आम आदमी पर बहसतलब, आम आदमी एक भी नहीं!

♦ आशीष कुमार ‘अंशु’



अनुराग कश्‍यप से सवाल करते हुए दिलीप मंडल

बहसतलब दो से जुडी पोस्‍ट्स

बहसतलब ‘दो’ में अचानक पहुंचे अनुराग
आम आदमी पर बहसतलब, आम आदमी गायब
बहसतलब दो में नजरें आम आदमी को ढूंढ़ रही थीं…
एक पूरी शाम और एक पूरे अनुराग कश्‍यप, हम भी…
त्रिपुरारी शर्मा की बातें बहसतलब की उपलब्धियां
समाज में ही आन्दोलन नहीं हैं तो मीडिया क्या करे?

कल बहसतलब दो में पहली बार नामवर सिंह को वक्ता के तौर पर इतना कम बोलते सुना। वक्ता से अधिक फुटेज तो उनके परिचय में मॉडरेटर ले गये। दूसरी बात आप मंच संचालन की परंपरा में मॉडरेटर को लेकर आये, अच्छा लगा। वैसे मॉडरेटर के फायदे हैं, तो उससे खतरे भी कम नहीं। आम आदमी से जुड़ी बहस को, इससे जुड़े सवाल-जवाब को आपने कैजुरिना तक समेट कर नहीं रखा और मोहल्ला-जनतंत्र पर आगे भी बहस जारी रखने की बात कही। यदि आपकी तरफ से यह ‘स्पेस’ नहीं मिलता, तो जो सवाल कैजुरिना में पूछे नहीं जा सके, वे अनसुने रह जाते।

जब हम आम आदमी की बात करते हैं तो उसका प्रतिनिधि चेहरा इस देश का आदिवासी और दलित समाज है। क्या मोहल्ला लाइव, यात्रा, जनतंत्र के पास कल आये श्रोताओं की सूची है? क्या आप बता पाएंगे, कल आये श्रोताओं में दलित और आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व कितना था? कल जिस प्रकार दिलीप मंडल के सवालों की कमसुनी (अनसुनी कहना उचित नहीं होगा) की गयी, यदि आप श्रोताओं के प्रतिनिधित्व में संतुलन बनाने की कोशिश करते तो शायद ऐसा नहीं होता। वहां आदिवासी और दलित समाज का प्रतिनिधित्व न के बराबर ही दिख रहा था, वरना अनुराग कैटरिना के पोस्टर की आड़ में दिलीप मंडल के गंभीर सवालों से बचकर नहीं निकल सकते थे?

यदि आप आगे से बहसतलब में कम से कम तैंतीस प्रतिशत दलित और आदिवासी समाज के श्रोताओं की उपस्थिति सुनिश्चित करें तो क्या इससे बहसतलब का रंग और नहीं निखरेगा? सक्षम आयोजकों के लिए यह अधिक मुश्किल भी नहीं होगा।

क्या आपको ‘अभिव्यक्ति माध्यमों में आम आदमी’ के ऊपर अपनी बात रखने के लिए एक भी अच्छा आदिवासी या दलित समाज का प्रतिनिधि नहीं मिला। कैजुरिना में आयोजक, मॉडरेटर से लेकर सभी के सभी वक्ता तक सवर्ण ही थे। ऐसा क्यों भाई, क्या आपको आदिवासी और दलित समाज से एक भी चेहरा ऐसा नहीं मिला, जो मुकम्मल तरिके से अपना पक्ष रखता।

अनुराग अपनी एक फिल्म के हवाले से बता रहे थे कि उनकी वह फिल्म चार घंटे की थी और पर्दे पर आते आते दो घंटे चालिस मिनट की रह गयी। मतलब जो बात अपने फिल्म के माध्यम से वे कहना चाह रहे थे, वह सही सही दर्शकों तक कनवे नहीं हो पायी। उनके कहने का लब्बो लुआब यही था कि फिल्म के दर्शकों तक पहुंचते पहुंचते निर्देशक फिल्म के ऊपर से अपनी अथॉरिटी खो चुका होता है। यह बात जानते बूझते उन जैसे संवेदनशील फिल्म निर्माता ने कैसे तय किया कि ‘राजनीति’ प्रकाश झा की सबसे कमजोर फिल्म है। क्या उन्होंने झा की ‘राजनीति’ का असंपादित वीडियो देखा हुआ है?

ashish kumar anshu(आशीष कुमार अंशु। जनसरोकार की पत्रकारिता के चंद युवा चेहरों में से एक। सोपान नाम की एक पत्रिका के लिए पूरे देश में घूम-घूम कर रिपोर्टिंग करते हैं। मीडिया के छात्रों के साथ मिल कर मीडिया स्‍कैन नाम का अखबार निकालते हैं। उनसे ashishkumaranshu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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