केंद्र मणिपुर से एक गेंद की तरह खेलता रहता है!

मुइवा, मणिपुर और केंद्र की दोहरी नीति








♦ एस बिजेन सिंह

पिछले दस वर्षों से शीर्ष नगा अलगाववादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनईससीएनआईएम) और केंद्र सरकार के बीच वार्ताओं का दौर चला आ रहा है। बीते अप्रैल में हुई नये दौर की वार्ता से लोगों को लगा कि इस बार दोनों पक्ष एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझ पा रहे हैं। नये वार्ताकार आरएस पांडे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मुलाकात करने के बाद मुइवा से मिले थे। पांडे नगालैंड कैडर से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए आईएएस अधिकारी हैं। उनसे पहले के पद्मनाभन ने मुइवा एवं इसाक स्वू के साथ कई दौर की बातचीत करके नींव तैयार की थी और अब समझौता होने के आसार दिखने लगे थे। मगर, केंद्र सरकार के कुछ फैसलों ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। केंद्र ने अचानक अपना रुख बदलते हुए सीधे जवाब दे दिया कि पड़ोसी राज्यों की सहमति के बिना इस वार्ता का कोई सार्थक परिणाम नहीं निकल सकता। सरकार का यह बयान इस समस्या की सच्चाइयों से मुंह मोड़ना है, क्योंकि सभी जानते हैं कि नगा बागी वृहद नगालिम में पड़ोसी राज्यों के कुछ नगा बहुल इलाकों को भी शामिल करने की मांग करते रहे हैं। जब यह पहले से ही स्पष्ट है तो इस मौके पर केंद्र का यह बयान अपने बढ़े पैरों को पीछे खींचने जैसा है।

पिछले कई वर्षों से नगा बागी वृहद नगालैंड (नगालिम) के तहत नगा बहुल इलाकों को एक पृथक प्रशासनिक तंत्र में शामिल करने की मांग करते रहे हैं। उनका कहना है कि नगालिम में नगालैंड के अलावा मणिपुर के चार जिले, असम के दो पहाड़ी जिले और पूर्वी अरुणाचल प्रदेश के दो जिले भी शामिल किये जाएं। केंद्र के इस बयान से वार्ता असफल हुई तो एनयेससीएन (आईएम) के मुखिया मुइवा ने अपना पैंतरा बदला। उन्होंने 3 से 10 मई तक मणिपुर में अपने जन्मस्थान उख्रूल के सोमदाल आने का फैसला किया। नगा शांति वार्ता पिछले दस वर्षों से चल रही है, लेकिन इस बीच मुइवा कभी मणिपुर नहीं आये। अब उनके इस फैसले ने राज्य की जनता को दो हिस्सों में बांट दिया है। स्थानीय लोगों का एक हिस्सा मुइवा को आने देने के पक्ष में है, तो राज्य की जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा ऐसा नहीं होने देना चाहता। उसे डर है कि मुइवा अपने मणिपुर दौरे के दौरान लोगों को लामबंद करने की कोशिश करेंगे, जिससे राज्य का सांप्रदायिक माहौल बिगड़ सकता है। बिफरी हुई जनता चौक-चौराहों और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन पर उतर आयी।

राज्य सरकार भी इस खतरे से वाकि़फ थी और यही वजह है कि राज्य कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित कर यह फैसला ले लिया कि मुइवा को किसी भी कीमत पर मणिपुर में प्रवेश की इजाजत नहीं दी जाएगी। मणिपुर और नगालैंड की सीमा माओ गेट पर धारा 144 के तहत कर्फ्यू लगा दिया गया। मणिपुर का द्वार कहे जाने वाले माओ गेट पर कमांडो पुलिस और सुरक्षाबलों को मुइवा को आने से रोकने के लिए तैनात कर दिया गया। दूसरी ओर, मुइवा के मणिपुर आगमन का समर्थन करने वाले हजारों लोगों की भीड़ पांच मई को कर्फ्यू का उल्लंघन करती हुई माओ गेट पर एकत्र हो गयी। मुइवा के स्वागत के लिए आये लोगों की पुलिस के साथ झड़प हुई। उन्हें रोकने के लिए सुरक्षाबलों को हवाई फायरिंग और टियर गैस का इस्तेमाल करना पड़ा, जिसमें तीन लोगों की मौत हुई और 50 से अधिक घायल हो गये। घटना में मारे गये लोगों के परिजनों ने शव ले जाने से मना कर दिया है। पुलिस कार्रवाई के बाद मार्केट सेंटर के रूप में प्रचलित माउ बाजार में सन्नाटा पसरा है। बड़ी दुकानें, होटल और रोजमर्रा की जरूरतों वाली दुकानें बंद हैं। नेशनल हाइवे नंबर 39, जो मणिपुर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है, पूरी तरह बंद पड़ा है। इस वजह से लोग गुवाहाटी से इंफाल नहीं पहुंच पा रहे हैं। राज्य के बाहर रहने वाले हजारों छात्र अपने घर नहीं जा पा रहे हैं। माउ गेट पर मणिपुर आने वाली तेल और खाने-पीने के सामान से लदी गाड़ियां रुकी हुई हैं। राज्य में महंगाई आसमान छू रही है और जनता रोजमर्रा की जरूरतों की पूर्ति से भी महरूम है। मणिपुर की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए पीएमओ ने आदेश दिया कि जब तक यहां का माहौल शांत नहीं हो जाता, मुइवा की मणिपुर यात्रा स्थगित रहे। नगालैंड के मुख्यमंत्री नैफ्यू रिउ ने भी माहौल शांत होने तक यात्रा स्थगित रखने की अपील की। इस मामले में मणिपुर सरकार और जनता एक साथ है। लेकिन, केंद्र के टालमटोल वाले रवैये ने एक बार फिर इस आग में घी डाल दिया।

दिल्ली से बुलावा आने पर मणिपुर के मुख्यमंत्री ओ इबोबी सिंह 7 मई को दिल्ली पहुंचे। इस मसले को लेकर गृहमंत्री, रक्षा मंत्री और अन्य वरिष्ठ नेताओं से उनकी बातचीत हुई। केंद्र ने मुख्यमंत्री से कहा कि वह मुइवा के मणिपुर आने की व्यवस्था करें। केंद्र सरकार का तर्क है कि एनयेससीएन (आईएम) प्रतिबंधित संगठन नहीं है और इसलिए मुइवा को मणिपुर में आने से रोकना उचित नहीं है। उसने राज्य सरकार को मुइवा के लिए जरूरी सुरक्षा इंतजाम करने की सलाह दी, लेकिन मुख्यमंत्री ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मुइवा को रोकने का फैसला उनका व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राज्य कैबिनेट का है, जो इस आधार पर लिया गया है कि 40 वर्ष बाद मुइवा का अपने जन्मस्थल लौटना एनयेससीएन (आईएम) के पक्ष में नया माहौल बनाने में मददगार साबित हो सकता है। राज्य सरकार इसलिए भी डरी हुई है, क्योंकि मुइवा उख्रूल के अलावा मणिपुर के कई अन्य जिलों जैसे सेनापति, तमेंगलोग और अन्य नगा बहुल इलाकों में जाने की योजना बना रहे थे। सरकार का मानना है कि अपनी बैठकों और भाषणों के जरिये मुइवा हजारों वर्षों से एक साथ रह रहे नगा और मणिपुरी लोगों के बीच अलगाव की कोशिश करेंगे। केंद्र सरकार के इन विरोधाभासी फैसलों को देखकर आम जनता को लगने लगा है कि केंद्र मुइवा के इस दौरे का राजनीतिक इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है और इसमें मुइवा को हथियार बनाया जा रहा है। हालांकि, राज्य सरकार मुइवा को रोकने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, लेकिन फिर भी अगर मुइवा आ जाते है, तो इसके हर परिणाम के लिए केंद्र सरकार ही जिम्मेदार होगी। केंद्र के इस रवैये ने स्थानीय लोगों के जख्मों को फिर से हरा कर दिया है। उन्हें लग रहा है कि मुइवा के मणिपुर आने का यह मुद्दा कहीं 2001 के उस कांड की पुनरावृत्ति न कर दे, जिसमें 18 लोगों की मौत हो गयी थी। लोग सहमे हुए हैं। 18 जून, 2001 को हुई घटना के लिए भी लोग मुइवा को ही जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि मुइवा अगर ग्रेटर नगालैंड के सपने न देख रहे होते, तो 18 जून की घटना नहीं घटती और शांति वार्ता भी तेजी से आगे बढ़ती।

केंद्र सरकार केवल अपना राजनीतिक लाभ देखते हुए मुइवा को मणिपुर आने देने के लिए दबाव डाल रही है, मगर वह इस बात को भूल रही है कि वहां की जनता भी भारत का हिस्सा है, उसकी भावनाओं से खेलकर केंद्र दरअसल उसके मन में अपने ही खिला़फ कांटे बो रहा है। इससे देश की एकता और अखंडता को खतरा हो सकता है। केंद्र सरकार ने अगर दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखा होता, तो वह यह निर्णय न लेती। शांति वार्ता को लेकर आम जनता का खून बहा था, वह शायद केंद्र को याद नहीं है। स्थिति इतनी विस्फोटक हो चुकी है कि अब यदि मणिपुर सरकार मुइवा को आने की इजाजत दे भी देती है, तो हालात इससे भी ज्यादा बदतर हो सकते हैं। अब भी समय है कि केंद्र सरकार राजनीतिक बयानबाजी और निजी स्वार्थों को दरकिनार करते हुए जमीनी हकीकत को समझे। साथ ही उसे यह भी समझना होगा कि यह मामला जनता की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। इसलिए जरूरी है कि वह जबरदस्ती की अड़ंगेबाजी से बाज आये और राज्य की बहुसंख्यक जनता की इच्छाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी नीतियों को स्पष्ट करे।

मणिपुर जरूर जाऊंगा : मुइवा

नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) ने भारत सरकार से शिलांग समझौता टूटने के बाद 30 अप्रैल, 1988 को नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड का गठन किया था। बाद में एनयेससीएन दो गुटों में बंट गया। पहला गुट एनयेससीएन (आईएम) यानी आइजाक चीसी स्वू और थुइङालेंग मुइबा और दूसरा एनयेससीएन (के) यानी खपलांग के रूप में जाना जाने लगा। एनयेससीएन (आईएम) का एक ही मकसद है, माओत्से-तुंग की क्रांतिकारी विचारधारा पर आधारित ग्रेटर नगालिम का गठन। इस संगठन के घोषणापत्र में स्पष्ट रूप से मांग की गयी है कि नया नगालैंड केवल ईसाइयों के लिए हो। भारतीय संविधान के मौजूदा दायरे में ऐसा संभव नहीं है और एनएससीएन (आईएम) इसके खिला़फ सशस्त्र आंदोलन चलाने का पक्षधर है। हालांकि, केंद्र के साथ पहली बार 1997 में हुए युद्ध विराम समझौते के बाद से हिंसा का दौर थमा हुआ है, लेकिन मौजूदा विवाद से सांप्रदायिक भावनाएं एक बार फिर भड़क जाने का खतरा भी पैदा हो गया है। दूसरी ओर, संगठन के जनरल सेक्रेटरी थुइङालेंग मुइवा भी राज्य सरकार को चुनौती देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उनका कहना है कि मैं मणिपुर जरूर जाऊंगा और अपने परिजनों एवं रिश्तेदारों से मिलूंगा। कोई भी ताकत मुझे नहीं रोक सकती। मैं मणिपुरियों से कुछ नहीं लूंगा। किसी भी तरह के आपत्तिजनक काम नहीं करूंगा। मैं स़िर्फ नगाओं के हक की ही मांग करूंगा। मणिपुरियों ने मेरी यात्रा में बाधा डाली, इससे मैं बहुत आहत हूं। यह यात्रा शांति के लिए है, किसी को परेशान करने के लिए नहीं।

bijen(सलाम बिजेन सिंह। मणिपुर के बिश्‍नुपुर में जन्‍म। मछुआरा परिवार। हिंदी सीखने देवघर हिंदी विद्यापीठ आये। पढ़ाई अधूरी छोड़ कर पत्रकारिता शुरू की। प्रभात ख़बर, दैनिक भास्‍कर, हिंदुस्‍तान के बाद फिलहाल चौथी दुनिया के साथ जुड़े हैं। इंदिरा गांधी मुक्‍त विश्‍वविद्यालय से छूटी हुई पढ़ाई पूरी कर रहे हैं। उनसे sbijensngh@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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