अपना जनरल नॉलेज दुरुस्त कीजिए वेद प्रताप वैदिक…
♦ दिलीप मंडल
जनगणना में जाति छिपाने के सवाल पर वेद प्रताप वैदिक हिंदुस्तानी होने का आंदोलन चला रहे हैं। इस बारे में पिछले दिनों उन्होंने एक लेख लिखा। हम यहां उनके लेख के उल्लेखनीय अंश दे रहे हैं, साथ ही मेरे जवाब भी। वैदिक का लेख विस्फोट डॉट कॉम पर छपा है : दिलीप मंडल

50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण किसी भी हालत में नहीं दिया जा सकता। यदि आरक्षितों की संख्या 1931 के मुकाबले अब बढ़ गयी हो तो भी उनको कोई फायदा नहीं मिलेगा और कुल जनसंख्या के अनुपात में अगर वह घट गयी हो तो हमारे देश के नेताओं में इतनी हिम्मत नहीं कि आरक्षण के प्रतिशत को वे घटवा सकें।
वैदिक जी, इसी देश के कई राज्य 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देते हैं। तमिलनाडु 69 फीसदी आरक्षण देता है। और यह किसने कहा कि 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण किसी हालत में नहीं दिया जा सकता। 50 फीसदी की सीमा सुप्रीम कोर्ट ने बालाजी केस में लगायी थी। इसे सुप्रीम कोर्ट की ज्यादा जजों की पीठ भी बदल सकती है और संसद भी। और नवीं अनुसूची में डालकर संसद ऐसे कानून को अदालती पड़ताल से मुक्त भी कर सकती है।
आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों को आरक्षण से क्या मिलता है? सिर्फ नौकरियां! 5-7 हजार लोगों के मुंह में सरकारी नौकरियों की चूसनी (लॉलीपॉप) रखकर देश के 60 करोड़ से ज्यादा वंचितों के मुंह पर ताले जड़ दिये गये हैं|
5-7 हजार नौकरियां??? कई सारे शून्य जोड़ना भूल गये हैं वैदिक जी। प्रूफ की गलती भी हो सकती है। सिर्फ केंद्र सरकार की नौकरियों में 1 जनवरी 2006 को 5.84 लाख दलित, 2.20 लाख आदिवासी और 1.89 लाख ओबीसी थे। राज्यों का आंकड़ा इससे कई गुणा ज्यादा है। 60 करोड़ का आंकड़ा वैदिक जी पता नहीं कहां से लेकर आये हैं। लेकिन यह जरूर है कि केंद्र सरकार की 32 लाख नौकरियों के हिसाब से ये संख्याएं कम जरूर हैं। इसे बढ़ाने की जरूरत है ताकि हर समुदाय को लगे कि देश उसका भी है।
जो अपनी योग्यता से भी चुनकर आते हैं, उनके बारे में भी मान लिया जाता है कि वे आरक्षण (कोटे) के चोर दरवाजे से घुस आये हैं।
ये चोर दरवाजा संवैधानिक प्रावधान है वैदिक जी। चोर दरवाजा है तो अदालत में शिकायत कीजिए। आपको न्याय जरूर मिलेगा।
हमारे संविधान निर्माताओं और आजाद भारत की पहली सरकार ने जनगणना में से जाति को बिल्कुल हटा दिया था।
जाति की गणना कभी बंद नहीं हुई। आजादी के बाद की जनगणनाओं में अनुसूचित जाति की गिनती होती रही है।
जिन स्त्री और पुरुषों ने अंतरजातीय विवाह किया है, उनकी संतानें अपनी जात क्या लिखेगी?
किसी भी वकील से पूछ लीजिए, आपको जवाब मिल जाएगा। भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में ये पूछे जाने योग्य सवाल नहीं है।
हर व्यक्ति अपनी जात जो भी लिखाएगा, उसे वही लिखनी पड़ेगी। वह कानूनी प्रमाण भी बनेगी।
जनगणना में गलत जानकारी देने पर सजा का प्रावधान है। जनगणना अधिनियम 1948 को पढ़ें। और किसी ने अपनी जाति कुछ भी लिखा दी, वह कानूनी प्रमाण है, यह किस विद्वान ने बता दिया? एक बार तथ्यों को दोबारा जांच लें। जनगणना में दलित लिखा देने से कोई दलित बन जाए, यह जादू इस देश में नहीं होता।
आश्चर्य है कि जिस कांग्रेस के विरोध के कारण 1931 के बाद अंग्रेजों ने जन-गणना से जाति को हटा दिया था और जिस सिद्घांत पर आजाद भारत में अभी तक अमल हो रहा था, उसी सिद्घांत को कांग्रेस ने सिर के बल खड़ा कर दिया है।
अंग्रेजों ने जनगणना में जाति को नहीं हटाया। 1941 में विश्वयुद्ध के कारण जनगणना का काम पूरा नहीं हो पाया था। अगली जनगणना आजाद भारत में हुई।
जात पर आधारित नौकरियों का आरक्षण चाहे तो अभी कुछ साल और चला लें लेकिन उसे समाप्त तो करना ही है।
किसने कहा आरक्षण खत्म होगा ही। संविधान ने नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण को लेकर कोई समय सीमा नहीं लगायी है। एक बार संविधान फिर से पढ़िए।
जाति आधारित जनगणना के विरोध में कुतर्कों का ऐसा जाल बुना जा रहा है कि कोई भी चकरा जाए। इन्हें तथ्यों की गलती नहीं कह सकते क्योंकि लिखने वाले ऐसे सभी लोग विद्वान माने जाते हैं। फिर तथ्यों के साथ ऐसी छेड़खानी क्यों। क्या तथ्यों के आधार पर अपने तर्क रखने में कोई दिक्कत है?









दिलीप जी माफ कीजिएगा..वैदिक साहब जातिवार जनगणना को पारिवारिक भेदभाव उद्घाटित करने वाला मौका समझ बैठे हैं। वे बृहद हिंदू परिवार की अब तक की बंदरबाट के सरेआम होने की आशंका में भावुक हो उठे हैं..लिहाजा आंखे छलक आयीं हैं,जिससे तथ्यों में अस्पष्टता आ गई है। भावुक होना स्वाभाविक है क्योंकि कल तक एक मोटे अनुमान के मुताबिक भाई से जो बंटवारा हुआ था,आज वही भाई सबके सामने फिर से बंटवारे की नाप-जोख करवाना चाहता है। यानि कल तक जिसके पास सर छुपाने की जगह नहीं थी,आज वह अपने पूरे हक की बात कर रहा है। बस इतनी सी बात है कि लोग 1857 से लेकर जाति विहीन भारत की कहानियां खोज कर लाने लगे हैं।
भाई आरक्षण न तो कोई बीमारी है और न ही किसी बीमारी का इलाज। यह एक व्यवस्था है जिसके जरिए सत्ता प्रतिष्ठानों में जनांकिकी का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाता है। यानी जनांकिकी के भीतर जैसे-जैसे विभाजन या क्रम होंगे,उनको पहचान कर सत्ता प्रतिष्ठानों में प्रतिनिधित्व देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया हिस्सा है। ऐसे में आरक्षण को खत्म करने की जरूरत तभी आ सकती है जब किसी चयन में स्वाभाविक रूप से जनांकिकी (डेमोग्रेफी) का प्रतिनिधित्व आने लगे। इसलिए आरक्षण जाति-व्यवस्था को बढ़ाने के लिए नहीं,सत्ता संरचना को सही रूप देने के लिए जरूरी है। सही अनुपात में आरक्षण देने के लिए जातिवार जनगणना से जातियों का सही-सही आंकड़ा होना सबसे अहम है।
वैसे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने (स्थानीय निकायों में)मतदान को अनिवार्य बनाने की देश की पहली कवायद कर चुके हैं। वैदिक साहब इसी एजेंडे को आगे बढ़ाने की मशक्कत कर रहे हैं। खैर,बात लम्बी हो जाएगी,इसलिए अपनी टिप्पणी यहीं तक सीमित करता हूं।
मजा आ गया दिलीप सर . सबको सन्मति दे ….. संविधान.
@भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में ये पूछे जाने योग्य सवाल नहीं है.
दिलीप जी,
यदि कोई व्यक्ति अपनी माँ की जाती को अपनाना चाहे तो उसके लिए कानून में क्या प्रावधान है?
यदि नहीं है तो क्या बच्चे को यह अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि वह चाहे तो अपने माँ की जाती अपना सके?
दूसरी बात संविधान में धर्म परिवर्तन की तरह जाती बदलने का अधिकार क्यों नहीं है?
यदि किसी व्यक्ति का धर्म और जाती में विश्वास नहीं है
फिर भी उसके लिए कई कई बार यह बताना क्यों अनिवार्य हो जाता है कि
उसकी जाती और धर्म क्या है?
आशीष जी, इसके लिए तो गांधी परिवार में जन्म लेना पड़ेगा। इंदिरा गांधी के बाद की पीढ़ियों की जाति क्या है?
वैदिक जी भी को ऐसे कुतर्को का सहारा लेना पर रहा है .. च च च… आंकड़ो का ऐसा घालमेल !?
दिलीप मंडल जी ने कलई खोल कर रख दी. सच में मजा आ गया. साधुवाद .
अविनाश भाई,
यह सुविधा भी उस परिवार को इसलिए मिल गई क्योंकि फिरोज को महात्मा गाँधी ने अपना बेटा बनाया था..
मतलब कहानी वही ढाक के तीन पात
गांधी परिवार में भी जन्म लेने का कोई फायदा नहीं है
देखिए ना राहुल की बहन बढेरा हो गई ना
अब बढेरा की अगली पीढ़ी गांधी नहीं बढेरा ही होगी..
आशीष जी, शायद इसलिए क्योंकि प्रियंका इंदिरा गांधी नहीं बन पायीं।
Indira hona sach
aasaan naheen…
सही लिखा दिलीप जी, यह ज़रुरी भी था। इसी संदर्भ में आजके जनसत्ता में मस्तराम कपूर का लेख भी उल्लेखनीय है। दो पंक्तियां:
‘‘ जो सचमुच जातिमुक्त होना चाहते हैं वे जनगणना में अपने को ‘जातिमुक्त‘ लिखवा सकते हैं। लेकिन सही मायनों में जाति-मुक्त होने के लिए अपने भीतर छिपी गंदगी को धोना पड़ेगा……….’’
1) आरक्षण कभी खत्म होगा – यह एक दिवास्वप्न ही है।
2) गरीब ब्राह्मणों को कभी आरक्षण मिलेगा – यह भी एक दिवास्वप्न ही है।
3) आरक्षण से सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिलेगा – यह भी एक दिवास्वप्न ही है।
बेटे को दसवीं पास होते ही समझा दिया है कि “सरकारी नौकरी” तेरी किस्मत में नहीं है, क्योंकि तेरे पुरखों के पापों की सजा तुझे अब मिल रही है, और कभी गलती से सरकारी नौकरी लग ही गई तो यह सजा आगे भी मिलती रहेगी…
। उसे बता दिया है कि अम्बानी-टाटा के गुण गाओ, कि कम से कम वे हम गरीब ब्राह्मणों को सम्मानजनक रोटी तो दे रहे हैं…।
इसलिये अब अपने को कोई दुख नहीं है, क्योंकि जो व्यक्ति परिस्थितियों से समझौता कर लेता है वह कम दुखी रहता है, सरकारी नौकरी अपने लिये नहीं है यह बात एक बात एक बार दिमाग में बैठ गई तो बस, सारे दुख दूर हो गये…। अब चाहे तो सभी लोग 100% आरक्षण ले लो, अपने को कोई शिकायत नहीं… जनगणना में जातियों का गणित कम-ज्यादा हो तो होता रहे अपने को क्या?
भाई, जो ब्राह्मण सम्पन्न हैं वे तो अपने लाल को विदेश भेज ही रहे हैं, जो सम्पन्न नहीं हैं वे भी इस कोशिश में लगे हैं कि जल्दी से जल्दी उनके बेटे-बेटी यह देश छोड़ दें, और हमारे जैसे लोग हैं जो चाहते हैं कि पूरा का पूरा देश ही आरक्षित वर्ग को दे दिया जाये… बहुत लूट चुके ब्राह्मण इस देश को, अब मायावती, लालू और पासवान को भी पूरा लूटने का मौका दिया ही जाना चाहिये…।
इसलिये अपनी तरफ़ से तो 100% आरक्षण को भी पूरी सहमति है…
dilip mandal has given a befitting reply to ved pratap vaidik for his absurd, negative and baseless thinking
वैदिक जी के आंदोलनों का मकसद क्या होता है, यह पिछले 30 सालों से जग जाहिर है. ये भाई साहब धर्मयुग, दिनमान, पराग, सारिका, माधुरी आदि पत्रिकाएं बड़े भव्य और व्यापक रूप से निकालने वाले थे. इनसे जरा पूछिए तो उन पत्रिकाओं का क्या हुआ. वह फर्जी चंद्रप्रभा प्रकाषन कहां गया, जिसके बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था कि यह एग्रीमेंट फ्राड है. दरअसल होता यह है, कि आदमी एक बार अपने अपराध की सजा से बच जाए तो उसमें अपराध करने का हौसला आ जाता है. धर्मयुग के 15 कर्मचारियों ने इनके खिलाफ मुंबई के लेबर कोर्ट में मुकदमा डाला था, यदि यही मुकदमा मुंबई के क्रिमिनल कोर्ट में डाला गया होता, तो जिस एग्रीमेंट को भारत का सर्वोच्च न्यायालय फ्रॉड कह रहा है, उसके लिए आपराधिक धाराओं में क्या सजा उल्लेखित है, यह जाना जा सकता है. इन महोदय के हर आंदोलन के परखचे उड़ाना आवष्यक है, क्योंकि ये सभी आंदोलन निहित स्वार्थ से प्रेरित होते हैं.
मुझे बड़ी हंसी आती है जब कोई शदियों से दबाये गए लोगों के आरक्षण का तो बिरोध करता है मगर ..खुद अपनी जाती और बिरादरी की आरक्षण सुबिधा देने के लिए तम्मं तरह के तर्क देता है….जैसा अभी कुछ साल पहले उच्च शिक्षा में आरक्षण मामले में hum देख चुके हैं.जो लोग ये कह कर दलितों और पिछड़ों के आरक्षण का विरोद कर रहे थे की ये डॉ. बनने के लायक नहीं वही अपने कुनबे के गरीबों के लिए आरक्षण की मांग कर रहे थे…तब मेरे दिमाग में ये बात आती थी क्या ये उच्च जाति के गरीब लोग आरक्षण पा कर गर डॉ .बनते हैं तो क्या ये मरीज के पेट में कैंची नहीं छोड़ेंगे.या प्रतिभा केवल ऊँची जाति वालों की बपौती है. ये हकीकत है की भेद भाव अभी भी जारी है और दलितों और पिछड़ों को आज भी ये सम्मान और एक इन्सान के तौर पे जिन्दा नहीं देखना चाहते…और ये बाते जो कहते हैं की शहरों में इस तर लोग नहीं सोचते तो उनसे कहना चाहूँगा कभी इस तरह की बातें शहरी उच्च वर्ग के सामने छेडिये जवाब मिल जायेगा की कोंन कितने पानी में है और लोग अपनी ५० साल की सोच पे अब भी कायम है…
जाति का प्रभाव अभी नहीं मिठा है जो लोग आरक्षण का विरोध करते है और सभी लोगों को समान अधिकार देने की बात करते है वे खुद भी ब्राहम्णवाद अर्थात श्रेष्ठवाद से अछूत नहीं है| उन्हें अभी भी अपने ब्राहमण होने पर गर्व होता है| और बाकी लोगों को वे हिकारत की नजर से देखते है| कहीं पर भी जाओं चाहे वो जाब के लिए जाओ या किसी से आप मेल मिलाप कर रहे हो पहला सवाल यही है कि आपकी कास्ट क्या है| ठीक है पूछने में कोई बुराई नहीं लेकिन वह कास्ट आपकी इसलिए पूछ रहा होता है ताकि वह आपके बारे में अपना एक नजरिया बना ले| अगर आप लोअर कास्ट के है तो वह सोच लेगा कि यह ठीक नहीं है और अगर ब्राहम्ण है तो वह सोच लेगा कि यह बुद्घिमान ही होगा|
जब तक ये बुराई हमारे देश से खत्म नहीं होती हमें आरक्षण की सीढ़ी लगाके रखनी पड़ेगी| ये ब्राहमणवादी लोग जो आरक्षण का विरोध करते है| यह अपने आप को सर्वश्रेष्ठ बनाकर रखना चाहते है जैसे कि इनके बाप-दादाओं ने किया था| ये बाकी लोगों को गुलाम बनाकर रखना चाहते है सिर्फ जन्म से ब्राहम्ण होने के आधार पर| मीडिया में आरक्षण का विरोध होता है इसकी वजह उसका सही या गलत होना नहीं है| उसकी वजह है कि मीडिया में सारे ब्राहम्ण ही बैठे है| वहां नौकरी मांगने जाओंगे तो सबसे पहले वह यही देखेगे कि आप ब्राहम्ण है कि नहीं एक प्रकार से मीडिया में उन्होंने ब्राहमणवाद चलाकर आरक्षण स्थापित कर लिया है| ताकि पूरे देश को भी अपने हिसाब से चलाएं|
aarakshan lene ke liye kutarkon ka sahara lena kahan tak uchit hai. aapki apni baaton me hi wirodhabhaas jhalak raha hai ek baar apni baaton ko phir se jaroor padhne ka kast karen. aisa nahi hona chahiye ki bachhe ki tarah kisi baat ko lekar baith gaye ki muje tofee khani hai to papa khilane yogya nahi hain to mujhe usse kya matlab main to wahi khaunga aur abhi khaunga.
वैदिकजी की जिस किताब को मीडिया का ककहरा पढ़नेवाला स्टूडेंट वेद की तरह पढ़ता आया है,उसके लिए ये लेख बेचैनी पैदा करनेवाला। असर कुछ ऐसा जैसे अंग्रेजी दवाई ज्यादा वॉल्यूम का खा लेने पर हो जाता है,वैसा ही। ऐसे में कुछ नहीं करने का बस गूगल पर जाकर एंड ऑफ मेटानरेटिव टाइप करके वीकिपीडिया का एक पन्ना पढ़ लेने का है। तब जाकर मामला नार्मल हो जाएगा और स्टूडेंट कहेगा- अच्छा तो ये इसलिए विद्वान कहलाए क्योंकि पढ़ने में थोड़ी कोताही हमने कर दी। कुछ लोग इसलिए विद्वान हो जाते हैं कि हम आलस करके कम पढ़ते हैं,शुक्र है कि दिलीप मंडल जैसे लोग उस आलस से मुक्त हैं जो विद्वता को सिन्ड्रोम बनने से रोकते हैं। बधाई।…
“कुछ लोग इसलिए विद्वान हो जाते हैं कि हम आलस करके कम पढ़ते हैं,”
विनीत जी , क्या बात कही है आपने. लाजबाव
जाति और जनगणना को लेकर कुछ लेखक इतने भावुक (ऋषि कुमार सिंह से शब्द उधार) हो गए हैं कि तथ्यों की कपाल क्रिया करने में जुटे हैं। कुछ भी लिखा जा रहा है। विचार और तर्कों की बात मैं नहीं कर रहा हूं। लेकिन तथ्यों को लेकर बुनियादी ईमानदारी का अभाव है या फिर ये लोग बेहद लापरवाह और अनपढ़ हैं।
मिसाल के तौर पर एक महान लेखक लिखते हैं – जाति जनगणना हुई तो लोग आरक्षण का लाभ लेने के लिए खुद को ओबीसी लिखवाने लगेंगे। और कि 2011 की जनगणना की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। कई राज्यों में तो जनगणना का पहला चरण पूरा भी हो चुका है। ऐसे में अब जाति आधारित जनगणना की बात करने का क्या मतलब है। ये महान लेखक राज्यसभा में रह चुके हैं और देश के सबसे बड़े अखबारों में से एक के प्रतापी संपादक रहे हैं। चलिए नाम भी ले लेते हैं। पढ़ कर देखिए – http://www.dawn.com/wps/wcm/connect/dawn-content-library/dawn/the-newspaper/columnists/kuldip-nayar-reviving-the-caste-system-450
क्या कुलदीप नैयर को यह पता नहीं होगा कि जनगणना में ओबीसी लिखाने से ओबीसी का लाभ नहीं मिलता? इसके लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाना पड़ता है। और क्या उन्हें यह नहीं मालूम कि इस समय हाउस लिस्टिंग का काम चल रहा है? जनगणना फरवरी 2011 में होगी।
जो लोग जाति आधारित जनगणना के विरोधी हैं उन्हें अपनी कमान वेद प्रताप वैदिक जैसे अगंभीर लेखन करने वालों के हाथों में नहीं सौपनी चाहिए। नंदिनी सुंदर उनका नेतृत्व बेहतर तरीके से कर सकती हैं। ब्राह्मणवाद जैसी शातिर व्यवस्था की रक्षा का दायित्व चंद कुपढ़ लोगों के हाथों में है, यह देखकर दुख होता है।
sachchai to yah hai ki ab har aadmi apni apni jati ke labh ke liye lad raha hai…chahe mandal hon ya vaidik…ladte raho guru logon aur apne swarth me is desh ka gala ghot do…
@आलोक रंजन जी, पशु पक्षियों पर आधारित कहानी की कुछ किताबें है. जैसे – पंचतंत्र, हितोपदेश आदि. इनमें से किसी एक में कहा गया है — ‘दीर्घसूत्री विनश्यति’( आलसी का नाश हो जाता है.) मुझे ये किताबें बड़ी पसंद हैं जी.
तरुण विजय का रविवार को जनसत्ता में एक लेख छपेगा। अभी वेबसाइट http://www.jansattaraipur.com/ पर लग गया है। तरुण विजय ने लिखा है कि उनके परिवार में एक दामाद तेलुगु है। एक बहू बंगाली और एक अन्य दामाद तमिल ब्राह्मण। वे खुद पहाड़ी हैं।
अंतर्प्रांतीय विवाहों के आधार पर खुद को जातिवाद से मुक्त बताने का यह अजीब तर्कशास्त्र है। उनकी व्याख्या है कि ऐसा व्यक्ति जातिवादी कैसे हो सकता है। ऐसे भोलेपन पर कौन फिदा न हो जाए?
ये किस टाइप के लोग हैं? खुद मूर्ख हैं या लोगों को मूर्ख समझते हैं? मुझे दूसरी संभावना ज्यादा प्रबल लगती है। ये बेहद घुटे हुए लोग हैं जो दुनिया को मूर्ख बनाते हैं।
जातिवार जनगणना के विरोधियों का केस कौन सबसे बेहतर डिफेंड कर सकता है?
1.वेद प्रताप वैदिक, 2. प्रताप भानु मेहता, 3. नंदिनी सुंदर, 4. अभय कुमार दुबे, 5. अरुण कुमार त्रिपाठी, 6. तरुण विजय, 7. अमूल्य गांगुली, 8. आरएसएस, 9. विश्व हिंदू परिषद 10. विनोद शर्मा
11. अजय माकन.12.पी चिदंबरम(आप अपनी ओर से भी कोई नाम जोड़ सकते हैं)
ये सभी ज्ञानी हैं और पंडित हैं तथा इस विषय पर राय रख चुके हैं। मेरा वोट नंदिनी सुंदर के लिए हैं। उनका शातिरपना सबसे कम झलकता है। आप भी बताएं?
ऊपर वाले कमेंट में पंडित न जाति सूचक है और न ही कबीर ने जिन्हें पंडित कहा है, उनसे इनका साम्य तलाशने की जरूरत है। यहां मतलब पढ़े-लिखे माने जाने से है।
क्या कहूं IIMC के teacher को.. दिलीप मंडल जी को क्या कहना .. जबतक संसार है तब तक आरक्षण के बैशाखी पर ही चलना चाहते हैं तो खूब चलिए . आरक्षण ये तय कर देता है कि आप लोग एकदम अयोग्य हैं .किसी वैज्ञानिक काम के तो बिलकुल भी नहीं .जरूरत है आपके सेहत को अच्छा करने की लेकिन आप लोग हैं कि वो भी अच्छा नहीं करना चाहते. इस सारी व्यवस्था में आपका भला तो कभी नहीं होगा .हाँ देश गैर जरूरी सरकारी नौकरी में आप मटरगस्ती जरूर करते नज़र आयेंगे .और आप तो माशा अल्लाह कर भी रहे हैं .कुछ हद तक और कुछ समय सीमा तक तो आरक्षण का मैं समर्थक रहा हूँ लेकिन आप जिस सीमा की वकालत कर रहे हैं वो नाजायज़ है ..कब तक कोई इसी बैशाखी पर दुरुस्त हो सकेगा. किसी ने उपर ठीक ही लिखा है ..टाटा के गुण गावो …सर जी london school of economic में जाने के लिए आरक्षित कोटा काम नहीं देगा वहाँ क्या कर लेंगे …जिसको पढना है ..नौकरी करना है वो कहीं न कहीं मेहनत से ले ही लेगा .जिनको आरक्षण नहीं है वो लोग आज भूखों नहीं मर रहे .जो होगा कर ही रहे हैं और आगे ही करेंगे .NDTV जैसा चैनल आरक्षण से नहीं बनता और आगे भी नहीं बनेगा ..कोई अच्छा lawer आरक्षण से नहीं बनता और आगे भी नहीं बनेगा ..जात आधारित जनगणना एक बड़ी चाल है फसेंगे आप लोग देखते रहिये कोई जात निकाला जायेगा obc से और कोई डाल दिया जायेगा ..vote जिसका ज्यादा होगा politician उसको पिछड़ों के नाम पर डाल देगी और जो निकलेगा वो कुछ न कर पायेगा .और भी बहुत कुछ होगा देखते रहिये और फसते रहिये ..सारे पता नहीं ये जात जात जात करते रहते हैं ..भगवान् भला करे ऐसे लोगों का ..
दिलीप जी,
1.बहुमत जाति जनगणना के पक्ष में है। अतः ज्यादा परेशान न हों। आपने काफी अच्छी बहस की है अब तक। आगे भी आप अपना मानसिक संतुलन बनाए रखें। बहस में व्यक्गित न हो।
2.जिस तरह से आपने विजातिय तरीके से ‘पंडित’ शब्द का प्रयोग किया उसी तरह से कोई पंडित जाति का व्यक्ति करता तो आप तो उसकी खाल खींच लेते या नहीं ?
3.लालाओं को परंपरागत रूप से सवर्ण माना जाता है लेकिन क्या उनका जातिय उत्पीड़न करने का वैसा इतिहास रहा है जैसा कि आज पिछड़ा मानी जाने वाली कई जातियों का है ?
4.भारत के किसी भी गाँव में किसी चमार,डोम,मुसहर इत्यादि के लिए यादव और ब्राह्मण या ठाकुर के जातिय उत्पीड़न में कोई फर्क होता है तो हमें बताएं ?
5.भारत के जातिय व्यवस्था के ऊपर कोई आपने(दिलीप मण्डल) विशेष अध्ययन किया हो तो उसके बारे में सभी पाठकों को बताएं। जिसे हम पढ़कर इस देश की जाति व्यवस्था को बेहतर तरीके से समझ सकें।
फिर से कहना चाहुंगा कि देश का बहुसंख्यक चाहता है कि जाति जनगणना हो। वंचितो का न्याय मिले। लेकिन इसके लिए घटिया बहस के तौर-तरीके अपनाना सही नहीं है।
विनीत कुमार,
एंड आफ मेटानरेटिव को विकीपीडिया से ही पढ़ा तो कम से कम ठीक से पढ़ा होता। विकीपीडिया पर जो लिखा है उसका हिन्दी अनुवाद करके सामने रख दो। पाठक समझ जाएंगे कि तुम पढ़ने में कितने आलसी हो और समझ में कितने बोदे।
पोस्ट-माडर्नइज्म कोई बच्चों के खेलने की चीज नहीं है। तुम तो जानते ही होगे कि उर्दू के साहब ने इससे खेलने की कोशिश की तो उन्हें विश्वभर के सामने बौद्धिक चोर के रूप में पहचान लिया गया। एक साहब ने हिन्दी में इसका ठीका लिया तो ‘पपलू’ बन कर रह गए।
तुम जाति आधारित जनगणना के पक्ष में हो तो हमारी तरह साफ-साफ कहो कि तुम इसके पक्ष में हो। इधर-उधर की खोखली बौद्धिकी मत भांजो ।
और हाँ,मानो या न मानो तुम्हें सलाह है कि पोस्ट-माडर्नइज्म से पहले माडर्नइज्म पढ़ो। वीकीपीडिया और पोस्ट-माडर्नइस्ट रीडर के सहारे पढ़ना बंद करो। ओरिजनल राइटिंग पढ़ो। मेटानरेटिव शब्द जिसने दिया था उसके बारे में तुमने वीकीपीडिया में पढ़ा होगा। कोशिश करो कि उसकी ओरिजनल किताब पढ़ो। यदि तुमने पढ़ी हो तो मैं अगली बार तुमसे उस पर बहस करूंगा। जिससे पाठकों के सामने मेटानरेटिव -एंड आफ मेटानरेटिव की अवधारणा साफ हो सके।
मेरे नए ब्लोग पर मेरी नई कविता शरीर के उभार पर तेरी आंख http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html और पोस्ट पर दीजिए सर, अपनी प्रतिक्रिया।
I think you all have lost mental status .Do you know why reservation is necessary? it is for upliftment of a poor person ,There should not be any caste .You know that a person born in rich family of SC /ST hate a poor brahmin.They laugh on them .Poor bania is still selling grocessory in a small shop.Ramvilas Paswal, Mulam Singh < Lalu will enjoy in parliament due to reservation .You are supporting this module ? if so, shame …
वेद प्रताप हों या कोई और प्रताप ,
असंयत हो जाना ही उनका संस्कार बता देता है ।
आज आरक्षण के कारण कुछ कम पड़ रहा है तो
कष्ट होना स्वाभाविक है किन्तु जिन्हें सदियों से
वंचित रखा उनकी पीड़ा के विषय में सोचा है कभी ?
माननीय , आरक्षण ही है जिसने आजादी के बाद
दलितों को हिन्दू बनाए रखा है वरना यहां
उनके लिये अपमान और गुलामी के अलावा था ही क्या ?
लेकिन तब रोने वाले धर्मांतरण के लिये रोते ।
अंबेडकर के साथ क्या हुआ ?
उन्होंने कौन सा आरक्षण लिया था?
Dilip Mandal, as in past, has again exploded and demythified the frauds perpetuated by upper caste savarna. I personally feel that neither of the Vaidik or Kuldeep Naiyar have any to corrective clarification for such factual howlers.
Caste system is a reality and there is not caste like ‘Hindustani’, ‘Hindu’, ‘Indian’ etc in this country. Truth is that after the Bristish, this subcontinent is ruled by a tiny upper caste minority through false and fraudulant identities just to hide their own real faces and DNA.
This ruling minority, which is abviously Hindu upper caste savarna, is now leading a campaign against caste based census on the one hand and simeltaneouly, in conspiratorial alignments with the MNCs and corporates, leading a most violent war against tribals and poor lower caste people in various states i.e. Jharkhand, Orissa, W.Bengal, Andhra, Vidarbha and Chhtteesgarh.
This savarna, which hates other inhabitants of this country venomously, unfortunately also rules over the media, academic institutions, cultural centers and all other pools of informations.
There is a chance of faltering even by people like Dilip Mandal, if they fall and make compromises for their own self interests, as happened with many in the past, by the allurements coming from these `thugs and cheaters’. So, one has to keep monitoring and looking critically to such attempts, which appears very iconoclastic at the moment.
Carry on brothers. Battle is yet to properly begin. Fronts are many..and this is just one to bring a pragmatic relative justice to a society, convulsing under stragulating exploitation of the majority civilians.
Congrats Dilip Mandal.
Can Anyone tell me…not a single SC/ST faculty member exist at Indian Institute of Information Technology,Allahabad (IIITA) although having reservation of GOI.
Gyanendra Verma
Research Scholar
Indian Institute of Information Technology, Allahabad, INDIA
Email: vermagkv@gmail.com
Ph: +91-532-2922235, +919839015445
web: http://profile.iiita.ac.in/rs49
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