दिनेश श्रीनेत की कहानी: विज्ञापन वाली लड़की

♦ दिनेश श्रीनेत

विज्ञापन वाली लड़की। कानपुर से दिनेश श्रीनेत्र ने ये कहानी भेजी है। हालांकि ये दलित की कहानी नहीं है, फिर भी इसे आप सबसे साझा कर रहे हैं – क्‍योंकि ये इसी उद्देश्‍य से भेजी गयी है। यह कहानी सबसे पहले वागर्थ के अप्रैल 2006 के अंक में प्रकाशित हुई और सराही गयी थी। इसके बाद कहानी का उर्दू में अनुवाद हुआ और यह उर्दू आजकल में प्रकाशित हुई। उर्दू के पाठकों ने इसे इतना पसंद किया कि यह बाद में पाकिस्तान से आसिफ फारुकी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका दुनियाजाद में प्रकाशित हुई। जैसा कि लेखक ने हमें जानकारी दी है, यह अब तक उनकी पहली और इकलौती प्रकाशित कहानी है। कहानी अभी और भी है, पढ़ते रहिए मोहल्‍ला लाइव : मॉडरेटर

बीते एक हफ्ते से लगातार पानी बरस रहा था। आसमान में सुरमई बादल भाप की तरह उड़ते थे और पूरा शहर हवा के झोकों पर तिरती फुहारों से भीगता रहता था। भारी-भरकम पेड़ों के नीचे एक अलग किस्म की टिप-टिप होती थी। पत्तियां भीगकर भारी हो जातीं और फुनगियों से नीचे तक अटक-अटककर गिरता पानी मद्धिम सा कोलाहल पैदा करता। शाम को अचानक घना अंधेरा छा जाता था। उघर की दिशा से काली पेंसिल और खडिय़ा से रंगे बादल उमडऩे लगते और आभासी उजाले में भागती गाडिय़ों की हेडलाइट में आसमान से गिरती बूंदें चमकने लगती थीं। हर गीली चीज रोशनी पड़ते ही चमक उठती थी। बूंदा-बांदी थोड़ी देर को रुकती तो थमी हुई हवाएं जाने कहां से बदहवास चल पड़तीं, लोगों के गीले कपड़े फडफ़ड़ाने लगते और खिड़कियों से हवा के रगड़-खाने की आवाज सुनाई देती।

इस तूफानी मौसम में उसे करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर शाम को दफ्तर पहुंचना होता था। घर से कुछ दूर चलने के बाद एक पुराना पुल पड़ता था। जिसकी पानी टपकाती ईंटों पर काई और घास-फूस छाई हुई थी। थोड़ी बारिश में ही पुल के नीचे की सड़क टखनों तक गंदले पानी से भर जाती थी। ऊपर से पानी बूंद-बूंद लगातार टपकता रहता था। ऊपर से कोई ट्रेन गुजरती तो पुल की ढलान वाली छत पर चिपकी असंख्य बूंदों में हलचल मच जाती। कोयले की आंच के समीप दुबके और बात-बात पर गुर्राते आवारा कुत्तों, दिन भर की दिहाड़ी के बाद गोल घेरा बनाकर बैठे मजदूरों, चाय की प्याली से उठती भाप, टीन के ढाल पर बहते पानी के रेले और सजी मंडी की कीच भरी गलियों को पार करता वह कुछ ही देर में हाइवे पर निकल जाता था।

इस हाइवे पर आकर वह करीब एक किलोमीटर की बचत कर लेता था। लिखा-पढ़ी में इस हाइवे को ‘एनयेच 14’ के नाम से जाना जाता है। यहां आसपास नयी जिंदगी बस रही थी। गाडिय़ां बेतहाशा भागती थीं। इस इलाके में हजारों मजदूर ईंट ढोते और गारा तैयार करते नजर आते। सड़क से बहुत हटकर बलखाती नाले जैसी नदी के पास उनकी बस्तियां थीं। मटमैले और पैबंद लगे कपड़ों में इन मजदूरों के बीच भागते-गरजते वाहनों के बिल्कुल पास बेपरवाह होकर खेलते थे। शहर बदल रहा था। देखते-देखते वह चौड़ी, उदास और अकेली सड़क स्ट्रीट लाइट से जगमगाने लगी। गीली सड़क पर उनकी रोशनी दूर तक चमकती दिखाई देती। इस शहर की हलचल दरअसल उस वीराट धक-धक का एक हिस्सा थी, जो वहां सिर्फ दो सौ किलोमीटर पर हो रही थी। यह दुनिया के एक बहुत बड़े महानगर के सीमांत पर बसा कसबेनुमा शहर था, जिसकी तलछटों में कालिख, धुएं और शोर में डूबे इलाके थे। सुदूर ब्रह्मांड में अगर कोई शक्तिशाली दुरबीन से आंख टिकाकर उस शहर को देखता तो वह धड़कते दिल की तरह फैलता और सिकुड़ता दिखाई देता और सड़कों पर रेंगती गाडिय़ां नसों में टहलते रक्त की तरह नजर आतीं।

तेजी बदलता यह शहर उसके अपने घर से करीब एक हजार किलोमीटर दूर था, वह अपनी बीमार मां से एक हजार किलोमीटर दूर था, अपनी उदासी में डूबी किशोरावस्था और घुटन से भरे नौजवानी के दिनों की स्मृतियों से भी एक हजार किलोमीटर दूर था। वह हर बात से इस कदर दूर था कि लगभग चुप था। उसे बोलते बहुत कम लोगों ने देखा होगा। जिस अखबार के दफ्तर में वह काम करता था, वह शहर के बाहरी हिस्से में बसे इंडस्ट्रीयल एरिया में बना था। काम करने वालों के आने और जाने का बाकायदा रजिस्टर में टाइम नोट होता था। वर्दी पहने गार्डों और बरसाती से ढके कागज के भारी-भरकम रोल के बीच से गुजरता हुआ वह गोदाम जैसे बड़े हाल की सीढिय़ां चढ़ता था, जिसके कोने पान की पीक से कत्‍थई रहते थे। ऊपर बोर्ड के लंबे-चौड़े पार्टीशन से बने कमरों में लाइन से कंप्यूटर लगे थे, इनके की-बोर्ड और स्क्रीन मटमैले हो चुके थे और पीछे लगे तार महीनों पुरानी धूल से अटे रहते थे। वह अपनी सीट पर जाते ही खाकी लिफाफों को फाड़ता, तह लगाये कागजों को स्टैंड पर लगाता और काली-नीली रोशनाई पर आंखें टिका देता। ट्यूबलाइट की सफेद रोशनी में दर्जन भर की-बोर्ड खडख़ड़ाते रहते। आधी रात बीत जाने के बाद उसका काम खत्म होता था। अक्सर पैदल ही दूसरे रास्ते से घर की तरफ चल देता था। कभी-कभार कोई साथी अपनी दुपहिया पर बैठाकर हाईवे के मोड़ तक उसे छोड़ देता था।

यह मानसून के शुरुआती दिन थे। कहते हैं कि इस साल बरसात अच्छी हुई। सचमुच। बारिश की बूंदें आपस में टकराकर बहुत महीन फुहार का रूप धर लेतीं, जो तेज हवा में भाप की तरह तैरती दिखाई देती। ऐसी ही एक शाम जब आसमान में बादल बहुत निचाई पर धुएं की तरह तैर रहे थे और हवाओं का मिजाज तूफानी था, उसने पेड़ के नीचे ठिठुरते हुए वह विशालकाय होर्डिंग देखा। वह अवाक रह गया। इतना बड़ा होर्डिंग इससे पहले शहर में कभी नहीं लगा था। वहां हाइवे एक दूसरी सड़क से जाकर मिलता था। उधर से दौड़ती गाडिय़ों की हेडलाइट होर्डिंग पर रोशनी के सैकड़ों प्रतिबिंब बना रहे थे। उस विशालकाय विज्ञापन में कुछ ऐसा था कि वह खुद को बिल्कुल बौना महसूस करने लगा। वह एक मोबाइल कंपनी का बेहद लंबा होर्डिंग था। उसका अधिकांश हिस्सा खाली था। बायीं तरफ एक लड़की खास भंगिमा में खड़ी मुस्कुराती हुई सामने की तरफ देख रही थी। अनुपात के नजरिये से इतने बड़े होर्डिंग के एक कोने में खड़ी उस लड़की का कद सचमुच की किसी युवती जितना था। वह हैरान रह गया। वह दरअसल मुस्कुराती हुई उसी की तरफ देख रही थी।

उस दिन उसे हल्का सा बुखार भी था। पीठ में रह-रहकर दर्द की लहर सी उठ रही थी, मगर अपने संदेह को झुठलाने के लिए उसने सावधानी से सड़क पार की। पेट्रोमेक्स की लपलपाती सफेद रोशनी में भुने चने खरीदे और पलटकर होर्डिंग की तरफ देखा। लड़की अभी भी उसी की तरफ अपलक देख रही थी। वह तिराहे पर छितराई भीड़, आटो-रिक्शा और तांगे वालों के बीच देहात के लिए भागते-हकबकाए लोगों के बीच यहां-तहां भटकता रहा। और उसे पक्का यकीन हो गया। निगाहें उसका पीछा कर रही थीं। अब उस लड़की के देखने में ज्‍यादा बेबाकी थी। उसकी पूरी मौजूदगी में एक तपिश थी। एक मद्धिम आंच – जो उसकी आंखों के पीछे आहिस्ता-आहिस्ता सुलग रही थी। बलखाए बालों के बीच गाल दहक रहे थे। उस मुस्कुराहट में भी एक ताप था। एक ऐसी सुंदरता थी जो आग में होती है – निषिद्ध, खतरनाक और गरमाहट से भरी सुंदरता – जंगल में जलने वाली आग की तरह रहस्यमय। देर तक देखने पर मानो आग फैलने लगती थी, होर्डिंग जलने लगता था और उसके पिलर्स धधक कर लाल हो उठते थे। उस रात उन निगाहों ने बहुत देर तक उसका पीछा किया…

क्या यह नियति का कोई अजीबो-गरीब खेल था? वह कई रात उस विज्ञापन वाली लड़की के बारे में सोचता रहा। यह एक ऐसा सच था जो सिर्फ वही जानता था। हर बार जब उधर से गुजरता था तो विज्ञापन वाली लड़की उसकी तरफ ही देख रही होती थी। वह चोर निगाहों से अपने आसपास देखता। सभी अपने काम में मशगूल होते थे और वह उसे देखती रहती थी – बिना किसी हिचक या लाग-लपेट के। तो क्या बचपन से वह जो ख्वाब देख रहा था सही साबित हुआ। आखिर इस तकलीफ से भरी जिंदगी से परे कोई तो दुनिया है। जहां लोग सचमुच उसी तरह से खुश हैं, जिस तरह से उन्‍हें होना चाहिए – एक आदर्श जिंदगी।

विज्ञापन वाली लड़की बहुत कम दिनों में उसके सपनों में दाखिल हो गयी थी। बचपन से देखे उन सपनों के भीतर हजारों ख्वाहिशें थीं। इन ख्वाहिशों ने लंबी तपती दुपहरियों में ऊंधते कसबे के उन उकताहट से भरे दिनों जन्‍म लिया था, तब वह तेरह साल का था। कसबे में आये सिर्फ दो साल बीते थे। पिता को गुजरे भी दो ही साल बीते थे। वे एक सरकारी महकमे में बाबू थे। मां उसे लेकर सालों से बंद उस पुश्तैनी मकान में लौट आयीं, जिसकी छत पर लकड़ी की दीमक खाई कड़‍ियां लगी थीं। पड़ोस की आरा मशीन से लकड़ी चिराई के बाद बचने वाला महीन बुरादा आता था। मां उसी को अंगीठी में भरकर खाना पकाती थी। सीढिय़ों के नीचे पड़े बुरादे के ढेर से ताजा चिरी लकड़ी की खुशबू आती रहती थी। उसकी मां अनपढ़, कम बोलने वाली और बदहवास सी औरत थी। पेंशन लेने कचहरी जाती तो हर बार अंगूठा गलत जगह लगा देती और कभी बाबू तो कभी चपरासी की फटकार सुनती। रुपये लेते ही उसे थमा देती और वे उसे गिनते हुए बाहर वकीलों और मुवक्किलों से भरे गलियारे से गुजरते थे।

‘मां अब बहुत दूर है – हजार किलोमीटर दूर!’ उसने भोर के चार बजे अपनी कमर सीधी करते हुए मन ही मन सोचा। घंटे-दो घंटे को थमी बारिश अचानक तेज हो उठी और टीन की छत बजने लगी थी। रात तीन बजे जब काम खक्म करते सीढिय़ां उतरता तो अखबार छापने वाली मशीन के शोर से कुछ भी सुनाई नहीं देता था। इन दिनों वह हमेशा हाइवे से होते हुए ही घर वापस आता था। जहां विज्ञापन वाली लड़की उसके इंतजार में खड़ी मिलती थी। बिल्कुल वैसे ही जैसे पिछली रात वह छोड़ गया था। बस उसकी निगाहों का तीखापन दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था। ट्यूबलाइट की सफेद रोशनी में की-बोर्ड की अंतहीन खड़खड़ाहट के बीच उसके सहकर्मियों ने उन दिनों शायद उसमें आये बदलावों पर गौर नहीं किया। उस पूरे हॉल में एक खटखट अचानक रुक जाती थी। वह देर तक एमएस डॉस प्रोग्राम की काली स्क्रीन पर उभरे सफेद देवनागरी के अएक्षरों को घूरता रहता था और कभी-कभी मुस्कुरा उठता। और शायद हाइवे से एक मिनट के भीतर गुजरने वाले सैकड़ों लोगों में से कोई यह नहीं भांप पाता था कि घनघोर बरसात में भीगते होर्डिंग पर टिकी उस युवती की मुस्कान भी गहरी हो जाती।

विज्ञापन वाली लड़की की उस मुस्कुराहट को, उसकी निगाहों के ताप को वही पहचान सकता था। जिस पुश्तैनी घर में वह अपनी मां के साथ रहता था, वहां की नक्काशीदार पल्लों वाली एक अलमारी पुरानी पत्रिकाओं से भरी पड़ी थी। सन 1958 से लेकर 1974 तक की पत्रिकाएं – जिनके कागज पीले पड़ चुके थे और हर पत्रिका में कागज से एक अलग किस्म की खुशबू उठती थी। यह पिता से उम्र में बहुत बड़े उसके ताऊजी का संग्रह था।

घर लौटने के बाद वह अक्सर उन पत्रिकाओं की धूल झाड़ता और उन्‍हें लेकर बैठ जाता था। उसे उन किताबों में छपे विज्ञापन सबसे ज्‍यादा दिलचस्प लगते थे। हर बार जब वह उन पत्रिकाओं को खोलता तो एक अनोखा संसार सामने खुलने लगता। जिनमें मुस्कुराते हुए स्वस्थ नन्हें बच्चे थे। थोड़े बड़े बच्चों में हमेशा एक भाई और एक बहन दिखाई देते। बहन फूलों की छाप वाला फ्राक पहने रहती और उसकी हमेशा दो चुटिया बनती थी। इन बच्चों के साथ हमेशा उनके माता-पिता होते थे। बुजुर्ग दादा या नाना हमेशा कुर्सी पर अखबार पढ़ते दिखते और खुशमिजाज बूढ़ी औरतें सिलाई करती या स्वेटर बीनती नजर आती थीं। इन पुरानी पत्रिकाओं में भी फिल्मी अभिनेत्रियां एक खास साबुन को अपनी सुंदरता का राज बताती थीं। उनकी क्लैक एंड व्हाइट तस्वीर छपी होती थी। सन बासठ के बाद की बच्चों पत्रिकाओं में चीन को ललकारने वाली बाल कविताओं के अलावा अक्सर टाफियों के विज्ञापन होते थे। टाफियों के चौकौर और गोल टीन के डिक्बों पर ब्रिटिश स्टाइल के हेयर कट और फ्राक वाली युवतियां होती थीं, या फिर टॉमस हार्डी के उपन्‍यासों से निकली कोई क्वालिन। वह पूरा-पूरा दिन इन विज्ञापनों में डूबा रहता था।

बचपन से ही उसे अक्सर बुखार आता था। बुखार से समय वे तसवीरें रात को सोते वक्त तक उसके हवास पर छायी रहती थीं। रात को जब उसकी मां सोने से पहले अपने पलंग का सिरहाना पकड़कर देर तक कुछ बुदबुदाती रहती, वह बगल में लेटे-लेटे इन्‍हीं विज्ञापनों की मदद से छत की कड़‍ियों पर नयी तसवीरें बनाता-बिगाड़ता रहता था। वह खुद को बड़ा होने पर अक्सर प्रिंटेड शर्ट और बेलबॉटम पहने मोटरसाइकिल चलाते एक युवक के रूप में देखता था, जिसे उसने शूटिंग-शर्टिंग के एक विज्ञापन में देखा था। वह मां को हमेशा घर में बने मंदिर के पास आरती की थाल लिये देखता था। वह मुस्कुराते हुए उसे आशीर्वाद देती थी – वह शायद घी के किसी विज्ञापन से निकली थी।

वहीं पड़ोस के घर से मांगकर लायी नयी-ताजी पत्रिकाएं उसके सपनों में नये रंग भर रही थीं। उनमें कभी-कभार चिकने रंगीन पन्नों पर तौलिया लपेटे वह युवती दिखाई दे जाती – जिसकी जांघों का बड़ा हिस्सा खुला होता था या फिर गीजर के विज्ञापन में दरवाजे के पीछे से झांकती मॉडल, जिसके कंधों से लेकर कमर के नीचे तक का आधा हिस्सा बिल्कुल नग्न दिखाई देता। इन तसवीरों को वह देर तक देखता था – एक अव्यक्त सी सनसनी के साथ – उसका गला सूख जाता था। कई बरस पहले जब वह पिता के साथ बिहार की धरती पर भागती ट्रेन में सफर कर रहा था, तो ऊपरी बर्थ पर अकेले लेटे-लेटे किसी फिल्मी पत्रिका को पलटते सहसा पूरे पन्ने पर छपी बिकनी पहने स्त्री को देखकर अवाक रह गया था। बढ़ी धड़कनों के साथ उसे देर तक देखता रहा। उस दिन भी वैसे ही गला सूखा उठा था। पहली बार उसे महसूस हुआ कि औरत के शरीर में कितने घुमाव और कितने उतार-चढ़ाव हो सकते हैं।

बरस बीतते गये। बदलते विज्ञापनों के साथ उसके सपने भी बदलते गये। अब इन विज्ञापनों में हीरो साइकिल पर सवार उमंगों से भरे युवक-युवतियों के बीच प्रेम की तितलियां नहीं फडफ़ड़ाती थीं। उनकी जगह कसरती शरीर वाले जीन्‍स पहने उन नौजवानों ने ले ली थी, जो रोमांचकारी यात्राओं के शौकीन थे। उनके पास बाइक और स्पोर्ट-शू थे। उनके कमरे में गिटार लटकता रहता और टेबल पर बाइनाक्यूलर, कंपास और रोड मैप फैला दिखाई देता। विज्ञापन की दुनिया में युवतियां अब शालीन स्वभाव और करीने से पहने कपड़ों को पसंद करने की बजाय गठीले बदन और मर्दाने अंदाज पर फिदा होती थीं। उम्र बढने के साथ-साथ उसकी काठी, चेहरा-मोहरा और समूची शख्सियत विज्ञापनों के संसार से निराशाजनक हद तक भिन्न थी। वह दुबले-पतले शरीर और धंसी आंखों वाले आत्मविश्वास से विहीन युवक के रूप में बड़ा हो रहा था। उसके आसपास की दुनिया और भी विद्रूप होती जा रही थी। मां बूढ़ी हो चुकी थी और उसकी बदहवासी अब खुद में डूबी एक बेपरवाही में बदल गयी थी। घर के भीतर जाने कहां से मटमैले मोटे चूहों की गिनती बढ़ती जा रही थी। उन्‍होंने गाहे-बगाहे नक्काशीदार अलमारी में घुसकर पत्रिकाओं को कुतरता भी शुरू कर दिया था।

लंबी बेरोजगारी, ट्राइका की गोलियों और मां की उदासी के बाद नौकरी करने वह अपना घर छोड़कर यहां कैंसर की तरह फैलते महानगर से कुछ सौ किलोमीटर के फासले पर चला आया। यह नौकरी उसके मामा ने लगवायी थी। यहां वह पत्रिकाएं नहीं देख पाता था, मगर विज्ञापनों की दुनियां अब कागजों में कैद नहीं रह गयी थी। दूधिया रोशनी में नहाये विशाल होर्डिंग तेजी से उस शहर में फैल रहे थे। कभी-कभी वह किसी नये होर्डिंग को देखता तो बहुत देर तक उसकी ओर टकटकी लगाये रहता। टेलीविजन पर भी उसे हमेशा विज्ञापन ही भाये। कोल्ड ड्रिंक पीते बिंदास नौजवान हों या घड़ी के विज्ञापन में टेनिस खेलते, टाई की गांठ बांधते हाथ या फिर साबुन, खुशबूदार मसाले या कंडोम के बहाने चुहल करते नवदंपति, वह सभी को पूरी दिलचस्पी से देखता था। दीवारों पर पेंट के विज्ञापन में जब दरवाजे खुलते थे और पूरे घर में दौड़ते बच्चों के साथ कैमरा आगे बढ़ता था, तो उसके पूरे शरीर में सिहरन सी हो उठती थी। बचपन से विज्ञापनों में देखी गयी सुखी और खुशहाल इंसानों की तमाम छवियां नास्टेल्जिया बनकर उमड़ पड़तीं। लगता अतीत में कोई राज छिपा है, जो खो गया है और अब कभी नहीं मिलेगा। उसे उसी दूसरी दुनिया की तलाश थी। वही सच था। उस संसार में एक अनुशासन था, कोई बुरा नहीं था, सभी एक-दूसरे की इज्‍जत करते थे, सभी खुश थे, सभी जिंदगी को जीने में यकीन रखते थे, सभी वर्तमान में जीते थे। सोचते-सोचते उसका दिल उदास हो उठता था। विज्ञापन उसे हमेशा उदास कर देते और आहिस्ता-आहिस्ता मां चेहरे की झुर्रियां उभरने लगतीं।

दो दिन की चकमक धूप और चिपचिपाती उमस के बाद उस रात फिर न जाने कहां से दुनिया-जहान के बादल उस बेतरतीब से शहर के आसमान पर इकट्ठा होने लगे। रात डेढ़ बजे ग्रिड फेल हो गयी और पूरा शहर अंधकार में डूब गया। आसमान में बिजली लगातार कंपकंपा रही थी मगर कोई गर्जना नहीं थी। हवा बिल्कुल चुप थी। वह गलियों से होता हाइवे की तरफ निकल आया। आज होर्डिंग अंधेरे में डूबा हुआ था। करीब डेढ़ मिनट पैदल चलने के बाद बाद अचानक आधा आसमान भक से सफेद हो उठा। बिजली की इस कौंध में उसने जो देखा, तो उसे खुद पर यकीन नहीं हुआ…

विज्ञापन वाली लड़की होर्डिंग में नहीं थी।

हां, उसके बाद बिजली लगातार कौंधी थी और गाडिय़ों की हेडलाइट भी पड़ी। लड़की वहां कहीं भी दिखाई नहीं दी। घर आते-आते हवा और भारी हो गयी। वह कहां चली गयी? वह बिस्तर पर लेटे-लेटे सोचता रहा। नहीं! वह चौंककर उठ बैठा। यह बात इस पूरे शहर में सिर्फ वही जानता है, वह लड़की सिर्फ उसे ही तो देखती थी। नहीं! तस्वीरें बेजान नहीं होतीं। चार साल की उम्र में कैलेंडर में जब वह चटख लाल रंग की निकर पहने एक खास कंपनी के बिस्कुट खाते बच्चों को देखता तो सोचता था कि इन्हें अगर कैंची से काट लिया जाए तो ये बच्चे कैलेंडर से आजाद हो जाएंगे और हंसते-बोलते उसके घर में घूमने लगेंगे। वह लड़की भी आजाद हो गयी है। वह इसी शहर में कहीं है। हंसती-बोलती नहीं, बदहवास और बुरी तरह घबरायी हुई। यह बात कोई और नहीं जानता है। लड़की को उसे ही तलाशना होगा।

वह तीर की तरह उस अंधेरी रात में निकल पड़ा। गलियों में भौंकते आवारा कुत्तों और डीजल सने कीचड़ में धंसे ट्रकों के बीच मंडराते हिजड़ों से बचता वह मंडी की तरफ भागा जा रहा था। मंडी की संकरी गलियां हाइवे से जाकर जुड़ती थीं। वह उन तंग गलियों में बदहवास भागता जा रहा था। सब कुछ पीछे छूटता जा रहा था। तौलिया लपेटे युवती, बुरादे की महक, मां का झुर्रियों वाला चेहरा, की-बोर्ड की खटखट, कॉलेज कैंपस में बुलबुले छोड़ती कोल्ड ड्रिंक – सब पीछे छूटता जा रहा था। वह पूरे जीवन जो सोचता रहा वह गलत नहीं था। उस ‘दूसरी दुनिया’ का अस्तित्व है। वह लड़की सचमुच है और इसी शहर में कहीं गायब हो गयी है। आखिरकार भारी हवा भी बूंदों का बोझ देर तक बरदाश्त नहीं कर सकी और बूंदें बे-आवाज उस अंधेरे में डूबे शहर पर गिरने लगीं। एक गली से दूसरी गली छानते हुए आखिर वह मिल गयी। बारिश में तरबतर। दुकानों के शटर के बीच खाली हिस्से में दुबकी हुई। बारिश में भीगकर उसका ताप खक्म हो चुका था। वह रात के अंधेरे में राख की तरह उदास और सुरमई लग रही थी। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। इस तरह देखा जैसे हमेशा से एक-दूसरे को जानते हों। उनकी आंखों-नाक से पानी के परनाले बह रहे थे।

अब वह तौलिये से अपने बाल सुखा रही थी। सवा महीने से होर्डिंग में अटकी लड़की आज उसके घर थी। कौन यकीन करेगा कि कंपनी ने जिस पर लाखों-करोड़ों खर्च किए वह लड़की आजाद होकर उसकी छोटी सी बरसाती में बैठी है। उसने लड़की को गरम चाय पिलायी और नारियल वाले बिस्कुट खाने को दिए, जिसे उसने चुपचाप बच्चों की तरह खा लिया। सुबह होने वाली थी। वह सूखे कपड़ों और चादर की गरमाई में दुबककर सो गयी। सुबह 10-11 बजे आंख खुली तो देखा कि विज्ञापन वाली लड़की ने किसी भी आम हिंदुस्तानी स्त्री की तरह उसके कमरे में बिखरे सामान को काफी करीने से लगा दिया था। खुद चुपचाप कोने में बैठी अपने नाखूनों को कुरेद रही थी। वह उस लड़की से बात नहीं करना चाहता था। उसे भय था कि कहीं बात करते ही यह पारभासी हकीकत छिन्न-भिन्न न हो जाए। इसलिए वह जल्दी से जल्दी दिन की रोशनी में उस होर्डिंग को दोबारा देखना चाहता था।

दोपहर डेढ़ बजे ही वह हाइवे पहुंच गया। होर्डिंग रात की तरह खाली था। वहां कोई लड़की नहीं थी। होती भी कैसे – उसने तो बीती रात उसी के कमरे में बिस्कुट के साथ चाय सुड़की थी। हैरानी की बात थी कि सड़क से गुजरते सैकड़ों लोगों में से किसी का क्यान उस होर्डिंग की तरफ नहीं गया। उनकी छोड़ें तो तिराहे पर खोमचे, गुमटी और ठेले वालों ने भी क्या इस बात पर ध्यान नहीं दिया? उस रात वह अखबार के दफ्तर कंपोजिंग करने नहीं पहुंचा। बहाना गढ़ दिया कि तबियत खराब है। उसे संदेह हो रहा था कि कहीं यह बात खुल न जाए। घर लौटते वक्त पूरे रास्ते जहां-तहां उसे यही शक होता रहा कि कुछ लोग उसके मन में छिपी बात को ताडऩे की कोशिश कर रहे हैं।

वैसे मन की बातें ताडने का भय तो जैसे बचपन से ही उसका पीछा करता रहा। पिता की मौत के बाद उदासी से भरे बचपन के दिनों में वह हमेशा एक ही बात सोचता रहता था कि कैसे भी स्लेट पर लिखी चाक जैसी उसकी जिंदगी को कोई पोंछ दे और अचानक एक नयी जिंदगी शुरू हो जाए। जीवन में किसी भी तरह के बदलाव को लेकर उसकी उम्मीदें इस कदर खत्म हो गयी थीं कि वह हमेशा किसी चमत्कार की उम्मीद करता था। उसे यह भी लगता था कि वह इस दुनिया में औरों से खास है और उसके साथ कभी न कभी कोई चमत्कार जरूर घटित होगा। नक्काशीदार अलमारी में रखी किताबें उसे हमेशा एक सपनीली दुनिया में ले जाती थीं। उसे हमेशा वही विज्ञापन भाते थे जो खास तरह की जिंदगी जीने को आमंत्रित करते थे। किशोरावस्था के दिनों में ‘कंप्लीट मैन’ की परिभाषा बताने वाली एक शूटिंग-शर्टिंग कंपनी का विज्ञापन उसे बेहद पसंद था। उनमें हंसमुख, उदार, बच्चों और जानवरों के साथ खेलने वाले, एकांतप्रिय और प्रतिभावान पुरुष होते थे। वे स्त्रियों से प्रेम करते थे मगर अपनी बनायी दुनिया से कभी बाहर नहीं निकलते थे। वह उनके जैसा ही बनना चाहता था।

बाद के सालों में जवानी में कदम रखने के साथ टेलीविजन पर वाशिंग मशीन, रेफ्रीजिरेटर, कम कीमत वाली कारें और माइक्रोवेव ओवेन अपने साथ रिश्ते, प्रेम, सहनशीलता और सुखी जीवन की नयी परिभाषाएं लेकर आए। ये सभी वस्तुएं एक ऐसे परिवार की पृष्ठभूमि में होती थीं जो जीवन की छोटी-छोटी खुशियों में यकीन रखता था। वे एक-दूसरे का ख्याल रखते थे। बहुत मामूली सी बातें उनके रिश्तों की सघनता का संकेत दे जाती थीं। इस तरह एक इंसानी जिंदगी के तमाम रिश्तों को उसने इन विज्ञापनों से ही महसूस किया। पिता का अपने बच्चों के प्रति स्नेह, बच्चों का माता-पिता के प्रति आदर और प्रेम, या फिर भाई-बहन के बीच खिलंदड़ेपन से भरी आत्मीयता। तस्वीरों की मदद से इन रिश्तों से मन में उमडऩे वाली भावनाएं, खुशी और विषाद सब कुछ उसने महसूस किया था। वैसे उसकी खुद की मां विज्ञापनों के इस संसार से बिल्कुल अलग थी। उस पर हमेशा एक किस्म का अवसाद छाया रहता था। उसे सिर्फ रोज के काम निपटाने की चिंता रहती थी या बस इतनी कि उसके बेटे ने खाना खाया या नहीं। वह जानता था कि इन दिनों जब वह अपनी मां से हजार किलोमीटर दूर है, वह किस कदर गुमसुम सी जिंदगी जी रही होगी। यहां तक कि अगर वह बीमार पड़ गयी तो पड़ोसियों को इसकी खबर तक नहीं होगी। वह अपनी मां को फोन नहीं करना चाहता था। कभी फोन पर बात होती तो उधर से आती मां की आवाज में ऐसी लरज होती थी जो उसे घसीटती हुई बरसों-बरस बितायी उदासी से भरी जिंदगी में दोबारा फेंक देती। उसका दम घुटने लगता। वह जितना ही छुटकारा पाने के लिए हाथ-पांव मारता, उतना ही अपने स्याह अतीत में और धंसता जाता।

अब तो इस शहर में आये उसे कई साल बीत चुके थे। वह रेलवे लाइन के पार बने बेतरतीब मकानों और तंग गलियों वाले मोहल्ले में रहता था। यह इलाका काफी ढलान पर बसा हुआ था। इसकी वजह से बरसात में यहां अक्सर पानी भर जाता था। इसी इलाके में सुनसान मोड़ पर एक बहुत बड़े मकान की ऊंची-सपाट दीवारें दिखाई देतीं – जो धूप और बारिश की मार झेलकर बदरंग हो चुकी थीं और जिसकी दरारों में पीपल की कोंपलें फूट पड़ी थीं। वह दरअसल शहर के एक पुराने व्यापारी की कोठी का पिछला हिस्सा था। इसी मकान की तीसरी मंजिल पर टीन की छत वाली बरसाती में वह किराये पर रहता था। वहां तक जाने के लिए जीना बाहर गली में ही खुलता था। इसी टीन की छत वाली बरसाती में वह लड़की मौजूद थी – जो कई शहरों को जोडऩे वाली हजारों किलोमीटर लंबी सड़क के किनारे लगे होर्डिंग से रातों-रात गायब हो गयी।

उस दिन जब वह घर पहुंचा तो शाम हो गयी थी। मौसम खुला था। छत पर गया तो देखा कि जिस तरफ अभी-अभी सूरज डूबा था, उस तरफ दर्जनों पतंगें हवा में हलके-हलके कांप रही थीं। उसे अपना बदन हल्का तपता सा लगा और पेट के निचले हिस्से में मुलायम ऐंठन हुई। सुबह घर से निकलते वक्त वह दरवाजे पर बाहर से ताला लगाकर गया था। ताले में चाभी डालते वक्त उसने भीतर चल रही हलचल को भांपने का प्रयास किया, लेकिन भीतर नि:स्तब्धता थी। वह दरवाजा खोलकर अंदर गया तो देखा लड़की फर्श पर घुटने मोड़े सो रही थी। इस वक्त वह क्लैमरस मॉडल नहीं बल्कि किसी आम सुंदर लड़की जैसी दिख रही थी। अगस्त की उमस के चलते उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आयी थीं। कमरे से लगे छोटे से चौकोर किचेन में खाली बरतनों से अंदाजा लग गया कि दुपहर में उसने अपने खाने के लिए कुछ पकाया भी था। वह खुद भी फर्श पर बैठ गया और उसे सोते हुए देखता रहा।

जो उसे हमेशा से देखते चले आये थे, उन्होंने महसूस किया कि इन दिनों उसके तौर-तरीके थोड़े बदले हुए हैं। वह सीढिय़ां तेज कदम से चढऩे लगा था। उसकी कंपोजिंग में गलतियां होने लगी थीं। घर लौटते वक्त वह नुक्कड़ पर रिक्शेवालों से घिरी दुकानों से बन और मक्खन की टिक्की खरीद लेता था, ताकि घर पर इंतजार कर रही लड़की कुछ खा सके। पहली बार वह किसी के साथ सचमुच जिंदगी गुजार रहा था। उसे चाकलेट कंपनी का वह विज्ञापन याद आ गया जिसने सबसे पहले उसके जेहन में साहचर्य का भाव विकसित किया था। उसे एहसास हुआ कैसे दो इंसान उम्र और रिश्तों में अलग-अलग होते हुए भी एक दूसरे के मन की बात को समझ सकते हैं। अब तो उन दोनों के बीच बातचीत भी शुरू हो गयी थी। शुरुआत उस लड़की ने ही की थी। जब पहली बार लड़की की आवाज कानों से टकराई तो एक पल के लिए उसे अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ। बहुत साफ आवाज और बहुत स्पष्ट से शब्द।

‘तुम मुझे पहचानती थी?’
‘हां, सचमुच, तुम सबसे पहले थे – जिसने मेरी तरफ आंखें उठाकर देखा, जैसे मुझे सचमुच जानते हो…’
‘मैंने देखा कि तुम मुझे देख रही थी…’
‘हां, मैं तुमको ही देख रही थी, तुम कितनी रात गये उधर से अकेले जाते थे।’
‘मैंने आज तक यह बात किसी को नहीं बतायी है कि तुम मुझे देखती रही और अब मेरे पास हो।’
‘किसी को भी बताना भी मत…’
‘… पर तुम कौन हो?’
‘जैसे तुम हो, वैसे ही मैं भी हूं!’

लड़की ने उसे तमाम दिलचस्प बातें बतायीं। जैसे कि वह किसी मॉडल की प्रतिछाया नहीं है। वह एक महत्वाकांक्षी एड डिजाइनर की कल्पना है। वह अपने एड के लिए ऐसी लड़की चाहता था जो ‘यूनिक’ हो। उसने अपने कंप्यूटर में सैकड़ों युवतियों की तस्वीर को फीड करने के बाद उसका निर्माण किया। उसे एक व्यक्तित्व दिया गया। उसे सुंदरता, मुस्कुराहट और शोखी दी। लड़की ने कहा कि उन दोनों में कोई खास फर्क नहीं है। विज्ञापनों ने ही उसकी भी शख्सियत तैयार की है। उसे यह सच लगा- इन्हीं विज्ञापनों ने तो उसे सोचना सिखाया, सहानुभूति, प्‍यार, आदर और तपती हुई वासना का एहसास कराया था। लड़की ने हंसते हुए कहा – तुम दरअसल तुम नहीं हो, तुम तो हजारों विज्ञापनों की एक संरचना हो – बिल्कुल मेरी तरह। बस फर्क इतना है कि तुम दर्पण के उस तरफ हो और मैं इस तरफ। यह तुम कैसे साबित कर सकते हो कि दर्पण के इस तरफ असलियत है और दूसरी तरफ झूठ। वह उसे सुनता रहता था। शाम ढल जाती थी। कभी-कभी अचानक पानी बरसने लगता। घरों की बत्तियां जल उठती थीं। बाहर की रोशनी उसकी बरसाती में छनती हुई गिरती। इस अंधेरे-उजाले के बीच लड़की की सफेद आंखें चमकती हुई दिखाई देतीं। उसकी बहुत साफ फुसफुसाहट सुनाई देती और अंधेरे में कांच के टूटकर बिखर जाने जैसी हंसी भी।

वह पिछले कई दिनों से बिना किसी सूचना के दफ्तर से गायब था। उसका पूरा वक्त अब अपनी बरसाती में गुजरता था। भूख लगती तो बाहर से ताला लगाकर वह बचे हुए पैसे गिनता सीढ़ियां उतरता था और अगली गली से खाने-पीने का सामान खरीद लेता। दोनों साथ बैठकर खाना खाते और फिर बातें करते हुए वहीं फर्श पर लेटे-लेटे सो जाते। अर्सा पहले एक कंपनी ने यह समझाया था कि घड़ियां सिर्फ समय देखने के लिए नहीं होतीं, वे अगर तोहफा बनें तो प्यार के इज़हार का तरीका भी होती हैं और शरीर का आभूषण भी। उस विज्ञापन ने समझाया समय सिर्फ वह नहीं जो घड़ी में नजर आता है, समय वह है जो जीवन में घटित होता है, घड़ी तो उसका महज गवाह होती है। उस विज्ञापन में आर्केस्ट्रा की एक खास धुन बजती थी। बिथोवन और मोजार्ट की तरह – 45 सेकेंड का एक टुकड़ा – जैसे सागर की लहरें बहती चली आ रही हों।

इधर बीते पांच दिनों फिर लगातार पानी बरस रहा था। आसमान में जाने कहां से बादल उमड़ते चले आ रहे थे। झड़ी पंद्रह मिनट को भी नहीं थमती थी। शहर के पश्चिमी छोर पर बलखाती नदी अब विस्तार लेने लगी थी। शहर के निचले इलाकों में पानी भरने लगा था। नालों में अनवरत शोर करता हुआ पानी बहता रहता था। पुराने मकानों की छतें रिसने लगी थीं। सिनेमा के पोस्टर बारिश में भीगकर बेरंग हो गये थे। बिजली के तारों पर बूंदों की झालर बनी दिखाई देती थी। स्कूलों के मैदान पानी से भर गये थे और वहां शाम होते मेढकों का टर्राना शुरू हो जाता। दुकानों पर काम करने वाले लड़के क्लास्टिक की सिली हुई पन्नियों से खुद को ढके इधर-उधर भागते नजर आते। यह एक ऐसा मौसम था जब मन बेवजह उदास हो जाता है और इंसानी गरमाहट की जरूरत महसूस होती है।

वे बातों-बातों में एक-दूसरे के करीब आ रहे थे। इतना कि लड़की के शरीर से उठती खुशबू उसके नथुनों से टकराने लगती। वह लेटे-लेटे सोई हुई लड़की की सांसों के साथ उठते-गिरते सीने को देखता रहता। उसे विज्ञापन में देखी तौलिये में लिपटी आधी से ज्‍यादा खुली जांघें याद आने लगतीं या साबुन के विज्ञापनों दिखाई देती अनावृत्त पीठ और वक्षस्थल के आभासी हिस्से। उसका गला सूख जाता। ठीक वैसे ही जैसे सालों पहले ट्रेन में बिकनी पहने लड़की की तसवीर देखकर सूखा था। उस शाम लड़की का टाप पेट से बित्ते भर ऊपर खिसका हुआ था और जींस के बटन से थोड़ा ऊपर उसकी नाभि दिखाई दे रही थी। बौछारों से भरी हवा उसकी बरसाती की खिड़कियों से टकरा रही थी। इस शहर में कोई नहीं जानता कि होर्डिंग से निकलकर कोई नौजवान लड़की उसकी बरसाती में बेखबर सो रही है। आखिर वह उसी संसार का हिस्सा थी जो हमेशा उसकी पहुंच से बाहर रहा। वह एक घुटन भरी मटमैली सी जिंदगी जीता रहा और उस संसार की चकाचौंध बढ़ती रही।

उस लड़की की त्वचा की रंगत में एक किस्म की गहराई थी – जैसे बहुत दूध डालकर बनायी गयी चाय की रंगत। उस शरीर से गुजरते हुए एक दूसरी दुनिया के दरवाजे खुलते थे, जहां हंसते हुए ईमानदार लोग थे, रिश्तों की कद्र करने वाले, मन की बातें समझने वाले और छोटी-छोटी बातों में खुशी तलाशने वाले लोग थे। उसने लड़की के पेट के निचले हिस्से पर कसी हुई जींस का बटन खोल दिया। चेन अपने-आप नीचे खिसक गयी। भीतर उसने काले रंग की लेस वाली पैंटी पहन रखी थी। उसी वक्त लड़की की आंखें खुल गयीं थीं। शहर पर झुके बादलों में लगातार गडग़ड़ाहट हो रही थी। तभी शायद लड़की ने जो कुछ कहा वह उसे सुनाई नहीं दिया। बादलों की गडग़ड़ाहट बहुत देर तक समान में भटकती रही। वह स्तब्ध सा उसके ऊपर झुका रह गया। लड़की की आंखों में रोष भरी नमी थी।

बरसाती में बहुत देर तक चुप्पी छायी रही। उसके मन में ग्लानि थी। उसे अचानक हजार किलोमीटर दूर छूट गयी अपनी मां की याद आयी। याद आया कि कैसे मां घर के पिछवाड़े की थोड़ी सी कच्‍ची जमीन पर उगायी सब्जियों को सुबह के धुंधलके में तोड़ा करती थीं। वह ओस से भीगी उनकी पत्तियों को देखता रहता था। उस याद आया जब वह पैसे जोड़कर अपनी मां के साथ जूते की दुकान पर पहुंचा था। मां एक सस्ती सी चप्पल ली थी और उसके लिए कपड़े का सफेद जूता – उससे मिलता-जुलता जूता उसने किसी मैगजीन के एड में देखा था। उसे बहुत सी और बेमतलब की बातें याद आयीं और फिर एक रुलाई सीने के भीतर उमड़ने-घुमड़ने लगी। वह फूट-फूटकर रोने लगा। लड़की अंधेरे में उसे टकटकी लगाये देखती रही। उसकी आंख खुली तो चेहरा आंसुओं से तरबतर था। बिजली की कौंध में घड़ी की सूइयां चमकीं। रात के नौ बज रहे थे। कमरे में चारों तरफ लड़की कहीं नहीं दिखाई दी। उसने जल्दी-जल्दी किचेन और बाथरूम भी छान मारा। बाहर झांका तो पानी लगातार बरस रहा था – पूरे शोर के साथ। बरसाती और नीचे सीढ़ी का दरवाजा खुला था।

उस रात जैसे आसमान फट पड़ा। इस पूरे मौसम में ऐसी बारिश कभी नहीं हुई। सड़क से लगे चबूतरों की सीढिय़ां पानी में पूरी डूब गयीं। कुत्ते पानी में तैरते हुए इधर से उधर भाग रहे थे। गलियों में घुटनों तक हरहराता पानी बह रहा था। उसने देखा पानी में अखबारों के टुकड़े बहे चले जा रहे थे। सेनिटरी नैपकिन के विज्ञापन, चाय के खाली डब्‍बे पर मुस्कुराती गृहणी और दीवारों से उखड़े सिनेमा के पोस्टर उस तेज धार में नाचते हुए आंखों से ओझल हो गये। वह लड़की को खोजने के लिए भटकता रहा। मंडी में बने विशालकाय गोदाम – जहां छत पर बने पाइपों से शोर करता हुआ पानी नीचे गिर रहा था, टखनों तक पानी से भरी गलियां, सड़क के किनारे खड़ी ट्रकों की अंतहीन कतार – वह कहीं नहीं मिली। उसे अपने पेट के निचले हिस्से में फिर ऐंठन सी महसूस हुई, मगर इस बार ज्‍यादा तकलीफदेह। उसे कंपकंपी सी लगी और नथुनों से आती-जाती सांस गरम महसूस हो रही थी। उसे फिर बुखार आ गया था। वह भागता हुआ हाइवे की तरफ जा रहा था। सड़क के बगल से नाला गुजरता था। उसमें से ऐसा शोर उठ रहा था जैसे किसी पहाड़ी नदी से उठता है।

पूरे शहर में बिजली नहीं थी। होर्डिंग खाली और अंधेरे में डूबा हुआ था। बारिश में सुस्त चींटों की तरह डोलते ट्रक उस महानगर की तरफ से आ रहे थे, जो वहां से सिर्फ दो सौ किलोमीटर दूर था। उसे यकीन था कि लड़की उसी तरफ लौटेगी। वह लोहे के उन भारी-भरकम एंगल के पास कांपता हुआ खड़ा हो गया, जिन पर वह विशाल होर्डिंग टिका था। उसने खुद को शांत करने का प्रयास किया मगर उसके भीतर कंपकंपी बढ़ती चली गयी। जब पैर इस कदर थरथराने लगे कि उसे लगा कि अब खड़ा हो पाना मुश्किल होता तो वह ऐंगल पकड़कर दोहरा हो गया। उसके पेट में फिर तकलीफदेह ऐंठन शुरू हो गयी। पानी लगातार बरस रहा था। वह पानी से इस कदर तरबतर हो गया था कि उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी थी। माथे से बहता पानी नाक-मुंह के भीतर घुसता चला जा रहा था। वह घुटनों के बल वहीं कीचड़ में बैठ गया और अपने हाथों से इस तरह सिर को छिपा लिया जैसे गांव वाले पुलिस की पिटाई से बचने के लिए करते हैं।

अगली सुबह भी आसमान में बादल छाये थे और हल्की फुहार गिर रही थी। हाइवे पर एक लावारिस शव मिला। उस विशाल होर्डिंग के नीचे – जिस पर मुस्कुराती खूबसूरत लड़की का अक्स था। पानी से सराबोर शरीर बिल्कुल ठंडा और अकड़ा हुआ था। जेब में मिले कागजों से पता लगा कि वह उसी शहर से छपने वाले अखबार के दफ्तर में एक कंपोजीटर था। उसके साथ काम करने वाले लोग भी उसके बारे में बहुत कम जानते थे। उसके कमरे की छानबीन से भी कुछ खास पता नहीं चला। किचेन देखने से लग रहा था करीब दो हफ्ते से उसमें खाना नहीं पका है। अलबत्ता उसके रूम में अखबारों और पत्रिकाओं से काटी गयी विज्ञापनों की ढेरों कटिंग बरामद हुई। उनमें से बहुत सी कमरे में बिखरी हुई थीं और कई पालीथीन में सहेज कर रखी हुई थीं। घर में बन और डबलरोटियों के खाली रैपर छिटके हुए थे। एक लेटर पैड पर चार-पांच लाइनें लिखी हुई थीं। शायद वह अपनी मां को चिट्ठी लिख रहा था…

उस रात फिर बहुत पानी बरसा और विज्ञापन वाली लड़की मुस्कुराती रही!

यह कहानी हमने आज, 7 जुलाई 2010 को छापी है। फिल्‍म बनाने के लिए लेखक की अनुमति जरूरी है।

(दिनेश श्रीनेत। युवा पत्रकार। न्यू मीडिया, इंटरनेट, ग्राफिक नावेल और सिनेमा में गहरी दिलचस्पी। करीब सात-आठ साल प्रिंट में रहने के बाद बंगलुरु की एक आईटी कंपनी में ढाई साल बिताये। इन दिनों जागरण समूह के डेली आईनेक्स्ट के लिए वेब तथा प्रिंट इंटीग्रेटेड मीडिया पर काम कर रहे हैं। उनसे dshrinet@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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