समाज न बदल पाने की कुंठा सिनेमा पर न उतारिए
♦ अनुराग कश्यप
बहस इतनी हो रही है कि पता ही नहीं चल रहा है कि कौन किससे क्या जवाब चाह रहा है। अनुराग की बात इतनी है कि सिनेमा पैसे से बनता है, साहित्य या आंदोलन पैसे से नहीं बनता। और जो सृजन पैसे पर खड़ा है, उसका पूरा रूप रंग उस पर निर्भर करता है कि पैसा कहां से आ रहा है। जनता के पैसे से जिस दिन सिनेमा बनना शुरू होगा, उस दिन जन सरोकार आ जाएंगे। अभी पूंजी के चक्रव्यूह को तोड़ने की अपनी कोशिशों को अनुराग कामयाब बनाने में लगे हुए हैं। उनकी एक और प्रतिक्रिया पढ़ें : मॉडरेटर

ऋत्विक घटक ने कहा था, अजय जी ने याद दिलाया कि जिस दिन सिनेमा का स्टॉक कागज जैसे दामों पे मिलने लगे और कैमरा कलम हो जाए, जो सिनेमा बोलो, बना दूंगा। उनके शब्द उधार ले कर मैं भी यही कहना चाहूंगा।
फिल्म का एक कैन 12 हजार का आता है और एक फिल्म बनाने में 150 कैन तो छोटी बजट की फिल्म में लगते हैं। बाकी का खर्चा पूछिए मत। सस्ती से सस्ती फिल्म बनाने में, सरकारी सब्सिडी के साथ 80 लाख लग जाते हैं, जो बहुत बनती हैं।
सिनेमा से समाज बदलना है, आंदोलन करना है, तो उतरिए और मदन मोहन मालवीय की तरह भीख मांगिए, पैसा जोड़िए और बनाइए। फिल्म की तुलना साहित्य और पेंटिंग से न ही करें तो अच्छा है।
और यदि नहीं कर सकते तो कृपया सिनेमा को अपने आंदोलनों से मुक्त करें।
विमर्श करिए, बहस करिए, हाथ में बंदूक उठाइए और बदलिए समाज को। मेरी कोशिश बस इतनी है कि सिनेमा अगर एक इंच भी बदल सकूं तो बस उतनी जिम्मेदारी चाहिए, जो मैंने उठायी है। जो जिम्मेदारी आपने उठायी है, उसे आप निभाइए। अपनी जिम्मेदारी न निभा पाने का, समाज को न बदल पाने का फ्रस्ट्रेशन सिनेमा पर न उतारिए – अपना ही समय व्यर्थ करेंगे आप।
(अनुराग कश्यप। हिंदी सिनेमा में नये और मौलिक कंटेंट पर काम करने वाले युवा फिल्मकार। सत्या की पटकथा से चर्चा में आये। ब्लैक फ्राइडे, देवडी और गुलाल महत्वपूर्ण फिल्में। उड़ान के निर्माता। उनसे anuragkashyap2000@yahoo.co.in पर संपर्क कर सकते हैं।)









हालांकि अनुराग कश्यप ने बहस की भाषा को बहुत ही अजीब धरातल पर फेंक दिया है लेकिन उनकी बात में तो दम है . वह यही तो कह रहे हैं कि इस मुल्क को हर शख्स को कोई काम दिया गया है और हर आदमी को अपना काम करना चाहिए. उन्होंने स्वीकार किया है कि वे सिनेमा के माध्यम से अपनी बात कह रहे हैं ,बाकी लोगों का जो माध्यम है उस के ज़रिये वे कह सकते हैं . यह जिद करना कि जिस तरह से मैं सोचता हूँ अगर आप उस तरह से नहीं सोचेंगें तो ठीक नहीं होगा , सोलहों आने गैर लोकतांत्रिक है. बीच में दलित विमर्श वाले भी शामिल हो गए . उनके अपने आग्रह हैं .लेकिन मैं एक साधारण पाठक के रूप में इस बहस पर नज़र रख रहा हूँ , मुझे लगता है कि बहस कहीं रास्ता भटक गयी है. हर विषय पर अपनी बात को फिट करने की जल्दी में अनुराग ने और बाकी लोगों ने बहस को बहुत नुकसान पंहुचाया है . आगे देखिये कोई सुधार हो तो हो . वैसे मैं अनुराग की नीचे उद्धृत बात को सही मानता हूँ और मुझे विश्वास है कि शरीर के अंगों से बहस को मुक्त करके उनकी इस बात पर ध्यान देने की ज़रुरत है
विमर्श करिए, बहस करिए, हाथ में बंदूक उठाइए और बदलिए समाज को। मेरी कोशिश बस इतनी है कि सिनेमा अगर एक इंच भी बदल सकूं तो बस उतनी जिम्मेदारी चाहिए, जो मैंने उठायी है। जो जिम्मेदारी आपने उठायी है, उसे आप निभाइए। अपनी जिम्मेदारी न निभा पाने का, समाज को न बदल पाने का फ्रस्ट्रेशन सिनेमा पर न उतारिए – अपना ही समय व्यर्थ करेंगे आप
अनुराग आपकी बातों में सहमति और असहमति के कई बिन्दु हैं। इन्हें नकारा नहीं जा सकता… इन पर बातें की जा सकती हैं। मेरा एतराज आपकी भाषा पर है। गालियों में बहुत ताक़त होती है और आपने इस ताक़त का दुरुपयोग किया है। यही गालियां काशीनाथजी के रचनात्मक स्पर्श से साहित्य बन जाती हैं और आप जब बोलते हैं, तो आपका दम्भ प्रकट होता है। इस अंतर को जानना आवश्यक है। आपका दम्भी लगना मेरे लिए चिंता का कारण है। आप फिल्मकार नहीं बनारस के ठाकुरों की भाषा में बातें करने लगे हैं। प्रतिभा उम्र या यश की गुलामी नहीं करती। आप लोगों को भाषा का पाठ न पढ़ाएं। जैसे आप आए और छा गए, वैसे ही कोई आएगा और आपको धो-पोंछ कर चला जाएगा और आप इतिहास के कूड़े पर गिरे होंगे। दलितों और वंचितों के स्वर आप ही नहीं असंख्य लोगों के कानों में पिघले शीशे की तरह ही गिरते हैं। प्रश्नों से जो घबराते हैं वे बस टोपी का फुदना ही बनकर रह जाते हैं। आप टोपी का फुदना बने रहना चाहते हैं, तो बने रहिए।
हृषिकेश जी, आप कहानी लिखते हैं, बहुत सम्माननीय हैं, लेकिन बात भाषा से आगे बढ़ चुकी है। आप मुद्दे पर बात कीजिए। मुद्दा ये है कि पैसे से संभव हो सकने वाले सिनेमा में गरीब आम आदमी का एजेंडा कैसे फिट किया जाए।
anurag is right…if people want to have change, they should take the lead..not the filmmaker and the useless profession of journalism. we have to be very clear about the change. are we looking for an agency which can bring change or are we trying ourselves for change. Cinema has done its duty…Hindi songs are always revolutionary, ahead of time. viewer cannt take themselves as a passive clapper. why cant they bring change in their family..neighbourhood, why r they looking for anurag kashyap, what they have done to support anurag kashyap
we should not debate the language of anurag. so what he used abusive language…abusive words are part of our so called civilised culture. not invented by anurag kashyam the filmwallah. Abusive words represent a kind of social construct, anurag used to make a dent in that construct by abusing moralist.
आपमें से कोई एक भी ऐसा है क्या जो कसम खा कर ये कह सकता है कि उसने कभी गालियों का भाषा में प्रयोग नहीं किया है….हालांकि मैं जानता हूं कि आपमें से कई ऐसी कसम खा भी लेंगे…ज़ाहिर है हम खुद अक्सर गुस्से में…आक्रोश में….या मज़ाक-दोस्ती-यारी में उसी भाषा का प्रोयग करते हैं पर फिर भी हम दूसरों पर उंगली उठाते हैं….यही हमारा सच है….और अनुराग की बातों में आगे जोड़ना चाहूंगा कि अनुराग जिसे अपना काम करना है वो करता रहेगा क्योंकि ये नकली लोग कुछ बदल नहीं सकते हैं….सिर्फ़ उंगलियां उठा सकते हैं…..वो भी असल मुद्दों की जगह गौण मुद्दों पर…..हंसी तो इस बात पर आ रही है कि लोग असल मुद्दे पर जब कुछ बोलने को नहीं ढूंढ सके तो भाषा को मुद्दा बना लिया….क्या सभ्य भाषा वालों ने बहुत बदलाव ला दिया देश में….शायद इसीलिए हम कुछ नहीं बदल सकते क्योंकि हम असल मुद्दा ही बदल देते हैं….
बोलूंगा तो आप फिर गरिआएंगे लेकिन कभी आपने ये जानने की कोशिश की है कि जिस आम आदमी के हक की लड़ाई प लड़ने की बात करते हैं,उनके मुद्दे की बात कर रहे हैं,वो इस लड़ाई को सी रुप में चाहता भी है या नहीं। आपने तो उनके सपनों को भी हाइजैक कर लिया. वो टाहते कुछ और हैं और आप हैं कि सालों से उनके वीहॉफ पर डिमांड कुछ और कर रहे हैं। ऐसे में आप कहीं से भी वैलिड नहीं रह जाते। एक स्टेट अपरेटस सरकार ने तय कर दिया है और दूसरा आप बौद्धिक बहसों के जरिए तय किए दे रहे हैं जिसे कि अल्थूसर ने आइयोलॉजिकल रिप्रेसिव एपरेटस कहा है. सरकार उनसे मुंह का निबाला,जमीन,जंगल और जल छीन ले रही है विकास के नाम पर और आप उनकी तरक्की के नाम पर उनके सपने,उनती जरुरतें,उनके मनोभावों को हथिया लेने के फिराक में हैं। विमर्श के नाम पर नेताओं जैसी नारेबाजी मत करने लग जाए प्लीज। मसला ये नहीं है कि सरोकार से जुड़ी कितनी फिल्में बनी हैं या बनायी जा रही है,मसला ये है कि सिर्फ ऐसी फिल्में बनकर भी कुछ नहीं होगा. जरुरी नहीं कि हक की लड़ाई के लिए सब झंड़ा लेकर जंतर-मंतर की दौड़ लगाए। जरुरी है कि हममें से जो भी जहां भी जिस कुर्सी पर बैठा है वो इस वंचित और हाशिए के समाज के लिए कितने स्पेस पैदा कर रहा है। चीजें प्रैक्टिस से बदलती है,कुछ प्रतीक खड़े कर देने भर से नहीं…
अनुराग भाई क्यूँकर नहीं की जानी चाहिए फिल्म की साहित्य और पेंटिंग से तुलना?क्यूँकर आप जनसरोकारों को जिन्दा रखने के लिए भीख मांगने से कतरा रहे हैं? हम ऐसा कर सकते हैं इसलिए कहते हैं कि सिनेमा से भी जनांदोलन किये जा सकते हैं और शायद इसलिए पलायन के मूड में कत्तई नहीं हैं |कभी किसी ने कोशिश नहीं की कि जनता के धन से फिल्म बनायीं जाए ,चलिए ये पहल आप करिए सबसे पहले सहयोग मै करूँगा ,लेकिन आपको ये तय करना होगा कि जनता के पैसे से बनी फिल्म में जन सरोकार भी जिन्दा रहेंगे ,इस बात की गारंटी आपको देनी होगी और खुद की जिम्मेदारी तय करने का जोखिम भी उठाना होगा इधर फ्रस्ट्रेशन तो है मगर इसलिए नहीं कि हम समाज को नहीं बदल पाए इसलिए कि जितना कुछ बदला ,जहाँ बदला ,थोडा था ,हम भी तंगहाल थे यूँ कहें की बेहाल थे (शायद अविनाश भाई के इस कमेन्ट पर की “अनुराग की बात इतनी है कि सिनेमा पैसे से बनता है, साहित्य या आंदोलन पैसे से नहीं बनता।”साहित्य या आन्दोलनों के लिए पैसा अर्जित करना आगे से हमको आपको बेईमानों की श्रेणी में ला खड़ा करेगा) |आपको समाज बदलने के लिए ८० लाख की जरुरत थी ,इसलिए आप नहीं कर पाए ,ये बात कहने से अच्छा है निकल लीजिये जनता के बीच उनका अपना सिनेमा बनाने के लिए |और हाँ पूंजी का चक्रव्यूह पूंजी को देवता मान कर नहीं तोडा जा सकता|
पैसा फिल्मों में ज्यादा लगता है इसमें बहस की गुंजाइश कहां है। किंतु संचार के मौजूद सभी साधनों में सबसे प्रभावशाली होने के नाते उससे उम्मीदें भी ज्यादा हैं। सिनेमा ने कुछ नहीं किया यह भी कहना ठीक नहीं है। अपने समय की तमाम सच्चाइयों को उसने अपने तरीके से व्यक्त किया है। आज भी अनुराग, मधुर भंडारकर,सुधीर मिश्र जैसे तमाम फिल्मकार कुछ कहने की कोशिश करते ही हैं। उनकी प्रस्तुति और विषयवस्तु में ताजगी भी है। मुख्यधारा की फिल्में क्या कर रही हैं उस पर न जाइए। बिकने के लिए तो लुगदी साहित्य भी किसी क्लासिक से ज्यादा बिकता है। उस होड़ में पड़ने का क्या फायदा। साहित्य के लिए पैसा नहीं चाहिए पर लुगदी साहित्य के लेखक तो बहुत अमीर हैं। उनकी पुस्तक के संस्करण लाखों में आते हैं। साहित्य की वैसे भी हमारे हिंदी समाज में जगह क्या है जो उसके लिए चिंतित हुआ जाए। हम तो वैसे भी वाचिक परंपरा के समाज हैं- देखने और सुनने के अभ्यासी। सो सिनेमा का असर कभी कम होने वाला नहीं है। साहित्य तो उसके प्रभाव के आसपास भी नहीं फटकता। समाज के हीरो कल भी भारतेंदु और प्रेमचंद की जगह दिलीप कुमार और देवानंद थे, आज भी उदय प्रकाश या विनोदकुमार शुक्ल की जगह अमिताभ और ऋतिक रोशन हैं। हिंदी के साहित्य और साहित्यकार की जगह जब अपने समाज में ही नहीं है तो वह मीडिया और फिल्मों से अपने सम्मान की उम्मीद तो न ही करे। मीडिया तो इतना समर्थ है कि वह लेखक गढ़ता भी है अरूंधती राय और चेतन भगत क्या अपने लेखन से बने नायक हैं। इन्हें तो मीडिया ने ही लेखक के रूप में स्थापित कर दिया है और इनके दोयम दर्जे के लेखन को महान लेखकों से ज्यादा लोकप्रियता दी है। यह अंतर ऐश्वर्या राय और राखी सावंत जैसा है। ऐश्वर्य की प्रगति जलाती है और राखी की गालियां भाती हैं।
अनुराग एक धारा को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। जिन मित्रों को उनकी जुबान दंभी लग रही है, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि वे मोहल्ला की हर पोस्ट का जवाब ना भी दें तो क्या फर्क पडेगा। हम चर्चा करने वाले लोग क्या उनकी चुनौती को स्वीकार कर सकते हैं। जहां तक मामला समाज बदलने का है, तो फिल्में देखने, पढने और लिखने के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि गले का नाप पहले रखकर फांसी का फंदा आप बनाने लगेंगे तो जिन लोगों को नाप लिया जा रहा है वे आपको फंदा ही नहीं बनाने देंगे क्योंकि वे बहुत ताकतवर हो गए हैं। उन पर हमला जरूरी है। अनुराग जिस इंडस्ट्री में जिस मुकाम पर खडे हैं, वहां पहले से स्थापित कई आकाओं की नीदं उडाए हैं। जाहिर है कोई आएगा उनकी भी नींद उडाएगा लेकिन तब तक वे वहां महत्त्वपूर्ण ढंग से उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
दूसरी बात, कोई मदद नहीं करता। हमने हमारी फिल्म शुरू की है तो उसक दो बजट थे। एक पैसा खुद हमारा था, दूसरा करोडपति अरबपति मित्रों ने आश्वासन दिया था कि आप बनाओ पैसे की चिंता मत करो। आजकल उन सब हितेषी मित्रों ने फोन उठाने बंद कर दिए हैं। पैसा था हमारे पास। कम ही सही। हमारा काम नहीं रुका। अनुराग भाई, पिछले तीन साल में जूझकर देख लिया, इस देश में फिल्म बनाने के नाम पर भीख भी नहीं देता कोई। नए लोगों को भीख देने के इच्छुक का भी पहला सवाल होता है, हीरोइन किसको लेने वाले हो।
मैं खुद रामकुमार सिंह की फिल्म की शूटिंग देख कर आया था। उनकी फिल्म बपालीवुड की मसाला फिल्म नहीं है। उसमें आम आदमी भी है। आम आदमी की चिंता में घुले जा रहे शुभैषियों से मेरा आग्रह है कि वे रामकुमार सिंह की टीम की मदद में आगे आएं।एक छाेटी शुरूआत का हिस्सा बनें।
मुझे ऐसी ही संभावनाओं में भविष्य दिख रहा है।
अपने लेख का एक प्रासंगिक अंश चिटका रहा हूं…
इन दिनों जयपुर में चुटकी बजा के की शूटिंग चल रही है। यह पी किरण की सीमित बजट की फिल्म है। इसे मॉर्निग वॉक के निर्देशक अरूप दत्त निर्देशित कर रहे हैं। चुटकी बजा के वास्तव में स्थानीय कोशिश से बन रही फिल्म है। सात व्यक्तियों के फिल्मप्रेमी समूह ने फिल्म बनाने का सामूहिक सपना देखा। उन्होंने इस सपने को पूरा करने के लिए मुंबई आने की जरूरत नहीं समझी। उनमें से तपन भट्ट, गजेंद्र श्रोत्रिय और रामकुमार सिंह ने कहानी लिखी। एस एल इंदालिया ने गीत लिखे, तो राजीव थानवी ने संगीत तैयार किया। बात आई निर्देशन की, तो उन्होंने अनुभवी लेकिन सीमित बजट में काम करने के लिए तैयार अरूप दत्त को जयपुर बुला लिया। इस तरह उनके सपने का स्वरूप बना और अब वह धीरे-धीरे आकार ले रहा है। फिल्म की मुख्य भूमिकाओं में स्थानीय कलाकार ही चुने गए हैं। केवल मुकेश तिवारी परिचित कलाकार हैं, जो राजस्थान के बाहर से आए हैं। बाकी आशीष शर्मा, शिल्पी शर्मा, ईशान आदि राजस्थान के ही हैं। मजेदार तथ्य है कि नई होने के बावजूद चुटकी बजा के की टीम जयपुर में सुचारु तरीके से फिल्म की शूटिंग कर रही है।
पूरा लेख और संदर्भ यहां पढें…
http://chavannichap.blogspot.com/2010/05/blog-post_06.html
मेरे आकाओं अब बख्स दो यारों। बहुत उल्टी कर चुके। तुम फिल्म वाले हो ऐसे ही राजकुमार हिरानी ने चेतन भगत को ‘पेल’ दिया था। और बेचारा चेतन दर्द के मारे चिल्लाने लगा था।
लेकिन सवाल अब सिर्फ इतना नहीं रहा कि अनुराग की भाषा खराब है या उनकी नीयत। वे बड़ी चतुराई से अपनी भाषा को समाज की बनती हुई पोपुलर भाषा से जोड़कर अपना बचाव करने की कोशिश कर रहे हैं और अपने आपको नैतिकता भंजक महान क्रान्तिकारी के रुप में भी पेश कर रहे हैं। उनके साथ आए कुछ कुमारनुमा लोग- मसलन, विनीत और रवीश भी नैतिकता को उसी तरह देखने की कोशिश कर रहे हैं जैसे एक संघी, हरेक मुसलमान को आईएसआई का एजेंट देखते वक्त कोशिश करता है। सवाल ये है कि नैतिकता का क्या मतलब है? क्या वो यूनिवर्सल है या काल और देश से उसका रिश्ता भी है? नैतिकता कौन तय करेगा? राहुल गांधी, नितीन गडकारी, अंबानी, रवीश या फिर अनुराग कश्यप? मान लीजिए आपकी नैतिकता ‘ग’ से शुरु होती है तो क्या जरुरी है कि वो एक स्त्री के लिए भी सही हो और एक दलित के लिए भी? हरेक युग की, हरेक व्यक्ति की, हरेक समाज की और हरेक पेशे की अपनी अलग-अलग नैतिकताएं होती है लेकिन साथ ही एक ढ़ीला ढाली युनिवर्सल नैतिकता भी होती है जिसे आप पर्यावरण संरक्षण, नारी अभिव्यक्तिकरण, दलित सशक्तिकरण आदि के समर्थन से जोड़ सकते हैं। एक परिवार की भी नैतिकता होती है जिसमें बड़ों से सम्मान और छोटों को प्यार और प्रोत्साहन देने की बात की जाती है। वैसे भी अनुराग की नैतिकता ने महिलाओं और दलितों को इस बहस से बेआवाज-बेदखल कर ही दिया है-वे खुद देख लें कि इस बहस में उनकी नुमांइदगी कितनी हो रही है और उनकी नैतिकता यहां पर कितनी एक्सेप्टेबल है। कुल मिलाकर वे और उनके तमाम समर्थक हैव्स के बीच प्ले कर रहे हैं और हैव्स नोट्स तो अभी तक अपने अंग विशेष में दम ही तलाश कर रहे हैं!
कई लालबुझक्कड़ों का ये कहना है कि ये भाषा तो आम है और दैनिक जीवन में उसका धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है। भाई मेरे, इस्तेमाल इतना ही नहीं होता-अगर बेर सराय, कटबारिया सराय या मुखर्जीनगर आपका पैमाना है तो इस्तेमाल तो वहां क्या-क्या नहीं होता। लेकिन विनीत या रवीश शायद इसे अपने जिगड़ी दोस्तों के बीच भी नहीं बोलते। हां, इंटरनेट पर आप जरुर अपने आपको बोल्ड और महान बना लेते हैं कि देखो मेरा कलेजा और मेरी नैतिकता कितनी चौड़ा है। दूसरी बात ये कि हरेक नैतिकता समय निरपेक्ष भी तो होती है-आप जिसे अपनी शाश्वत और नई नैतिकता बता रहे हैं, हो सकता है आपके बेटे उसे कूड़े में डाल दें। उसकी नैतिकता ‘ग’से नहीं कहीं और से शुरु होगी। तो फिर हरेके व्यक्ति को आजाद छोड़िये न…क्यों अपनी थोप रहे हैं। ये अपने आप में एक सामंतबाद है।
गालियों पर शोध करने वालों का कहना है कि ज्यादातर गालियां आपके अवचेतन में गहरे बसे महिलाविरोधी कुंठा का रुप होता है। शायद, फिल्म इंडस्ट्री में इसका एक्सप्रेसन आम हो, या मीडिया में भी-लेकिन क्या जनजीवन में भी ऐसा है? अगर आपका पैमाना ब्लू लाईन बसों का कंडक्टर है तो माफ कीजिए। प्लीज ये मत कहिए कि स्लम और झोपड़ पट्टियों में तो ऐसा होता ही है-लेकिन फिर स्लम वालों को अपना पैमाना अनुराग या रवीश कब से बनाने लगे?
मैं, अनुराग के फिल्म निर्माण संबंधी वित्तीय विशेषज्ञता से सहमत हो सकता हूं, लेकिन गालियों के समाजशास्त्र को उन्होंने सर के बल उल्टा खड़ा कर दिया है। दरअसल, हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां हमारे अंतर्मन का सामंत अभी पूरी तरह कुचला नहीं गया है, और हम दलित, अराजक भाषा, उसका समाजशास्त्रीय विश्लेषण और अपने आपको बोल्ड और महान मानने की मानसिकता से अपने अंदर के अहंकार को ढ़ंकने का प्रयास कर रहे हैं।
अनुराग शॉक ट्रीटमेंट के मुरीद है, उदाहरण के लिये बच्चों के लिये बनी हनुमान फिल्म ही देख लें। पर साधारण स्थिति ओर हर स्थिति में शॉक लगाना बेवकूफी है यह समझने से उनकी USP न बदल जायेगी
@ Hrishikesh Sulabh : आपकि बात से मैं सहमत नही हूं सर… माफी चाहूंगा… लेकिन गाली चाहे साहित्य में आए या सिनेमा में, वो गाली के रुप में ही आता है… गाली कोई एक्ट नही जो रुपक के तौर पर इस्तेमाल किया जाए… हां उसका प्रयोग रचनात्मक अर्थों में जरुर होता है… लेकिन वो गुस्सा भी जाहिर करता है… अनुराग कश्यप ने जो लिखा है उसमें एक गुस्सा दिख रहा है… जो अक्सर दिखता है… और ये गुस्सा वाजिब भी है… लेकिन अनुराग के लिये आप जैसे लोग जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं… वो भी ठीक नही है… रही बात उनके इतिहास के कूड़े पर गिरने कि तो ये अब संभव नही है… क्योंकि संयोग से उन्होंने जुगाड़बाज आलोचकों कि बदौलत अपनी पहचान नही बनाई है… ये फैसला तो आप फिलहाल इतिहास पर छोड़ दें… और ये काशीनाथ सिंह का जो हवाला आप दे रहे हैं… उससे अच्छा तो ये होता कि आप किसी फिल्मकार का हवाला देते…
सुलभ जी और देबाशीष से मैं सहमत हूं।
anurag sahi hai….bas sulabh ji ne jo shanka jahir ki hai wo na ho
…..dambhi hone ki ….anurag nahi honge ..aosa mera mananan hai…
aap log jo ve kahe ek batt satya hai ki anurag jo ve kahte hai wo danke ki chot pe kahate hai……aaj anurag ji ne mrinal kaul ko film banana ke lea bulaya….kise aur ne kyo nahi bulaya…ramu ne indian darshak ko jagruk banya aur anurag use ek sahi dish de rahe hai……..
warna karan and other commercial director ko ye sab sochne ki furshat kaha……
wo log to shayayd hi sapne me sochte honge………………………….
salute anurag……….anurag sirf kahte nahi balki karke dikhate ve hai
……lekin ye kahana ki sahitya ya penting se andolan nahi aa sakti to galat hai…cinema aane ke pahle jan andolan hue hai …
क्या हम देश समझते हैं
मूलत: मुद्दा वहीं अटका है कि हम जब जीते हैं तो ७०% याद रह्ता है या ३०% याद रहता है। जु़बान का क्या-हिली और अपनी सोच उगल दी…सोच तो सारा देश उगल रहा है..जैसे अभी मैं।अब कुछ प्रश्न १- हम बदलना क्या चाहते हैं..और बदल कर लाना क्या चाहते हैं…और जो बदल कर आयेगा क्या हम उसकी योग्यता रखते हैं।प्रश्न२ – हमारे देश की कल्पना क्या की गई है…२५ साल बाद हमारा देश कैसा होगा…तो क्या अभी वैसा है जिसके आधार पर हम वहाँ पहुँच सकें…प्र्श्न३ – आर्थिक निति किसके आधार पर है…अगर ८.५% का विकास है सालाना, तो दाल १०० रुपये किलो क्यूँ…प्रश्न४ – बदलाव की प्रक्रिया का चरम हम सब जानते हैं क्या उसके लिये हम तैयार हैं…क्या हम देश के लिये जीने को तैयार हैं…क्या देश की समझ हमारे अंदर है….अगर है तो, बहस क्यूँ…क्या हम सब अपनी-अपनी तरह से देश बदलना चाहते हैं…प्रश्न५ – क्या हम सिनेमा बनाना जानते हैं….समझते हैं….देखते हैं…प्रश्न बहुत हैं…जाने दें।
(सोच या विचार दिमाग में पैदा होता है,दिमाग सिर में होता है,सिर ज़मीन पर नही उतरता है।ज़मीन का सीधा संबंध हाथ और पावँ से होता है,सोच या विचार का उससे कोई संबंध नही होता,इसीलिये विचार, पूरे देश में, अर्धसत्य की तरह भटक रहा है।आईये अपनी सोच को हाथ और पावँ दें)
jab sahitya tucchagiri par utar raha hai to filmwale isse kyon parhej kare. Sulabhjee ne jis kashinath singh ke galion ko Art of literarary excellence bataya hai wahi galiyan film ‘Omkara’ ko public ki pasand banati hai. Anurag ki bhasa par bahas nahi hokar cinema ke sarokar par honi chaiye.
samajik badlao koi lottery nai hai ki jite to jite haare to haare, isme samay lagta hai, jitna bhi anurag kar rahe hai uski sarahna karni chahiye, unke kaam me badlaw ki mahak aati hai chahe wo subject ko le ke ho ya treatment ko le ke. Bhasha me ulajh ke mudde ki gahrai ko dilute karna thik nai hoga.
khud ko to badal nahi sakte samaj kya badalenge……..KHUD KO TO LATKA SAKE NAHI SOOLI PAR, SULI KO HI LATKA LIYA GALE ME….
सवाल से पहले यह साफ़ कर दूं कि सवाल ख़्याल का हिस्सा है। पहले हमारे मन में कुछ करने का ख़्याल उठता है। फिर हम बात-बहस करके उस ख़्याल को छानते-बीनते हैं। उसके बाद हम वाक़ई उसपर कुछ करते हैं या नहीं यह हमारे व्यक्तिगत स्वभाव पर निर्भर करता है। जिसपर समाज, परिवार, परिवेश का असर भी होता है। ख़्याल हमारा हो, मूत्र्त रुप देने वाला कोई दूसरा हो जो इसे हमसे बेहतर कर सकता हो, तो भी बुराई नहीं है।
क्या फ़िल्मों से कुछ बदलता है। फ़िल्म इण्डस्ट्री के अंदर व्यक्तिगत प्रयासों से कुछ बदलना और फ़िल्मों से समाज बदलना दो अलग-अलग बातें हैं। कहते हैं अनुराग ने हिंदी फ़िल्मों को थोड़ा-सा बदला पर क्या अनुराग की फ़िल्मों ने समाज को कुछ बदला ? जो बातें अनुराग की फ़िल्मों को लेकर आज कही जा रही हैं कमोबेश यही बातें सत्यजित रे, श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, सईद मिर्ज़ा, एन. चंद्रा, रामगोपाल वर्मा (और भी कई नाम हैं) की फ़िल्मों को लेकर भी कही गयीं थीं। हुआ क्या ? यहां तक कि जीतेंद्र अभिनीत कमर्शियल स्टंट ‘मेरी आवाज़ सुनो’ को लेकर भी दर्शकों में ऐसी ही आशाएं जाग उठीं थीं। आखिरकार हर तरह की शुरुआत इण्डस्ट्री के लिए एक नए फार्मूले और दर्शकों के लिए एक अलग तरह के मनोरंजन में बदलकर क्यूं रह जाती है ?
जब दर्शक फ़िल्म देखकर अंधेरे से रोशनी में आता है तो उसके मन में जो बच जाता है वो क्या है ? अगर फ़िल्म आफ-बीट भी है और अंत में मुख्य चरित्र ने अपना काम कर डाला है तो शायद दर्शक के मन में आधा काम निपट जाने की राहत होती है। अगर दर्शक बहुत संवेदनशील है तो अगले कुछ दिन तक वह बाक़ी के आधे काम की चिंता में गलता है। लेकिन मन में शायद उसके यही होता है कि दूसरे शुरु करें तो मैं भी उनके साथ लग जाऊं। छुटमुट या बड़े प्रयास करते शायद वही हैं जो पहले से करते आ रहे होते हैं।
‘शायद’ का प्रयोग यहां कई बार हो गया। अब आप ही तय करें कि कहां यह ‘शायद’ सही है और कहां ग़लत ? और यह भी कि ‘झिंझोड़ने वाली फ़िल्म’ आखिर होती कैसी है ?
(Gaali jo bhi de kripya tarkpurn de, ataarkik gaalioN ka maiN koi notice nahiN luNga.)
MERI SAMAJH MAIN NAHIL AATA KI AVINASH,MULE MUDDE SE bhatak ker ye kya bakvas laga rakhi hai..?kya ab avinash ko mohalla ke liye stariye artical milna band hogai h?ya mohalla live ka ab yahi star reh gaya h.AVINASH JI,is par gambhirta se vichar kare,varna is blog ka nam badal KR ANURAG KASHYAP GALI BLOG KR DE.MIDIA MAIN DALIT KI BHUMIKA MAIN BAAT KARNE KI BAJAI AAP TO KHUD EK AISE MIDIA KARMI KI DUM HO GAI KI JB BHI MOHALLA KHOLO ANURAG HI CIPKA HOTA HAI.usper kuch bahuda parshansko ki betkuki tippaniyo se bhi jugupsa hoti h.
और कुछ भी हो इस बहस का हासिल इतना तो है ही कि यहां ब्लागीय बहस के नये अध्यक्ष मिले। साथ ही ऐसे रैफ्री सिंह मिले जो दलित को आम आदमी में सरलीकृत करके ख़ुद बहस को डिरेल करते हैं और इल्ज़ाम दूसरों पर लगा देते हैं। अनुराग की चमचागिरी ऐसे निर्लिप्त, निर्विकार और तटस्थ भाव से करते हैं कि हो भी जाए और पता भी न चले। जज हैं जो बहसों के अंत में बताते हैं कि इसका कमेंट सही है, उसका ग़लत है, इसके पर ध्यान दिया जाए, उसके पर न दिया जाए। आॅर्डर ! आॅर्डर !
यह भी कुछ कम तो नहीं।
सिर्फ इतना कहूँगा के अपने सीमीत दायरों में रहकर भी यदि व्यक्ति अपना अपना काम इमानदारी से करे तो उसे किसी क्रान्ति के साइन बोर्ड को उठाने की जरुरत नहीं पढेगी .हम खामखां किसी बहस को लम्बा खींच रहे है …..शेष नारायण जी सही कहा है इस मुल्क को हर शख्स को कोई काम दिया गया है और हर आदमी को अपना काम करना चाहिए. उन्होंने स्वीकार किया है कि वे सिनेमा के माध्यम से अपनी बात कह रहे हैं ,बाकी लोगों का जो माध्यम है उस के ज़रिये वे कह सकते हैं .
@सुलभ जी
बनारस के ठाकुरों की याद तो आ गई क्या आपकी जाति भी बता दी जाए ? और उस जाति के सुकर्म ?
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