंद्र पाठक अपनी चिट्ठी में सही कहते हैं। धर्म ऐसे लोगों का नाश कर देता है। इसलिए लड़ाई धर्मेंद्र पाठक से तो है ही, उस धार्मिक कही जाने वाली वर्ण व्यवस्था से भी है, जो निरुपमा की हत्या को वैचारिक-धार्मिक आधार देती है।

इसलिए निरुपमा पाठक जैसों को बचाने की को लड़ाई एक परिवार से लड़कर नहीं जीती जा सकती। ये नया, बेहतर और न्यायसंगत आधुनिक समाज बनाने की लड़ाई है, जहां निरुपमा पाठक जैसों को यह नैतिक और धार्मिक अधिकार होगा कि वह किसी दलित से भी शादी करने की इच्छा का इजहार कर सके और इस वजह से उसकी जान लेने के बारे में कोई न सोचे।

dilip mandal(दिलीप मंडल। सीनियर टीवी जर्नलिस्‍ट। कई टीवी चैनलों में जिम्‍मेदार पदों पर रहे। अख़बारों में नियमित स्‍तंभ लेखन। दलित मसलों पर लगातार सक्रिय। यात्रा प्रिय शगल। इन दिनों अध्‍यापन कार्य से जुड़े हैं। उनसे dilipcmandal@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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