अपना जनरल नॉलेज दुरुस्‍त कीजिए वेद प्रताप वैदिक…

♦ दिलीप मंडल

जनगणना में जाति छिपाने के सवाल पर वेद प्रताप वैदिक हिंदुस्तानी होने का आंदोलन चला रहे हैं। इस बारे में पिछले दिनों उन्होंने एक लेख लिखा। हम यहां उनके लेख के उल्‍लेखनीय अंश दे रहे हैं, साथ ही मेरे जवाब भी। वैदिक का लेख विस्‍फोट डॉट कॉम पर छपा है : दिलीप मंडल



50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण किसी भी हालत में नहीं दिया जा सकता। यदि आरक्षितों की संख्या 1931 के मुकाबले अब बढ़ गयी हो तो भी उनको कोई फायदा नहीं मिलेगा और कुल जनसंख्या के अनुपात में अगर वह घट गयी हो तो हमारे देश के नेताओं में इतनी हिम्मत नहीं कि आरक्षण के प्रतिशत को वे घटवा सकें।

वैदिक जी, इसी देश के कई राज्य 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देते हैं। तमिलनाडु 69 फीसदी आरक्षण देता है। और यह किसने कहा कि 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण किसी हालत में नहीं दिया जा सकता। 50 फीसदी की सीमा सुप्रीम कोर्ट ने बालाजी केस में लगायी थी। इसे सुप्रीम कोर्ट की ज्यादा जजों की पीठ भी बदल सकती है और संसद भी। और नवीं अनुसूची में डालकर संसद ऐसे कानून को अदालती पड़ताल से मुक्त भी कर सकती है।

आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों को आरक्षण से क्या मिलता है? सिर्फ नौकरियां! 5-7 हजार लोगों के मुंह में सरकारी नौकरियों की चूसनी (लॉलीपॉप) रखकर देश के 60 करोड़ से ज्यादा वंचितों के मुंह पर ताले जड़ दिये गये हैं|

5-7 हजार नौकरियां??? कई सारे शून्य जोड़ना भूल गये हैं वैदिक जी। प्रूफ की गलती भी हो सकती है। सिर्फ केंद्र सरकार की नौकरियों में 1 जनवरी 2006 को 5.84 लाख दलित, 2.20 लाख आदिवासी और 1.89 लाख ओबीसी थे। राज्यों का आंकड़ा इससे कई गुणा ज्यादा है। 60 करोड़ का आंकड़ा वैदिक जी पता नहीं कहां से लेकर आये हैं। लेकिन यह जरूर है कि केंद्र सरकार की 32 लाख नौकरियों के हिसाब से ये संख्याएं कम जरूर हैं। इसे बढ़ाने की जरूरत है ताकि हर समुदाय को लगे कि देश उसका भी है।

जो अपनी योग्यता से भी चुनकर आते हैं, उनके बारे में भी मान लिया जाता है कि वे आरक्षण (कोटे) के चोर दरवाजे से घुस आये हैं।

ये चोर दरवाजा संवैधानिक प्रावधान है वैदिक जी। चोर दरवाजा है तो अदालत में शिकायत कीजिए। आपको न्याय जरूर मिलेगा।

हमारे संविधान निर्माताओं और आजाद भारत की पहली सरकार ने जनगणना में से जाति को बिल्कुल हटा दिया था।

जाति की गणना कभी बंद नहीं हुई। आजादी के बाद की जनगणनाओं में अनुसूचित जाति की गिनती होती रही है।

जिन स्त्री और पुरुषों ने अंतरजातीय विवाह किया है, उनकी संतानें अपनी जात क्या लिखेगी?

किसी भी वकील से पूछ लीजिए, आपको जवाब मिल जाएगा। भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में ये पूछे जाने योग्य सवाल नहीं है।

हर व्यक्ति अपनी जात जो भी लिखाएगा, उसे वही लिखनी पड़ेगी। वह कानूनी प्रमाण भी बनेगी।

जनगणना में गलत जानकारी देने पर सजा का प्रावधान है। जनगणना अधिनियम 1948 को पढ़ें। और किसी ने अपनी जाति कुछ भी लिखा दी, वह कानूनी प्रमाण है, यह किस विद्वान ने बता दिया? एक बार तथ्यों को दोबारा जांच लें। जनगणना में दलित लिखा देने से कोई दलित बन जाए, यह जादू इस देश में नहीं होता।

आश्चर्य है कि जिस कांग्रेस के विरोध के कारण 1931 के बाद अंग्रेजों ने जन-गणना से जाति को हटा दिया था और जिस सिद्घांत पर आजाद भारत में अभी तक अमल हो रहा था, उसी सिद्घांत को कांग्रेस ने सिर के बल खड़ा कर दिया है।

अंग्रेजों ने जनगणना में जाति को नहीं हटाया। 1941 में विश्वयुद्ध के कारण जनगणना का काम पूरा नहीं हो पाया था। अगली जनगणना आजाद भारत में हुई।

जात पर आधारित नौकरियों का आरक्षण चाहे तो अभी कुछ साल और चला लें लेकिन उसे समाप्त तो करना ही है।

किसने कहा आरक्षण खत्म होगा ही। संविधान ने नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण को लेकर कोई समय सीमा नहीं लगायी है। एक बार संविधान फिर से पढ़िए।

जाति आधारित जनगणना के विरोध में कुतर्कों का ऐसा जाल बुना जा रहा है कि कोई भी चकरा जाए। इन्हें तथ्यों की गलती नहीं कह सकते क्योंकि लिखने वाले ऐसे सभी लोग विद्वान माने जाते हैं। फिर तथ्यों के साथ ऐसी छेड़खानी क्यों। क्या तथ्यों के आधार पर अपने तर्क रखने में कोई दिक्कत है?

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