द हिंदू का दावा : भोपाल के दुख पर जेटली भी हंसे थे

♦ शेष नारायण सिंह

द हिंदू ने आज छापा है कि भोपाल के गैस पीड़ितों के साथ जो अन्याय हुआ है, उसके लिए कांग्रेस और बीजेपी के नेता बराबर के जिम्मेदार हैं। भोपाल कांड के वक्त यूनियन कार्बाइड कंपनी के अध्यक्ष, वारेन एंडरसन के मामले में एक नया आयाम द हिंदू ने खोजा है। दरअसल बीजेपी वाले भोपाल के बहाने एक और बोफोर्स की तलाश में हैं। सारी जिम्मेदारी राजीव गांधी के मत्थे मढ़ देने के चक्कर में हैं, जिससे सोनिया गांधी और राहुल गांधी को रक्षात्मक मुद्रा में लाया जा सके। लेकिन अब खेल बदल गया है। द हिंदू के मुताबिक, बीजेपी के सबसे प्रभावशाली नेता, अरुण जेटली जब कानून मंत्री थे, तो उन्होंने भी एंडरसन के बारे में वही कहा था, जो कहने के आरोप में बीजेपी वाले कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं।

द हिंदू ने छापा है कि 25 सितंबर को 2001 को कानून मंत्री के रूप में अरुण जेटली ने फाइल में लिखा था कि एंडरसन को वापस बुला कर उन पर मुकदमा चलाने का केस बहुत कमजोर है। जब यह नोट अरुण जेटली ने लिखा, उस वक्त उनके ऊपर कानून, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्री पद की जिम्मेदारी थी। यही नहीं, उस वक्त देश के अटार्नी जनरल के पद पर देश की सर्वोच्च योग्यता वाले एक वकील, सोली सोराबजी मौजूद थे। सोराबजी ने अपनी राय में लिखा था कि अब तक जुटाया गया साक्ष्य ऐसा नहीं है, जिसके बल पर अमरीकी अदालतों में मामला जीता जा सके। अरुण जेटली के नोट में जो लिखा है, उससे एंडरसन बिलकुल पाक-साफ इंसान के रूप में सामने आता है। जाहिर है, आज बीजेपी राजीव गांधी के खिलाफ जो केस बना रही है, उसकी वह राय तब नहीं थी, जब वह सरकार में थी। अरुण जेटली ने सरकारी फाइल में लिखा है कि यह कोई मामला ही नहीं है कि मिस्टर एंडरसन ने कोई ऐसा काम किया, जिससे गैस लीक हुई और जान माल की भारी क्षति हुई।

जेटली ने लिखा है कि कहीं भी कोई सबूत नहीं है कि मिस्टर एंडरसन को मालूम था कि प्लांट की डिजाइन में कहीं कोई दोष है या कहीं भी सुरक्षा की बुनियादी जरूरतों से समझौता किया गया है। कानून मंत्री, अरुण जेटली कहते हैं कि सारा मामला इस अवधारणा पर आधारित है कि कंपनी के अध्यक्ष होने के नाते एंडरसन को मालूम होना चाहिए कि उनकी भोपाल यूनिट में क्या गड़बड़ियां हैं। जेटली के नोट में साफ लिखा है कि इस बात के कोई सबूत नहीं हैं कि अमरीका में मौजूद मुख्य कंपनी के अध्यक्ष ने भोपाल की फैक्टरी के रोज के कामकाज में दखल दिया। उन्होंने कहा कि हालांकि केस बहुत कमजोर है लेकिन अगर मामले को आगे तक ले जाने की पॉलिसी बनायी जाती है तो केस दायर किया जा सकता है। जाहिर है, उस वक्त की सरकार ने कानून के विद्वान अपने मंत्री, अरुण जेटली की राय को जान लेने के बाद मामले को आगे नहीं बढ़ाया।

मौजूदा सरकार की भी यही राय है। उन्हें भी मालूम है कि केस बहुत कमजोर है लेकिन बीजेपी की ओर से मीडिया के जरिये शुरू किये गये अभियान से संभावित राजनीतिक नुकसान के डर से यूपीए सरकार भी मामला चलाने का स्वांग करने के पक्ष में लगते हैं। वैसे भी बीजेपी ने इस मामले को अपनी टॉप प्रायॉरिटी पर डाल दिया है। पता चला है कि संसद के मानसून सत्र में वे इस मामले पर भारी ताकत के साथ जुटने वाले हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि एंडरसन के केस में राजीव गांधी, अर्जुन सिंह वगैरह के साथ क्या अरुण जेटली को भी कठघरे में रखने की कोशिश की जाएगी क्योंकि अगर कांग्रेस जिम्मेदार है, तो ठीक वही जिम्मेदारी अरुण जेटली पर भी बनती है। सरकार में मंत्री के रूप में तो अरुण जेटली ने बयान दिया ही था, निजी हैसियत में भी उन्होंने यूनियन कार्बाइड खरीदने वाली कंपनी डाउ केमिकल्स को कानूनी सलाह दी थी कि डाउ को भोपाल गैस लीक मामले के किसी भी सिविल या क्रिमिनल मुकदमे में जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह सलाह अरुण जेटली ने 2006 में दी थी, जब वे डाउ केमिकल्स के एडवोकेट थे।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक फायदे के लिए बीजेपी वाले भोपाल के पीड़ितों को राहत देने के काम में हाथ डालते हैं कि नहीं। इसमें दो राय नहीं है कि 1984 से लेकर अब तक जितनी भी सरकारें दिल्ली और भोपाल में आयी हैं, वे सब भोपाल के गैस पीड़ितों के गुनहगार हैं। लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदारी कांगेस की है। अब यह साफ हो गया है कि बीजेपी का सबसे मजबूत नेता भी उसमें शामिल था। अब यह भी साफ है कि अमरीकापरस्ती की अपनी नीति के कारण न तो बीजेपी और न ही कांग्रेस, भोपाल के पीड़ितों का पक्ष लेगी। ऐसी हालत में मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह दोषियों को सामने लाये और सार्वजनिक रूप से कठघरे में खड़ा करे। द हिंदू ने बिगुल बजा दिया है, बाकी मीडिया संगठनों को भी कांग्रेस और बीजेपी के दोषी नेताओं की करतूतों को सार्वजनिक डोमेन पर लाने में मदद करनी चाहिए।

shesh narayan singh(शेष नारायण सिंह। मूलतः इतिहास के विद्यार्थी। पत्रकार। प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया। 1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की। महात्‍मा गांधी पर काम किया। अब स्‍वतंत्र रूप से लिखने-पढ़ने के काम में लगे हैं। उनसे sheshji@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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