साजिद रशीद और चिदंबरम की जबान एक क्‍यों है?

♦ विश्‍वदीपक

 इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन हो गया है कि नक्सलवादियों और आतंकवादियों में आखिर क्या अंतर है…?
 ‘मूर्ख का सपना’ इसी को कहते हैं…
 सरकार किसी पिछड़े इलाके में प्रगति का कोई काम शुरू करती है, तो नक्सलवादी उसे सफल नहीं होने देना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि पिछड़ों और आदिवासियों के जीवन में कोई सकारात्मक परिवर्तन आये, क्योंकि वे जानते हैं कि प्रगति असंतोष को खत्म कर देगी…
 तब तालिबान और माओवादियों में अंतर नहीं रह जाता…

(साजिद रशीद के लेख के अंश)




गुलाम बौद्धिकता के ऐसे घातक लेकिन स्‍पष्ट नमूने कम ही देखने को मिलते हैं।

दिमाग को गिरवी रखकर सब कुछ उसी अंदाज में सोचना, बोलना और लिखना जैसा कि सत्ता वर्ग चाहता है – हर दौर में होता है लेकिन साजिद रशीद का उदाहरण कई मायनों में महत्वपूर्ण है।

पहली बात तो वो पेशे से पत्रकार हैं और उनके द्वारा तथ्यों की अनदेखी को माफ नहीं किया जा सकता। दूसरा उन्‍होंने जिस भाषा का इस्तेमाल किया है, वो नितांत अस्वीकार्य है। खासकर अरुंधती को मूर्ख कहना हास्यास्पद है। तीसरा उन्‍होंने जनता के उस बड़े संघर्ष को खारिज ही नहीं किया है बल्कि उसे अपने तर्कों से घटिया और तुच्छ साबित करने की कोशिश की है, जिसके पीछे प्रगतिशीलता और बदलाव के सपने हैं। असहमति एक बात है और दूसरे को नीचा दिखाना दूसरी बात है। रशीद ने दूसरा कारनामा किया है।

हम जानते हैं कि समाज का पहरुआ माना जाने वाला बुद्धिजीवी वर्ग बिक चुका है। खासकर हिंदी का। लेकिन अब ये धारणा भी जाती रही कि उर्दू प्रेस में अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए प्रतिरोध ज्यादा है। हाशिये पर पड़े मुस्लिम समाज के एक महत्वपूर्ण प्रगतिशील चेहरे का इस तरह चालाकी-दलाली की भाषा बोलना कई सवाल पैदा करता है।

हम ये मान कर चलते हैं कि साहित्य अकादमी के चक्कर में और राज्यसभा की तलाश में बड़े से बड़े समझौते किये जाते हैं लेकिन आत्मा की नंगई इस तरह भी खुलकर कहीं बयान नहीं की जाती! साजिद रशीद ने इतना लिहाज भी नहीं किया है।

आप उनके लिखे हुए को पढ़ना शुरू कीजिए, साफ हो जाएगा कि वो अपने निष्कर्ष पहले ही तय कर चुके थे। बस उन्‍हें किसी बहाने का इंतजार था। उन्‍होंने अरुंधति की जिस ‘खून से डूबी हुई रोशनाई’ का जिक्र किया है, उसका खंडन माओवादी पहले ही कर चुके हैं। लेकिन रशीद ने इस तथ्य की जांच पड़ताल करने की जहमत भी नहीं उठायी। बाकायदा माओवादियों की तरफ से प्रेस विज्ञप्ति भेजी गयी थी, जिसमें इस हमले के पीछे उनका हाथ होने से इनकार किया गया था लेकिन रशीद साब का दिमाग इस कदर अवसरग्रस्त और पक्षपातपूर्ण है कि उन्‍होंने उन सामान्य तथ्यों की भी अनदेखी कर दी है, जिसे हर कोई जानता-समझता है।

(ट्रेन हादसे के बाद गृह मंत्रालय और रेलमंत्री दोनों की तरफ से जो बयान जारी किये गये, उसमें माओवादियों का नाम कहीं नहीं था। सिर्फ आशंका जाहिर की गयी थी। बाद में सबोटेज का मामला सामने आया। गृहमंत्रालय ने सबोटेज कहा और रेल मंत्री ने विस्फोट कह दिया था। इस मसले पर कांग्रेस और ममता के बीच विवाद भी हुआ था। सिर्फ आजतक और स्टार न्यूज ने सवाल और संदेह की गुंजाइश छोड़ी थी, बाकी अंग्रेजी के तथाकथित समझदार और परिपक्व चैनल राशिद की ही तरह इसे माओवादी-आतंकवादी हमला साबित करने में पिले पड़े थे।)

बाद में इंडियन एक्सप्रेस (5 जून, 2010) ने इस मसले पर एक विस्तृत खोजपरक रिपोर्ट छापी थी कि बापी महतो नाम के उत्साही नौजवान नेता के निर्देश पर पीसीपीए के कुछ सदस्यों ने दुर्घटना को अंजाम दिया था। हालांकि उनका मकसद भी माल गाड़ी को डिरेल करना था लेकिन प्रशासन की लापरवाही ने इस घटना को अवश्यंभावी बना दिया। बापी इस हरकत के बाद से माओवादियों के डर से फरार है।

लेकिन सवाल ये है कि क्या राशिद को ये बातें पता नहीं होंगी? फिर वो ऐसा क्यों कह रहे हैं? सीपीआई की जिस वैचारिक जमीन पर वो पले बढ़े हैं, वो कांग्रेस के चरण धोते-धोते लुप्तप्राय हो चुकी है। अब रशीद की बारी है। जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा, तब उनकी भूमिका का भी जिक्र होगा और बताने की जरूरत नहीं कि तब उनका परिचय किन शब्दों में लिखा जाएगा।

रशीद ने माओवादियों के प्रतिरोध को ‘सामूहिक दमन’ की कार्रवाई बताया है। लगता है वो ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ के सूत्र वाक्य पर यकीन रखते हैं। वरना कोई कारण नहीं कि वो हिंसा-अहिंसा के विचार का इतना सरलीकरण करते। उन्‍हें ये मालूम होगा कि माओवादियों की हिंसा मजबूरी है, उनका चुनाव नहीं। जिस समाज की एक-एक ईंट हिंसा की नींव पर रखी हो, वहां ऐसे लिजलिजे तर्क क्षोभ पैदा करते हैं। एक बार वो पैगंबर और कृष्ण पुलिस और सेना की हिंसा पर बात करके देखें। समझ में आ जाएगा।

जॉन मिडॉल और गौतम नवलखा के साथ अपने इंटरव्यू में (जनवरी 2010) माओवादी नेता, गणपति ने साफ तौर पर कहा है कि ‘हम जानते हैं कि हमारी पार्टी बहुत छोटी है… लेकिन हमारी ताकत हमारी मार्क्‍सवादी विचारधारा में है… कि हम हिंसा नहीं चाहते हमें मजबूरी में हथियार उठाना पड़ा है… कि हम नये तरह का लोकतांत्रिक समाज बनाना चाहते हैं…’ लेकिन इस पर साजिद रशीद को भरोसा नहीं होगा। उन्‍हें भरोसा है चिदंबरम की दलीलों में। अगर भारतीय राज्य इतना बर्बर, आक्रामक और हिंसक नहीं होता तो मध्यभारत के वो लोग हथियार नहीं उठाते, जिनकी पसलियां चमड़ी फाड़कर बाहर आने के लिए बेताब हैं। और वो लोग तो कतई नहीं जो मलेरिया के इलाज के अभाव में हर रोज आज भी तड़प-तड़प कर मरते हैं।

रशीद की विवेकहीनता का आलम ये है कि वो ‘आंतकवाद’ और ‘माओवाद’ को एक ही तराजू पर तौल रहे हैं। उन्‍हें आतंकवाद और माओवाद में फर्क भी समझ में नहीं आ रहा? क्या रशीद की बातों में, अमेरिका और कांग्रेस की दलीलों में कोई फर्क नजर आ रहा है? रशीद कहते कि माओवादी ‘सत्ता में परिवर्तन’ के ख्वाहिशमंद है। अब जबकि भारतीय राज्य अपनी वैधानिकता की सबसे खरतनाक जद्दोजहद कर रहा है राशिद जैसे लोगों को डर क्यों लग रहा है? क्या महज इसीलिए कि वर्तमान सत्ता संरचना में उनकी जो हिस्सेदारी है, सुविधाएं हैं, सहूलियतें है वो छिन जाएंगी?

रशीद ने माओवादी हिंसा के बरक्स ‘प्रगति’ के सवाल को भी उठाया है। जो प्रगति ‘नव उदारवाद’ के रास्ते उनके ड्राइंग रूम में घुस रही है, अच्छा ही है कि वो देश के बड़े हिस्से में नहीं पहुंची है। मैं सलाह दूंगा कि रशीद जरा प्रभाष जी के पुराने कॉलम पढ़ लें। ये अरुंधती के कानू से मुलाकात की सलाह से ज्यादा जरूरी है।

अब प्रभाष जी नहीं रहे लेकिन ‘मनमोहनी विकास’ के ढांचे पर उन्‍होंने जो टिपप्णियां की हैं, वो दिमाग की चूलें हिला देने के लिए काफी है।

रशीद की धृष्टता (माफ करें) ने अरुंधती की संवेदना और साहस को ‘मूर्खों का सपना’ करार दिया है। अरुंधती हमारे समय की सबसे प्रखर मेधा है। उनकी आंखों में जितना सुंदर सपना है, उसके लिए कई जन्म कुर्बान किये जा सकते हैं। प्रतिभा, संवेदना, साहस और तर्कों का ऐसा सुंदर और जीवंत समन्वय हमें पिछले कई दशकों से देखने को नहीं मिला था। पर ये रशीद को दिखाई नहीं देगा। जिन आंखों में मध्यवर्गीय नफा नुकसान और समझौते का कीचड़ चिपका हो, उनको सपने कैसे आ सकते हैं।

रशीद ने अपने पूरे लेख में वस्तुगत विश्‍लेषण के मूलभूत नियमों की जमकर धज्जियां उड़ायी हैं। हालांकि इस दुनिया में कुछ भी वस्तुगत नहीं है, फिर भी विश्लेषण के लिए इस सिद्धांत को मानना पड़ता है। आखिर तक आते रशीद ने माओवादियों की तुलना तालिबानियों से कर दी है। माओवादियों का धुर से धुर विरोधी भी इस तरह की अंधतुलना करने की मूर्खता नहीं कर सकता। लेकिन रशीद ने की है। इसका इनाम उन्‍हें क्या मिलेगा, ये तो वही बता सकते हैं, लेकिन मिलेगा जरूर। आखिर इस जहान में सोचने समझने की आजादी बेचने की कुछ तो कीमत मिलेगी ही।

Vishwadeepak copy(विश्‍वदीपक। तीक्ष्‍ण युवा पत्रकार। आजतक से जुड़े हैं। रीवा के रहने वाले विश्‍वदीपक ने पत्रकारिता की औपचारिक पढ़ाई आईआईएमसी से की। विश्‍व हिंदू परिषद के डॉन गिरिराज किशोर से लिया गया उनका इंटरव्‍यू बेहद चर्चा में रहा। उनसे vishwa_dpk@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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