जनता को बेवकूफ न बनाएं माननीय बाबूलाल मरांडी!

♦ संदीप कुमार
(दिल्ली में ही रहकर)

यह आलेख अविनाश के रांची प्रवास में बाबूलाल मरांडी से बातचीत के आधार पर लिखी गयी रिपोर्ट की प्रतिक्रिया में लिखा गया है और यह बाबूलाल मरांडी की गतिविधियों पर शुरू हुई बहस का एक पक्ष भी है : मॉडरेटर



अविनाश रांची से लौटकर आये। बाबूलाल की संगत-पंगत में बैठकर। कई बार जब आप (पत्रकार होने के नाते) किसी के साथ नजरें मिलाकर बात करते हो तो फिर लिखते वक्त बहुत ज्यादा दीदा-बिदोर (न समझने वाले इसे ‘एहसानफरामोशी’ के आसपास का कोई मायने-मतलब समझ लें…) नहीं कर पाते। आना-काना नजरअंदाज कर गुडी-गुडी बातें लिख-बक देते हैं।

मैं पक्के तौर पर ये नहीं कह रहा और न ही कह पाने की हालत में हूं कि अविनाश ने इसी फॉर्मूले को फॉलो किया होगा। स्कूली दिनों से ही अविनाश को मैं एक बखियाउधेड़ (!) पत्रकार के तौर पर जानता-पढ़ता रहा हूं इसलिए उनकी बाबूलाल-कथा को ‘प्रेम-विनय’ पत्रकारिता-वत्रकारिता के खांचे में रखने में मुझे संकोच हो रहा है। ऐसे भी उनके लिखे पर बहुत ज्यादा लेकिन-बल्कि-किंतु-परंतु करने की न तो मेरे पास समझ है और न ही सबूत।

खैर, इन बातों को बीच बहस में बिलखने-बिलबिलाने के लिए छोड़ देते हैं और बाबूलाल पर गौर करते हैं। बाबूलाल मरांडी को बचपन से बूझने की कोशिश कर रहा हूं। और मात भी खाता रहा हूं। बाबूलाल गृह जिले (गिरिडीह) के ही हैं और साथ ही अपने सांसद भी हैं। कोडरमा लोकसभा सीट से (मेरा कस्बा बगोदर, गिरिडीह जिला में आता है और संसदीय क्षेत्र कोडरमा हो जाता है) जब वो पहली बार 2004 में सांसदी का चुनाव लड़ने आये थे तो बीजेपी से एक तरह से ‘दर-बदर’ कर दिये गये थे और सीएम की कुर्सी भी छीन ली गयी थी। लेकिन भगवा-भक्तपना गया नहीं था इसलिए पार्टी के टिकट पर लड़ने गृह-संसदीय क्षेत्र (कोडरमा) आ गये। इससे पहले वो दुमका में दिशोम गुरु शिबू सोरेन और उनकी पत्नी रूपी सोरेन का दम निकाल चुके थे। उन दिनों अपनी लड़कपन की पत्रकारिता चल रही थी। दिल्ली वाला माहौल तो होता नहीं कि हाई-प्रोफाइल को केवल पीआईबी वाले ही कवर करेंगे, सो अपने भी गुलजार वाले दिन थे। बाबूलाल से लेकर गुरुजी तक को कवर करने का मौका मिल गया। और कुछ-कुछ इन्हें समझने का भी।

ऐसे पहली बार बाबूलाल को भर नजर देखने का मौका मिला था 14 नवंबर 2000 की दोपहरी को। रांची जा रहे थे। देर रात झारखंड की संवैधानिक पैदाइश होने वाली थी और बाबूलाल झारखंड के पहले ‘माय-बाप’ का तमगा हासिल करने जा रहे थे। रास्ता बगोदर से ही होकर जाता था। थाने के पास बायपास कट पर ही मजमा लगाया गया। बाबूलाल के सिर तक गेंदा फूल की मालाएं रोप दी गयीं। कॉलेज के दिन थे वो। तब सोचा नहीं था कि चार साल बाद इस शख्स को रिपोर्ट करने का मौका मिलेगा।

2004 के अप्रैल की तपतपाती गर्मी थी। लोकसभा चुनाव की कंपेनिंग चल रही थी। बाबूलाल पूरे दिन बगोदर के आसपास के गांवों में घूमने वाले थे। उन दिनों प्रभात खबर में ‘प्रत्याशी के साथ एक दिन’ टाइप की स्पेशल रिपोर्टिंग भी होती थी। पीछे लग गया। बगोदर बाजार में घूमते-घूमते उन्होंने कहा कि चुनाव मैं नहीं लड़ रहा, जनता लड़ रही है। बहुत पॉलिटिकली और डिप्लोमैटिकली बातें रखने वालों में से हैं बाबूलाल। कब, क्या, कहां, कितना बोलना है, वो जानते हैं। इसमें दो राय नहीं कि बाबूलाल के बोल बहुत मीठे होते हैं। कम बोलते हैं। चिकना कर बोलते हैं। मोह-पाश में बांध लेते हैं। लेकिन धरातल पर चीजें उस तरह से दिखती नहीं!

बाबूलाल से पूछने को बहुत मन करता है। पहले से पता होता तो वाया अविनाश पुछवा लेता। आखिर एक ऐसे समय में आपको झारखंड मिला था जब प्रदेश कोरे स्लेट की तरह था। और आपके हाथ में चॉक। जो करना है, कीजिए। रेखाएं, बिंब, चित्र सब कुछ आपको लिखने को दे दिया गया था। तब क्या किया? ‘चीस’ कर रख दिया! आज कह रहे हैं कि झारखंड चलाने के लिए पॉलिसी चाहिए। आखिर ढाई साल बेधड़क सीएम रहे, तब क्यों नहीं बनायी ऐसी पॉलिसी?

मुझे कहने की इजाजत दें तो मैं यहां तक कहूंगा कि एक ‘वर्जिन स्टेट’ मिला उन्हें। भले उसे नोंचा-खसोटा नहीं लेकिन रुसवा करके ही माने। अब आप कहें कि पार्टी ने तब काम नहीं करने दिया तो ये बेगैरती-सी बात लगती है बाबूलाल जी। छह महीने में सबों से हिसाब मांगने बैठ जाते हैं और बेतकल्लुफ होकर ढाई साल राज करने के बाद भी अपना हिसाब देने में बहाने गिनाने लगते हैं। (नोट – पुल-सड़क ही सब कुछ थोड़े होता है। ऐसे भी पहली बारिश में उनके ही गांव कोदाईबांक में एक पुल भरभराकर गिर गया था।)

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि बीजेपी ने झारखंड के अपने पुराने योद्धाओं करिया मुंडा, रामटहल चौधरी, रीतलाल वर्मा (अब दिवंगत) को धकियाकर बाबूलाल मरांडी को आगे किया था। इस शर्त पर कि बाबूलाल युवा हैं। ऊर्जावान हैं। लेकिन इस शर्त पर बाबूलाल को आगे बढ़ाने वाले थे कौन? सत्तर पार के वाजपेयी-आडवाणी और उनकी महामंडली के महामहिम सज्जन। और देखिए न, अब तो बीजेपी ने करिया मुंडा को इतनी बड़ी कुर्सी (लोकसभा उपाध्यक्ष) पर बिठाल दिया कि उनकी जबान ही खींच ली। अब तो वो राजनीतिक बयानबाजी करने से भी रहे। मतलब पोलिटिकली ‘डेड’।

राष्ट्रीय फलक पर कह पाने की हालत में नहीं हूं लेकिन झारखंड के लिहाज से कहूं तो बीजेपी को पता है कि किसे आगे बढ़ाना है, किसे लताड़ना है। तीस बरस पुरानी बीजेपी की बुद्धि पर सवाल उठाया जाने लगता है और बाबूलाल मरांडी की मारक-बुद्धि की बलैया ली जाने लगती है तो पूछने का मन होता है कि क्या बीजेपी में रहते हुए बाबूलाल अपनी ही पार्टी की दुरदुराने वाली रंगरेल नीति को समझ नहीं पाये? जब पार्टी को अर्जुन मुंडा में ‘तेजपना’ दिखने लगा तो फिर बाबूलाल किस खेत की मूली? बाबूलाल के साथ पार्टी ने वही किया, जो करिया मुंडा के साथ किया था! मौका देखकर चौका लगाना।

एक और सच जानिए बाबूलाल का। ये सच वो सच है, जिसे कभी सांसदों ने आरटीआई कानून संसद से पास करते वक्त भी नहीं सोचा होगा! आरटीआई का एक जवाब बताता है (जो मेरे पास पड़ा है) कि कोडरमा के सांसद के तौर पर 2004 से 2009 के बीच (बीजेपी छोड़ने के बाद बीच में सांसदी से इस्तीफा दे दिया था और फिर से उपचुनाव में जीतकर संसद पहुंचे थे) संसद में मात्र 91 दिन मौजूद रहे जबकि संसद चली पूरे 310 दिन। मतलब एक-तिहाई दिन भी आप संसद में मौजूद नहीं रहे। साढ़े चार सालों में सिर्फ तीन महीने का संसद-प्रवास! इसका जवाब क्या है आपके पास? क्या करते थे मरांडी जी इतने दिन संसद से दूर रहकर? बताना तो पड़ेगा ही। तकदीर बदल देने के दावे के साथ वोट लिया और बस कोरम पूरा करने के लिए संसद में हाजिरी लगायी!

लेकिन ये कहने-मानने में हिचक नहीं कि बाबूलाल मरांडी दूसरों के मुकाबले ज्यादा स्वीकार्य नेता हैं। ईमानदार छवि है, जिसे भूनते-भुनाते रहे हैं। 11 विधायक उनकी अंटी में है। जब पांच विधायकों वाले उप-मुख्यमंत्री बने हुए हैं, तो उनके अरमान तो सातवें आसमान पर रहने लाजिमी हैं। इसलिए कह देते हैं कि चुनाव करवा लो, ज्यादा खर्चा थोड़े ही होगा। (अब 300 करोड़ कोई ज्यादा रकम थोड़े ही होती है!) बाबूलाल ने चुनाव में होने वाले सरकारी खर्च का आंकड़ा अविनाश को तो दे दिया लेकिन हर जगह हेलिकॉप्टर में उड़कर जाने, मंच पर श्वेता तिवारी (उर्फ टीवी वाली प्रेरणा) को प्रस्तुत करने, अखबारों में भर-भरकर विज्ञापन देने (उर्फ पेड न्यूज की शरण में जाने) का खर्चा तो उन्होंने बताया ही नहीं!

खैर, 2009 के विधानसभा चुनाव में टिकट बांटने के दौरान कांग्रेस, बाबूलाल और उनकी पार्टी जेवीएम को कम आंक रही थी लेकिन कांग्रेस के मुकाबले काफी कम सीट पर लड़कर उनसे ज्यादा सीटें जीतकर बाबूलाल ने साबित कर दिया कि उनमें भी दम है। यही दमखम है कि बाबूलाल बार बार कहते हैं, चुनाव करवा लो। और बड़े मौके पर उन्होंने राजधानी रांची में पार्टी का अधिवेशन भी करवा लिया। 22-23 मई को। कहते हैं लाख लोग तक पहुंच गये थे। बड़ा ही हाईप्रोफाइल-हाईटेक टाइप का अधिवेशन था। यहां तक कहा जा रहा है कि इस तरह के किसी राजनीतिक समागम का गवाह कभी झारखंड रहा नहीं। हर किसी के लिए खाने से लेकर आइडेंटिटी कार्ड तक का इंतजाम। मतलब बाबूलाल तैयार हैं। मानो कह रहे हों, दम है तो आओ और फरिया लो।

विज्ञापन की दुनिया में एक सूत्रवाक्य है। आप हर किसी को कुछ समय के लिए बेवकूफ बना सकते हैं। आप कुछ लोगों को हमेशा बेवकूफ बना सकते हैं। लेकिन आप हर किसी को हमेशा बेवकूफ नहीं बना सकते। अगर मान लें कि चुनाव आ भी जाता है तो बाबूलाल इस विज्ञापनी-सूत्र पर गौर करें तो बेहतर है। विकल्प नहीं है, उम्मीद आप हैं तो लोगों को न तो बेवकूफ समझें न ही बेवकूफ बनाएं।

(संदीप कुमार। आईआईएमसी के 2005-06 बैच के पासआउट। आईआईएमसी आने से पहले झारखंड में प्रभात खबर के लिए रिपोर्टिंग कर चुके थे। इन दिनों टीवी पत्रकारिता में हैं। उनसे sandybaba81@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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