हमारी फिल्मों के दलित चरित्र इतने निरीह क्यों हैं?
मुंबइया फिल्मों में दलित! काल्पनिक किरदार कितने काल्पनिक?
♦ शीबा असलम फहमी


बहसतलब दो से जुडी पोस्ट्स
♦ बहसतलब ‘दो’ में अचानक पहुंचे अनुराग
♦ आम आदमी पर बहसतलब, आम आदमी गायब
♦ बहसतलब दो में नजरें आम आदमी को ढूंढ़ रही थीं…
♦ एक पूरी शाम और एक पूरे अनुराग कश्यप, हम भी…
♦ समाज में ही आन्दोलन नहीं हैं तो मीडिया क्या करे?
♦ त्रिपुरारी शर्मा की बातें बहसतलब दो की उपलब्धियां
♦ प्रतिभा अवसर के अलावा कुछ नहीं है, अनुराग!
बात हिंदी फिल्मों की हो रही है तो इधर-उधर भटके बिना दो मिसालें पेश है, जहां दलित चरित्र हैं और साहब, ‘वाह-वाह’ क्या खूब हैं। आशुतोष गोवारिकर की बहुचर्चित फिल्म ‘लगान’, जिसे पता नहीं किस आशावाद के तहत ‘ऑस्कर’ तक भेजा गया था, में भी एक सशक्त दलित किरदार है, जिसका नाम है ‘कचरा’। तो साहेबान ‘कचरा’ बहुत काम का गेंदबाज है। इसलिए नहीं कि उसमें प्रतिभा है बल्कि इसलिए की उसमें एक ‘नुक्स’ है, जिसकी वजह से उसका हाथ टेढ़ा है और गेंद कुछ ऐसे फिरकती है कि बस!
उसमें यही प्रतिभा बिना ‘नुक्स’ के भी हो सकती थी, अगर वो भुवन होता। उसका नाम ‘कचरे’ की जगह ‘भुवन’ हो सकता था अगर वो दलित न होता और वो आखरी शॉट उसके हिस्से में भी आ सकता था, अगर वो आशुतोष-आमिर की फिल्म न होती। इसी फिल्म में गोरी-मेम ‘भुवन’ का समर्थन करते हुए कहती है की ‘at least give him a fair chance…’ मतलब ये एक ‘fair-chance’ या ‘एक अवसर मात्र’ पर ही तो सारा दारोमदार टिका था न???
और वही एक अवसर ही तो नहीं देता है शासक-शोषक वर्ग।
तो साहेबान हमारी फिल्मों में तो कल्पना भी नहीं की जाती एक ‘कम-जात’ के प्रतिभावान होने की! अगर इसके बर-अक्स आप को कोई ऐसी फिल्म याद आ रही हो, तो मेरी जानकारी में इजाफा कीजिएगा… हां खुदा न खासता अगर कोई प्रतिभा होगी तो तय-शुदा तौर पर अंत में वो कुलीन परिवार के बिछड़े हुए ही में होगी।
एक और मिसाल… ‘सुजाता’ याद है आपको? कितनी अच्छी फिल्म थी। बिलकुल पंडित नेहरु के जाति-सौहार्द को साकार करती! अछूत-दलित कन्या ‘सुजाता’ को किस आधार पर स्वीकार किया जाता है, और उसे शरण देनेवाला ब्राह्मण परिवार किस तरह अपने आत्म-द्वंद्व से मुक्ति पाता है? वहां भी उसकी औकात-जात का वर ढूंढ कर जब लाया जाता है, तो वह व्यभिचारी, शराबी और दुहाजू ही होता है, और कमसिन सुजाता का जोड़ बिठाते हुए, अविचलित माताजी के अनुसार ‘इन लोगों में यही होता है’। पूरी फिल्म में ब्राह्मण-दलित संवाद स्थापित ही नहीं हो पाता। बस ब्राह्मण-ब्राह्मण का ही द्वंद्व है, जिसमें दयालु-दाता मॉडर्न ब्राह्मण और ‘संस्कारी ब्राह्मण’ का डिस्कोर्स उभरता है। दलित कन्या में कोई गुण नहीं निकल पाता, बस सामाजिक जिम्मेदारी के तहत ही वह स्वीकार्य होती है… फिल्म इस संभावना के साथ खत्म होती है कि अगर अपने बेटों की बात नहीं मानी और उनके प्रेम विवाह में रोड़े अटकाये तो वे बगावत कर देंगे। पिता पुत्र की आधुनिकता एक गुण के तौर पर उभरती है और हां, खून सबका एक है – ये मेडिकल फैक्ट भी स्थापित होता है। जहां तक सुजाता का सवाल है, उसका संस्कृतिकरण पूर्ण है। वो चुप रहनेवाली, गुनी, सुशील और त्यागी ‘मैरिज-मैरिटल’ यानी सेविका ही बन पाती है जबकि उसी परिवार-परिवेश की असली बेटी एक प्रतिभावान मंचीय नर्तकी, आधुनिका, वाचाल और अपनी मर्जी की इज्जत करनेवाली शख्सियत बनती है।
क्या वाचाल, मन-मर्जी जीनेवाली और आत्म-सम्मानी ‘सुजाता’ है कहीं बंबइया फिल्मों में आज तक?
(शीबा असलम फहमी। कानपुर की पैदाइश। 94 में पत्रकारिता शुरू की। इन दिनों जेएनयू में रिचर्स फेलो। इस्लामिक फेमिनिज्म पर शोध। मशहूर साहित्यिक पत्रिका हंस में नियमित स्तंभ लिखती हैं। उनसे sheebaasla@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










‘बहेसतलब’ के आयोजकों को सुझाव है कि ‘बहेसतलब-2 ‘ से पैदा हुए विमर्श को देखते हुए अगली किसी कड़ी में ‘हिंदी फिल्मों में दलित चरित्र’ विषय पर केन्द्रित बह़ेस भी आयोजित करें. फ़िल्म मीडिया समाज से क्या ले रहा है और ‘process’ कर कैसा तय्यारमाल वापिस कर रहा है इस पर भी एक नज़र तो डालनी ही चाहिए.’बहेसतलब’ के आयोजकों को सुझाव है कि ‘बहेसतलब-2 ‘ से पैदा हुए विमर्श को देखते हुए अगली किसी कड़ी में ‘हिंदी फिल्मों में दलित चरित्र’ विषय पर केन्द्रित बह़ेस भी आयोजित करें. फ़िल्म मीडिया समाज से क्या ले रहा है और ‘process’ कर कैसा तय्यारमाल वापिस कर रहा है इस पर भी एक नज़र तो डालनी ही चाहिए.
आख़िर साहित्य-सिनेमा-प्रेस समाज का दर्पण भी होते हैं, समाज के पथप्रदर्शक भी!
बहसतलब के आयोजकों से प्रार्थना है कि मेहरबानी करके शीबा असलम फहमी के सुझावको तुरंत खारिज करें। शीबा आपका परोगराम भाड़ना चाहती है। जैसे ही आप यह विष्य रखेंगे, आपके परोगराम में आने वाले आम आदमी भाईलोग (मतलब आयोजक भाईलोग तो समझते होंगे, यानी आपके ही भाई और बंधु-बांधव) आपसे नफरत करना शुरू कर देंगे। आएंगे तो कोई भी नहीं। आपकी मंच की सभी कुरसी भले भर जाए लेकिन शरोता वाली कुरसी पूरा का पूरा खाली रहेगा। तो आप चाहते हों कि आपका परोगराम सफल हो कामयाब हो तो विषय रखिये कि – हिंदी फिलमों में बराहमणों पर अत्याचार। फिर देखिए कि हेबीटेट सेंटर में कितना हेवी भीड़ जुडती है। हेबीटेट सेंटर हिलने लगेगा।
भारत में इस तरह का विमर्श शुरू हो रहा है, यही हमारे दौर की बड़ी उपलब्धि है। इस बारे में बातचीत हो और बिना कड़वाहट के हो और इसमें हर किसी का हिस्सा हो, इसके को-ऑर्डिनेट्स तय करने में अगर यात्रा, मोहल्ला और जनतंत्र डॉट कॉम कोई भूमिका निभाता है तो यह महत्वपूर्ण होगा।
सभी यह महसूस कर रहे होंगे कि कुछ असहज सवाल अब पूछे जाने लगे हैं। ये सवाल कई सदियों से स्थगित थे। इससे पहले एस आनंद क्रिकेट में जाति प्रश्न को लेकर अपनी बहुचर्चित किताब लिख चुके हैं। ऐसे सवालों को हल करके समाज आगे बढ़ पाएगा, ऐसी उम्मीद है।
एक ऐसे समाज की कल्पना कीजिए जहां लोकजीवन के हर अंग में पूरा भारत अपनी तमाम विविधताओं के साथ नजर आए। यह कोई बेजा मांग नहीं है। ऐसा भारत ज्यादा सुंदर दिखेगा और शायद इस तरह भारत की तरक्की का कोई रास्ता ही खुल जाए। आखिर हर किसी को लगे तो कि देश उसका भी है।
शीबा जी ने अपनी बात तार्किक तरीके से रखी है। इन सवालों का जवाब यह नहीं हो सकता कि – क्या फिल्मों में भी आरक्षण लागू कर दिया जाए। बेहतर समाज बनाए बगैर ऊपर से थोपकर ऐसे बदलाव नहीं हो सकते और हुए भी तो वे टिकाऊ नहीं होंगे। उम्मीद है यह चर्चा जारी रहेगी।
शीबा जी ने सही सुझाव दिया है। मैं इसमें एक बात यह जोड़ना चाहुंगा कि यह विषय रखा जाए तो इस विषय पर वक्ता पूरी तैयारी के साथ आएं। हो सके तो लिखित पर्चा जरूर पढ़ें। हो सके तो वह पर्चा कुछ संख्या में वहां बांट भी दें। एक रविश कुमार को छोड़कर मुझे दोनों बहसतलब में नहीं लगा कि कोई वक्ता किसी तैयारी के साथ आया था। मुंह है तो बोल लेंगे यही प्रवृत्ति हावी दिखी। तैयारी के मामले में श्रोता और वक्ता एक स्तर पर दिखते हैं। इतने कैजुअल ढंग से बहसतलब होना शुभ संकेत नहीं है।
@दिलीप जी,@शीबा जी दलित विमर्श व्यक्तिगत पहचान को स्थापित करने की वजह तो नहीं बनता जा रहा ?भारत में विमर्श शुरू हो चुका है ये आप कह सकते हैं |लेकिन ये एक कड़वा सच है कि आम आदमी के बीच ,गाँवों ,कस्बों ,टोलों में जहाँ ऐसे विमर्श की सर्वाधिक जरुरत थी ,वहाँ अभी भी चुप्पी है?वहाँ पहुचने का न तो समय है और न ही कोई ईमानदार कोशिश |आप महानगरों में रहकर अखबार के पन्नों या फिर कंप्यूटर की स्क्रीन पर या फिर सेमिनारों में दलितों का सवाल बहसतलब कर सकते हैं ,विषय भी कुछ ऐसे ही होंगे सिनेमा में दलित ,क्रिकेट में दलित ,पत्रकारिता में दलित इत्यादि इत्यादि ,जबकि जरुरत दलितों के परिप्रेक्ष्य में रोटी ,पानी ,जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों पर घमासान छेड़ने की थीजो कभी नहीं हो सका | क्या कभी ये सोचा गया कि इन तमाम विमर्शों के बाद दलित आदिवासी किसानों गिरिजनों को क्या मिला ,हाँ उनको जरुर मिला जो खुद को दलित चिन्तक कहलाना पसंद करते हैं ,बेहतर होगा आपस में बहस करने के बजाय उनके बीच जाएँ जिन्हें ऐसे विमर्श की जरुरत है ,बुद्धिजीवियों,पत्रकारों,साहित्यकारों की निगाह से नहीं दलित को दलित की निगाह से देखना होगा |
…ये दलित नायक भी सवर्णों के घर जना है!!
प्रकाश झा की नयी फिल्म आई है ‘राजनीति’. एक बढ़िया फिल्म का दर्जा दिया जा सकता है इसे बेहिचक. लेकिन इस फिल्म में भी शीबा असलम का वही प्रश्न जोर मारता है कि आखिर दलित को सबल दिखाने से परहेज क्यों है फिल्मों को? दलितों का नेता ‘सूरज’ (अजय देवगन), जो भरी सभा में सवर्णों और ऊंचे लोगों से लोहा लेता दिखाई देता है, आखिर वह भी उसी सवर्ण परिवार में जन्मा हुआ साबित होता है. अंततः फिल्म इसी परिपाटी पर लौट आती है कि दलितों का वह मसीहा इसी कारण से इतनी घाघ राजनीति कर सका क्यूंकि उसके अन्दर उसी राजनीतिक खानदान का खून था. फिल्म की कहानी का आधार कुछ भी रहा हो, लेकिन यह सत्य है कि फिल्म समाज की दलितों के प्रति इसी तस्वीर को पुष्ट करती है किसी दलित में स्वाभाविक रूप से वर्चस्ववादी लोगों का सामना करने का साहस ही नहीं है.
आज समाज में ऐसे सवाल उठ रहे हैं, यह अच्छा संकेत है, बहसतलब के अगले पड़ाव में ऐसे किसी विषय के होने की उम्मीद हमें रहेगी.
कायदे से शीबा के सवालों के जवाब अनुराग को देने चाहिए। (पर वो नहीं देंगे)
अनुराग पूरी बाततीच में ‘बाजार’ का रोना रो रहे थे। वो ‘एक सजग निर्देशक’ नहीं बल्कि फिल्मों के व्यापारी की तरह बात कर रहे थे। फिल्में को भी ‘मास मीडिया’ के दायरे में रखा जाता है। और मास को खारिज करके कोई भी ‘कृति’ बड़ी नहीं हो सकती। फिर वो चाहे फिल्म हो या फिर साहित्यकि कृति।
अनुराग शॉपिंग मॉल के जिस बहुप्रचारित गणित को समझा रहे थे(जिसकी वजह से मुझे गुस्सा आया था)असल में ये वही तर्क हैं जिसका प्रचार मनमोहन एंड कंपनी पिछले दो दशकों से कर रही है। और इसकी मंशाएं बहुत शातिर हैं। हम नहीं चाहेंगे कि अनुराग उसी वर्ग में शामिल हों! सच है, लोग कैटरीना को देखना चाहते हैं। लेकिन लोग तो प्रॉर्नोग्राफी भी देखना चाहते हैं? कैटरीना को संभोगरत देखना- दर्शक, निर्देशकों और बाजार सबके लिए बहुत सुकूनभरा-लाभदायक होगा-क्या आप दिखाएंगे? दरअसल, बॉलीवुड का पूरा का पूरा मांइंड सेट बहुत गहराई से सवर्ण हिंदूवादी है। यही वजह है कि युसुफ खान को ‘दिलीप’ बनना पड़ता है और शाहरुख को ‘राज’ । ‘कचरा’ की तो बात ही मत कीजिए!
भाई विश्वदीपक ने तल्ख़ मगर सही कहा है… यदि बाजार ही रचनात्मकता की दशा और दिशा तय करेगा, तो फिर हम यहाँ क्यों हैं? हमें कला की मार्केटिंग नहीं करनी है… शीबा जी का सवाल एक लाजमी सवाल है…इसका जवाब कला जैसी “कोमोडिटी” बेचने वालों के पास शायद ही हो.
विश्वदीपक ने जो कहा वो नासमझी की बात है। बाज़ार में रहते हुए बाज़ार के नियमों को खारिज नहीं किया जा सकता। ये तो मार्केट का दौर है आज से चालीस साल पहले के बारे में सोचिए जब सत्यजीत रे जैसे लोग फिल्में बनाते थे और भारत में उन्हें प्रदर्शित करने के लिए कोई तैयार नहीं होता था। एक से बढ़ कर एक रचनाएं धूल फांक रही हैं। एनएफडीसी जैसी संस्थाएं फिल्म निर्माण के लिए पैसे दे देंगी लेकिन फिल्म दिखाने के लिए तो डिस्ट्रीब्यूटर को ही तैयार करना होगा। दूसरी बात अगर फिल्म बड़े पर्दे पर उतार भी दी गई तो देखेंगे कितने लोग? आप, हम और विश्वदीपक जैसे चंद लोग। क्या उनसे दूसरी फिल्म बनाने का पैसा मिल जाएगा?
वैसे आपको बता दें कि जो बातें विश्वदीपक अनुराग पर थोपने की कोशिश कर रहे हैं आप उन्हीं बातों को विश्वदीपक पर लागू कर दीजिए। क्या वो कल अपने चैनल को छोड़ कर सड़क पर संघर्ष करने को तैयार हैं? या फिर क्या वो जिस संस्था में काम करते हैं वहां के सरोकारों को बदलने का हौसला रखते हैं? यहां बात हो सकती है कि विश्वदीपक की हैसियत अभी उतनी अधिक नहीं है। तो क्या आप लोग यह मानते हैं कि अनुराग जैसा कोई भी निर्देशक इतनी हैसियत रखता है कि बाज़ार के सारे नियमों और सरकार की सारी नीतियों को धत्ता बता कर अपनी शर्तों पर काम कर लेगा?
अगर आप लोग यह मानते हैं तो फिर आप लोग बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं।
दूसरी बात कि युसुफ खान को दिलीप कुमार क्यों बनना पड़ता है? दरअसल, इसके लिए एक व्यवहारिक नजरिए से इतिहास की समझ होनी चाहिए। यह समझ दिलीप कुमार में थे इसलिए वो युसुफ खान से दिलीप कुमार बने। यह समझ विश्वदीपक में नहीं है इसलिए वो सवाल कर रहे हैं। जब युसुफ खान दिलीप कुमार बने तब देश का धर्म के नाम पर बंटवारा हुआ था। जब धर्म के नाम पर बंटवारा हो चुका हो उस देश में यकीनन नाम बदलना समझदारी है। वैसे आपको बता दें कि दिलीप कुमार यानी युसुफ खान को फिल्मों में मौका देविका रानी ने दिलाया था। अब देविका रानी की जाति और धर्म क्या था ये मैं नहीं जानता और न ही पता करने की इच्छा है। बंटवारे के बाद भी अगर बॉलीवुड की बनावट हिंदूवादी और सवर्ण वादी थी और एक के बाद एक मुस्लिम अभिनेता और अभिनेत्री को क्यों काम मिलते गया ये सोचने लायक बात है? वो हिंदू निर्माताओं और पैसा लगाने वालों की कौन सी मजबूरियां थी कि उन्होंने मुस्लिम अभिनेताओं और अभिनेत्रियों पर पैसे लगाए ये सोचने लायक बात है।
आज़ादी के कुछ समय बाद जब तनाव कम हुआ तो एक के बाद एक मुस्लिम अभिनेता और अभिनेत्रियां अपने वास्तविक नामों के साथ बड़े पर्दे पर आए और आज भी आ रहे हैं।
रही बात शाहरुख खान के राज बनने की तो राजेंद्र कुमार और प्रदीप कुमार ने बहुत सी फिल्मों में मुस्लिम किरदार निभाए हैं। राजकुमार ने भी कई मुस्लिम किरदार निभाए हैं।
इसलिए चीजों को एकांगी नज़रिये से देखने से बेहतर होता कि आप लोग वास्तविकता को समझने की कोशिश करते।
यहां एक लाजवाब उदाहरण मैं आपको और देता हूं। क्या आप जानते हैं कि ए आर रहमान किस धर्म के थे। उनका असली नाम ए एस दिलीप कुमार है। उन्होंने तो अपना धर्म ही परिवर्तन करा लिया और उनके कारोबार पर कोई असर नहीं पड़ा। वो मुसलमान बन गए और आज दुनिया भर में उनका नाम है।
एक बात और। फिल्मों के मामले में शीबा की सोच भी बेहद सतही है। उनसे पूछना चाहता हूं कि क्या यह जरूरी है कि वो हर मामले में अपनी टांग अड़ाएं। जहां समझ नहीं हो वहां भी लिखने बैठ जाएं। शीबा से यह पूछना चाहता हूं कि मदर इंडिया में राधा, बिरजू और रामू की जाति क्या थी… उस फिल्म में एक लाला विलेन बना है। कालिया में कल्लू की जाति क्या थी?
ऐसे ढेरों फिल्में मौजूद हैं जिनमें लाला, ब्राह्मण और ठाकुर विलेन के तौर पर पेश किए गए हैं और एक दूसरी जाति वाले हीरो ने उनका संहार किया है। तो क्या वो सारे फिल्मकार और अभिनेता उन तमाम जातियों के दुश्मन थे।
दलितो का आत्मविश्वास तोड़ने की साजिश आज भी हो रही है ये सब इसी का हिस्सा है
बहुत सही बात कही आपने अयाज अहमद जी। अल्लाह के नाम पर आप ने अपने ब्लॉग में जो कुछ लिखा है वह यथास्थिति को तोड़ने वाला है और बाकी सब यथास्थिति बनाए रखना चाहता हैं। ठीक वैसे ही जैसे आपने एक मौलवी की तरह दाढ़ी बढ़ा रखी है। जैसे एक शख्स का चोटी रखना उसकी संकीर्ण सोच को दर्शाता है ठीक वैसै ही आपकी दाढ़ी बयां कर रही है कि आपने कितने दलितवादी हैं और धर्म की कितनी बेड़ियों को तोड़ कर इस्लाम और दूसरे धर्मों में रिफॉर्म की बात करते हैं। बहुत खूब। इस पाखंड को जारी रखिए।
Pahla Prastav :
अगली किसी कड़ी में ‘हिंदी फिल्मों में दलित चरित्र’ विषय पर केन्द्रित बह़ेस भी आयोजित करें.
Dusra aur Asli Prastaav :
Is par bolne ke liye mujhe bulaya jaye kyonki mere pas bhi ab iske alawa koi chara nahi bacha.
सब कुछ दूसरे लोग ही क्यों करे कुछ आप लोग भी कीजिये
रोने और गली देने के आलावा भी कोई हुनर दिखाईये
क्योंकि आप जैसे director-producer नहीं हैं.
आज सबसे आसान काम है किसी से कड़वा सवाल पूछ लेना और कोई आरोप मढ़ देना और इसपर अपनी बौद्धिक शेखी बखारना ..करना धरना तो कुछ नहीं बस सवाल पूछते रहिये aircnditioned hall में। फिल्मों से काफी उम्मीदें हैं .चलचित्र ने समाज के कई रुढ़िवादी मान्यतावों को ध्वस्त किया है .इसे अपने कुचक्र में मत फसावो .दिलीप मंडल का अजेंडा क्या है उनकी सोच क्या है ये वो ही जाने लेकिन उनकी सामजिक सोच रुक सी गयी है ..कहीं न कहीं…एक ही चश्मे से देखने की आदत हो गयी है । जिम्मेदारी है कि आगे बढ़ कर काम करे .वो आपको कश्यप लगा तो बस शुरू हो गए । जाकर देखिये मनीष झा की मातृभूमि कैसे इस नए फिल्मकार ने दलित चित्रण किया है कैसे मुद्दे को उठाया है । और आप जैसे लोग वर्तमान फिल्मकारों से इतनी उम्मीदें क्यों लगाए बैठे हैं कुछ करो भी यार। एक आसान बात हो गयी है जब लगे जिसको भी कह दो कि तुम्हारी भाषा सवर्णों की है ।
shiba ne jo sujhav bahes talab ke ayojako ke samaksh rakha h,vehe kabile gor h.darasal Dalito ke pass abhi apna sashakt midia nahi h.jiski vajah se Dalito ki samasyaon,unke sangharsho athava sahas ko darshane vala imandar nazaria ab tak ki filmo se nadarad h.jahan tak Avesh tivari ji ka kehna h ki computar or blog ke jarie is ladai ko nahi jita ja sakta jarurat Dalito or Aadivasiyo ke beech ja kr ladne ki he to ye baat apni jageh sahi h,lakin kya aap ne svyam is vishay mai gambhirta se socha h?shayad nahi kyoki yadi socha hota to aap shiba ko is mahetvapurn mudde pr bahas ke liye badhai dete.kyoki hm yh bhali bhato jante hai ki abi hamare dalito or adivasiyo ke pass na to itni shiksha h,na hi itne sanchar madham ki ve apni baat samaj ke kone-kone tak pahunca sakea to yah dayitv samaj ke un prabudhva jono ka hi h,or hona chahiye ki samaj mai unpar ho rahe anyay ko darshaya jay.chahe veh kisi bhi shetra se sambandhit ho.Acha hota ki aap mudda rekhate ki midia mai gohana ,kherlanji,jjhajar,mirchpur, palval yafir dentevada,lalgar pr koi film kyo nahi banti?ya in visho pr behas kyo nahi ki jati.tab shayad aap ki chinta svabhavik lagti,kyo ki koi bhi jang sirf bhavukta ke bal pr nahi jiti ja sakti.uske liye bodhik shram bhi jaruri hota h.
shiba ki bat par sarthak bahas jaruri hai. kadvapan hai lekin jaruri hai.
Vishwadeepak.. NFDC mein kuch saat filmein daliton ko lekar pichhle do saalon mein bani hain aur taiyaar padi hain.. jitne log is blog par aate hain utne bhi mil kar un filmon ko release karwa lein , bazaar ko nakara kar ke to mein maan jaaoo.
Aap ashawadi hain, mein yathatrh mein rahta hoon.. aap cheezen , halaat badalne ke sapne dekhte hain.. hum bazaar mein andar se dheere dheere cheezon ko badal rahein hain.. aapki manshayen sarahniya hai..lekin phir un cheezon ko badalne ki baat mat kariye.. unhe badaliye…
meri khud ki aankhon ke saamne, bahut saare aap jaise log aaye, anish ranjan ek the, ek r k bajaj the, sab aaye paise banaye, chale gaye.. dalit wahin ka wahin rah gaya.. mein baat karne waaalon ka bharosa nahi karta.. uska karta hoon jiski gaand mein dum hai ki woh maidan mein koode, haalaton ko badle, cinema badle, mein jhuk kar usse sallam karoonga.. aur uske peechhe aoonga.. bolna jo hai paadne jaisa hota hai.. badbu hi failti hai, badalta kuchh nahi hai..
[...] विश्वदीपक का तंज यहां देख सकते हैं : कायदे से शीबा के सवालों के जवाब अनुराग…। वहीं, जहां ये सारी बहस चल रही थी, [...]
मैंने अनुराग कश्यप के किसी बयान पर प्रतिक्रिया कभी नहीं दी!
मैंने दिलीप मंडल के उठाए सवाल पर दो मिसालें पेश की थीं, क्योंकि कुछ लोगों ने दलित चरित्रों के सवाल पर ‘फिल्मों में आरक्षण’ जैसे तंज़ से उस सवाल को नाकारा था की हमारी फिल्मों में संवेदनशीलता और प्रगतिशीलता दोनों की कोई जगह नहीं. और मेरा सवाल भी अनुराग कश्यप से नहीं था. सिर्फ़ 4 या 5 फ़िल्म पुराने फिल्मकार से, भले ही वोह कितना भी प्रतिभाशाली हो, साहित्य-फ़िल्म-मीडिया की दशकों पुरानी सोच और नज़रिए में सुधार की उम्मीद कौन कर सकता है? (इत्तेफ़ाक से अभी तक अनुराग कश्यप की कोई फ़िल्म देखी भी नहीं है, बस सुना ही है उनके बारे में).
मेरा सवाल अभी भी वहीँ है और उस सामाजिक समझ से है जो दलित चरित्रों को ‘agency-less’ और स्वाभाविक रूप से तिरस्कार-ग्राही दिखाते-बताते हैं. अभी तक सशक्त दलित किरदार का इंतज़ार है, जो उतना ही ‘आम’ हो जितना एक फ़िल्मी किरदार होता है और उतना ही ‘ख़ास’ हो जितना एक ‘हीरो’ होता है!
[...] विश्वदीपक का तंज यहां देख सकते हैं : कायदे से शीबा के सवालों के जवाब अनुराग…। वहीं, जहां ये सारी बहस चल रही थी, [...]
ह्म्म्म, काफ़ी बड़े-बड़े, पढ़े-लिखे लोग इधर बहसिया रहे हैं
मुझे तो इस बात की चिन्ता सता रही है कि मैं अपने “सवर्ण” बेटे को यह बात कैसे समझाऊं कि, उसके ST दोस्त (जो उसके साथ उठता-बैठता-खाता-पीता है, और जिसके पिता मुझसे ज्यादा कमाते हैं) को कम या बराबर नम्बर मिलने के बावजूद उसे अच्छा कॉलेज क्यों मिलेगा?
अब बेटा दसवीं पास कर चुका है और आजकल बहुत “ऊटपटांग सवाल” पूछने लगा है। कल ही सवाल कर रहा था कि मेरे दोस्त को स्कॉलरशिप क्यों मिल रही है, जबकि जरूरत मुझे ज्यादा है।
अब मैं उसे कैसे समझाऊँ?
“दलित विमर्श” तो बहुत चलता रहता है भाईयों…। कभी देश के सबसे उपेक्षित वर्ग यानी “गरीब सवर्णों” पर भी कुछ लिखिये ना…
आप इसे मेरा दुर्भाग्य कह सकते हैं कि मैंने सुजाता नहीं देखी.. हाँ पर लगान जरूर बहुत बारीकी से देखी है.. जहाँ तक मेरा मानना है कि कचरा की स्पिन को मुरलीधरन के उस समय उपजे विवाद का रंग देने के लिए ऐसा गढ़ा गया था.. वैसे शीबा जी को यहाँ स्पष्ट करना चाहिए था कि उनका तात्पर्य सिर्फ जातिगत दलितों से है या वो दलित जो वास्तव में दलित हैं; जो शोषित हैं, जो सताया गया है.. सिर्फ जाती के आधार पर नहीं बल्कि आर्थिकस्थिति के आधार पर.. दलित शब्द एक जाती विशेष के लिए तो बहुत बाद में इस्तेमाल हुआ.. मदर इंडिया के दलित वोकिसी जाती के दलित नहीं हैं..
कुछ लोग यहाँ बुद्धिजीविता का मुखौटा पहन अपने को ऊपर दिखाने की सोच रहे हैं.. और अपनी बात को सही सिद्ध करने की… पर मेरे भाई बुद्धिजीवी लोग इन सब बातों से बहुत ऊपर होते हैं.. उन्हें अपनी बातों या व्यवहार से ये जताने की जरूरत ही नहीं होती कि वो क्या हैं और क्यों हैं.. हाँ नकली माल बहुत है बाज़ार में जो अपनी चमक दिखा असल बनने की कोशिश में लगा है..
अनुराग कश्यप की बाद की दलीलों से लगा की वह और विश्व दीपक आमने-सामने नहीं बल्कि एक ही पाले में खड़े हैं और यही बात अहम् है क्यूंकि विश्व दीपक के सवाल ‘बाज़ार की सत्ता’ की उसी विडंबना को नकारने का आग्रह करते हैं जिसे ख़ुद अनुराग कश्यप अपनी बात में बार-बार उजागर कर रहे हैं. और दिख रहा है की उनके माध्यम पर बाज़ार की तानाशाही ख़ुद उनके आड़े कितनी आई है. बस फ़र्क़ इतना है कि बाज़ार की ‘मजबूरी’ हम सब से जो करवा रही है उसको सही ठहराने में और आत्मसात कर लेने में ख़तरा है की alternative मॉडल की तलाश या अविष्कार की उम्मीद दम तोड़ देती है जो किसी भी ज़िन्दा समाज के लिए शर्मनाक है. अनुराग कश्यप ने ये महसूस किया होगा की वे जिस छोटी सी हिंदी की दुनिया से रूबरू थे उनमें किसी ने उनसे वो चटपटे, मसालेदार, स्कैंडल और ग्लेमर से अभिभूत सवाल नहीं पूछे.
मेरे सवाल- ‘मुंबइया फिल्मों में दलित! काल्पनिक किरदार कितने काल्पनिक!’ के जवाब में जो भी कुछ कहा गया उसमें भी कम से कम ये छिछलापन नदारद रहा. यहाँ पर किसी ने उन महा-सफल मनमोहन देसाईयों, प्रकाश मेहराओं, टीनू आनंदों, करन जोहरों या दादा कोंडके जैसे फिल्मकारों का नाम नहीं लिया जो शायद फ़िल्मी दुनिया के अर्थतंत्र की धुरी हों. अनुराग कश्यप ने अगर ये चुना है की वह कुछ अलग हटकर करेंगे तो ये सवाल उसी चुनाव का सीधा प्रतिफल है जो उनकी ही झोली में गिरना था किसी करन जोहर की झोली में तो ‘आपकी ‘अंडरवियर” का रंग क्या वाकई गुलाबी है, या आप की यौन वरियेता क्या है’, जैसे सवाल ही आते हैं.
पाता नहीं इस बात का उनके लिए कुछ मतलब है या नहीं लेकिन जिस बहेस में व्ही शांताराम, राज कपूर, महबूब, गुरूदत्त, बी.आर. चोपड़ा, बिमल राय, ख़्वाज़ा अहमद अब्बास, सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक जैसे फिल्मकारों का नाम लिया जाए, और उसी सांस में अनुराग कश्यप जैसे निस्बतन नए फ़िल्मकार का नाम भी अपनी जगह बनाए ये इज्ज़त की बात है. हाँ जो सिर्फ़ पैसा कमाने के लिए आया हो उसके लिए ये झुंझलाहट की बात हो सकती है.
जहाँ तक गाली का सवाल है ‘बहेसतलब’ सेमिनार श्रंखला एक बौधिक प्रयोजन ही है, इसके विषय, वक्ता, प्रतिभागी आदि सभी विमर्श की दुनिया के लोग हैं. अगर अनुराग कश्यप केवल 5 -6 फिल्मों में योगदान दे कर त्रिपुरारी शर्मा, नामवर सिंह, अजय ब्रम्ह्मात्म्ज जैसे मनीषियों के साथ एक ‘बोलनेवाले’ की हैसियत से इसमें शामिल होते हैं और उनकी तरफ़ कुछ सवाल आते हैं तो विचलित हो कर गालियों पर उतरना बचकाना है और उनके इस मंच पर होने की पात्रता पर भी सवाल खड़े करता है. और उससे भी बेवकूफ़ाना है गाली बकने की छूट मांगना ये कह कर की, “गाली गलौज के बिना मैंने बात करना नहीं सीखा…”. मोहल्ला लाइव पर बहेसतलब-2 में उनका कहा मौजूद है, वहां तो उन्होंने कहीं गाली नहीं दी? उस मंच पर वे सभ्य कैसे बने रहे? क्यों ना माना जाए की ‘मोहल्ला लाइव’ के मंच पर प्रतिक्रिया करने वालों के प्रति तुच्छ भावना से वे शुरू हुए, शायद उन्हें बुरा लगा की ये दलित और उनके मुद्दे उठानेवाले भी अब हमसे सवाल करेंगे? अगर ऐसा नहीं है तो वे अपने से बड़ी हैसियत के किसी आदमी को इन्हीं गालियों से नवाज़ कर दिखाएँ. कल को वे किसी आमिर खान, सलमान खान, अक्षय खन्ना जैसी फ़िल्मी हस्ती के साथ काम करेंगे, निर्माता-निर्देशक का माई-बाप वाला दर्जा होने के बावजूद क्या वे ऐसी जुर्रत किसी आमिर खान के साथ तो क्या ‘उनके सामने’ किसी और से भी कर सकते हैं? मोहल्ला लाइव पर ये छूट क्या वे इसलिए ले रहे हैं कि यहाँ उन्हें बाक़ी सब तुच्छ लग रहे हैं?
‘चीजों को बदलने की बात मत करिए, उन्हें बदलिए’ का जहाँ तक सवाल है तो फिर सभी अखबार, पत्रिकाएँ, किताबें, सेमिनार, गोष्ठी, वर्कशॉप, साहित्यकार, कवि, बे-ईमान ठहरे? एक राजशाही में जीते हुए, राजशाही के विरुद्ध और प्रजातंत्र की कल्पना पर बोलने-लिखने-पढ़ने वालों को हम आज यूंहीं सजदा नहीं करते हैं. उन सब ने कभी राजशाही से सीधे मोर्चा नहीं खोला बस समाज को वो वाजिब सवाल दिए जिनकी डोर पकड़ कर तमाम क्रांतियाँ हुईं. सुकरात, रूसो, वोल्टेयर, मार्क्स, फुले, आम्बेडकर, गाँधी, सभी अपने ‘बोलने’ और सिर्फ़ बोलने के लिए जानेजाते हैं. आम्बेडकर बोले ना होते तो कभी इस लायक़ ना हो पाते की देश का आम आदमी उनके पीछे चल देता और अँगरेज़ और ‘द्विज’ नेहरु-गाँधी उन्हें अपने साथ टेबल पर बिठाते.
आख़िर ये समाज पर सोचने-बोलनेवाले करें क्या? अनुराग कश्यप आपका वाजिब तर्क है कि फलां-फलां ने कोशिश की, एक फ़िल्म बनाई, नहीं चली और वे ज़मीन पर आ गए. आपकी दलील फ़िल्म कि आर्थिक कामयाबी कि अहमियत को बताती है, जिसे नकारा नहीं जा सकता. ज़ाहिर है आप मैदान में होंगे तभी ना अच्छा या बुरा कुछ करेंगे, लेकिन आपकी इस बात का समर्थन करनेवाले टिप्पणीकार जब लिखने-बोलनेवालों को ये उलाहना देते हैं कि ‘तुमने दलितों आदि आदि के मुद्दे उठाकर सिर्फ़ निजी तौर पर कामयाबी हासिल की, तुम बिकने-छपने लगे, सभाओं में बुलाए जाने लगे’, तो ऐसी हालत में समझ में नहीं आता की सही रास्ता कौन सा है? कोई वक्ता अगर अपने तर्कों-विचारों के बल पर लोकप्रिय हो जाए, मिसाल के तौर पर दोनों बहेसतलब का संचालन करनेवाले विनीत कुमार ही को देखिये. मीडिया पर उनकी समझ और बेबाक बोलने के अंदाज़ के कारण वे लोकप्रिय युवा विश्लेषक के तौर पर जाने जाते हैं. उन्हें मंच, मगज़ीन, मुद्रा सभी मिलती है तो अब ये उनका अपराध है क्या? सामाजिक समझ को आर्थिक बदहाली से तभी क्यूँ जोड़ा जाता है जब कोई दिलीप मंडल या अनीता भारती वही तन्ख्वाह ले रहा होता है जो कोई भी दूसरा उसी संस्थान में? ये लोग किस अपराध के तहत चुप करवाए जा रहे हैं? आप कहेंगे की ये सवाल आप उन्ही से कीजिये जो चुप करवा रहे हैं, तो उसका जवाब ये है की आपके पक्ष में खड़े ये लोग आपके तर्क को सिर्फ़ आप तक ही सिमित रखना चाहते हैं और आप इस पर ख़ामोश हैं, क्या आपको नाजायज़ तर्कों से अपना बचाव मंज़ूर है?
अरे विचार-विमर्श की कामयाबी अगर जायज़ आर्थिक मज़बूती भी लाती है तो वह किसी हाशियाग्रस्त समाज के सदस्य के लिए ‘भ्रष्टाचार का प्रमाणपत्र’ बना कर क्यूँ पेश की जाती है? किसी मनेजर पाण्डे, नामवर सिंह, गौतम नौलखा, निर्मला जैन, जैसों से ये सवाल क्यूँ नहीं किया जाता? क्या दिलीप मंडलों और अनीता भारतियों से ये नहीं कहा जा रहा है की नौकरी ‘दे दी’, तन्ख्वाह ‘खा’ रहे हो, अब और ‘क्या’ चाहिए? चुप कर के बैठो, शांति से!
अजीब हाल है हमारी सोच का ! इसी नौकरी-तन्ख्वाह के साथ साथ जब कोई द्विज मंचों-मंचों ‘बोलता’ फिरता है तो वह देश-विश्व स्तर का बुद्धिजीवी, प्रकांड विद्वान्, शिखर पुरुष हो जाता है. जब कोई ग़ैर-द्विज इसका पासंग भी करे तो वह मौक़ापरस्त, भ्रष्ट, छदम, गल्थोथरी करनेवाला, बुद्धिहीन हो जाता है?
आखरी बात ये कि सवाल दलितों पर फ़िल्में बनाने का नहीं है, सवाल ये है की वे जब परदे पर उतारे जाते हैं तो किस तरह का चरित्र उनमें उभारा जाता है. ‘सौन्दर्यबोध-कटरीना’ से परे जा कर सोचिये की आत्म-बोध, आत्म-सम्मान, मनुष्यगत-अस्मिता, स्वाभिमान जैसे गुण उसमें क्यूँ नहीं होते? वह अपने तिरस्कार पर ख़ुद क्यों चीत्कार करता नहीं दिखता? वह अपने प्रति हर ज़्यादती-अत्याचार को आत्मसात करनेवाला ही क्यों है? उसकी ये छवि उसके असल जीवन में अत्याचारों के विरुद्ध उठाए प्रतिकारों-चीत्कारों को ख़ारिज करती है. उसके आत्म-सम्मान के संघर्ष को नकारती है. एक सवर्ण हीरो में गुणों-ख़ूबियों की अथाह मौजूदगी हाशियाग्रस्त दुनिया के आत्मसम्मान और नैतिकता को ध्वस्त कर पैदा की जाती है. मेरा मक़सद हिंदी फिल्मों की इस प्रवृत्ति की तरफ़ ध्यान दिलाना था नाकि फिल्मों में आरक्षण लागू करने की वकालत करना या ‘दलित हीरो’ को लेकर ‘दलित विषय’ पर फ़िल्म बनाना का आग्रेह करना.
आप सही हैं कि फ़िल्म एक महंगा माध्यम है, आर्थिक कामयाबी उसकी बुनियादी शर्त है. आप ऐसे सिस्टम में कुछ नया कर के दिखाने की जद्दोजहद में लगे हैं, और दुनिया आपकी इस कोशिश को मान रही है. इसीलिए आपसे ही सवाल भी किये गए. आप फिल्मीदुनिया में उस नई सोच के प्रतिनिधि के तौर पर मंचासीन होते हैं. साझा समझ विकसित करने की जगह बहेस मत ‘जीतिए’, क्यूंकि हम नहीं आप विशेषज्ञ हैं इस विधा के, और इस ‘बहेसतलब-2 ‘ में जो हुआ उस ज़िद में कोई दलित फ़िल्म ना बना डालियेगा. दलित समस्या पर फ़िल्म जब भी बनाइएगा, तभी बनाइएगा जब अच्छी कहानी, पटकथा, निर्देशक, और पैसा हो. क्यूंकि चैलेन्ज यही है की जब अनुराग कश्यप दलित समस्या पर फ़िल्म बनाएं तो वो हिट भी हो और किसी बहेसतलब सेमिनार का मुद्दा भी बने. डिब्बा-बंद ना पड़ी रहे!
शुभकामनाएँ!
‘ कचरे को कचरा कह देना , शोषण को उजागर कर देना , कमी को कमी बता देना और इससे भी बड़ी बात चौराहे पर खड़े होकर दुष्टों को गाली देना ! क्या यही किसी समस्या को हल करने का सही उपाय है ? आप दो -चार को गाली दे दीजिये , क्या होगा उससे ? क्या यह भी आत्म- प्रचार का एक तरीका नहीं है ? दलितों का मामला हो या विभूति नारायण राय की लम्पटता का , एक चुनिन्दा गुट या हिम्मत से कहें तो जैसे एक गिरोह , आपस में छीना-झपटी पर उतारू हो जाता है . जो समर्थ हैं या यों कहें कि जो हाबी हैं , उनके मन में दया या करुणा पैदा करके दलितों/महिलाओं का भला कराने की सदिच्छा के बजाय, आप उन्हें अपना हक लेने/छीनने के बारे में क्यों नहीं उक्सातीं? क्या इस डर से कि यह गैर -कानूनी होगा ? फिल्म बनाने का , किताबें छापने का या राजनीति का धंधा चलाने का एक तंत्र जिन लोगों ने खड़ा कर रखा है,उनके ही धंधे के लिए अहितकर तत्वों के प्रति उनके मन में सदाशयता पैदा करने की कोशिश का दिखावा सबसे बड़ा छल है , और इस छल से अपना भला तो हो सकता है लेकिन उनका तो बिलकुल नहीं जिनके लिए बताया जा रहा है. यह भी वैसे ही है जैसे अनपढ़ और अति-दरिद्रों के बारे में अंग्रेजी में लिखकर दुःख प्रकट करने का .
मौलवी औरतों के खिलाफ फतवा न जारी करें, सामंत गरीबों का उत्पीड़न न करें, राजा प्रजा पर रहम करें और ईश्वर सब पर कृपा करें , कई हजार सालों से हम यही करते आयें है , लेकिन कुछ हुआ क्या ? ऐसे कुछ होगा भी नहीं शीबा जी !!
मुझे तो इस पूरी बहस में राजकुमार जी के तर्क सबसे संतुलित लगे.लेख के जवाब में उनकी बातें काबिले गौर हैं.
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