भोपाल के बूचड़खाने में सब नंगे हैं

♦ राजेन तोडरिया

कहते हैं कि ईश्वर के घर में देर है पर अंधेर नहीं। पर भारतीय अदालतों के बारे में ऐसा कतई नहीं कहा जा सकता। देर और अंधेर उनकी बुनियादी और इनबिल्ट विशेषताएं हैं या कह सकते हैं कि मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट हैं। वे फैसले करने में अन्याय की हद तक देर लगाती हैं और उस पर तुर्रा यह कि उनके अधिकांश फैसले से अंधेर जैसे निराश कर देने वाले लगते हैं। बाजार की सेल्स प्रमोशन स्कीमों की तरह न्याय चाहने वाले लोगों को एक आफत के साथ दूसरी आफत मुफ्त में मिलती है। हालांकि साख बचाये रखने लायक अपवाद वहां भी होते हैं। हर व्यवस्था की तरह यह उसकी जरूरत भी है या कहें कि मजबूरी भी। भोपाल गैस त्रासदी पर जब अदालत का फैसला आया, तो मीडिया में मची चीख पुकार के बावजूद अदालत ने वही किया, जो उसकी बड़ी बहनें अब तक करती आयी हैं। वरना इतनी बड़ी तादाद में हुए नरसंहार और लाखों लोगों को यातनाओं के नरक में धकेलने वाले इस कारपोरेट अपराध पर 25 साल बाद फैसला सुनाना तो मूल अपराध से भी बड़ा अपराध है।

इससे पहले 1989 और 1996 में सुप्रीम कोर्ट भी गैस पीड़ितों के खिलाफ अपना फैसला सुना चुका है। इसलिए इस फैसले को ‘देर और अंधेर’ के रूप में याद रखा जाना चाहिए। भोपाल गैस कांड भारतीयों को गिरमिटियों के रूप में बेचे जाने के बाद पहला मौका था जब विश्व बाजार में भारतीयों को इतनी कम कीमत पर बेचा गया। यदि मृतकों की जान की औसत कीमत और विकलांग हुए जिंदा लोगों के न्यूनतम गुजर बसर की लागत, जिसमें दवाइयों पर होने वाला न्यूनतम खर्च भी शामिल है, को मुआवजे का आधार माना जाए, इस कंजूस आकलन पर भी गैस पीड़ितों को 1737 अरब रुपये बतौर मुआवजा मिलना चाहिए था। मुआवजे के इस आकलन में पीड़ितों का औसत जीवन काल 25 साल माना गया है। यदि हर्जाने के तौर पर इसका आकलन किया जाए तो मुआवजे की राशि कई सौ खरब में पहुंच जाएगी। यदि भारतीयों की औसत उम्र पर हर्जाने की गणना की जाए तो यह कई गुना अधिक होगी। यदि अमेरिका या पश्चिमी देशों में ऐसा नरसंहार हुआ होता तो दोषियों को सजा के साथ इतना हर्जाना देना पड़ता कि उससे यूनियन कार्बाइड दिवालिया हो गयी होती।

मगर भारतीय न्यायपालिका ने ऐसा न पहली बार किया है और न आखिरी बार। इसे दुर्लभतमों में से दुर्लभ खराब फैसला भी नहीं कहा जा सकता। भारतीय राज्य और कारपोरेट घरानों के पक्ष और आम लोगों के विपक्ष में ऐसे फैसले आते रहते हैं। सिर्फ इतना हुआ है कि उदारीकरण के बाद न्यायपालिका ने उस लबादे को भी उतार फेंका है जो उसकी मिथकीय निष्पक्षता का आभामंडल बनाता था। उदारीकरण के बाद आये अनगिनत फैसलों के जरिये न्यायपालिका ने पहले ही यह साफ कर दिया है कि उसका भी अपना एक खास वर्ग और पक्ष है जो अक्सर पीड़ितों के खिलाफ दिखाई देता है। अलबत्ता अदालतें कभी-कभार ऐसे फैसले भी करती हैं जो लोगों को ढाढ़स बंधाते दिखते हैं। ऐसे फैसलों से लगता है कि देश की न्यायव्यवस्था का सूरज आखिरी तौर पर अभी डूबा नहीं है। चमत्कृत कर देने वाले ग्रीक, रोमन उद्धरणों, अंग्रेजी के खूबसूरत शब्दों में गुंथे प्रभावोत्पादक भाषा वाले ये फैसले जजों की विद्वता पर भरोसा बंधाते हैं। न्यायिक इतिहास में रुचि रखने वाले लोग इन्‍हें नक्काशीदार फ्रेमों में जड़कर रख सकते हैं। ऐसे फैसले सूक्तियों की तरह याद रखे जाते हैं। देर और अंधेर के अंधेरों के बीच पेंसिल टॉर्च की तरह टिमटिमाते इन फैसलों की रोशनी आम लोगों को निराश नहीं होने देती। बावजूद इसके ये फैसले लोगों की रोजमर्रा के जीवन में राज्य और प्रभावशाली लोगों के द्वारा किये जा रहे अन्याय को कम नहीं कर पाते और न ही वे अन्याय और दमन की मशीनरी को भयभीत कर पाने में समर्थ होते हैं।

नवें दशक तक जनांदोलन और न्यायपालिका मिलकर जन असंतोष के दबाव को कम करने के लिए सेफ्टी वाल्व का काम करते थे। दोनों मिलकर लोकतंत्र में लोगों का भरोसा कायम रखते थे। बीसवीं सदी के आखिरी दशक में जब उदारीकरण का दौर आया तो अदालतें पूरी तरह से उदारीकरण की चपेट में आ गयीं। देश के हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट के द्वारा 1991 और उसके बाद किये गये फसलों की समीक्षा करें तो यह साफ नजर आ जाता है कि इस दौर में अदालतों के अधिकांश दूरगामी फैसले मजदूरों, किसानों, विस्थापितों, कर्मचारियों जैसे सामान्य वर्ग के लोगों के खिलाफ गये हैं। इसी दौर में न्यायपालिका ने हड़तालों, जुलूसों और सभाओं पर पाबंदी लगाने जैसे फैसले किये जो दरअसल अराजनीतिक उच्च वर्ग और उच्च मध्यवर्ग को खुश करने के लिए जैसे महसूस किये गये। हजारों लाखों लोगों की भागीदारी वाले टिहरी बांध से लेकर नर्मदा बांध विरोधी आंदोलनों को अदालती फैसलों ने एक झटके में ही धूल चटा दी। इन अहिंसक आंदोलनो को सजा-ए-मौत का फैसला अदालतों ने ही सुनाया। इसी दौर में सबसे ज्यादा फैसले भी कारपोरेट कंपनियों के पक्ष में हुए। चाहे वे हड़तालों और सेवा संबधी मामलों के रहे हों या फिर कारपोरेट घरानों से जुड़े अन्य हितों के। कारपोरेटी समूहगान में विधायिका, कार्यपालिका के साथ न्यायपालिका के भी खड़े होने का ही परिणाम था कि उदारीकरण के बाद देश में औद्योगिक मजदूरों की हालत बद से बदतर हो गयी। आउट सोर्सिंग के चोर दरवाजे के चलते निजी क्षेत्र में बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में मजदूर आंदोलनों से हासिल हुई अधिकांश सुविधाएं खत्म कर दी गयी हैं।

उदारीकरण के दौर में एक ओर जहां लोगों के संकट बढ़ते रहे, वहीं न्यायपालिका सामान्य लोगों के बुनियादी सवालों के प्रति अनुदार होती गयी। हालांकि राजनेताओं और कुछ हाई प्रोफाइल लोगों के खिलाफ फैसले सुनाकर उसने मीडिया से तालियां भी बटोरीं और यह आभास कराने की कोशिश भी की कि सरकारी तंत्र के लिए उसके पास काटने वाले दांत भी हैं। पर यह सब वाहवाही लूटने से आगे का खेल नहीं था। ऐसा उदाहरण खोजना मुश्किल है, जब कोई कोर्ट हस्तक्षेप कर किसी जनाधिकारों के पक्ष में आगे आया हो। छत्तीसगढ़ से लेकर उड़ीसा तक अहिंसक आंदोलन सरकारों के दमन के आगे असहाय और पराजित होते रहे, पर अदालतें लोगों के जीने के अधिकार की गारंटी नहीं कर पायीं। आदिवासियों को खदेड़ने पर तुले कारपोरेट राक्षसों पर देश की अदालतें चुप हैं। जाहिर तौर पर यह जनअसंतोष को सुरक्षित रास्ता देने की पुरानी लोकतांत्रिक रणनीति में बदलाव का संकेत है। भारतीय शासन व्यवस्था में आंदोलनों और जनअसंतोष के प्रति बढ़ रही इस अनुदारता की काली छाया न्यायपालिका पर भी दिख रही है।

उदारीकरण के आगमन के बाद से यदि भारतीय जनजीवन में हिंसा बढ़ी है, तो इसका कारण भी यही है कि लोकतंत्र के चारों पाये अब घोषित रूप से कारपोरेट लोकतंत्र के पक्ष में हैं। न्यायपालिका पर अनास्था रखने वाले समूह बढ़ रहे हैं। यह आखिरी किला था जो भारतीय लोकतंत्र की वर्गीय पक्षधरता को संतुलित करता था। इसकी वर्गीय पक्षधरता भी उजागर होने के बाद किस मुंह से भारतीय राज्य खुद के लोकतंत्र होने का दावा कर सकेगा? भोपाल गैस कांड यह सवाल भी देश के लोकतंत्र से पूछ रहा है। पांच लाख से ज्यादा लोगों से उनके स्वाभाविक रूप से जीने का प्राकृतिक और संवैधानिक अधिकार छीनने के दोषी लोगों में से एक के खिलाफ भी कोई कार्रवाई न हो, ऐसा अंधेर तो इसी देश में संभव है। भोपाल के इस कारपोरेट बूचड़खाने में भारतीय कारपोरेट कंपनियां, कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका सब के सब नंगे खड़े हैं। ऐसे में भोपाल गैस कांड के पीड़ितों को न्याय के लिए शायद अगले जन्म का इंतजार करना होगा। क्या इस न्यायिक अंधेर पर किसी को कभी शर्म आएगी?

Rajen Todariya(राजेन तोडरिया। वरिष्‍ठ पत्रकार। उत्तरांचल की राजधानी देहरादून में रहते हैं। दैनिक भास्‍कर और अमर उजाला में बरसों बड़ी जिम्‍मेदारियों में रहे। देहरादून से जनपक्ष नाम की पत्रिका निकाली। फिलहाल जनपक्ष प्रकाशन से पहाड़ी कंटेंट पर कुछ किताबें निकाल रहे हैं। उनसे todariya@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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