झारखंड में “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है”




♦ शेष नारायण सिंह

भारतीय कुश्ती में एक दांव होता है, धोबीपाट। इस दांव में खिलाफ पहलवान को पता ही नहीं चलता कि क्या होने वाला है और जब उसे पता चलता है कि मुकाबले में धोबीपाट इस्तेमाल हो रहा है, तब तक वह हार चुका होता है। यह दांव मुकाबला जीतने का बहुत ही मुकम्मल तरीका है। अवध और पूर्वी उत्तर प्रदेश में धोबीपाट के जानकार बहुत सारे पहलवान पाये जाते हैं। अब पता चला है कि झारखंड में भी धोबीपाट का एक माहिर है, जिसने एक साथ राष्ट्रीय स्तर के दो पहलवानों को धोबीपाट की कला का जायका दिखा दिया है और दोनों ही पहलवान दिल्ली की गर्मी में अपने घाव चाट रहे हैं। मेरी मुराद बीजेपी और कांग्रेस पार्टियों से है, जो आजकल शिबू उस्ताद की लपेट में हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने जिस तरह से रांची में बीजेपी को चित्त किया है, उसे भगवा पार्टी के लोग बहुत दिन तक नहीं भुला पाएंगे। यही हाल कांग्रेस का भी है। कांग्रेसी अभी तो समझ रही है कि उसने मुकाबला जीत लिया है लेकिन ये उनका मुगालता ही माना जाएगा क्योंकि कांग्रेस को तो शिबू सोरेन कई बार औकातबोध करवा चुके हैं। शिबू उस्ताद ने खेल में कांग्रेस को भी घेर लिया है, लेकिन उसको अभी अंदाज नहीं है कि क्षेत्रीय राजनीति के बड़े खलीफा से उनका पाला एक बार फिर पड़ गया है।

झारखंड का विधानसभा चुनाव बीजेपी ने पूरी तरह से शिबू सोरेन के विरोध के नाम पर लड़ा था। पूरे चुनाव में बीजेपी के उम्मीदवार शिबू सोरेन को गरियाते रहे थे लेकिन जब सरकार बनाने की बारी आयी तो बीजेपी वाले शिबू की दर पर दस्तक देते नजर आने लगे। बीजेपी की मदद से शिबू सोरेन ने गद्दी संभाल ली। जानकार बताते हैं कि शिबू सोरेन को उम्मीद थी कि बीजेपी वाले उनका एहसान मानेगें कि झारखंड की राजनीति के पितामह ने उन्हें मौका दिया। लेकिन बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व को लगता था कि उन्होंने कृपा करके शिबू को मुख्‍यमंत्री बनवा दिया है। ऐसा नहीं था। शिबू को मालूम था कि बीजेपी के नेताओं पर ऊपर यानी नागपुर से दबाव है कि झारखंड में सरकार में रहना जरूरी है क्योंकि बीजेपी के नागपुर वाले आका चाहते थे कि राज्य में संघ के लोग सरकार में रहें, जिससे ईसाई मिशनरियों के काम को रोका जा सके और अपने वनवासी कार्यक्रम को गति दी जा सके। बनवासी कार्यक्रम से आदिवासी इलाकों में बीजेपी को बहुत फायदा होता है। छत्तीसगढ़ में इस योजना से भारी राजनीतिक लाभ हुआ है। यह बात शिबू सोरेन को भी मालूम थी लेकिन बीजेपी के दिल्ली वाले नेता लोग नहीं जानते थे कि शिबू सोरेन सब कुछ जानते हैं। बीजेपी के धीरज की परीक्षा लेने के लिए लोकसभा में बीजेपी के कट मोशन के खिलाफ शिबू सोरेन ने कांग्रेस को वोट दे दिया। बीजेपी के शहरी नेता अलप हो गये। फौरन धमकी जारी की कि शिबू सोरेन की सरकार को दिया गया समर्थन वापस ले लिया जाए। शिबू सोरेन के महत्वाकांक्षी बेटे हेमंत ने भी दिलचस्‍पी लेनी शुरू कर दी और बीजेपी वाले शेखी में आ गये।

झारखंड की राजनीति के जानकार बताते हैं कि जब शिबू सोरेन ने अपने बेटे के साथ जाकर बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी से माफी मांग ली थी, तो बीजेपी को एक मौका मिला था कि समर्थन वापसी के दलदल से बच निकलते, उन्हें माफ कर देते। लेकिन पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को कुछ भी अंदाज नहीं था। ऐंठे रहे और आज कहीं के नहीं रह गये। अब बीजेपी के 18 विधायक सत्ता पक्ष में नहीं हैं। समर्थन वापसी हो चुकी है। बीजेपी विधायक दल के कई सदस्य शिबू सोरेन के अखाड़े के ही पहलवान हैं यानी उन्होंने राजनीति की बुनियादी शिक्षा शिबू सोरेन के चरणों में बैठ कर ही हासिल की है। इस बात को तो निश्चित माना जा रहा है कि उनमें से कई विधायक अपनी पार्टी छोड़कर शिबू सोरेन के साथ चले जाएंगे। हालांकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पूरी पार्टी ही गुरु के चरणों में जा गिरे जैसा कि सन 1980 में हरियाणा में भजन लाल ने किया था। बहरहाल झारखंड में बीजेपी नाम की पार्टी सत्ता से बाहर है लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि उसके टिकट पर चुनाव जीतकर आये विधायक भी सत्ता से बाहर रहेंगे।

इस बीच कांग्रेस ने बिग ब्रदर का रोल हासिल करने की कोशिश शुरू कर दी है। उनकी कोशिश है कि उनके साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले, झारखंड के पूर्व मुख्‍यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा के अध्यक्ष, बाबूलाल मरांडी को आगे करके शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया जाए और बाबूलाल मरांडी को राज्य में कांग्रेस की हैसियत बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाए। कांग्रेस को जो भी यह सलाह दे रहा है, उसे झारखंड की राजनीति की भूलभुलैया का पता नहीं है। पहला तो यह कि झारखंड राज्य के आंदोलन के समय से ही उस इलाके के लगभग सभी बड़े नेता सोरेन के साथ रह चुके हैं। दूसरी बात यह है कि अपने लोगों के बीच यह लोग इतने सम्मान के पात्र हैं कि दिल्ली के बाबू लोग इनका इस्तेमाल करने की सोच कर बेवकूफी कर रहे हैं। शिबू सोरेन केवल इतना लचकने को तैयार हैं कि उनकी जगह पर उनका बेटा मुख्यमंत्री बन जाए, इससे ज्यादा कुछ नहीं। और यह काम बाबूलाल मरांडी के बिना भी हो सकता है बशर्ते कांग्रेस इस खेल में शामिल होने को तैयार हो।

बाबूलाल मरांडी अब इस जोड़तोड़ के खेल से बहुत आगे निकल आये हैं। पत्रकारों के एक दल को उन्होंने बताया कि वे किसी भी जोड़तोड़ वाली सरकार का हिस्सा बनने को तैयार नहीं हैं। ऐसा लगता है कि झारखंड की राजनीति की जमीनी हकीकत उनके इस आत्मविश्वास को सही ठहराने के लिए तत्पर है। बाबूलाल मरांडी बहुत मजबूत हो चुके हैं और वे किसी और के खेल में शामिल होने को तैयार नहीं हैं। लगता है कि अब वे अपना ही काम करने के मूड में हैं। पिछले हफ्ते ही उन्होंने रांची में एक बहुत बड़ा अधिवेशन किया जो उनकी पार्टी “झारखंड विकास मोर्चा” का पहला बड़ा राष्ट्रीय अधिवेशन था। उन्होंने बताया कि पिछले चार साल से झारखंड के गावों में घूम घूम कर उन्होंने लोगों को तैयार किया है कि दिल्ली वाली पार्टियां बड़े औद्योगिक घरानों से मिलकर राज्य की सारी खनिज संपदा को लुटा देंगी। इसलिए राज्य के लोगों को अपने हित की नीतियां बनाने के लिए अपनी राजनीतिक पार्टी का सहारा लेना पड़ेगा।

पिछले 4 वर्षों में वे राज्य के हर गांव में गये और उनके सम्मलेन में 5500 गांव की उनकी पार्टी की इकाइयों के लोग मौजूद थे। दो दिन तक चले इस सम्मलेन में झारखंड विकास मोर्चा के करीब एक लाख ग्रामीण स्तर के नेता जमे रहे। जाहिर है बाबूलाल मरांडी अगले साल भर के अंदर चुनाव की तैयारी में हैं। उन्होंने इस बात को ऐलानिया कहा भी क्योंकि उन्हें मालूम है कि अब जब भी झारखंड में चुनाव होगा, उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी होगी। इसका मतलब यह हुआ कि कांग्रेस को अब यह मुगालता दिमाग से निकला देना चाहिए कि राज्य में बाबूलाल मरांडी कांग्रेसी राजनीति करेंगे। उनकी अपनी दुकान सज चुकी है और उनके अधिवेशन में जुटी भीड़ से यह अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है कि झारखंडी अवाम उनकी बातों पर विश्वास कर रहा है।

ऐसी हालत में साफ नजर आ रहा है कि झारखंड की राजनीतिक जमीन पर अब वहां की मुकामी पार्टियां ही काम कर पाएंगी। राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों को अब झारखंड में उसी भूमिका में आना होगा, जिसमें वे उत्तर प्रदेश में हैं। आज शिबू सोरेन को नैतिकता की राजनीति वाले चाहे जितना गरिया लें, लेकिन उन्होंने झारखंड की अस्मिता को एक पहचान दी है और उसको अब स्थानीय महत्वाकांक्षाओं को सम्मान देने वाली राजनीतिक पार्टियों की दरकार है। और यह काम शिबू सोरेन, अर्जुन मुंडा, बाबूलाल मरांडी या कोई भी आदिवासी नेता बखूबी अंजाम दे सकता है। लगता है कि झारखंड में अब देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों को फिर से लोगों का विश्वास हासिल करने में बहुत वक्त लगेगा। लेकिन अभी तो फिलहाल दोनों ही बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के लिए शिबू सोरेन की राजनीति से लगे घाव चाटने का वक्त है।

shesh narayan singh(शेष नारायण सिंह। मूलतः इतिहास के विद्यार्थी। पत्रकार। प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया। 1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की। महात्‍मा गांधी पर काम किया। अब स्‍वतंत्र रूप से लिखने-पढ़ने के काम में लगे हैं। उनसे sheshji@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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