जाति की सड़ांध छिपाना चाहते हैं जातिवार जनगणना के विरोधी



♦ मस्तराम कपूर

बीस साल पहले जब मंडल रिपोर्ट लागू होने पर देश भर में आत्मदाह और आगजनी का तूफान उठा था, तो इन पंक्तियों के लेखक ने बुद्धिजीवियों का एक सरसरी सर्वेक्षण किया था। यह जानने के लिए कि कौन मंडल समर्थक है और कौन मंडल विरोधी। तब पता चला था कि द्विज वर्णों के सभी बुद्धिजीवी करीब-करीब (एक-दो अपवाद सहित) मंडल-विरोधी थे। लगभग यही स्थिति जातिवार जनगणना और विधानमंडल में महिलाओं के आरक्षण के संदर्भ में बनी है। महिला आरक्षण के समर्थक भी करीब-करीब सभी द्विज जातियों से हैं और जातिवार जनगणना का विरोध करने वाले भी। महिला आरक्षण के संबंध में इन बुद्धिजीवियों का सरल तर्क यह है कि अगर नौकरियों आदि में आरक्षण संविधानसम्मत है तो संसद और विधानसभाओं के आरक्षण भी संविधान सम्मत हैं। वे यह देखना ही नहीं चाहते कि संसद और विधानसभाओं के आरक्षण (राजनीतिक आरक्षण) अंग्रेजों ने हम पर थोपे थे, ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत।

इन आरक्षणों ने दो राष्ट्रों के सिद्धांत को जन्म दिया, जिसके खिलाफ पूरे स्वाधीनता आंदोलन में लड़ाई लड़ी गयी, महात्मा गांधी ने इनके विरोध में आमरण अनशन किया और इन्हीं के कारण (यानी दो राष्ट्रों के सिद्धांत के आधार पर) देश का बंटवारा हुआ। संविधान बनाते समय इन आरक्षणों को सर्वसम्मति से समाप्त किया गया, केवल अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए इन्हें दस साल के लिए जारी रखा गया। इनके विपरीत नौकरियों आदि के आरक्षण (सामाजिक आरक्षण) हमने खुद अपनाये जाति-व्यवस्था के अन्यायों को दूर करने के लिए। आंखें बंद कर सिर्फ आरक्षण शब्द को लेकर चलने वाले ये बुद्धिजीवी दोनों प्रकार के आरक्षणों के बीच स्पष्ट भेद और परस्पर विरोधी चरित्र को देखना ही नहीं चाहते और कुतर्क पर कुतर्क गढ़ते जाते हैं। ये कुतर्क तब और स्पष्ट हो जाते हैं जब राजनीतिक आरक्षणों की मांग करने वाले महिलाओं के लिए सामाजिक आरक्षण की मांग नहीं करते, क्योंकि सामाजिक आरक्षण मिलने से उनके साथ पिछड़ा विशेषण जुड़ जाएगा।

अब ये बुद्धिजीवी जातिवार जनगणना के विचार के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। पिछले साठ सालों से उन्होंने लगातार इस विचार को दबाने का कोशिश की। कांग्रेस, भाजपा और वामपंथी पार्टियां, जो मूलत: द्विज वर्चस्व वाली पार्टियां हैं, जातिवार जनगणना कराने से बचती रहीं, क्योंकि इससे जाति-व्यवस्था के शोषण की असली तस्वीर सामने आती थी। यह बात सामने आती कि पंद्रह सोलह प्रतिशत द्विज जातियां नब्बे फीसद से अधिक सत्ता-स्थानों पर कब्जा जमाये बैठी हैं।

जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक सभी प्रधानमंत्रियों ने जातिवार जनगणना न कराने का फैसला किया। बीच में देवगौड़ा की सरकार ने जातिवार जनगणना का फैसला किया, लेकिन कांग्रेस ने उस सरकार को गिरा दिया और बाद में बनी वाजपेयी सरकार ने पहला काम देवगौड़ा सरकार के फैसले को बदलने का किया। अब जब विद्वानों ने जोरदार तरीके से यह बात रखी कि जातिवार जनगणना के बगैर हमारे पास सहीं आंकड़े नहीं होंगे और हम गरीबी निवारण और जाति-व्यवस्था के विनाश जैसे संवैधानिक कार्यक्रमों को ठीक से लागू नहीं कर सकते, तो मनमोहन सिंह ने जातिवार जनगणना कराने का आश्वासन संसद में दिया। लेकिन इस पर द्विजवर्णीय बुद्धिजीवियों ने तलवार भांजना शुरू कर दिया है।

जो लोग एक समय मंडल के विरोध में खड़े थे और महिला आरक्षण के हक में शहीद होने को तैयार हैं, अब जातिवार जनगणना के खिलाफ खम ठोंक कर अखाड़े में उतर पड़े हैं। इनमें जो लोग राजनीतिक माहौल में बदलाव या न्यायालयों के बदलते रवैये के कारण सामाजिक न्याय के समर्थक हो गये थे, वे भी महिला आरक्षण और जातिवार जनगणना के मुद्दे पर फिर बिदक गये हैं। ये ऐसे-ऐसे तर्क निकाल रहे हैं कि ब्रह्मा का दिमाग भी चकरा जाए। एक तर्क जो आमतौर पर अफसरी योग्यता वाले लोगों के मुंह से सुनने को मिल रहा है, वही है जिसे कभी जवाहरलाल नेहरू ने प्रस्तुत किया था। यह तर्क है कि क्या बस या रेल की यात्रा के समय हर यात्री से उसकी जाति पूछी जाएगी? यह समाज विज्ञान की गंभीर प्रक्रिया और अनुसंधान का मखौल है। सरकारी विभागों और संस्थाओं में जो बुद्धिजीवी भरे हैं (हर बड़े पद पर बैठा व्यक्ति अपने को प्रतिभाशाली तो मानता ही है), उनकी दलीलें इसी तरह की मिलेंगी जो या तो गंभीर विचार को मजाक में उड़ाएंगी या उसे व्यावहारिक रूप से नामुमकिन बताएंगी, जैसे कि मंत्रिमंडल की बैठक में गृह मंत्रालय के नौकरशाहों ने अव्यावहारिकता के तर्क से जातिवार जनगणना के विचार को काटना चाहा था।

अगर ये आंकड़े दस साल में एक बार जमा करने और उनका वैज्ञानिक विश्लेषण, वर्गीकरण आदि करने में हमारा सरकारी तंत्र सक्षम नहीं है तो उसे सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति की डींग मारने का क्या हक है। सूचना प्रौद्योगिकी में अग्रणी होने का दावा करने वाला देश अगर अपनी जनसंख्या का पूरा प्रोफाइल तैयार नहीं कर सकता तो उसे हम क्या कहेंगे? हर नागरिक के चित्र और अंगुलियों के निशानों सहित सारी जानकारी तो इकट्ठी की जा सकती है, पर सदियों पुरानी बीमारी यानी जाति-व्यवस्था की सभी पेचीदगियों को समझने के लिए आंकड़े इकट्ठा नहीं किये जा सकते। हम पुलिस-राज्य बनाने के लिए तैयार हैं, मगर समता का समाज नहीं।

एक प्रसिद्ध बुद्धिजीवी प्रताप भानु मेहता ने जातिवार जनगणना के खिलाफ एक लेख (इंडियन एक्सप्रेस में) लिखा है, जिसमें उन्होंने इस विचार के खिलाफ आठ कारण गिनाये हैं। इस लेख में जातिवार जनगणना के विरोधियों के सारे तर्क समाहित हैं। वे जातिवार जनगणना कराने के विचार को भयानक विपत्ति कहते हैं जो आधुनिक भारत की हर अच्छी चीज का क्षुद्रीकरण करती है, और अस्मिता की राजनीति की तानाशाही ही लादती है। उनका कहना है कि जातिवार जनगणना का विचार उन सब चीजों को उभारता है, जिनके खिलाफ हमने लंबी लड़ाई लड़ी। बात काफी ईमानदारी से कही गयी है। द्विज जातियों की सारी लड़ाई जाति-व्यवस्था के शोषण पर पर्दा डालने की रही है और जातिवार जनगणना उसका पर्दाफाश कर सकती है। एक तरफ सब प्राणियों के बीच वेदांतिक आत्मिक एकता और दूसरी तरफ छुआछूत की सीमा तक लौकिक भेदभाव, इस पाखंड को बनाये रखने की कोशिश ही तो है हमारा ज्ञान-साधना आडंबर। वे कहते हैं कि जाति-गणना का मतलब है, हम अपनी जाति से कभी बच नहीं सकेंगे।

क्या कूड़े को दरी के नीचे सरकाने से उससे बचा जा सकता है? हमारे समाज ने अब तक जाति की गंदगी को दरी के नीचे छिपाने का ही काम किया है। निन्यानवे प्रतिशत परिवार अब भी जन्मकुंडली के अनुसार जाति और गोत्र देख कर शादियां करते हैं, भले वे प्रगतिशीलता का मुखौटा पहने रहें। यह सही है कि जाति और धर्म आदि की हमारी पहचानें हमारी चुनी हुई नहीं हैं, बल्कि ये दिये गये तथ्य हैं। यह भी सही है कि हम इनसे बच नहीं सकते, लेकिन इसीलिए यह जरूरी है कि हम इनके दबावों को भलीभांति समझें और इन दबावों को अपने फैसलों पर हावी न होने दें। यह काम शुतुरमुर्ग की तरह आंखें बंद कर लेने से नहीं होगा।

वैसे संविधान ने जाति-उन्मूलन का रास्ता दिखाया है और जातिवार जनगणना और आरक्षण व्यवस्था इसी उद्देश्य के लिए हैं, बशर्ते कि हम पाखंड छोड़ कर ईमानदारी से संविधान की व्यवस्था को लागू करें। जो सचमुच जातिमुक्त होना चाहते हैं, वे जनगणना में अपने को ‘जाति-मुक्त’ लिखवा सकते हैं। लेकिन सही मायनों में जाति-मुक्त होने के लिए भीतर छिपी गंदगी को धोना पड़ेगा और यह काम इतना आसान नहीं है। इस अन्याय के सारे आयामों को समझना पड़ेगा और उसके लिए आंकड़े जमा करने पड़ेंगे। मेहता का कहना है कि दलित पिछड़े वर्गों के सशक्तीकरण का एक भी कार्यक्रम ऐसा नहीं है, जिसके लिए जातिवार जनगणना की जरूरत हो। वैसे जातिवार जनगणना का यह उद्देश्य है भी नहीं। इसका उद्देश्य तो ऊंची जातियों द्वारा छोटी जातियों के शोषण का पता लगाना है। लेकिन अगर सशक्तीकरण का मतलब अस्सी प्रतिशत लोगों को भिखमंगेपन के स्तर से ऊपर उठाना है तो उसके लिए जनता के विभिन्न तबकों की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति का पता लगाना पड़ेगा और यह काम जातिवार जनगणना से ही होगा।

मेहता का यह कहना भी सही है कि जाति आधुनिक राज्य के वर्गीकरण से पहले की चीज है। इसीलिए हमारा कहना है कि जाति को खत्म किये बिना आधुनिक राज्य का निर्माण नहीं हो सकता। जब तक आधुनिक राज्य की विभिन्न संस्थाओं पर कुछ द्विज जातियों का वर्चस्व बना हुआ है, तब तक आधुनिक राज्य एक ढकोसला है। इसीलिए राज्य के हर विभाग और हर संस्था में – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में – काम करने वालों की जातिगत पहचान कर जातीय असंतुलन को दूर करना पड़ेगा। साठ साल के पसोपेश के बाद संविधान के एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य की पूर्ति के लिए सही कदम उठाया जा रहा है। निहित स्वार्थ इसके खिलाफ एकजुट हो सकते हैं और इस प्रयास को विफल कर सकते हैं। अत: जाति-आधारित जनगणना का समर्थन करने वाले नेताओं को मिल कर प्रधानमंत्री के हाथ मजबूत करने चाहिए।

अगर जातियों से संबंधित आंकड़े ठीक से इकट्ठा किये गये (यह काम फरवरी 2011 में व्यक्तिश: गणना के समय आसानी से हो सकता है) तो हम आने वाले सौ-पचास वर्षों में जाति-व्यवस्था के उन्मूलन की उम्मीद कर सकते हैं। हर जनगणना से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नागरिक वर्गों को संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के अनुसार आरक्षण की परिधि से बाहर किया जा सकता है, जिससे आरक्षण का लाभ उत्तरोत्तर निचले क्रम के लोगों को मिलता जाएगा और एक दिन सभी को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल जाएगा; एक सीमा तक समता स्थापित हो जाएगी और जाति-व्यवस्था क्षीण हो जाएगी। यह हमारे पूर्वज संविधान-निर्माताओं का सपना है और इसे साकार करना हम सबका परम कर्तव्य होना चाहिए। इस सपने की हत्या जातिवार जनगणना की मांग करने वालों ने नहीं की, जैसा कि के सुब्रह्मण्यम (इंडियन एक्सप्रेस, तेरह मई) कहते हैं, इस सपने की हत्या उन्होंने की जो जातिवार जनगणना को अब तक टालते रहे।

(मस्‍तराम कपूर। जन्म 22 दिसंबर 1926… प्रसिद्ध समाजसेवी लेखक, चिंतक। रामवृक्ष बेनीपुरी रचना संचयन का संपादन। विपथगामी, एक सदी बांझ और विषय पुरुष जैसे चर्चित उपन्‍यासों के लेखक। अखबारों में निरंतर वैचारिक लेखन। दिल्‍ली में रहते हैं।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *