एक लेखक के अपमान का विरोध या गैंगवार, साफ करें

हिंदी अकादमी का सम्‍मान लेने के बाद कवयित्री-चिंतक गगन गिल के खिलाफ सक्रिय हुई आवाजों को यह गगन गिल का जवाब है। यह आज अपने लघु रूप में (जिसे संपादक के अनुरोध पर गगन गिल ने स्‍वयं करके जनसत्ता को पुन: भेजा था) जनसत्ता में छपा है। हालां‍कि गगन गिल ने पहले संपादक से कहा था कि इसे अविकल छापा जाए। साथ ही मदन भास्‍कर का जवाब भी जनसत्ता ने आज छापा है जबकि वे गगन के सम्‍मान लेने पर अपनी आलोचना जनसत्ता में पहले भी लिख चुके थे। अपने पक्ष की संपूर्ण प्रस्‍तुति को लेकर गगन गिल और संपादक ओम थानवी में जो पत्राचार हुआ, वह इस प्रकार है…

प्रिय सुश्री गिल,

आपकी प्रतिक्रिया लंबी है। श्री अशोक वाजपेयी ने दस और श्री मदन भास्कर ने बीस पंक्तियों की टिप्पणी आपके आचरण पर की है। इसके जवाब के लिए ज्यादा से ज्यादा उतनी ही जगह ली जा सकती है। इसलिए कृपया इसे संक्षिप्त कर दें।

यह ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद कि जनसत्ता की पत्रकारिता दिनोंदिन पीली होती जा रही है। अच्छा होता इस तरफ आपका ध्यान हिंदी अकादमी विवाद से पहले भी चला जाता!

आपका,
ओम थानवी

थानवी जी,

मुझे नहीं मालूम दस और बीस पंक्तियों की जगह उन लेखकों ने ली है या आपने उन्‍हें दी है! यदि अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का आपका अभियान डेढ़ पन्‍ने को देख कर डगमगा गया है, तो आप इसे सहर्ष ड्रॉप कर दें। ऐसा नहीं कि प्रतिक्रिया छोटी नहीं की जा सकती, पर आपका पक्ष सुनूं तो सही।

गगन गिल

इस संदर्भ में गगन गिल ने अशोक वाजपेयी को भी पत्र लिखा है, जो इस प्रकार है…

Dear Ashok ji,

Pl see the attachments. In consideration of our friendships & the work we did together & NOW the public spectacle we will all end up as, I insist an acknowledgment of my actual statement as reported in Mail Today, your appreciation of my freedom to exercise the mode of my protest etc etc in your Jansatta column to finish up the matter. You are the wise one among the three of us & it is upto you of course.

Regards
GG

हम यहां गगन जी की मूल प्रतिक्रिया तो छाप ही रहे हैं, जनसत्ता में छपे इसके संशोधित लघु रूप को भी रख रहे हैं। साथ ही मदन भास्‍कर का जवाब भी प्रस्‍तुत है : मॉडरेटर

आज के जनसत्ता में ज्‍यों का त्‍यों छपा गगन गिल का प्रतिवाद और उस पर मदन भास्‍कर की प्रतिक्रिया…

अकादमी सम्‍मान लेने का तर्क

♦ गगन गिल

मैंने कभी भी हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान लौटाने की बात नहीं कही, हालांकि ऐसा करने के लिए मुझे एक संपादक मित्र के एकाधिक फोन आये। 15 मार्च को, इंडिया टुडे की सहयोगी पत्रिका मेल टुडे सहित कई अखबारों ने मेरा संपूर्ण बयान छापा, जिसमें मैंने कहा कि सम्मान लौटाने और विरोध करने के बीच चुनाव की नौबत आना ही असमंजसकारी है। श्री कृष्ण बलदेव वैद के साथ जो व्यवहार हिंदी अकादमी ने किया, उसके विरोध पर मैं कायम हूं।

मुझे खुशी है, मैं किसी तानाशाही या कम्युनिस्ट व्यवस्था की नागरिक नहीं। यदि भारतीय लोकतंत्र बिना मेरी लेखकीय गरिमा को चोट पहुंचाये मुझे विरोध प्रकट करने की पूरी छूट देता है तो मैं इस अधिकार का प्रयोग क्यों न करूं? किसी संस्था के समारोह में जाने का अर्थ यह तो नहीं है कि हमने उसके सफेद-स्याह कार्यों को क्लीन चिट दे दी।

हिंदी अकादमी के समारोह में उनके पक्ष में खड़े होने के लिए नहीं, अपने मित्रों के अंदाजे-बयां से अलग होने के लिए सम्मिलित हुई। सम्मान समारोह में जाने से एक दिन पहले ‘भाषा’ समाचार एजेंसी को दिये अपने बयान में मैंने कहा था, विरोध की एक मर्यादा होती है और सहयोग की भी। क्या एक तेजस्वी विरोध को गैंगवार बन जाने दिया जाए? आज जबकि जातिवाचक शब्दों के प्रयोग तक से सब लोग सचेत हैं, इस विवाद के केंद्र में एक व्यक्ति को एक ही शब्द बार-बार कह कर हम किस स्तर का विरोध-विमर्श प्रस्तुत कर रहे हैं?

‘जनसत्ता’ ने यदि लेखकों के विरोध की खबर बड़े जोर-शोर से छापी थी तो उनका नैतिक दायित्व था कि मुझ जैसे मध्यमार्गी लेखक से वहीं समारोह स्थल पर मेरा बयान मांगते, ताकि किसी तरह की भ्रामक स्थिति पैदा न हो। जनसत्ता की पत्रकारिता दिनोंदिन पीली हो जाए और उसे इसका आभास न हो, यह चिंतनीय है।

हिंदी अकादमी के इस लंबे खिंच चले विरोध-विमर्श में जो प्रश्न छूट गये हैं, वे हैं – हिंदी/साहित्य अकादेमी, भारत भवन जैसी संस्थाएं हमारे समाज में कोई बृहद उद्देश्य पूरा करती हैं कि नहीं? उन्हें होना चाहिए कि नहीं? यदि दुर्भाग्यवश वे किसी विवाद में फंस जाती हैं, तो हमारे विरोध की अवधि क्या हो? कितने विरोध के बाद हम उन्हें सशर्त काम करने दें?

मेरे लेखक मित्र ने सम्मान को ‘निश्चिंत लालच’ कहा। सम्मान यदि लालच हैं तो इस दूषण को बढ़ावा देने में वे सब बराबर के जिम्मेवार हैं जो सम्मान देते या लेते हैं। साहित्य में सम्मान दिये ही क्यों जाएं, बहस इस पर भी होनी चाहिए। कवि-स्मृति के इस दौर में विचारणीय यह भी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस तथाकथित आंदोलन की अगुवाई यदि टैगोर या कबीर जैसा कोई कवि कर रहा होता, तो विमर्श का स्तर क्या यही रहता, जो अब सामने आया है?

मध्‍यमार्ग नहीं होता

♦ मदन भास्‍कर

गगन गिल की समस्या यह है कि वे अपने गाल पर चिपके कीचड़ को कैसे साफ करें। इसका एकमात्र नैतिक तरीका यह था कि वे अपने विचार का बदल जाना स्वीकार कर लेतीं। अन्य जगहों पर उन्होंने क्या कहा और क्या नहीं, पर जनसत्ता में यह खबर बराबर छपती रही कि वे पुरस्कार का बहिष्कार करने वालों के साथ हैं और उन्होंने एक बार भी, लिख कर या बोल कर, इसका खंडन नहीं किया।

अपने संपादक मित्र से उनका क्या रिश्ता है, यह वे दोनों जानें, पर ‘सम्मान लौटाने और विरोध करने के बीच चुनाव की नौबत आना ही असमंजसकारी है’ जैसा छायावादी वाक्य गगन गिल के वास्तविक स्टैंड को स्पष्ट नहीं करता। सवाल सम्मान लौटाने का नहीं, उसे अस्वीकार करने का था, क्योंकि जब कोई चर्चित लेखक उस वक्त कोई सम्मान स्वीकार करता है जब उसी सम्मान शृंखला द्वारा उससे भी अधिक चर्चित लेखक का अपमान किया गया हो, तो स्पष्ट है कि वह दोनों तरफ चलना चाहता है, ताकि राम और माया, दोनों को एक साथ साधा जा सके। हिंदी अकादमी, दिल्ली का सम्मान ठुकराने वाले अन्य लेखकों की शर्त सिर्फ यह थी और है कि जब तक श्री वैद का सम्मान बहाल नहीं किया जाता, तब तक उनका खुद सम्मान ले लेना लेखक बिरादरी का अपमान लगेगा। गगन गिल को अपनी आत्मा से पूछना चाहिए कि वे इस अपमान में शामिल हैं या नहीं हैं।

जहां तक सवाल यह है कि ‘किसी संस्था के समारोह में जाने का अर्थ यह तो नहीं है कि हमने उसके सफेद-स्याह कार्यों को क्लीन चिट दे दी’, तो इस सुंदर वाक्य में अतिव्याप्ति दोष है। जब दिल्ली के लेखक इस मुद्दे पर बंटे हुए हों कि पुरस्कार समारोह में जाना चाहिए या नहीं, ऐसे नाजुक क्षण में कोई लेखक पुरस्कार या सम्मान लेने पहुंच जाता है, तो वह निश्चय ही साहित्य नहीं, सत्ता का समर्थन कर रहा होता है। क्षमा करें, साहित्य और सत्ता के बीच कोई मध्यमार्ग नहीं होता है, जैसे पुरुष होने और स्त्री होने के बीच कोई मध्यमार्ग नहीं होता – संयोग से जो हो जाता है, वह इस या उस विकल्प की विकृति है।

गगन गिल के लेखक मित्र ने, जहां तक मैं समझ पाया हूं, सम्मान मात्र को लालच नहीं कहा है। जिस समाज में रचनाकारों का सम्मान न हो, वह रहने लायक समाज नहीं है। अशोक वाजपेयी का मंतव्य यह है कि पहले सम्मान को ठुकराना और फिर कोई स्पष्टीकरण दिये बिना उसे ग्रहण कर लेना (यह मैं जोड़ रहा हूं : और ग्रहण करते वक्त अपमानित लेखक के साथ अपनी वफादारी में एक शब्द भी न कहना) – यह लालच है और ऐसा लालच, जिसके बारे में कण मात्र भी फिक्र नहीं है कि जमाना क्या कहेगा।

हिंदी अकादमी के खिलाफ अपनी मुहिम पर जनसत्ता संपादक ने मेरी नीचे दी गयी प्रतिक्रिया पढ़ने के बाद कुल दस जमा बीस पंक्तियां लिखने को कहा क्योंकि उनके अनुसार इतनी ही जगह अशोक वाजपेयी एवं मदन भास्कर ने अपनी टिप्पणी में ली थी! उनके इस गणित में वे पंक्तियां शामिल नहीं जो जनसत्ता में बिना मेरा नाम लिये मुझ पर टीका हेतु छपीं। यद्यपि उन्होंने मेरे यक्ष-प्रश्न – दस या बीस पंक्तियां लिखने की जगह इन लेखकों ने उनसे ली या उन्होंने दी? – का उत्तर इन पंक्तियों के लिखने तक नहीं दिया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के “नाज़ुक दौर” को देखते हुए मैंने उन्हें कुल पच्चीस पंक्तियां दुबारा भेजीं जो रविवार 30 मई में एक बार फिर बीसेक पंक्तियों के साथ छपीं! मेरी प्रथम, अविकल प्रतिक्रिया जानने का हक पाठकों को है, इसलिए इसे छापने की सहमति एवं अनुमति आपको है। मूल प्रतिक्रिया में संकोचवश मैंने व्यक्तियों के नाम नहीं लिये थे, हालांकि इससे परहेज भी क्‍यों किया जाए, इसका कोई कारण नहीं दीखता। मेरा आग्रह है, यह विमर्श अराजक या अशालीन न होने पाये, इसका पूरा ध्यान रखा जाए : गगन गिल

♦ गगन गिल

जनसत्ता में पिछले दो सप्ताह से मेरे द्वारा हिंदी अकादमी का सम्मान स्वीकार करने को लेकर कई प्रकार की बातें छपी हैं। मैं कुछ बातों का निराकरण करना उचित समझती हूं। मेरा यह बयान आप रविवारी जनसत्ता में अविकल रूप से प्रकाशित करें, यही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आपके आंदोलन के अनुरूप होगा।

मैंने कभी भी हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान लौटाने की बात नहीं कही थी हालांकि ऐसा करने के लिए मुझे ओम थानवी के एकाधिक फोन आये। हमारे वरिष्ठ लेखक कृष्णबलदेव वैद के साथ जो अपमानजनक व्यवहार हिंदी अकादमी ने किया, मैंने उसका पुरजोर विरोध किया और आज भी उस पर कायम हूं। मैंने विरोध करते समय अकादमी की अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित से इस मुद्दे पर सार्वजनिक बयान की मांग कई मंचों से की, जिनमें 17 मार्च को बीबीसी से प्रसारित एक वार्ता भी है। मुझे खेद है कि जनसत्ता संपादक ने मेरे विरोध को मेरे द्वारा सम्मान लौटाने के रूप में प्रकाशित किया और मैंने इसका स्पष्टीकरण इसी मंच से तुरंत नहीं दिया, कि लेखकों की इस मुहिम में फांक न दिखाई पड़े। यद्यपि अगले ही दिन, 15 मार्च को, इंडिया टुडे की सहयोगी पत्रिका मेल टुडे सहित कई अखबारों ने मेरा संपूर्ण बयान छापा, जिसमें मैंने कहा था कि सम्मान लौटाने और विरोध करने के बीच चुनाव की नौबत आना ही असमंजसकारी है। समस्त सुधीजन इंटरनेट पर मेरे इस बयान की तसदीक कर सकते हैं।

विरोध प्रकट करने और सम्मान समारोह संपन्न होने के बीच कई घटनाएं हुईं, जिनमें विरोध-विमर्श का स्तर उत्तरोत्तर निम्न होता गया और साहित्यिक राजनीति से मेरी वितृष्णा बढ़ती गयी। हिंदी अकादमी के समारोह में मैं उनके पक्ष में खड़े होने के लिए नहीं, बल्कि अपने मित्रों के अदाजे-बयां से अलग होने के लिए सम्मिलित हुई। सम्मान समारोह में जाने से एक दिन पहले मैंने “भाषा” समाचार एजेंसी को दिये अपने बयान में कहा कि विरोध की एक मर्यादा होती है और सहयोग की भी। यदि मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित ने विधानसभा में इस प्रकरण पर खेद जताते हुए कहा है कि इस मामले की जांच लेखकों की एक कमेटी द्वारा करायी जाएगी और विवाद का सम्मानपूर्वक समाधान किया जाएगा, और इस आशय का एक पत्र भी हमें भेजा जाता है, तो ऐसी स्थिति में लेखकों के पास क्या उपाय है? क्या एक तेजस्वी विरोध को गैंगवार बन जाने दिया जाए? इस देश का छोटे से छोटा न्यायालय आरोपी को अपनी बात कहने की मोहलत देता है।

प्रश्न यह नहीं कि इस प्रकरण में किसने सम्मान स्वीकार किया, किसने अस्वीकार किया। कौन बोला, कौन चुप रहा। प्रश्न यह है कि सामाजिक जीवन में एक लेखक के विरोध की अभिव्यक्ति का स्तर क्या हो? हमारे लोकतंत्र में हिंदी अकादमी और उसके जैसी संस्थाएं हों या नहीं? क्या ये संस्थाएं हमारे समाज में कोई बृहद उद्देश्य पूरा करती हैं कि नहीं? यदि दुर्भाग्यवश वे किसी विवाद में फंस जाती हैं, (जिनमें भारत भवन भी अपवाद नहीं है), तो हमारे विरोध की अवधि क्या हो? कितने विरोध के बाद हम उन्हें सशर्त काम करने दें। प्लेटो ने अपने गणतंत्र में से कवियों को बहिष्कृत किया था, क्या हम लेखक अपने समाज में से गणतंत्र को बाहर करना चाहेंगे? बहस इस पर भी होनी चाहिए कि साहित्यिक सम्मान दिये ही क्यों जाएं? जनसत्ता ने सम्मान को “पुरस्कार” लिखकर हिंदी भाषा और लेखकों के प्रति अपनी संवेदनशून्यता ही उजागर की है। आज जब जातिवाचक शब्दों के प्रति हर व्यक्ति संवेदनशील है, इस विवाद में एक व्यक्ति के लिए एक ही शब्द बार-बार प्रयोग कर हम किस स्तर का विरोध-विमर्श प्रस्तुत कर रहे हैं?

अशोक वाजपेयी ने मुझ पर पुरस्कार के “निश्चिंत लालच” का अभियोग लगाया है, (बेशक निश्चिंत, लेकिन लालच? इक्कीस हजार पत्र-पुष्प कितनी देर सुगंध देते हैं, कौन नहीं जानता!) सम्मान यदि लालच हैं तो इस दूषण को बढ़ावा देने में मेरे यह मित्र सबसे अग्रणी हैं। जितनी रेवड़ियां हिंदी अकादमी जैसी लोकतंत्र पोषित संस्था एक साल में बांटती है, उससे कहीं अधिक वे अपनी जेबी संस्थाओं से चार महीने में बांट देते होंगे। सहयोग-विरोध का गणित खूब समझते होंगे। अली बाबा, अपना गणित तो बहुत कच्चा निकला!

आश्चर्य यह है, इस विवाद पर मेरे मध्यमार्गी स्टैंड ने उन जैसे सूक्ष्मवेत्ता को आत्म-परीक्षण करने के लिए नहीं उकसाया। वह “सबकी खबर ले” नारे पर अमल करते रहे। एक कवि के जैसी मृत्यु चाहने वाले व्यक्ति से एक कवि जैसा जीवन जीने की अपेक्षा रखना क्या बहुत बड़ी मांग है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस तथाकथित आंदोलन की अगुवाई यदि टैगोर या कबीर जैसा कोई कवि कर रहा होता, तो विमर्श का स्तर क्या यही रहता, जो उनके नेतृत्व में सामने आया है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर अपने एक लेखक साथी को “जमात में” इंच भर हिलने की मोहलत न दें, इससे बड़ा प्रहसन और क्या हो सकता है!

मुझे खुशी है, मैं किसी तानाशाही या कम्युनिस्ट व्यवस्था की नागरिक नहीं। यदि भारतीय लोकतंत्र बिना मेरी लेखकीय गरिमा को चोट पहुंचाये मुझे विरोध प्रकट करने की पूरी छूट देता है तो मैं इस अधिकार का प्रयोग क्यों न करूं? यदि एक संस्था को मेरा मुखर, घोषित विरोध जानने के बावजूद मेरा स्वागत करने में कोई परेशानी नहीं है, तो मैं क्यों न जाऊं? किसी संस्था के समारोह में जाने का अर्थ यह तो नहीं है कि हमने उसके सफेद-स्याह कार्यों को क्लीन चिट दे दी। यदि मेरी अंतरात्मा इसे सही ठहराती है तो क्या इसलिए रुक जाऊं कि मित्रों की शतरंज बिगड़ जाएगी? आखिर ये सम्मान लेखकों की निर्णायक समिति ने तय किये थे। इन्हें पाने के लिए हमने कोई आवेदन नहीं किये थे! जनसत्ता ने मेरे सम्मान स्वीकार करने की बात को कुछ इस तरह उछाला, जैसे मैंने अपना नहीं, भूल से किसी दूसरे का (शायद शलाका?) सम्मान ले लिया हो! नैतिकता का तकाजा था कि जनसत्ता वहीं, समारोह स्थल पर मुझसे बयान मांगता। हमारे विरोध की खबर पहले पेज पर और सहयोग की खबर अंदर के पृष्ठों पर, चटखारे लेकर कई दिनों तक? जनसत्ता की पत्रकारिता दिनोंदिन पीली हो जाए और उसे एहसास तक न हो, यह चिंतनीय है।

सच तो यह है, एक स्वतंत्र मेधा, विशेषकर एक स्त्री की, लेखिका की स्वतंत्र मेधा, उसकी “निश्चिंतता” हमें आज भी चिंताग्रस्त करती है। हमारे बड़े-बड़े सिंहासन हिल जाते हैं। हम उसका आखेट करने के लिए क्षुद्रता की किसी भी हद तक जा सकते हैं। ऐसा करते और करवाते हुए न हमें साथ खाये नमक का लिहाज है, न पारिवारिक मित्रता की ग्रेस का। सिर्फ तगमे लेने के लिए स्वच्छ व तेजसी जीवन नहीं जिये जाते। (न ऐसे तमगे कोई देता है!) एकांतजीवी एक महिला को विरोध के समक्ष अकेले खड़े रहने का आत्मबल कहां से मिलता है, कम से कम मित्रों को इस पर चिंतन करना चाहिए था! अपने स्तंभ में अशोक वाजपेयी ने ठीक ही कहा, ऐसा नहीं कि मुझे अंदाजा न था सम्मान स्वीकार करके मैं क्या हंगामा बरपाने वाली हूं, फिर भी मैंने लोक-अपवाद की चिंता क्यों न की। मुझे हैरानी है, वह मेरी थाती भूल गये। जिन साधक मनीषी के साथ मैंने एक पूरा जीवन बिताया, उनकी स्वाधीन चेतना का स्वाद तो मित्रों का चखा हुआ है! मित्रों ने सब कयास लगाये, सिर्फ यह नहीं कि कहीं हमसे मोहभंग ही तो कारण नहीं! कभी एक अप्रिय प्रसंग में बहुउद्धृत यह सूक्त-वाक्य सुना था – मुर्दों के साथ कोई मर नहीं जाता। मैं कहना चाहूंगी, सम्मान दिलाने की जिद में कोई मर नहीं जाता!

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