लिखावट की गोष्‍ठी में विष्‍णु नागर का एकल काव्‍यपाठ

अभी जो 19 जून बीता, शनिवार का दिन था। उस दिन लिखावट की गोष्‍ठी में विष्‍णु नागर ने अपनी कविताएं पढ़ीं। मयूर विहार में राजीव वर्मा के घर की खुली और हवादार छत पर शाम ढलते ही कविता का माहौल बन गया। वहीं यह पता भी चला कि अब हर 15 दिन पर यहां कविगोष्‍ठी जमा करेगी। बड़े शहर में कस्‍बाई आत्‍मीयता से भरी इस कोशिश का स्‍वागत किया जाना चाहिए।

विष्‍णु नागर अभी पिछले दिनों 60 बरस के हुए। उम्र के इस पड़ाव पर उनकी रचनात्‍मक सक्रियता कायदे से बनी हुई है। अंतिका प्रकाशन से उनकी कविताओं का संकलन इसी साल छप कर आया है : घर के बाहर घर। संबोधन पत्रिका ने उन पर विशेषांक निकाला है, जिसका अतिथि संपादन किया है युवा कवि हरेप्रकाश उपाध्‍याय ने।

पिछले शनिवार की गोष्‍ठी में संजय कुंदन, रंजीत वर्मा, कुमार मुकुल, मनोज मोहन, मिथिलेश श्रीवास्‍तव, प्रेम भारद्वाज, मोहन गुप्‍त और कुबेर दत्त सहित और भी कई श्रोता मौजूद थे।

पेश है विष्‍णु नागर की कुछ कविताएं, जो उनके ताजा संग्रह घर के बाहर घर में संकल‍ित हैं…

कौन है वह मर्द

है कोई ऐसा मर्द
जो कभी फूट-फूटकर नहीं रोया

कौन होगा ऐसा अभागा
जिसके आंसू कभी किसी औरत ने नहीं पोंछे
जिसे अपने सीने से नहीं लगाया, जिसे पानी नहीं पिलाया
जिसका सिर नहीं सहलाया, जिसे चुप नहीं कराया
जिसके लिए औरत कभी किसी से लड़ी नहीं?

कौन है वह मर्द
जो किसी औरत को देख
कभी पागल नहीं हुआ
उसके पांवों में नहीं गिरा
उसके आगे नहीं गिड़गिड़ाया
उससे क्षमा नहीं मांगी
उसे खोकर जरा नहीं पछताया

होगा कोई तो जरूर वह कोई कीड़ा होगा
पांवों के नीचे आने के डर से
इधर-उधर भागता फिर रहा होगा

दिल है कि मानता नहीं

हमारे डिरेवर साहब के पास भी एक दिल है
उसके साहब होते हुए भी देखिए हमें ये बात मालूम पड़ गयी
और दिल है तो जाहिर है कि मानता नहीं है
वे जब फुर्सत में रहते हैं तब तो वह बिल्कुल भी नहीं मानता

वे दिल लगा बैठे हैं सब्जी बेचनेवाली से
जो दरअसल दिल लगाने का सबसे सुरक्षित ठिकाना है
जिससे औरों ने भी आते-जाते दिल लगा रखा है
फिर उसका भी तो एक दिल है और
दिल है तो वह भी करमजला ऐसा कि मानता नहीं

वह भी शादीशुदा है और ये भी
वो कुछ जवान है और ये हो चुके हैं अधेड़
उसके भी दो बच्चे हैं और संयोग देखिए इनके भी दो हैं
उसके बच्चों को खेलाने ये अंकलजी बनकर अकसर चले जाते हैं
जब हम कहते हैं चलो
तो दिल को छोड़कर वहीं
हमारे साथ चल देते हैं

जब हमारी कार उसी तरफ से गुजरती है
तो जाते-जाते उसको ये एक बार और
जी भरकर देख लेना चाहते हैं

हमने एक दिन उनसे कहा कि भैयाजी जो करना हो
कार चलाने से पहले क्यों नहीं कर लेते
लेकिन ऐसी बातों का
पहले कब असर हुआ है, जो अब होगा?

तो जी, वो दाहिनी तरफ देखते हैं और नाक की सीध में गाड़ी चलाते हैं
और जैसा कि सुंदरियां अकसर किया करती हैं
वह कभी तो इनको भरपूर नजरों से देखती है
कभी बिल्कुल भी नहीं देखती
आखिर वह पतिव्रता भी तो हैं

खैर हम, वह खुद और हमारी कार अभी तक सुरक्षित है
लेकिन प्रेम में हादसे तो होते ही रहते हैं
बस गाड़ी का न हो, खयाल इसका रखना डिरेवरजी।

ठीक चलने और न चलने के बीच

सब कुछ ठीक चल रहा होता है
इतना ठीक
कि गलत कुछ चल ही नहीं रहा होता —
कॅरियर, परिवार, बैंक बैलेंस, तबियत

तब भविष्यफल मनोरंजन के लिए पढ़ा जाता है
मंत्रित अंगूठियां घर में होती हैं तो उन्हें पहनना बोझ लगता है
ज्योतिषी बताता है कि जजमान अभी तो आपका और अच्छा समय आएगा
आप देखते जाइए

अचानक सब कुछ गलत चलने लगता है
इतना गलत कि कुछ ठीक चल ही नहीं रहा होता
जहां हाथ डालो, हाथ जलने लगता है
ठंडे पानी से भी शोले निकलने लगते हैं
अंगूठियां, तंत्र-मंत्र, यज्ञ-हवन, उपवास-जाप-वास्तु-तीर्थयात्राएं
कुछ काम नहीं आतीं
फिर भी ईश्वर पर विश्वास रखना होता है कि वही सब कुछ ठीक करेगा
और वह कुछ-कुछ ठीक कर भी देता है
उसे भी तो अपनी दुकान चलाना है
लेकिन वह सीख दे जाता है कि
इस बार मुझे और मेरे बन्दों को भूल मत जाना
अंगूठियां पहनना, मंत्र जाप करना, ज्योतिषियों पर भरोसा रखना
और हो सके तो बीजेपी में भर्ती हो जाना
वरना नरेंद्र मोदी की तारीफ करना तो सीख ही जाना

ईश्वर की दी यह सीख काम आती है
फिर सब कुछ तो ठीक नहीं होता
लेकिन सब कुछ गलत भी नहीं होता
ईश्वर की मेहरबानी बनी रहती है
बुजुर्गों का आशीर्वाद फलता रहता है
घर में पहले से बड़ी कार आ जाती है
मकान में तीसरी मंजि़ल जुड़ जाती है
नौकर-चाकर दिनभर दौड़ते, डांट खाते रहते हैं
प्रभु में और शेयर मार्केट में मन रमा रहता है
बेटे-बेटी, नाती-पोते एमबीए वगैरह हो रहे होते हैं
कोई अमेरिका से आ रहा होता है, कोई अमेरिका जा रहा होता है
अमेरिका अपने दूसरे घर जैसा लगने लगता है

इधर पेट से वायु निकलती रहती है
और उधर मुंह से ओम निकलता रहता है।

हमने शादी की थी

हमने शादी की थी
तो सोचा था कि जब हमारे बच्चे हो जाएंगे
तो हम उन्हें गोद में खिलाएंगे, पीठ पर चढ़ाएंगे
अपने पर मुत्ती कराएंगे
उन्हें गीत-कहानियां सुनाएंगे
कभी हम उन्हें डराएंगे
कभी वे हमें डराएंगे

फिर वे बड़े और बड़े और बड़े होते जाएंगे
फिर वे हमारे मां-बाप जैसे हो जाएंगे
और हम उनके बच्चे जैसे

कभी वे, कभी हम याद करके अपना बचपन
कभी हंसने और कभी उदास होने लग जाएंगे
कभी हम उन्हें समझाएंगे
कभी वे हमें

जब वे काम पर जाएंगे
तो हमसे कह जाएंगे
ये यहां रखा है और वो वहां
ठीक से रहना, भूख लगे तो खाना गरम कर खा लेना
हमें देर हो जाए तो घबराना मत
दवा टाइम पर ले लेना
और जरूरी हो तो हमें फोन कर लेना

जब वे शाम को आएंगे
हमें अच्छे बच्चे की तरह पाएंगे
तो इस तरह खुश हो जाएंगे
जैसे हम कभी हो जाया करते थे
वे बाजार से लायी कोई चीज हमें खिलाएंगे
पूछेंगे कैसी है
जब हम बेमन से कहेंगे कि अच्छी है
तो कभी तो कुछ नहीं कहेंगे, कभी हमारा चेहरा देख मुस्कुराएंगे
कहेंगे मुझे मालूम है कि आपको बस एक ही मिठाई पसंद है
चलो कल वह लाएंगे

हम झूठ क्यों बोलें, हमने तो इसी दिन के लिए शादी की थी।

हम तो हवा हैं हवा

एक बादल से मैंने कहा
भैया, अब तो तू बरस जा
वह नहीं बरसा, चला गया

मैंने कहा बच्चों से
आज मेरे साथ ऐसा हुआ
और मुझे तुम्‍हारे बारे में यही शंका है
क्योंकि तुम भी मेरे बादल हो पानी भरे

उन्होंने कहा पापा
हम कोई बादल थोड़े न हैं
कि बरसें तो अपनी मरजी से बरसें
हम तो हवा हैं हवा
बहते रहते हैं लगातार
याद है एक बार आपके
कपड़े उड़ा ले गये थे

जब अखबार पढ़ते हो न आप
तो हम आपको तंग करते हैं
आपका अखबार लगातार फडफ़ड़ाता रहता है
आप उसे संभालते-संभालते तंग आ जाते हो

पापा, कितनी बार हम ठंडी बयार की तरह भी आते हैं
वैसे आपकी प्राब्लम ये है कि आपको ये ज्यादा
याद रहता है कि एक बार हम लू की तरह बरसे थे

पापा आप अब बूढ़े हो चले हो
इसलिए अब आपके अखबार को नहीं
हम आपको ही अपने साथ देश-विदेश उड़ा ले जाएंगे
तब भी आप कहोगे कि अरे-अरे ये क्या कर रहे हो
मेरे साथ
बूढ़ा हूं भाई
तो हम हंसेंगे और कहेंगे — आप और बूढ़े?

आपको धीरे-धीरे अभ्‍यास हो जाएगा
उड़ने का
आप बादलों को छुआ करोगे
आप एक दिन कहोगे, यार तारों को छूने का मन कर रहा है
लेकिन आप तारों को छूकर भी कहोगे,
नहीं मुझे तो हवा के साथ ही रहना है
अपने बच्चों के साथ ही रहना है।

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