भोपाल मर रहा था, अर्जुन सिंह जहाज में उड़ रहे थे

इतिहास का सबसे दर्दनाक हादसा

♦ आनंद स्वरूप वर्मा

1984, दो /तीन दिसंबर को हुई भोपाल गैस त्रासदी के बाद यह विशेष संपादकीय साप्‍ताहिक सहारा के तब के लखनऊ संपादक आनंद स्‍वरूप वर्मा ने लिखा था। उस हादसे के बाद जब पूरा देश क्रोध से जल रहा था, उस क्रोध की छाया इस संपादकीय में देखी जा सकती है। लेकिन नेता कितने इत्‍मीनान थे और अपनी चुनावी तैयारियों में कितने मशरूफ थे, इसकी सूचना भी इस संपादकीय से मिलती है : मॉडरेटर

लगभग आठ लाख की आबादी वाले शहर भोपाल को देखते देखते गैस चैंबर में तब्दील करने वाली अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कार्बाइड के आला अफसरों के साथ साथ मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह, उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों तथा राज्य के बड़े-बड़े नौकरशाहों के भी हाथ जनता के खून से रंगे हुए हैं। तीसरी दुनिया के देशों को अपनी चारागाह बनाने वाले मौत के सौदागर अमरीकी साम्राज्यवादियों की मुनाफाखोरी को बढ़ाने के लिए इनके अनुग्रह पर पलने वाले मंत्रियों और अफसरों की सुविधालोलुपता ने हजारों बेगुनाहों को मौत के घाट उतार दिया। इस दुर्घटना में न तो अर्जुन सिंह की मौत हुई और न उनके किसी रिश्तेदार की, यह पिट्स विमान दुर्घटना जैसा कोई हादसा भी नहीं था जिसमें गांधी-नेहरू परिवार का कोई व्यक्ति मारा गया हो। सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों को जनता के खून पसीने से तैयार सुरक्षा कवच हासिल है – इसलिए शताब्दी की इस सबसे दर्दनाक दुर्घटना पर न तो कोई राष्ट्रीय शोक मनाया गया, न सरकारी इमारतों पर लहरा रहे तिरंगे झुकाये गये और न अगले पांच वर्षों के लिए जनता को फिक्स्ड डिपॉजिट खाते में जमा कर ऐरय्याशी करने के कार्यक्रम ही टाले गये। यह आम लोगों की मौत थी – फिर वह पचीस सौ हों या 25 हजार या 25 लाख – कोई फर्क नहीं पड़ता। इनकी मौतें अखबार की सुर्खियां ही बन सकीं। सभी काम बदस्तूर जारी रहे। न तो विपक्ष ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाया और न सत्तारूढ़ दल के केंद्रीय नेताओं ने हत्यारों की शिनाख्त करने की जरूरत को महसूस किया। अमरीका से आये यूनियन कार्बाइड के अध्‍यक्ष एंडरसन की गिरफ्तारी और रिहाई भी इतने नाटकीय ढंग से हुई कि सारा मामला रहस्य में ही लिपटा रह गया…

यह कोई प्राकृतिक दुर्घटना नहीं थी – सरकार की लापरवाही से घटित दुर्घटना थी। इस दुर्घटना के लिए सीधे तौर पर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह जिम्मेदार हैं क्योंकि उन्हें बार-बार बताया गया था कि कारखाने की सुरक्षा व्यवस्था गड़बड़ है। उन्हें पता था कि अतीत में कई बार ऐसी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। वह जानते थे कि उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों और अफसरों के भाई, भतीजे, रिश्तेदार इस कारखाने में बड़े ओहदों पर हैं और गड़बड़ियों पर परदा डाल रहे हैं। खुद मुख्यमंत्री इस कारखाने से तरह तरह की सुविधाएं ले रहे थे लेकिन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने न तो उनसे इस्तीफे की मांग की, न उनकी सरकार बर्खास्त की गयी और न उन्हें गिरफ्तार ही किया गया। एक ऐसे अपराध के लिए, जिसमें 2500 से ज्यादा लोग मारे गये हों और दो लाख से ज्यादा लोग आने वाले दिनों में तिल-तिल कर मरने के लिए अभिशप्त बना दिये गये हों, देश के कानून के मुताबिक सबसे कड़ा दंड दिया जाना चाहिए। लेकिन यह काम कार्यपालिका का नहीं है इसे कोई न्यायालय ही कर सकता है और अपराधियों को न्यायालय तक पहुंचाने का काम जिन लोगों को करना है, वे चुनाव में व्यस्त हैं। चुनावों के मौके पर हर छोटी बड़ी घटना में विदेशी हाथ ढूंढने वाले सत्ता और विपक्ष के राजनीतिज्ञों को जनता के खून से तरबतर अमरीकी साम्राज्यवाद का हाथ क्यों नहीं दिखाई दे रहा है? उन्हें क्यों नहीं वे नरभक्षी चेहरे दिखाई दे रहे हैं, जो इन खूनी हाथों से मिलने वाली सुविधाओं को बेशर्मी से डकार रहे थे। यह एक अहम सवाल है।

मौत का नाम भोपाल हो गया

अर्जुन सिंह का अपराध अक्षम्य है। भोपाल को देश की सांस्कृतिक राजधानी का गौरव दिलाने में लीन तथाकथित संवेदनशील मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि 26 दिसंबर 1981 से (जब इस कारखाने में जानलेवा फास्जीन गैस के लीक होने की पहली घटना हुई थी) 3 दिसंबर 1984 के बीच कारखाने के अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गयी और जनता की सुरक्षा के कौन से उपाय किये गये? उन्हें जनता के सामने स्पष्ट करना चाहिए कि दिसंबर 1982 में एक मंत्री ने राज्य विधानसभा को क्यों यह कहकर गुमराह किया कि यूनियन कार्बाइड कारखाने की जहरीली गैस से किसी भी तरह का नुकसान नहीं है? उन्हें बताना चाहिए कि अमरीकी वैज्ञानिकों के एक दल ने जब उक्त कारखाने की सुरक्षा व्यवस्था पर चिंता व्यक्त की, तो कौन से कदम उठाये गये?

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजधानी दिल्ली से प्रकाशित प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक जनसत्ता ने 16 जून 1984 के अंक में ‘भोपाल ज्वालामुखी के मुहाने पर’ शीर्षक से अपने प्रतिनिधि राजकुमार केसवानी की एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें आने वाले खतरों की स्पष्ट चेतावनी थी, लेकिन सरकार ने उस पर तनिक भी ध्‍यान नहीं दिया। केसवानी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था, ‘भोपाल अभी 24 नवंबर 1978 के उस दिन को भी भूल नहीं पाया है, जब उसी कारखाने के नेफथाल स्टोर में ऐसी भयानक आग लगी थी कि सारा शहर उस रात सो नहीं पाया था। दस घंटे तक इस आग पर काबू नहीं पाया जा सका था। दसों दमकलों व सैकड़ों लोगों के प्रयासों से इस शहर के लोगों की नींद वापस लौट पायी थी। इस दुर्घटना तक कारखाने में फास्जीन स्टोरेज टैंक नहीं था। विकासशील देशों में विकसित देशों द्वारा खेले जाने वाले खेल में यदि किसी दिन इस तरह की दुर्घटना फिर घट जाती है, तो भोपाल में हो सकने वाली विनाशलीला का बयान करने वाला भी कोई चश्मदीद गवाह बचेगा क्या?’

पत्रकार केसवानी ने अपनी रिपोर्ट में यह आशंका व्यक्त की थी कि सारी चेतावनियों के बावजूद सरकार कोई कदम नहीं उठा सकेगी, क्योंकि उसके निहित स्वार्थ हैं। रिपोर्ट का एक अंश: ‘… ऐसा नहीं है कि सरकार यह सब नहीं जानती। हर दुर्घटना के बाद प्रशासन जांच की बात कहकर छुटकारा पा लेता है… मध्यप्रदेश के ‘पारदर्शी व्यक्तित्व’ वाले मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री निवास के नजदीक श्यामला पहाड़ी पर एकांत में बने कार्बाइड गेस्ट हाउस को उनके निजी उपयोग के लिए दिया जाता रहा है। पिछले वर्ष हुए कांग्रेस के क्षेत्रीय अधिवेशन के समय मुख्यमंत्री के इस प्रिय गेस्ट हाउस में मंत्रियों के ठहरने की व्यवस्था की गयी थी। अधिवेशन के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला यह एक मात्र गैर सरकारी गेस्ट हाउस था…’

रिपोर्ट में आगे कहा गया है – ‘शहर के एक नामी व असरदार चिकित्सक कार्बाइड के चिकित्सा सलाहकार हैं तथा इंका नेता व वकील विजय गुप्त विधि सलाहकार हैं। प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक रामनारायण लागू को कारखाने का सुरक्षा ठेका दिया गया है। राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री नरसिंह राव दीक्षित के भांजे विजय अवस्थी को जनसंपर्क अधिकारी बनाया गया है तो वर्तमान सिंचाई मंत्री दिग्विजय सिंह के भतीजे को भी नवाजा गया है। प्रदेश के सह मुख्यसचिव राजकुमार खन्ना के साले राणा भी वरिष्ठ पद पर आसीन हैं।’

उपरोक्त तथ्यों ने मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को भी साम्राज्यवादियों की कृपा पर पलने वालों की कतार में शामिल कर दिया है। दरअसल, उन्होंने खुद भी नहीं सोचा होगा कि दुर्घटना का स्वरूप इतना भीषण हो सकता है। उन्होंने सोचा था कि अगर कभी दुर्घटना हुई भी, तो 10-20 लोग मारे जाएंगे। आम आदमी की जिंदगी के प्रति अगर उनका उपेक्षात्मक रवैया न रहा होता तो वे कोशिश करते कि एक भी व्यक्ति न मारा जाए और निश्चय ही यह हादसा नहीं हुआ होता।

लेकिन यह रवैया केवल अर्जुन सिंह का ही नहीं है। प्रधानमंत्री राजीव गांधी से लेकर विपक्षी दलों के नेताओं तक सभी ने यह सतर्कता बरती कि इस दुर्घटना में ‘उलझने’ से चुनावी कार्यक्रमों में बाधा न पड़ जाए। किसी विपक्षी दल ने यह मांग नहीं की कि चुनावों को स्थगित किया जाए और पीड़ितों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सहायता एवं पुनर्वास कार्यक्रम लिए जाएं।

प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि 16 जून ’84 को ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित स्पष्ट चेतावनी के बावजूद अर्जुन सिंह ने क्या किया? यदि कुछ नहीं किया तो उन्हें हिरासत में क्यों नहीं लिया गया? इतना ही नहीं, 6 दिसंबर को जिस समय समूचा भोपाल मौत की दहशत में डूबा हुआ था, दोपहर बाद अर्जुन सिंह राजीव गांधी के साथ अपनी पार्टी के चुनाव प्रचार के लिए भोपाल से बाहर रवाना हो गये।

(लखनऊ से प्रकाशित साप्ताहिक सहारा के 16-22 दिसंबर 1984 के अंक में प्रकाशित)

Anand Swaroop Verma(आनंद स्‍वरूप वर्मा भारत में कॉरपोरेट पूंजी के बरक्‍स वैकल्पिक पत्रकारिता के लिए लंबे समय से संघर्षरत हैं। समकालीन तीसरी दुनिया पत्रिका के संपादक हैं और नेपाली क्रांति पर उन्‍होंने अभी अभी एक डाकुमेंट्री फिल्‍म बनायी है। उन्‍होंने कई किताबें लिखी हैं। उनसे vermada@hotmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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