बहसतलब दो में नजरें आम आदमी को ढूंढ़ रही थीं…

♦ हिमानी दीवान



आजतक की प‍त्रकार शांता अपनी बेटी के साथ


जमीन पर बैठकर बहस सुनते हुए पत्रकारों की टोली: पाणिनी आनंद, राजकुमार, सुशील कुमार सिंह और नौशाद

बहसतलब दो से जुडी पोस्‍ट्स

बहसतलब ‘दो’ में अचानक पहुंचे अनुराग
आम आदमी पर बहसतलब, आम आदमी गायब
बहसतलब दो में नजरें आम आदमी को ढूंढ़ रही थीं…
एक पूरी शाम और एक पूरे अनुराग कश्‍यप, हम भी…
समाज में ही आन्दोलन नहीं हैं तो मीडिया क्या करे?

शायरों में बकौल गालिब और बहसतलब दो में बकौल नामवीर सिंह, आम आदमी का दर्द कुछ यूं बयान हुआ… हम भी मुंह में जुबान रखते हैं, काश पूछो कि मुद्दआ क्या है… लेकिन कोई पूछता नही है। अगर पूछते हैं तो प्रबुद्ध लोग एक दूसरे से पूछते हैं कि आम आदमी कहां है। फिर जवाब मिलता है कि थिएटर में यहां है, सिनेमा में यहां है और मीडिया में यहां है। लेकिन इस बहसतलब के बीच मेरा सवाल ये था कि इस बहस में आम आदमी कहां है। मंच पर बैठे पांच लोग प्रबुद्ध जन हैं। मंच की ऊंचाई से थोड़ा नीचे कुर्सियों पर बैठे काफी सारे लोग भविष्य के प्रबुद्धजन होंगे और कुछ ने प्रबुद्ध बनने का नया नया सपना संजोया होगा। दृश्य केवल यहीं खत्म नही होता, भीड़ भरे भारत देश की तरह हैबिटैट सेंटर के इस हॉल में भी कुछ लोग जगह न मिलने की वजह से खड़े थे और कुछ लोग आम आदमी की इस खास बहस को सुनने के लिए जमीन पर ही बैठ गये थे। नजारा यकीनन अदभुत था लेकिन नजरें फिर भी न जाने क्यों आम आदमी की बहस में आम आदमी को ढूंढ़ रही थी।

तमाम तीखे, फीके और चटपटे जायके वाले सवाल पूछे गये। लाजवाब, जवाब भी दिये गये लेकिन ऐसा लगा कि सब अपने आप में कहीं न कहीं मजबूर से हैं। बात बात पर पैसे की मजबूरी और भाव भाव पर कला के लिए प्यार… उनके जवाबों में साफ झलक रहा था। जब उनकी मशहूरी सुनी थी तब लगा कि वो लोग खास हैं, और जब मजबूरी सुनी तब जाना कि कितने आम इंसान हैं। पैसा इन्हें भी रोक देता है मन की करने से, मेरी ही तरह। लेकिन पैसे के लिए ही ये वो काम भी कर जाते हैं, जो इन पर ऐसी बहसों में सवालों की झड़ी खड़ी कर देता है। खैर इस बहस में बेशक ये महसूस हुआ कि ये खास लोग भी आम हैं लेकिन मेरा मन फिर भी आम आदमी रूपी उस खोये खोये चांद की फिराक में था, जो काफी रात हो चुकने के बाद भी मुझे नजर नहीं आ रहा था।

इंडिया हैबिटैट सेंटर के वातानुकूलित आलीशान कमरे की बजाय अगर ये बहसतलब किसी मोहल्ले में टेंट लगाकर की जाती, तो दृश्य में रिक्शेवाला, पानी वाला, कूड़े वाला, भिखारी, डॉक्टर, टीचर, बच्‍चे-बूढ़े, जवान, पढ़े-लिखे अनपढ़… भारत की विविधता में जितनी एकता है, सब नजर आती। लेकिन इस प्रस्ताव को रखते हुए मेरे मन में ये डर भी है कि अगर ऐसा होता तो शायद… इस बहस में अनुराग कश्यप, नामवर सिंह… सरीखे लोग न आते। बहुत सारी बातें यहां गढ़ने का लाब्‍बोलुआब ये है कि पूंजी और बाजार जो इस लोकतंत्र में हावी हो रहा है, वहां आम आदमी एक ब्रांड बन गया है। और हर दूसरा आम आदमी इस पहले आम आदमी की बात उठाकर खास बनना चाहता है। …और फिर जब कुछ लफ्जों में बात खत्म करनी हो, तो तमाम बहसतलब में आम आदमी की बातों को छेड़ने का मतलब ये कि… आ गया गुमराह करने का हुनर, जाइए अब रहबर हो जाइए…

(हिमानी दीवान। युवा पत्रकार, कवयित्री। गाजियाबाद से निकलने वाले एक टेबलॉयड अखबार से जुड़ी हैं और ब्‍लॉग पर कॉलम भी लिखती हैं। अनुभूति-अभिव्‍यक्ति पर उनकी कविताएं आप पढ़ सकते हैं। उनसे himani.diwan@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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